-----परमात्म तत्व के साक्षात्कार के लिए भगवद् कृपा की आवश्यकता----

------परमात्म तत्व‌के साक्षात्कार के लिए भगवद् कृपा की आवश्यकता-----
इस स्थावर और‌ जंगमात्मक विश्व में  मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसमें विवेक और ज्ञान की प्रधानता होती है।
मानव के अतिरिक्त समस्त प्राणियों पर
प्रकृति का कठोर नियंत्रण रहता है परन्तु मनुष्य अपने विवेक अथवा ज्ञान से प्रकृति पर नियंत्रण करने की चेष्टा करता रहता है। विवेक ही वह विभाजक रेखा है जो मनुष्य को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ बनाती है। ईश्वर की सृष्टि रचना उद्देश्य परक है। इसलिए मनुष्य के जीवन का भी कुछ न कुछ
उद्देश्य होना चहिए। 
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीनमहती विनष्टिः।--केनो०--२/५
भावार्थ--हे मानव ! अपने इस जीवन में
यदि तूने ज्ञान द्वारा परमात्मतत्व को जान लिया, तब तो  तेरा जीवन सार्थक है अन्यथा तेरा महान् विनाश निश्चित है।
परमात्म तत्व का ज्ञान क्या है ? परमात्मतत्व के ज्ञान को ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान(ब्रह्म और आत्मा की एकता का ज्ञान) कहा जा सकता है।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्य स्तस्यैषआत्म
विवृणुते तनूंस्वाम्। --कठो०--१/२/२३
जिस साधक को परमात्मा स्वयं वरण (कृपा) करते हैं उसी को परमात्म तत्व का ज्ञान ‌हो पाता है।
अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुध्यते। अजमनिद्रमस्वप्नंद्वैतं बुध्यते तदा।--माण्डूक्यकारिका, आगम--१६
भावार्थ--अनादि माया में प्रसुप्त जीव जब जग जाता है, तब वह सुसुप्तकालीन कारण प्रपञ्च, स्वप्न कालीन सूक्ष्म प्रपञ्च तथा जागृत कलीन स्थूल प्रपञ्च से रहित परम तत्व का साक्षात्कार करता है। 
इस प्रकार हम इस ‌निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि परम तत्व के साक्षात्कार के लिए
शास्त्र कृपा, गुरु कृपा, आत्म कृपा के साथ- साथ भगवद् कृपा भी आवश्यक है।
 दुर्लभं त्रैमेवैत देवानुग्रह हेतुकम्।
मनुष्यत्वं, मुमुक्षुत्वं महापुरुष संश्रयः।
     ---विवेक चूड़ामणि---
भावार्थ--मनुष्यत्व, मुमुक्षत्व तथा महापुरुष (सद् गुरु) इन तीनो की प्राप्ति बिना ईश्वर की कृपा से सम्भव नहीं है।

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