(23) गहरी और चौड़ी सन्तान रेखाएँ पुत्र की सूचक होती हैं।
वे रेखाएँ जो विवाह रेखा के ऊपर की ओर उठती हुयी दिखायी देती हैं, सन्तान रेखाएँ कहलाती हैं। यदि उँगलियों के छोर से हथेली के इस भाग को अच्छी तरह से दबाया जाए तो सन्तान रेखाएँ स्पष्ट दिखती हैं। चौड़ी और गहरी रेखाएँ
पुत्र की सूचक होती हैं और पतली रेखाएँ पुत्री की सूचक। जब ये रेखाएँ सबल नहीं होती हैं, टेढ़ी-मेढ़ी होती हैं तो बच्चे दुर्बल होते हैं। यदि किसी संतान रेखा के आरम्भ में द्वीप है तो बच्चा बहुत कमज़ोर होगा। यदि द्वीप के बाद में रेखा स्पष्ट है तो बच्चे के स्वास्थ्य में बाद में सुधार हो जाएगा। यदि द्वीप चिह्न सन्तान रेखा के अन्त में है तो बच्चे का स्वास्थ्य कभी ठीक नहीं होगा। यदि सन्तान रेखाओं में से कोई एक रेखा अधिक सबल और स्पष्ट है तो वह अपने माँ-बाप का बहुत प्रिय होगा और वह अन्य की तुलना में अधिक सफल होगा।
एक मत के अनुसार जिस व्यक्ति के हाथ में शुक्र पर्वत बिल्कुल सपाट होता है और बहुत कम विकसित होता है ऐसा व्यक्ति संतानहीन होता है। यह बात और अधिक पुष्ट हो जाती है यदि प्रथम मणिबन्ध रेखा ऊपर मेहराब की तरह उठी हो। कुछ विद्वानो का मत है कि सन्तान रेखाएँ शुक्र क्षेत्र पर अँगूठे के मूल स्थान पर स्थित होती हैं। लम्बी, मोटी और स्पष्ट रेखाएँ पुत्रों की सूचक होती हैं तथा छोटी और पतली रेखाएँ
पुत्रियों की। यदि सन्तान रेखाएँ आड़ी
रेखाओं से कटी होती हैं अथवा टूटी
होती हैं तो सन्तान अल्पजीवी होती है।
एक अन्य मत के अनुसार अँगूठे के नीचे यदि एक बड़ा यव का चिह्न है तो व्यक्ति
निश्चित रूप से पुत्रवान होता है।
कुछ विद्वानो का मत है कि यदि जीवन रेखा स्पष्ट रूप से शुक्र पर्वत को घेरती हुयी वृहस्पति पर्वत पर पहुँच कर दो शाखाओं में विभाजित हो जाए तो ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से सन्तान का सुख प्राप्त करता है और उसका परिवार बड़ा
होता है। एक अन्य मत के अनुसार यदि पितृ रेखा (जीवन रेखा) और मातृ रेखा
(मस्तक रेखा) सबल और निर्दोष हैं तो माता-पिता दीर्घायु और समृद्ध होते हैं।
यदि ये रेखाएँ किसी स्थान पर टूटी हुयी हैं तो उस आयु में माता-पिता की मृत्यु सम्भव है। श्री मती राबिन्सन के अनुसार शुक्र क्षेत्र पर जो आड़ी रेखाएँ होती हैं, वे भाइयों और बहनों की सूचक होती हैं।
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