------आप दुखों से मुक्त हो जाएँगे------
जब तक मनुष्य में कृतृत्व का अभिमान रहता है अर्थात् इस संसार में कर्म करने का अहंकारिक भाव रहता है (कर्ता का भाव) तब तक मनुष्य दुखी रहता है। जिस दिन कर्ता का भाव समाप्त हो जाता है, जिस दिन आप यह समझ जाते हैं कि करने वाला ईश्वर है, बस उसी दिन से आप के जीवन में सुखों का आगमन होने लगता है। दुख समाप्त होने लगते हैं। जो लोग कहते हैं मैं सुखी हूँ, वे झूठ बोलते हैं। सच्चाई तो यह है कि हर एक के जीवन में सुख-दुख आते रहते हैं, जो इस भेद को समझता है, वह न तो दुख आने पर रोता है और न सुख आने पर इतराता है। वह दुख को ईश्वर की कृपा समझकर स्वीकार कर लेता है। जो इस भेद को नहीं समझता है, वह दुख आने पर रोता है, बिलखता है, चिल्लाता है और दूसरों के सामने गिड़गिड़ता है, फिर मर जाता है। यदि आप अपने अन्दर दुखों को सहने की क्षमता लाना चाहते हैं, यदि आप दुखों को सहने की सामर्थ्य प्राप्त करना चाहते हैं, तो ईश्वर की तरफ मुड़िए। ईश्वर आप पर आने वाले दुखों को स्वयं अपने ऊपर ले लेगा और आप दुखों से मुक्त हो जाएँगे।
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