जब कई रेखाएँ एक दूसरे को काटती हुयी आपस में एक जाल बना लेती हैं तो इसे रेखा जाल कहते हैं। यह सदैव अशुभ होती हैं और जहाँ भी होती हैं वहाँ के शुभ फलों को कम कर देती हैं।
डा०सूर्यपाल सिंह का उत्कृष्ट व्यक्तित्व : मनुष्यता की उज्ज्वल परंपरा के साधक (आदरणीय डॉ. ………… के व्यक्तित्व पर एक साहित्यिक व्यक्तित्व-चित्र) सृष्टि के विराट रंगमंच पर प्रतिदिन असंख्य मनुष्य आते हैं, अपना-अपना अभिनय पूरा करते हैं और समय की धारा में विलीन हो जाते हैं। किंतु कुछ विरले व्यक्तित्व ऐसे भी होते हैं जो अपने जीवन को अभिनय नहीं बनने देते; वे उसे साधना बना देते हैं। ऐसे लोग अपने युग की धड़कनों में बस जाते हैं। वे अपने लिए नहीं जीते, वे अपने समय की चेतना के लिए जीते हैं। उनके व्यक्तित्व की ऊष्मा केवल उनके परिवार या परिचितों तक सीमित नहीं रहती, वह समाज के विस्तृत आकाश में फैलकर अनेक जीवनों को आलोकित करती है। ऐसे व्यक्तित्वों का मूल्यांकन उनके पदों, पुरस्कारों या उपलब्धियों से नहीं किया जा सकता; क्योंकि उनका वास्तविक परिचय उनके चरित्र में, उनके व्यवहार में और उनके द्वारा स्पर्श किए गए असंख्य हृदयों में सुरक्षित रहता है। भारतीय संस्कृति ने सदैव ऐसे ही मनुष्यों को अपनी सबसे बड़ी संपदा माना है। हमारे यहाँ महानता का अर्थ अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है; वैभव नहीं, विनम्रता है; और प्रसिद्ध...
----प्राणायाम से दिव्य शक्ति की प्राप्ति-- एक बार बिठूर, कानपुर के लव कुश आश्रम के प्रांगण में स्वामी श्री सत्य मूर्ति जी आए । श्री स्वामी जी ने अपनी दिव्य अलौकिक शक्ति का वहाँ प्रदर्शन किया। वह वहाँ की गुफा में प्रवेश कर गए। उन्होंने जो संकल्प लिया था उसके अनुसार उन्हें सातवें दिन प्रातः निकलना था। गुफा से द्वार पर डेढ़ फुट मिट्टी डालकर गुफा को पूरी तरह से बन्द कर दिया गया। कहीं भी हवा के प्रवेश के लिए कोई छिद्र नहीं था। उस अवसर पर तत्कालीन उ० प्र० के महामहिम राज्यपाल श्री विश्वनाथ दास जी भी उपस्थित थे। निश्चित तिथि पर बहुत भीड़ इकट्ठा थी उन सबके समक्ष मिट्टी को हटाया गया। श्री स्वामी जी जब बाहर निकले तो पूर्णतया स्वस्थ थे। उन्होंने अपने प्रवचन में कहा कि इस तरह की समाधि अबतक 142 बार विभिन्न स्थानों पर ले चुका हूँ। यह प्राणायाम योग के द्वारा सम्भव होता है। समाधि के समय हम अपने प्राण को कुम्भक करके ब्रह्माण्ड में चढ़ाकर अनन्त में समाहित हो जाते हैं और संकल्प के अनुसार निश्चित तिथि और समय पर प्राण के उतरने पर हम चेतन की अवस्था में आज जाते हैं। यह बात सन् 1837 की है जब प...
ऋगुवेद सूक्ति-- (53) की व्याख्या " भद्रं कर्णेभि: श्रृणुयाम देव:" ऋगुवेद --1/89/8 अर्थ-- हे ईश्वर ! हम अपने कानों से शुभ सुनें। यह ऋग्वेद का अत्यंत प्रसिद्ध शांति मंत्र है: मंत्र (ऋग्वेद-- 1.89.8): "भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः व्यशेम देवहितं यदायुः॥" अर्थ: हे देवताओं! हम अपने कानों से शुभ (कल्याणकारी) बातें सुनें, अपनी आँखों से शुभ दृश्य देखें, हमारे अंग (शरीर) स्वस्थ और स्थिर रहें, और हम अपनी पूरी आयु ईश्वर के हितकारी कर्मों में व्यतीत करें। भावार्थ--: यह मंत्र हमें जीवन का एक आदर्श मार्ग दिखाता है— सुनना भी शुभ हो (अच्छी बातें, सकारात्मक विचार) देखना भी शुभ हो (अच्छे कर्म, अच्छे दृश्य) शरीर स्वस्थ रहे और जीवन ईश्वर के अनुसार, धर्म और कल्याण में लगे। यह केवल प्रार्थना नहीं है, बल्कि एक जीवन-दर्शन है— कि हमारा हर इन्द्रिय-व्यवहार (सुनना, देखना, करना) शुभ और सकारात्मक हो। वेदों में प्रमाण-- 1. यजुर्वेद (तैत्तिरीय आरण्यक 4.41 / यजुर्वेद 25.21) श्लोक: भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्...
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