(21) गहरी हृदय रेखा‌ पक्षाघात कराती है।

हृदय रेखा (Heart Line)----इसे अंतःकरण रेखा भी कहते हैं। इससे मनुष्य के दृष्टिकोण, उद्देश्य और विश्वास का परिचय मिलता है। प्रेम और प्रसन्नता का ज्ञान होता है। पुरुष और स्त्रियों के परस्पर प्रेम की भावनाओं का
परिचय भी इसी रेखा से मिलता है। हृदय रेखा वह रेखा है जो हथेली में उँगलियों को नीचे स्थित होती है। यह 
वृहस्पति पर्वत से प्रारम्भ होकर हथेली के ऊपरी भाग में शनि और सूर्य पर्वतों से होकर बुध पर्वत के मूल स्थान तक पहुँचती है। हृदय रेखा गहरी, सुस्पष्ट और अच्छे रंग की होनी चाहिए। यह
वृहस्पति पर्वत के बिल्कुल बाहर से, वृहस्पति पर्वत के मध्य से, तर्जनी और 
मध्यमा उँगलियों के बीच के स्थान से, 
शनि पर्वत से, शनि पर्वत के नीचे से,
हृदय रेखा का आरंभ हो सकता है।
जब हृदय रेखा वृहस्पति पर्वत के बाहर से आरंभ होती है तो व्यक्ति अपनी प्रेमिका की पूजा करता है। प्रेमिका के  प्रेम में अंधा हो जाता है जिसके कारण उसके गुण-दोष नज़र नहीं आते हैं। प्रेम 
में धोखा मिलने पर ऐसे व्यक्ति को कष्ट उठाना पड़ता है। जब हृदय रेखा वृहस्पति पर्वत के मध्य से प्रारम्भ होती है तो ऐसा व्यक्ति आदर्श प्रेमी होता है।
नैतिक आचरण उच्च कोटि का होता है।
सज्जन होता है और जीवन में सफलता
प्राप्त करता है। ऐसे व्यक्ति का प्रेम स्त्रियों के प्रति स्थाई होता है, ये दूसरे विवाह में विश्वास नहीं करते। जब हृदय रेखा तर्जनी और‌ मध्यमा के बीच से आरंभ हो तो व्यक्ति को वृहस्पति पर्वत 
के आदर्श और शनि पर्वत के स्वार्थ दोनो के गुण प्राप्त होते हैं। ऐसे लोग अपने प्रेम का प्रदर्शन नहीं करते परन्तु
अपने प्रेम के लिए बड़े से बड़ा बलिदान
कर सकते हैं। यदि हृदय रेखा शनि पर्वत से आरंभ हो तो व्यक्ति प्रेम के सम्बन्ध में स्वार्थी होता है। ऐसा व्यक्ति
चिड़चिड़े स्वभाव वाला, कम बोलने वाला, हठी स्वभाव वाला होता है। ऐसे लोगों की अपनी कमी नहीं दिखायी देती परन्तु यदि प्रेमिका से कोई गलती हो जाए तो कभी क्षमा नहीं करते। यदि हृदय रेखा बहुत लम्बी अर्थात् हथेली में एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाती‌ है तो 
व्यक्ति ईर्ष्यालु होता है। यह भावना और भी अधिक बढ़ जाती है यदि मस्तिष्क रेखा का झुकाव चन्द्र पर्वत की ओर होता है। यदि हृदय रेखा वृहस्पति पर्वत पर नीचे की ओर मुड़ जाए तो ऐसे व्यक्ति को अपनी प्रेमिका से निराश होना पड़ता है। यद्यपि ये अत्यन्त  कृपालु होते हैं, अन्तर्जातीय विवाह भी कर लेते हैं परन्तु इन्हें प्रेम का प्रतिदान
कभी नहीं मिलता।
यदि हृदय रेखा जंजीराकार हो तो ऐसे व्यक्ति का प्रेम अस्थिर होता है। ये प्रेम में इधर-उधर पागल की भाँति घूमा करते हैं। स्त्री प्रेमी होता है। स्त्री जाति को देखकर इसमें स्त्री प्रेम उमड़ आता है। शनि पर्वत से आरम्भ होने वाली 
हृदय रेखा यदि जंजीराकार है तो ऐसा व्यक्ति स्त्री जाति से नफरत करता है।
यदि हृदय रेखा बहुत नीची होकर मस्तिष्क रेखा से स्पर्श करती हुयी आरंभ होती है तो व्यक्ति की विचार शक्ति प्रेम शक्ति को दबा देती है। जब हृदय रेखा और मस्तिष्क रेखा एक साथ चलती हुयी प्रतीत होती है तो ऐसे व्यक्ति हठी और इच्छा शक्ति से पूर्ण होते हैं। इनमें भय नहीं होता है और ये खतरनाक पति अथवा प्रेमी होते हैं।
हिंसात्मक प्रवृत्ति को हो जाते हैं जिसके
कारण ये कुछ भी कर डालते हैं। जब हृदय रेखा आरंभ में दो शाखाओं में विभाजित होती है और एक रेखा वृहस्पति पर्वत की ओर से, दूसरी तर्जनी और मध्यमा से निकलती है तो यह संतुलित और सुखद प्रेम का परिचायक है। ऐसे व्यक्ति अपने सम्बन्धों में बहुत सुखी रहते हैं। जब हृदय रेखा पतली होती है तब व्यक्ति हृदय हीन  होता है। ‌ 
यदि हृदय रेखा नहीं है तो व्यक्ति निष्ठुर स्वभाव का होता है और यदि शुक्र क्षेत्र 
अति विकसित है तो व्यक्ति कामुक ‌होता है। यदि हृदय रेखा टूटी- फूटी है 
तो व्यक्ति को प्रेम के सम्बन्धों में कष्ट उठाना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति अपने प्रेमी को खो देता है और फिर कभी किसी से प्रेम नहीं करता है। हिन्दू हस्त शास्त्र में
हृदय रेखा को आयु रेखा कहा गया है।
गरुड़ पुराण के अनुसार आयु रेखा(हृदय
रेखा) यदि बुध पर्वत के नीचे से आरम्भ 
होकर वृहस्पति पर्वत तक जाए तो व्यक्ति की आयु सौ वर्ष की होती है।
समुद्र ऋषि का मत है कि यदि यह रेखा 
कनिष्ठिका से तर्जनी तक अक्षता रहती है तो व्यक्ति की आयु एक सौ बीस वर्ष होती है। यदि यह रेखा मध्यमा के मूल तक जाए तो व्यक्ति की आयु अस्सी वर्ष होती है और यदि अनामिका तक ही पहुँचे ‌तो व्यक्ति की उम्र साठ वर्ष होती है। आचार्य वराह मिहिर का मत है कि 
यदि आयु(हृदय) रेखा तर्जनी तक जाए 
तो आयु सौ वर्ष माननी चाहिए। यदि रेखा छिन्न हो तो दुर्घटना की आशंका होती है और यदि मध्यमा तक जाए तो
व्यक्ति की आयु पचहत्तर वर्ष की होती है। सामुद्रिक रहस्य के अनुसार यदि हृदय रेखा निर्मल और शुद्ध है तो व्यक्ति शान्त चित्त और दयालु होता है। यदि रेखा श्रंखलाकार और मलिन है तो मनुष्य धूर्त और ठग होता है। आयु रेखा गुरु और शनि स्थान के बीच में होने से 
मनुष्य आजन्म शौभाग्यशाली रहता है।
आयु कितनी होगी ? इसे जानने के लिए आयु (हृदय) रेखा को सौ बराबर भागों में बाँटते हैं। यदि यह कनिष्ठिका तक पहुँचती है तो आयु पच्चीस वर्ष, यदि अनामिका तक पहुँचती है तो पच्चीस वर्ष, यदि मध्यमा तक पहुँचती है तो पचहत्तर वर्ष, यदि तर्जनी तक पहुँचती है तो आयु सौ वर्ष की होगी।
एक मत के अनुसार यदि आयु रेखा बायीं ओर से आने वाली किसी लहरदार
रेखा से काटी जाए तो व्यक्ति की जल में डूबने से मृत्यु होती है। यदि किसी सीधी रेखा से काटी जाए तो मृत्यु शस्त्राघात से होगी। यदि दाहिनी ओर से आने वाली लहरदार रेखा से काटी जाए तो सर्पदंश से या अग्नि में जलकर मृत्यु होती है। यदि आयु(हृदय) रेखा बायीं ओर तथा दायीं ओर से आने वाली दो रेखाओं से काटी जाए तो व्यक्ति की मृत्यु सांघातिक रोग से होती है। यदि यह रेखा वृहस्पति पर्वत पर किसी 
लहरदार रेखा से काटी जाए तो व्यक्ति की मृत्यु घोड़े से गिरकर, वाहन से गिरकर अथवा वाहन दुर्घटना से होती है। यदि आयु(हृदय) रेखा पर काले तिल
का चिह्न है तो व्यक्ति की मृत्यु विष से होती है।
यदि हृदय रेखा शनि पर्वत पर पहुँचने
से पूर्व सहसा रुक जाए तो हृदय की धड़कन सहसा रुक जाने से व्यक्ति की
मृत्यु होती है। यदि हृदय रेखा अत्याधिक गहरी हो तो रक्त चाप बढ़ने से व्यक्ति की मृत्यु होती है। यदि हृदय रेखा बहुत चौड़ी हो तो हृदय रोग की
सम्भावना होती है। यदि हृदय रेखा श्रंखलाकार है, तो हृदय रोग की सम्भावना बढ़ जाती है। हृदय रेखा जब
शनि पर्वत के नीचे टूटी हुयी दिखती है 
अथवा सूर्य पर्वत पर टूटी हुयी दिखती है तो हृदय रोग हो सकता है। यदि बुध पर्वत के नीचे टूटी हुयी दिखती है तो 
यकृत दोष के कारण हृदय रोग होता है।
हृदय रेखा पर क्रास को चिह्न से रक्त चाप अथवा हृदय सम्बन्धी रोग उस उम्र में होता है। काला तिल हृदय की दुर्बलता बताता है। वर्ग विवाह में अड़चन नहीं आने देता‌ है। त्रिभुज से वृद्धावस्था में अकस्मात् भाग्योदय होता है। द्वीप से हृदय रोग सांघातिक नहीं होता है। वृत्त का चिह्न हृदय की कमज़ोरी व्यक्त करता है।



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