------भगवद् दया और भगवद् कृपा-----
----भगवद् दया और भगवद् कृपा------
दया, कृपा,अनुकम्पा, करुणा और अनुग्रह समान अर्थवाची हैं, फिर भी इन शब्दों में तनिक- तनिक अन्तर है। ' दया सर्व भुतेषु ' दया प्राणिमात्र पर समान रूप से की जाती है। दया में भेदभाव और पक्षपात नहीं होता है।
आत्मवत सर्वभूतेषु यो हिताय शुभाय च
वर्तते सततं हृष्टं क्रिया ह्येषा दया स्मृता।
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परस्मिन् वन्धुवर्गे वा मित्र द्वेष्टरि या सदा
आत्मवद् वर्तितव्यं हि दयैषा परिकीर्तिता।----अत्रि संहिता---४१
भावार्थ--जो सम्पूर्ण भूतों में अपने ही आत्मा के समान हित के लिए, शुभ कल्याण के लिए वर्तता है। निरन्तर समान भाव से आचरण करता हुआ
प्रसन्न होता है। उसकी उस क्रिया का नाम दया है। +. +. + + +
चाहे दूसरा पुरुष हो वा अपना वन्धुवर्ग,
चाहे मित्र हो वा अपने से द्वेष करने वाला शत्रु ही क्यों न हो, इन सबमें अपने आत्मा के सदृश जो बर्ताव किया जाता है, उसे दया कहते हैं। दया सर्व साधारण जनों पर एक समान की जाती है परन्तु कृपा अपने जन पर ही की जाती है। अपना आज्ञाकारी दास हो, अपना मित्र हो, अपना पुत्र हो----इन पर कृपा की जाती है।भागवत महापुराण में एक कथा आती है--महाराज अम्बरीश और ऋषि दुर्वासा की। इस कथा के माध्यम से हम दया और कृपा के भाव को आसानी से समझ सकते हैं।
महाराज अम्बरीश वैवस्वत मनु के पौत्र और राजर्षि नाभाग के पुत्र थे। आपके आधीन सम्पूर्ण पृथ्वी थी, फिर भी आप सुख वैभव से सर्वथा अलिप्त थे और भगवान विष्णु के भक्त थे। एक बार आपने एकादशी का व्रत रख रखा था और व्रत के उपरान्त पारण करने वाले थे तभी ऋषि दुर्वासा आ गए। आपने ऋषि दुर्वासा से भोजन के लिए आग्रह किया। ऋषि ने भोजन का निमंत्रण स्वीकार कर लिया और नदी पर स्नान हेतु चले गए। पारण के लिए विलम्ब हो रहा था। ब्राह्मणों के कहने पर महाराज
अम्बरीश ने तुलसी दल और जल से पारण कर लिया। ऋषि दुर्वासा जब स्नान करके वापस आए और उन्हें यह ज्ञात हुआ कि महाराज अम्बरीश ने पारण कर लिया है, तब ऋषि बहुत क्रुद्ध
हुए और अपनी जटा से एक बाल उखाड़ कर कृत्या को उत्पन्न किया। कृत्या महाराज अम्बरीश को निगल जाने के लिए आगे बढ़ी। भगवान विष्णु ने अपने चक्र से कृत्या का बध कर दिया
और ऋषि दुर्वासा के बध के लिए चक्र इनकी ओर बढ़ा। ऋषि दुर्वासा भगे। चक्र ने पीछा किया। ऋषि देव लोक गए
देव राज इन्द्र ने सहयोग करने से मना कर दिया। ब्रह्म लोक गए, ब्रह्मा ने भी सहयोग करने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। शिव लोक गए। भगवान शिव ने भगवान विष्णु के पास जाने के लिए कहा। दुर्वासा ऋषि आगे-आगे भागते जा रहे थे, चक्र निरन्तर पीछा कर रहा था। ऋषि विष्णु लोक पहुँचे।
भगवान विष्णु ने भी सहयोग करने से मना कर दिया और कहा, ऋषिवर ! मैं
आपकी सहायता नहीं कर सकता हूँ, क्योंकि मैं भक्त के अधीन हूँ। दुर्वासा बोले,भगवन् !भक्त तो मैं भी हूँ आपका।
भगवन् बोले, हाँ ! अनुरागी तो हैं आप मेरे। इसलिए आप दया के पात्र तो हैं, परन्तु कृपा के पात्र नहीं हैं। कृपा के पात्र तो अम्बरीश हैं। तनिक विचार कीजिए, जब आपने उनके बध के लिए कृत्या उत्पन्न की, तब न वह डरे और न भगे। उन्होंने तो अपना सबकुछ मुझे समर्पित कर रखा है ' योग क्षेमं वहाम्यहम्।' फिर उन्हें चिंता किस बात की थी ? उनकी चिन्ता करने का दायित्व तो मेरा था। परन्तु जब चक्र ने आपका पीछा किया, तब आप अपनी रक्षा हेतु देव लोक, ब्रह्म लोक, शिव लोक से भागते हुए यहाँ तक पहुँचे हैं। आप मेरी कृपा के पात्र नहीं है। हाँ ! आप दया के पात्र अवश्य हैं इसलिए हम पर दया करके ही यह बता रहे है कि आपकी रक्षा केवल अम्बरीश कर सकते हैं, यदि आप अपना प्राण बचाना चाहते हैं तो उन्हीं के पास जाइए। उन्हीं की आग्रह पर यह चक्र शान्त हो सकता है। दुर्वासा ऋषि महाराज अम्बरीश के पास आए और उनके चरणों पर गिर पड़े। महाराज अम्बरीश को बड़ा संकोच हुआ और चक्र से शान्त हो जाने के लिए प्रार्थना की। चक्र शान्त हुआ और महाराज अम्बरीश को अभय करके भगवान विष्णु के पास चला गया। इस कथा के माध्यम से यह सर्वथा सत्य प्रतीत होता है, कि भगवान समान दृष्टि से सब पर दया करने वाले हैं, मगर कृपा उन पर करते हैं जो उनके अपने जन हैं, अर्थात् जो उनके भक्त हैं। जो उनके शरणागत हैं, और जिन्होंने अपना पूर्ण समर्पण उनको कर दिया है, वही उनका (भगवान) कृपा पात्र हो सकता है।
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