--------भगवद् कृपा शक्ति------

     ------भगवद् कृपा शक्ति--------
'ईश्वरेच्छया  तृणमपि वज्रीभवति ' 
       ---केन उपनिषद: ३/१
भगवद् कृपा शक्ति से तृण भी वज्र हो जाता है। बिना भगवद् कृपा शक्ति के एक पत्ता भी नहीं हिलता है। बिना भगवद् कृपा शक्ति से संसार में कोई भी श्रेय प्राप्त नहीं किया जा सकता है। केन
उपनिषद में एक कथा आती है कि देवासुर संग्राम में देवता विजयी हुए थे, इसलिए देवताओं को अपनी-अपनी  शक्ति पर अहंकार हो गया था। अहंकार को दूर करने के लिए आसमान में ब्रह्म यक्ष के रूप में अवतरित हुआ। आसमान में अद्भुत और अप्रत्याशित प्रकाश देखकर देवराज इन्द्र ने अग्निदेव से कहा, जाकर देखो ! वह कौन है ? अग्निदेव ने वहाँ जाकर पूछा, आप कौन हैं ? यक्ष ने पूछा, आप कौन हैं ? अग्नि देव  अहंकार में बोले, मैं अग्नि देव हूँ। मैं चाहूँ तो सारे ब्रह्माण्ड को जलाकर राख  ‌कर सकता हूँ। यक्ष ने एक तिनका रख दिया और अग्नि देव से कहा, इस तिनके को जलाकर दिखाओ। अग्निदेव ने बहुत प्रयत्न किया, परन्तु तिनके को जला नहीं सके। वहाँ से लज्जित होकर
लौट आए। इन्द्र देव ने पूछा, वह कौन
 है ? अग्नि देव चुप रहे और आकर अपनी जगह पर बैेेठ गए। इन्द्र देव ने पवन देव को भेजा। पवन देव ने वहाँ पहुँचकर पूछा, आप कौन हैं ? यक्ष ने पूछा, आप कौन हैं ? पवन देव ने कहा, मैं पवन देव हूँ। मैं अपने वेग से इस ब्रह्माण्ड को उलट-पलट सकता हूँ। यक्ष ने तिनके की ओर इशारा करके कहा, इसे उड़ाकर दिखाओ। पवन देव ने बहुत प्रयत्न किया, पर तिनके को हिला न सके। वहाँ से लज्जित होकर लौट आए। इन्द्र देव ने पवन देव से जानना चाहा कि वह कौन है ? मगर वह बिना उत्तर दिए अपनी जगह पर आकर बैठ गए। देवराज इन्द्र स्वयं उठे और यह जानने के लिए कि वह कौन है ? वहाँ पहुँच गए। ब्रह्म वहाँ नहीं था। उसके स्थान पर उमा उपस्थित थीं। देवराज इन्द्र ने उमा से पूछा, माते ! वह कौन था ? उमा ने बताया, कि वह ब्रह्म था। वह इसलिए आया था कि आप लोगों को देवासुर संग्राम में विजय का अहंकार हो गया था। वह इसलिए यहाँ अवतरित हुआ था कि आप लोगों को यह आभास होना चाहिए कि आप लोगों के पास जो शक्ति है, वह शक्ति आपकी स्वयं की नहीं है बल्कि वह शक्ति उसी ब्रह्म की है। इस  ब्रह्माण्ड में सब कुछ उसी के द्वारा संचालित है। इस घटना से देवराज इन्द्र एवं अन्य देवताओं का अहंकार चूर-चूर हो चुका था। यह लिंगपुराण में इस तरह आया है।
दग्धुं तृणं वापि समक्षमस्य
यक्षस्य वह्रिनं शशाक विप्राः।
वायुस्तृणं चालयितुं तथान्ये
स्वान् स्वान् प्रभावान् सकलामरेन्द्राः।
        ----लिंगपुराण, पूर्वार्ध ५३/५६
भावार्थ--हे विप्रवृन्द। भगवद्रूप यक्ष के
सामने अग्निदेव न तो तृण को जला सके और न वायुदेव तृण को उड़ा ही सके। इसी प्रकार समस्त महान्-महान् देवता अपना-अपना प्रभाव दिखाने में समर्थ न हुए।

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