हमें वह स्वर्ग नहीं चाहिए जो विकारों से युक्त हो-
हमे स्वर्ग का सुख नहीं चाहिए क्योंकि स्वर्ग विकारों से मुक्त नहीं है, स्वर्गलोक के राजा इन्द्र देव को अपने काम की पूर्ति के लिए इस भू लोक पर आना पड़ा था, और अपने काम की पूर्ति गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या से किया था। इससे लगता है कि स्वर्ग लोक में काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकार भरे पड़े हैं, फिर वहाँ सुख कैसा ? हमें ब्रह्म लोक का भी सुख नहीं चाहिए क्योंकि ब्रह्मलोक भी विकारों से मुक्त नहीं है, ब्रह्मलोक के अधीश्वर ब्रह्मा स्वयं मोह से ग्रस्त होकर भगवान कृष्ण पर संदेह करके ग्वाल बालों को उनके बछड़ों सहित छुपा दिया था। भगवान कृष्ण को एक वर्ष तक ग्वाल बाल एवं बछड़ा बनना पड़ा था। बाद में ब्रह्मा ने भगवान कृष्ण से क्षमा माँग कर मोह को नष्ट करने हेतु अनुरोध किया था। इससे लगता है ब्रह्म लोक में भी काम, क्रोध, मोह भरा पड़ा है फिर ब्रह्म लोक में सुख कैसा ? फिर तो सच्चा सुख ईश्वर की शरण में जाने से ही मिलेगा ।
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