--हम अनन्त बार कूकर-शूकर बन चुके--
मन कभी खाली नहीं बैठता है। यह या तो सांसारिक कामना कि पूर्ति में लगा रहेगा अथवा ईश्वरीय आनन्द की पूर्ति में लगेगा। सदा से जीव ने अपने को देह माना, और संसार में आनन्द (सुख) की खोज में लगा रहा। संसार में लिप्त होने के कारण हम अनन्त बार कूकर-शूकर बन चुके। धन-सम्पदा अर्जित करने से सुख मिलता है। यह झूठ है। इस संसार में सुख है, यह भी झूठ है। नवनीत दूध के मन्थन से निकलता है न कि दूध के रंग वाले चूना के पानी के मन्थन से। चूना के पानी में जब नवनीत है ही नहीं, तब इसके मन्थन से नवनीत किस तरह निकलेगा ? इसी तरह जब संसार में आनन्द (सुख) नहीं है, तो हमें आनन्द कैसे मिलेगा ? जब धन में आनन्द (सुख) नहीं है तो हमें आनन्द(सुख)कैसे मिलेगा ? यही कारण है कि हम अनादि काल से दुख भोगते चले आ रहे हैं। और इसी तरह दुख भोगते रहेंगे। यदि हम दुख से छुटकारा चाहते हैं तो हमें सर्व प्रथम यह सच्चाई जाननी होगी कि जीव देह नहीं है बल्कि यह ईश्वर का अंश आत्मा है, जो अपने अंशी से मिलने पर ही सुख (आनन्द) प्राप्त कर सकता है। यदि आपको आनन्द(सुख) चाहिए, यदि आपको दुख से छुटकारा चाहिए, तो आप ईश्वर की ओर मुड़िए, मन को ईश्वर के चिन्तन में लगाइए आपको आनन्द (सुख) मिलेगा,और सदा के लिए इस संसार के दुखों से छुटकारा मिल जाएगा।
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