-- सत् लोक( जहाँ ईश्वर का निवास है)--
सत् लोक जहाँ ईश्वर का निवास है। ब्रह्म गायत्री मंत्र में सात लोक बताए गए हैं। ॐ भूः, ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्। ॐ तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्। ॐ आपो ज्योति रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्।पृथ्वी (भू ) से सत् ( सत्य मे) लोक की दूरी सोलह शंख कोस ( लगभग अड़तालिस शंख किलोमीटर) है।
(१)भू लोक-- जितनी दूर तक सूर्य का प्रकाश जाता है, वह भू लोक है। शरीर में यह मूलाधार क्षेत्र कहलाता है। जिसका केन्द्र बिन्दु मूलाधार चक्र होता है जो मेरु दण्ड के आखिरी सिरे पर नीचे सुषुम्ना नाड़ी के भीतर ब्रह्म नाडि में स्थित होता है। यहीं पर अण्ड और डिम्ब ग्रन्थियाँ होती हैं। जहाँ से शुक्र और रज नाम का रस निकलता है। इन्हीं रसों से मैथुनी सृष्टि सम्पादित होती है।
(२) भुव लोक--भू लोक (पृथ्वी) और सूर्य के बीच का स्थान भुव लोक कहलाता है। यहीं पितृ लोक स्थित है।
मनुष्य के मरने के बाद जीव पितृ लोक में जाता है, और अपने कर्म के अनुसार वह पुनः पृथ्वी पर जन्म लेता है। शरीर में यह क्षेत्र स्वाधिष्ठान क्षेत्र कहलाता है और इसके केन्द्र बिन्दु को स्वाधिष्ठान चक्र कहते हैं जो मेरुदण्ड पर सुषुम्ना नाड़ी के भीतर ब्रह्मनाडि में स्थित होता है। यहीं एक जोड़ी अधिवृक्क ग्रन्थियाँ स्थित होती हैं। जिनसे ए्ड्रेनिलीन या एपीनेफ्रीन नाम का हार्मोन (रस) निकलता है जो हमारे शरीर के आपातकालीन स्थिति में अधिक तेजी से निकलता है और अनेक कार्य जैसे हृदय की धड़कन, हृदय संकुचन, श्वसन दर तथा पुतलियों के फैलाव में सहायक होता है।
(३) स्व लोक--सूर्य लोक और ध्रुव लोक के बीच का स्थान स्व लोक है। यहीं सप्तर्षियों के लोक, इन्द्रादि लोक स्थित है। इसे स्वर्ग लोक भी कहते हैं। यह सूर्य
लोक से सोलह लाख योजन ऊपर स्थित है। पुण्य कार्य करने वाला सात्विक व्यक्ति यहीं स्वर्ग लोक में आकर स्वर्ग के सुखों को भोगता है और
पुण्य क्षीण होने पर वह पुनः भूलोक में आ जाता है। समस्त विकार काम, क्रोध लोभ आदि यहाँ भी विद्यमान हैं। स्वर्ग
के राजा इन्द्र ने कामातुर होकर पृथ्वी पर आकर अहल्या के साथ व्यभिचार किया था। यह कथा सर्व विदित है।शरीर में यह क्षेत्र मणिपुर क्षेत्र कहलाता है और इसके केन्द्र बिन्दु को मणिपुर चक्र कहते हैं जो मेरुदण्ड पर सुषुम्ना नाड़ी के भीतर ब्रह्म नाडि में स्वाधिष्ठान चक्र के ऊपर स्थित होता है। यहीं पर पाचक ग्रन्थियाँ लीवर, पैंक्रियाज़ आदि स्थित हैं। इनसे निकलने वाले हारमोन्स से भोजन पचता है, जो शरीर को शक्ति देता है।
(४) मह लोक--ध्रुव लोक से एक करोड़
योजन तक ऊपर का स्थान महर्लोक कहलाता है, इसे ब्रह्म लोक भी कहते हैं। यहीं ब्रह्मा का निवास है। समस्त विकार इस लोक में भी विद्यमान हैं। ब्रह्मा स्वयं मोह में पड़कर भगवान कृष्ण
को ग्वाला समझ बैठे थे। मानव निर्गुणा
भक्ति की साधना करके ब्रह्म लोक अथवा इसके ऊपर के लोकों में पहुँचता है। शरीर में इसे अनाहत अथवा हृदय क्षेत्र कहते हैं और इसके केन्द्र बिन्दु को
अनाहत अथवा हृदय चक्र कहते हैं, यह
चक्र मणिपुर चक्र के ऊपर मेरुदण्ड पर सुषुम्ना नाड़ी के भीतर ब्रह्म नाडि में स्थित होता है। इस पर हृदय ग्रन्थियाँ
स्थित होती हैं, जिससे निकलने वाला
हारमोन्स (रस ) हृदय और फेफड़े को पोषित करता रहता है।
(५) जन लोक--महर्लोक से ऊपर बीस करोड़ योजन तक का क्षेत्र जन लोक कहलाता है। इसे विष्णु लोक भी कहते हैं। यहाँ भगवान विष्णु का निवास है।
यहाँ पर विकारों की पैठ नहीं है। यह
क्षेत्र विकार मुक्त है। मानव निर्गुणा
भक्ति से अथवा चक्रों के मन्थन से इस क्षेत्र तक अथवा इसके ऊपर के क्षेत्रों की यात्रा पूरी करता है। शरीर में यह
विशुद्ध क्षेत्र कहलाता है और इसके केन्द्र बिन्दु को विशुद्ध चक्र कहते हैं।
यह चक्र अनाहत चक्र के ऊपर मेरुदण्ड पर सुषुम्ना नाड़ी के भीतर ब्रह्मनाडि में स्थित होता है। यहीं थायरायड और पैरा थायरायड ग्रन्थियाँ स्थित होती हैं ,
जिनसे थायराक्सिन नाम का रस निकलता है जो रक्त में कैल्शियम की मात्रा को निर्धारित करता हैं।
(६) तप लोक--जन लोक से आठ करोड़ योजन ऊपर तक का स्थान तप लोक कहलाता है। इसे शिव लोक भी कहते हैं। यहाँ भगवान शिव का निवास है। मानव निर्गुण, निर्विकार, निर्विशेष प्रकाश बिन्दु की साधना से अथवा चक्रों के मन्थन से इस लोक की यात्रा पूरी करता है। शरीर में यह आज्ञा क्षेत्र कहलाता है और इसके केन्द्र बिन्दु को आज्ञा चक्र कहते हैं, यह चक्र विशुद्ध चक्र के ऊपर मेरुदण्ड पर सुषुम्ना नाड़ी के भीतर ब्रह्म नाडि में स्थित होता है। यहीं पियूष ग्रन्थि स्थित होती है। यह ग्रन्थि स्फेनायड हड्डी के बीच में स्थित एक गड्ढे में होती है, इससे सोमेटोट्रापी हारमोन (एस टी एच) निकलता है। जिसकी अधिकता से मानव का क़द अप्रत्याशित रूप से अधिक बढ़ जाता है और टी एस एच की कमी से मानव बौना हो जाता है। एस टी एच अन्य ग्रन्थियों से निकलने वाले हारमोन्स को नियन्त्रित करता है।
(७) सत लोक--सत् लोक तप लोक से
ऊपर बारह करोड़ योजन तक का क्षेत्र
सत लोक कहलाता है। यहीं ईश्वर (भगवान कृष्ण) का निवास है। इसे गोलोक भी कहते हैं। मानव निष्काम प्रेम भक्ति से सगुण, साकार, सविशेष की साधना (आत्म समर्पण)से इस लोक तक की यात्रा पूरी करता है। यहाँ आने के बाद जीव पुनः नीचे के क्षेत्रों में नहीं जाता है, वह आवागमन के बन्धनों से सदा के लिए मुक्त हो जाता है। शरीर में यह सहस्रार क्षेत्र कहलाता है और इसके केन्द्र बिन्दु को सहस्रार चक्र कहते हैं, यह चक्र आज्ञा चक्र के ऊपर मेरुदण्ड पर सुषुम्ना नाड़ी के भीतर ब्रह्म नाडि में स्थित होता है। यहीं पीनियल ग्रन्थि स्थित होती है, जिससे निकलने वाले हारमोन्स से जीवों में चेतनता आती है। सोने और जागने में सहायक होता है।
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