------भक्त सदा सुखी रहता है-------

जब हम कोई कार्य करते हैं तो उस कार्य में या तो सफलता मिलती है अथवा असफलता मिलती है। जब कार्य में सफलता मिलती है तब हम सुख का अनुभव करते हैं और जब हमें असफलता मिलती है तो हम दुख का 
अनुभव करते हैं। जो लोग कहते हैं कि  हम असफलता से दुखी नहीं होते, वे झूठ बोलते हैं। क्योंकि मनुष्य का स्वभाव होता है कि जब कार्य का परिणाम उसके मन के प्रतिकूल होता है तब वह दुखी होता है और जब कार्य का परिणाम उसके मन के अनुकूल होता है तब वह सुख (प्रसन्नता) का अनुभव करता है। भक्त उसको कहते हैं जिसने अपने समस्त कार्यों को ईश्वर को समर्पित कर दिया हो। जब कोई अपने कार्य ईश्वर को समर्पित कर देता है तो कार्य की सफलता अथवा असफलता से उसका नाता टूट जाता है। सफलता की
अवस्था में न तो उसे खुशी होती है और असफलता की अवस्था में न ही उसे दुख होता है। भक्त का भाव सफलता और असफलता में एक जैसा रहता है।
इस तरह भक्त सदा सुखी रहता है। अतः आप ईश्वर की ओर मुड़िए।‌ अपने
समस्त कार्य ईश्वर को समर्पित करके करिए। आपका कार्य की सफलता और असफलता से नाता टूट जाएगा। आप दोनों ही स्थितियों में प्रसन्नचित्त रहेंगे।

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