------------जीव और माया----------

जीव और माया दोनो ईश्वर की शक्तियाँ हैं। जीव ईश्वर की तटस्थ शक्ति है जब कि माया जीव की विशिष्ट शक्ति है। यह संसार ईश्वर की रचना है। यदि इस संसार को हम माया का पर्याय कहें तो गलत नहीं होगा। मनुष्य की समस्त कामनाओं की पूर्ति यही संसार करता है। यद्यपि मनुष्य की कामनाएँ अनन्त हैं, इसलिए सभी कामनाओं की पूर्ति सम्भव नहीं है। कामनाओं की पूर्ति न 
होने से मनुष्य में क्रोध उत्पन्न होता है और यदि एक कामना की पूर्ति हो जाती है तो लोभ बढ़ता है। इन्हीं तीनो विकारों काम, क्रोध और लोभ से‌ अन्य विकार भी उत्पन्न हो जाते है। मन, ज्ञान इन्द्रियों को इधर-उधर सदैव भरमाता रहता है, जिससे नई-नई कामनाएँ उभरती रहती हैं। इस तरह मन, माया के इस अद्भुत संसार में जीव को बाँधे रहता है। जीव और माया का यह बन्धन इतना अधिक मजबूत होता है कि इस बन्धन को मनुष्य द्वारा तोड़ पाना सरल नहीं होता है। माया विकारों के माध्यम से मनुष्य को इसी संसार में लपेटे रहती है, जो ‌‌लोग कहते हैं मैने कामनाओं को जीत लिया, वे झूठ बोलते हैंअपनी कामनाओं को पूरा करते-करते कई बार मनुष्य कब जवान हुआ और कब बूढ़ा हो गया ?इसका आभास उसे हो ही नहीं पाता है। जब उसकी इंद्रियाँ शिथिल हो जाती हैं, किसी भी कार्य को करने में सक्षम नहीं रह ‌जाती हैं तब उसे होश आता है कि उसने अपना सब कुछ खो दिया है। माया के अधीन रहकर जीवन‌ भर अपनी इच्छाओं की पूर्ति में ही लगा रहा और अपना बहुमूल्य समय व्यर्थ में गवाँ दिया है। वह अपने जीवन के आखिरी समय में रोता है, बिलखता है, सोचता है शायद ऐसा करने से उसकी खोई हुयी जवानी पुनः लौट आए। जवानी तो नहीं लौटती है, परन्तु वह बुढ़ापा अवश्य गहरा जाता है,‌ जो मनुष्य को मृत्यु के निकट घसीट ले जाता है। आप ईश्वर की ओर मुड़िए। ईश्वर की आराधना में जुट जाइए। जैसे- जैसे आप ईश्वर की निकटता प्राप्त करेंगे, माया की गाँठें ढीली पड़ती जाएँगी, और विकार भी धीरे-धीरे लगते जाएँगे।   

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