------भगवद् दया--------

      --------भगवद् दया-------
दयया सर्वभूतेषु सन्तुष्टया येन केन वा।सर्वेन्द्रियो पशान्त्या च तुष्यत्याशु जनार्दनः।। भागवत पुराण:४/३१/१९
भावार्थ-- समस्त जीवों पर दया करने से, येन केन प्रकार से संतुष्ट रहने से तथा इंद्रियों को वश में करने से मनुष्य 
जनार्दन(ईश्वर) को बहुत शीघ्र संतुष्ट कर सकता है। यहाँ हमारा अभिप्राय केवल दया से है। दया किसे कहते हैं ? न्याय शास्त्र के अनुसार ' पर दुःख प्रहाणेच्छा'
अर्थात् दूसरों के दुख को दूर करने की इच्छा रखना  'दया ' कहलाता है। बिना दया के इस संसार ‌का संचालन सम्भव नहीं है। जब बालक प्रकृति की गोद से इस संसार में अवतरित होता है तो सर्वप्रथम् बालक की माँ बालक पर दया करके उसको अपना स्तन पान कराती है और पोषण करती‌ है। बालक का पिता बालक पर दया  करके उसके पोषण के लिए धन अर्जित करता है। गुरू बालक पर दया करके उसको  शिक्षित ‌करके समाज में रहने के योग्य बनाता है फिर समाज उस पर दया करके उसे महान् बनाता है।
फिर भी मानव एक सीमित मात्रा में ही दया कर सकता है क्योंकि यह संसार द्वन्द्वमय है। मनुष्य संसारी है इसलिए वह द्वन्द्व से मुक्त नहीं हो सकता है। मनुष्य में राग भी है और द्वेष भी है। मनुष्य का जब तक जिसमें स्वार्थ रहता है, वह उसमें राग रखता है अर्थात दया का भाव रखता है और स्वार्थ के समाप्त होते ही वह उससे द्वेष करने लगता है और उसके अन्दर से दया का भाव समाप्त हो जाता है। परन्तु '  पितासि लोकस्य चराचरस्य ' जो इस संसार का पिता है वह (ईश्वर) नित्य है, अव्यय है और सर्वज्ञ है। वह समस्त जीवों के हृदय में जीव के साथ चिपका हुआ बैठा रहता है-- ' द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समान वृक्षं परिषस्वजाते।' वह समान रूप से दया करने वाला है, सबके लिए सुलभ है और भक्ति मात्र से संतुष्ट होकर मनुष्य पर असीम दया करने वाला है। हम उसी परम पिता परमेश्वर ‌की शरण में जाते हैं।
व्याधस्याचरणं ध्रुवस्य च वयो विद्या गजेन्द्रस्य का,जातिर्विदुरस्य यादवपतेरुग्रस्य किं पौरुषम्। कुब्जायाः
कमनीयरूपमधिकं किं तत्सुदाम्नोधनम्। भक्त्यातुष्यति केवल न च गुणैभिभक्तिप्रियो माधवः।
भावार्थ--प्राण हत्या कर मांस बेचने वाला व्याध(रत्नाकर), प्रपञ्च परिचय से विहीन छोटी आयु वाला ध्रुव, विद्या रहित गजेन्द्र जाति से शूद्र विदुर, पौरुषहीन यादवपति उग्रसेन, कुरूपा कुब्जा, धन हीन गरीब सुदामा आदि केवल भक्ति से भगवद्  दया की प्राप्ति की है। हमारे प्रभु ! केवल भक्ति करने से ही अपनी दया से भव पार करा देते हैं।
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