-------भगवद् कृपा की कणिकाएँ------

--------भगवद् कृपा की कणिकाएँ-------
(१) नाना प्रकार की सांसारिक समस्याओं से घिरा मनुष्य चिन्ताओं के सागर में डूबता उतराता रहता है। वह हर क्षण दुखी रहता है, अवसाद से घिरा रहता है। परन्तु भगवद् कृपा होते ही मनुष्य दुख के सागर को पार करके खुशियों के संसार में पहुँच जाता है। 
(२) जब तक अहंकार रहता है, प्रभु की कृपा नहीं मिलती। गजेन्द्र ने सहस्त्र वर्षों तक अपने बल के अहंकार पर ग्राह  से युद्ध किया। जब अहंकार भंग हुआ तब
वह प्रभु की शरण में गया और उस पर भगवद् कृपा हुयी जिससे‌ उसका संकट
दूर हुआ।
(३) दो वस्तुएँ ही मनुष्य को इस संसार सागर में डूबने से बचाती हैं--पहला उसके द्वारा अर्जित पुण्य और दूसरा भगवद् कृपा। इसलिए मनुष्य को शुभ कर्मों में लगना चाहिए।
(३) संसार में मनुष्य धनवानों की कृपा
चाहता है यदि वह भगवद् ‌की कृपा चाहे
तो वह संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाए।
(४) भगवान् के बल और कृपा का
अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। जिसे जितना विश्वास होता है उसे उतनी ही कृपा शक्ति की सिद्धि मिलती है।

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