(24) मणिबन्ध से अँगूठे तक जाने वाली भाग्य रेखा व्यक्ति को राजा बना देती है।

भाग्य रेखा ---इसे ऊर्ध्व रेखा अथवा 
Fate Line भी कहते हैं। यह रेखा हथेली के मध्य भाग से होकर शनि के स्थान को घेरती है इससे प्रारब्ध का भी
ज्ञान होता है इसलिए इसे प्रारब्ध रेखा भी कहते हैं। भाग्य रेखा से जीवन में होने वाली मुख्य घटनाओं की जानकारी मिलती है। भाग्य रेखा निम्नलिखित स्थानों से होकर आरम्भ हो सकती है--
(१) जीवन रेखा से---यदि भाग्य रेखा जीवन रेखा से आरम्भ हो तो व्यक्ति अपने परिश्रम से जीवन में सफलता प्राप्त ‌करता है। ऐसे व्यक्ति का प्रारम्भिक जीवन कठिनाई से भरा होता है, क्योंकि उस समय उसके पिता अपनी इच्छानुसार चलने में उसके मार्ग में बाधाएँ उत्पन्न करते हैं। ऐसी भाग्य रेखा जिस आयु में जीवन रेखा से अलग होती है वही वह समय होता है जब वह स्वतंत्र होकर अपना जीवन आरम्भ करता है।
(२) मणिबन्ध से--जब भाग्य रेखा 
मणि बन्ध से निकलकर हथेली के मध्य से होती हुयी शनि पर्वत तक पहुँचती है 
और यदि हथेली में सूर्य रेखा भी स्पष्ट बनी है तो व्यक्ति का जीवन प्रतिभा, 
सौभाग्य और सफलता से पूर्ण होता है।
(३) चन्द्र पर्वत से--जब भाग्य‌ रेखा चन्द्र पर्वत से प्रारम्भ होती है तब व्यक्ति का भाग्य परिवर्तनशील होता है और दूसरों पर आश्रित होता है। ऐसी रेखा जब हृदय रेखा से मिल जाती है तो वैवाहिक
जीवन सफल होता है। यदि मणिबन्ध से
शनि पर्वत पर पहुँचने वाली भाग्य रेखा 
से चन्द्रपर्वत से आने वाली कोई रेखा मिलती है तो व्यक्ति का भाग्य विपरीत योनि के सहयोग से आगे बढ़ता है। यदि चन्द्र पर्वत से आने वाली यह रेखा भाग्य रेखा से बिना मिले साथ-साथ आगे बढ़ती है तो विपरीत योनि का प्रभाव बना रहता है। जब हथेली में बढ़ती हुयी 
भाग्य रेखा से निकलकर कोई शाखा वृहस्पति पर्वत पर, सूर्य पर्वत पर अथवा बुध पर्वत पर जाए तो भाग्य पर इन पर्वतों का प्रभाव पड़ता है। यदि वृहस्पति पर पहुँचे तो शासन करने वाले उच्च पद को व्यक्ति प्राप्त करता है। यदि सूर्य पर्वत पर पहुँचे तो व्यक्ति धनवान होता है और समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। यदि बुध पर्वत पर पहुँचे तो व्यक्ति विज्ञान अथवा व्यापार के क्षेत्र में 
सफलता प्राप्त करता है। यदि भाग्य रेखा शनि पर्वत पर पहुँचने के बजाय किसी अन्य पर्वत की ओर मुड़ जाए तो 
व्यक्ति का भाग्य उस पर्वत के गुणों से प्रभावित होता है। जब भाग्य रेखा शनि पर्वत पर पहुँचती है तो व्यक्ति भाग्य का गुलाम होता है और जीवन में इसी कारण से दुखी रहता है। सूर्य रेखा के साथ में यह रेखा शुभ होती है। यदि भाग्य रेखा शनि पर्वत को पार करके 
मध्यमा उँगली से मूल तक पहुँच जाए 
तो व्यक्ति स्वयं पर नियन्त्रण नहीं रख पाता है। व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य पर
व्यक्ति का नियन्त्रण बिल्कुल नहीं होता।
यदि भाग्य रेखा हृदय रेखा पर जाकर रुक जाती है तो जीवन में गलत तरीके से किए गए प्रेम के कारण बरबादीआती
है।
 यदि भाग्य रेखा हृदय रेखा से मिलकर दोनों वृहस्पति पर्वत की ओर बढ़ जाएँ तो व्यक्ति दूसरों का प्रेम पाकर अपना जीवन सुखमय बनाता है और अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति करने में सफल होता है तथा मित्रों द्वारा उसे आर्थिक लाभ भी होता है। 
जब भाग्य रेखा मस्तक रेखा द्वारा आगे बढ़ने से रोक दी जाती है तो व्यक्ति के जीवन में उसकी अल्पबद्धि तथा मानसिक विकारों से रुकावट आती है।
जब भाग्य रेखा हथेली के मध्य (मंगल पर्वत) से आरम्भ होती है तब व्यक्ति का जीवन कठिनाई से भरा होता है और लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ता है। यदि इसकी एक
शाखा सूर्य पर्वत की ओर चली जाए तो
व्यक्ति बिना किसी के सहायता से धन, प्रतिष्ठा और सफलता प्राप्त करता है।
यदि भाग्य रेखा मस्तक रेखा से आरम्भ हो तो व्यक्ति का भाग्योदय देर से (३५ वर्ष बाद) होता है। इस तरह की भाग्य रेखा की एक शाखा शुक्र पर्वत की ओर 
जाए और दूसरी चन्द्र पर्वत की ओर जाए तो व्यक्ति का जीवन रोमांस भरा
होता है।
जब भाग्य रेखा जीवन रेखा के अन्दर से आरम्भ होती है तो व्यक्ति के जीवन पर 
उत्तेजनात्मक प्रेम का प्रभाव पड़ता है।
वह प्रेम में धोखा खाता है। यदि स्त्री में
इस प्रकार की भाग्य रेखा है तो दुर्भाग्य
का प्रतीक है।
यदि भाग्य रेखा टूटी-फूटी है तो अशुभ है। परन्तु टूटने को बाद इस टूट को ढकते हुए दूसरी भाग्य रेखा आगे बढ़े तो
यह भाग्य में परिवर्तन का प्रतीक है। किस आयु में यह परिवर्तन होगा इसकी जानकारी हम भाग्य रेखा को सौ बराबर भागों में बाँटकर कर सकते हैं। जब कोई छोटी रेखा भाग्य रेखा से मिले तो वह समय व्यक्ति के विवाह का सूचक है। यदि यह रेखा भाग्य रेखा के साथ-साथ चलती है तो व्यक्ति का विवाह नहीं होता है। यदि भाग्य रेखा को काटती हुयी यह रेखा मंगल पर्वत पर पहुँच जाए तो व्यक्ति को अन्य व्यक्ति के द्वारा हानि पहुँचाने की सम्भावना होती है।
दोहरी भाग्य रखने वाले व्यक्ति का जीवन भी दो प्रकार का होता है। कुछ दूर साथ चलकर जब ये रेखाएँ आपस में मिल जाती हैं तो दोहरे जीवन का कारण प्रेम का अभाव होता है। जब तक ये रेखाएँ मिलती नहीं हैं तब तक प्रेम चलता रहता है परन्तु जब ये आपस में मिल‌ जाती हैं तब व्यक्ति का विवाह उससे हो जाता ‌है। यदि भाग्य रेखा धुँधली हो तो ऐसा व्यक्ति भाग्य पर विश्वास नहीं करता है, केवल कर्म पर विश्वास करता है। यदि मस्तक रेखा बलवान है तो वह अपने जीवन में अपनी बौद्धिक क्षमता से सफलता प्राप्त करता है।
भाग्य रेखा पर द्वीप का चिह्न अशुभ होता है। यदि आरम्भ में द्वीप है तो व्यक्ति का जन्म रहस्यमय होता है (अवैध सन्तान भी हो सकती है)। यदि
कोई रेखा भाग्य रेखा से आकर शुक्र पर्वत पर पहुँच जाए और इस रेखा के आरम्भ में ही द्वीप हो ऐसी स्त्री किसी पुरुष द्वारा फुसलाए जाने पर अथवा पुरुष किसी स्त्री द्वारा फुसलाए जाने पर अवैध सम्बन्ध स्थापित करता है। यदि
मंगल पर्वत पर भाग्य रेखा पर कोई चिह्न हो तो व्यक्ति का जीवन संघर्षमय 
होता है और धन की हानि भी हो सकती है। यदि द्वीप भाग्य रेखा और मस्तक रेखा के मिलन स्थान पर है तो व्यक्ति की मूर्खता एवं मानसिक विकारों से  उसकी क्षति होगी। यदि द्वीप भाग्य रेखा
और हृदय रेखा के मिलन के स्थान पर है तो विपरीत योनि के प्रेम के कारण 
व्यक्ति की क्षति होगी। यदि द्वीप चिह्न 
भाग्य रेखा पर शनि पर्वत पर है तो व्यक्ति के जीवन के अन्त में गरीबी और धनहीनता आएगी। यदि द्वीप चिह्न भाग्य रेखा के अन्त में है तो यह मृत्यु का सूचक है। यदि द्वीप शनि पर्वत पर है तो व्यक्ति अपमानित होकर मरता है।
फाँसी पर भी लटक सकता है।
एक अन्य मत के अनुसार----
यदि भाग्य रेखा मणिबन्ध से अँगूठे तक जाती है तो व्यक्ति राजा बनता है। यदि तर्जनी तक जाती है तो व्यक्ति मन्त्री या
राज कुमार बनता है। यदि मध्यमा तक जाती है तो व्यक्ति प्रतिभाशाली नेता
अथवा सेनाध्यक्ष बनता है। यदि अनामिका तक जाती है तो व्यक्ति अत्यन्त धनवान बनता है। यदि कनिष्ठिका तक जाती है तो व्यक्ति को
मान प्रतिष्ठा मिलती है।

 

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