(6) नभ मण्डल का ग्रह आपकी हथेली में---
नभ मण्डल के ग्रह आपकी हथेली में- ग्रह सात हैं---(१) सूर्य (२) पृथ्वी (३)
मंगल (४) बुध (५) गुरु (६) शुक्र (७) शनि। दो छाया ग्रह हैं--(१) राहु (२) केतु
इस प्रकार नौ ग्रह हुए। तीन ग्रहों की खोज बाद में हुयी। (१) इन्द्र --प्लूटो (२)
प्रजापति--हर्शल या यूरेनस (३) वरुण---
नेपच्यून। सब मिलाकर बारह ग्रह हुए।
ये सभी ग्रह आकाश मण्डल में स्थित हैं।
मनुष्य का जन्म पृथ्वी पर होता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। मनुष्य के जन्म के समय आकाशीय मण्डल में स्थित जिन-जिन ग्रहों की रश्मियों का प्रभाव पृथ्वी पर पड़ता है, मनुष्य का स्वभाव, रूप और गुण वैसा ही बन जाता है। पृथ्वी से सबसे निकट पृथ्वी का ही उपग्रह चन्द्रमा है। फिर शुक्र, बुध , सूर्य, मंगल, गुरु और सबसे दूर शनि है। सूर्य से विभिन्न ग्रहों की दूरी निम्नलिखित प्रकार से है-- सूर्य से बुध की दूरी तीन करोड़ साठ लाख (36000000) मील है।
(चन्द्रमा पृथ्वी का उपग्रह है) [शनि ] सूर्य से शुक्र की दूरी छः
[ गुरु ] करोड़ बहत्तर लाख
[ मंगल ] (67200000) मील है।
]. सूर्य ] सूर्य से चन्द्रमा की दूरी दो
[ बुध. ] करोड़ अड़तीस लाख
[ शुक्र ]. पचासी हज़ार(23885000)
[चन्द्रमा ] सूर्य से पृथ्वी की
[पृथ्वी ] दूरी नौ करोड़ अट्ठाईस लाख सत्ताईस हज़ार (92827000) मील है। सूर्य से मंगल की दूरी चौदह करोड़ पंद्रह लाख पचास हज़ार
(141550000)मील है। सूर्य
से गुरु की दूरी अड़तालीस करोड़ बत्तीस लाख अस्सी हज़ार (483280000) मील है। सूर्य से शनि की दूरी अट्ठासी करोड़ साठ लाख (886000000)मील है।
God placed signs or seals in
the hands of men, that all men know their works--Job.
ईश्वर ने हाथों में चिह्न अथवा पर्वत इसलिए अंकित किए हैं जिससे लोग जान जाएँ कि कैसा भविष्य उनकी प्रतीक्षा कर रहा है ? जिस प्रकार मनुष्य
के मुख पर नाक, कान, आँख के नियत स्थान हैं, उसी प्रकार ऊपर लिखे बारह
ग्रहों का मनुष्य पर पड़ने वाले बारह ग्रहों का क्षेत्र(पर्वत) हथेली पर अंकित है। इन पर्वतों के नाम भी इन्हीं ग्रहों के नाम पर निश्चित किए गए हैं। मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसका हाथ सबसे अधिक विकसित होता है। वाक्पटुता,
भाषणपटुता, क्रोध, प्रेम आदि की प्रवृत्तियाँ हाथों के संचालन से व्यक्त की
जाती हैं। इस संचालन के कारण मनुष्य की हथेलियों के पर्वतों पर कुछ चिह्न
बनते और मिटते रहते हैं। मनुष्य की बायीं हथेली उन गुणों को व्यक्त करती हैं जो जन्मजात हैं और दाहिनी हथेली उन गुणों को व्यक्त करती हैं जिनका हम
निर्माण करते हैं ।
हम सभी मानते हैं कि कोई रहस्यमय
अदृश्य शक्ति है जो हमारे जीवन पथ को निर्धारित करती है और उस पर नियन्त्रण रखती है। इसे हम प्रारब्ध या
होनी का सिद्धान्त कहते हैं। यह जो वर्तमान है वह विगत का परिणाम है और यही वर्तमान कल का भविष्य बन
जाता है। गत जीवन के कर्म वर्तमान को प्रभावित करते हैं और वर्तमान के कर्म
भविष्य पर अपना प्रभाव डालते हैं। यही मनुष्य के जीवन का क्रम है जो
सृष्टि के प्रारम्भ से चला आ रहा है और जब तक यह सृष्टि है तब तक यह क्रम
चलता रहेगा।
मनुष्य की हथेली पर अंकित क्षेत्र (पर्वत) जन्मजात गुणों को व्यक्त करते हैं, इसलिए हाथ से काम करने के कारण ये दबते या घटते नहीं है। ये पर्वत और इन पर अंकित चिह्न मनुष्य के भूत, वर्तमान और भविष्य में होने वाली घटनाओं का स्पष्ट संकेत देते हैं। आकाश मण्डल में स्थित बारह ग्रहों का
स्थान हस्त शास्त्रियों अथवा निगूढ़ शास्त्रियों ने मनुष्य की हथेली में नियत कर रखे हैं। इन पर्वतों की हथेली में स्थिति, इनके उभार, इनके झुकाव के बारे में हम अध्ययन करते हैं और उसी के अनुसार हम भविष्य-फल की जानकारी प्राप्त करते हैं।
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