(1) आइए हथेली की लिखावट को पढ़ना सीखें---

       ----- भूमिका-----
शारीरिक चिह्नों को देखकर स्वभाव जानने की विद्या की जानकारी आदिकाल से लोगों को है। एक मामूली
किसान घोड़ा, बैल, भैंस, ऊँट , गाय को
देखकर यह‌ ‌बता देता है कि यह पशु किस नस्ल का है ? इसके गुण, कर्म और स्वभाव किस प्रकार के होंगे ? जिस प्रकार पशु के वाह्य चिह्न को देखकर उसके  भीतर के गुण जाने जा सकते हैं, ठीक ‌उसी प्रकार मनुष्य  को देखकर उसके गुण, कर्म और स्वभाव को जाना जा सकता है। वैज्ञानिकों की धारणा है कि जब भी मस्तिष्क में किसी विचार अथवा धारणा का जन्म होता है तो हाथ को उसका एहसास पहले हो जाता है, क्योंकि जितनी शिराएँ मस्तिष्क और हाथों  के बीच में है उतनी शरीर की व्यवस्था में अन्यत्र कहीं भी नहीं है। यही कारण है कि वैद्य लोग हाथ की नाड़ी को  देखकर रोगों का इलाज करते हैं। चिकित्सक नाखून को देखकर रोगों का इलाज करते हैं। एक हस्त विज्ञान को जानने वाला हस्त शास्त्री हाथ की रेखाओं को पढ़कर व्यक्ति के अतीत, वर्तमान और भविष्य को बताता है। हस्त रेखाएँ मुट्ठी बाँधने से बनती हैं अथवा काम करने से बनती हैं, यह धारणा गलत है, यदि ऐसा होता तो धनी लोग जो हाथ से कुछ काम नहीं करते हैं, उनके हाथ में रेखाएँ नहीं होतीं। किसान और मज़दूर जो सदा कठिन परिश्रम में लगे रहते हैं, उनके हाथों में बहुत अधिक रेखाएँ होनी चाहिए परन्तु ऐसा नहीं देखा जाता है। इस तरह हमें यह सोचने के लिए विवश होना पड़ता है कि हाथ की रेखाएँ अपने अन्दर कुछ रहस्य अवश्य छिपाए हुए हैं। वह रहस्य यह है कि हम रेखाओं की लिखावट को पढ़कर व्यक्ति के अतीत, वर्तमान और भविष्य की सटीक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
नारद संहिता के अनुसार---अमत्स्य कुतो विद्या अयवस्स्य कुतो धनम्।अर्थात् जिसके हाथ में मछली का चिह्न
नहीं होता है, वह विद्वान कैसे हो सकता है ? जिसके हाथ में यव का चिह्न नहीं होता है, वह धनी कैसे हो सकता है ?
हथेली की लिखावट पढ़ने के लिए पहले हम हथेली का परीक्षण करते हैं। हथेली यदि मुलायम है तो व्यक्ति धनी, भावुक, 
आरामपसन्द, मधुर भाषी, मन में छिपाव रखने वाला, चञ्चल मन वाला,
थोड़ी सी खुशी में फूल जाने वाला, थोड़ी सी बीमारी से चिन्ता करने वाला, समस्याओं से भयभीत और व्याकुल हो जाने वाला होता है। कठोर हथेली वाला
विचारशील, गम्भीर, दूरदर्शी, परिश्रमी तथा अपने धुन का पक्का होता है। स्वभाव रूखा तथा कर्कश होता है। मित्र
थोड़े होते हैं पर जो होते हैं, वे सच्चे और
स्थाई होते हैं। ऐसे व्यक्ति कठिनाइयों से भयभीत नहीं होते हैं, बल्कि साहस- पूर्वक सामना करते हैं। ऐसे व्यक्ति या तो परोपकारी होंगे अथवा स्वार्थी होंगे।
हस्त शस्त्र (निगूढ़ शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र) का इतिहास पुराना है। भारतवासी पुरातन काल से इससे लाभ
उठाते रहे हैं। भारत से ही इस विद्या का प्रसार चीन, तिब्बत, फारस, मिस्र, यूनान
आदि देशों में हुआ। यूरोपीय देशों ने हस्त रेखा शास्त्र के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण आविष्कार किए हैं और यह सिद्ध किया है कि यह विद्या शरीर विज्ञान और मनोविज्ञान पर आधारित है। वैज्ञानिक मेन्सीनर ने अपने परीक्षणों के आधार पर यह बताया कि हाथों में एक विशेष प्रकार के लाल रंग के परमाणु रेखाओं के सहारे आगे-पीछे रेंगते रहते हैं। हस्त शास्त्री कीरो ने 1894 में ' लैंग्वेज आफ हैण्ड ' नाम से एक पुस्तकप्रकाशित की तथा विलियम वेन्हम ने1900 में ' लाज़ आफ साइंटिफिक रीडिंग ' नाम की पुस्तक प्रकाशित करायी। ये दोनों ही पुस्तकें हस्त विज्ञान क्षेत्र में बहुत चर्चित रही हैं। हस्त विज्ञान के सन्दर्भ में जो कुछ लिखा जा सकता है अथवा जो कुछ कहा जा सकता है, वह सब कुछ इसमें उपलब्ध है। रेखा के सम्बन्ध में बाइबिल कहती है---'
Length of days is in her right
hand and honor in her left.'
बायीं हथेली और दायीं हथेली तथा इन पर अंकित रेखाओं में अन्तर होता है।(१) बायीं हथेली व्यक्ति की सम्भावनाओं को प्रदर्शित करती है। जब कि दायीं हथेली सही व्यक्तित्व को प्रदर्शित करती है।
(२) बायीं हथेली से अतीत देखा जाता है, जबकि दायीं हथेली से भविष्य।
(३) बायीं हथेली से देखा जाता है कि 
हम क्या-क्या लेकर पैदा हुए हैं, जब कि
दायीं हथेली से हम देखते हैं कि हमने क्या-क्या बनाया है ?
(४) बायीं हथेली औरतों की पढ़ी जाती है, जबकि दायीं हथेली पुरुषों की।
(५) बायीं हथेली से हमें जानकारी मिलती है कि हमें ईश्वर ने क्या-क्या दिया है, जब कि दायीं हथेली से हमें जानकारी मिलती है कि हमें क्या-क्या करना है ?
हथेली पर अंकित रेखाओं को जानने के पहले हमें हाथों की बनावट, उँगलियों की बनावट, अँगूठे की बनावट और नाखूनों की बनावट कि जानकारी लेनी होती है, तभी हम रेखाओं को पढ़कर सही जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
यह पुस्तक हस्त रेखा विशेषज्ञ कीरो की पुस्तक ' लैंग्वेज आफ हैंड ' विलियम जार्ज वेन्हम की पुस्तक  ' लाज़ आफ
साइंटिफिक हैंड रीडिंग ' पंडित प्रेम कुमार शर्मा की पुस्तक ' प्राचीन सामुद्रिक शास्त्र, पंडित कालिका प्रसाद
शर्मा द्वारा संकलित, पंडित ठाकुर प्रसाद शर्मा द्वारा परिष्कृत तथा पंडित
शिव नन्दन मिश्र द्वारा संशोधित पुस्तक
सामुद्रिक रहस्यम् , गरुड़ पुराण, कल्याण मल्ल द्वारा लिखित पुस्तक अनंग रंग तथा निजी अनुभवों के  आधार पर लिखी गयी है। इस पुस्तक को पाठक की सेवा में प्रस्तुत करते हुए हम एक बात और कहना चाहते हैं कि हम जीवन के प्रारम्भ से ही हस्त विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं और आज पचास वर्ष बाद भी इसके सन्दर्भ में कुछ और सीखने की ललक बनी हुयी है। इस पुस्तक का मूल आधार कीरो की पुस्तक
'लैंग्वेज आफ हैंड ' है। हम उस महान् 
लेखक को कोटिशः नमन करते हैं। आप इस पुस्तक को पढ़कर अपना एवं दूसरों के अतीत को जानेंगे, वर्तमान को समझेंगे और तद्नुसार भविष्य को सँवारेंगे ऐसा हमें विश्वास है। यदि आप हस्त विज्ञान के जिज्ञासु हैं तो विभिन्न हाथों को देखकर, इस पुस्तक का अध्ययन करके निश्चित ही एक दिन पूर्ण
शिक्षक बन सकते हैं और इस क्षेत्र में अपना नाम शिखर पर पहुँचा सकते हैं।
हाथ देखने का सही तरीका----
हस्त परीक्षक को हाथ दिखाने वाले के सामने इस प्रकार बैठना चाहिए कि पूरा प्रकाश हथेली पर पड़े। जब हाथ देखा जा रहा हो तो यथासम्भव तीसरा व्यक्ति वहाँ नहीं होना चाहिए। हाथ देखने के लिए कोई समय नियत नहीं है। हाथ देखने के आरम्भ में सबसे पहले हाथ की बनावट देखनी चाहिए, फिर उँगलियों की बनावट और अँगूठे की बनावट देखनी चाहिए। बायाँ हाथ और फिर दायाँ हाथ देखना चाहिए। फलादेश
दाएँ हाथ के आधार पर ही करना चाहिए। नाखून, त्वचा, रंग तथा मणिबन्ध का परीक्षण भी आवश्यक है। फिर पर्वतों पर ध्यान देना चाहिए। पर्वतों पर उपस्थित चिह्नों को भी भली-भाँति देखना चाहिए और सबसे बाद में रेखाओं को। हस्त परीक्षक की हैसियत से जो कुछ बताइए सत्य बताइए। परन्तु यह ध्यान रखिए कि हाथ दिखाने वाले को मानसिक आघात न पहुँचे। आपका कथन सहानुभूति पूर्ण होना चाहिए। आप जिसका हाथ देख रहे हैं, उसमें दिलचस्पी लें। उसे यह‌ लगना चाहिए कि आपका काम उसकी भलाई के लिए है। यदि आप ऐसा करने में सफल रहे तो आप उस पर प्रभाव डाल सकेंगे। आप भी प्रसन्न होंगे और हाथ दिखाने वाले को भी लगेगा कि हम आने वाली हर तकलीफ से अपना भविष्य सवार सकेंगे। हस्त विज्ञान ज्ञान का भण्डार है, आप भी लाभ उठाइए और दूसरे को भी लाभ पहुँचाइए।
यह पुस्तक ईश्वरीय प्रेरणा से लिखी गयी है, इसलिए आप इसे ईश्वर का प्रसाद समझकर ग्रहण करें। इस निवेदन के साथ आपका शुभेक्षु__
         गणेश प्रसाद तिवारी 'नैश'
               पीठाधीश्वर, नैश पीठ
नरायनपुर जयसिह,चरसड़ी,गोण्डा(उप्र)
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