------विकार आपसे हटते जाएँगे-----

कहीं भी , किसी भी चौराहे पर एक किनारे खड़े हो जाइए और गौर से देखिए। ये सब लोग कहाँ भागे जा रहे 
हैं ? हर किसी को जल्दी है। सब एक दूसरे के आगे निकल जाना चाहते हैं।
किसी के पास पल भर का समय नहीं है़, इनके इस व्यवहार पर ऐसा आभास
होता है कि इन्होंने अपने समय का भरपूर उपयोग किया ‌है। एक हमारे मित्र
हैं, वे ढाई बजे रात में उठ जाते हैं और दैनिक दिनचर्या में लग जाते हैं, दिन भर
अपने कार्य में लगे रहते हैं, फिर भी कार्य उनका अधूरा रह जाता है। उनकी आयु लगभग अस्सी वर्ष है।‌‌ साठ वर्ष
से लगातार अपने कार्य में लगे हुए हैं।  उन्हें याद नहीं है कि कभी उन्होंने एक
दिन विश्राम किया हो। पिछले साठ साल से दिन भर खेती के काम में लगे रहते हैं। कभी‌ जब खेत में काम नहीं होता है तब वे खेत के मेढ़ पर बैठकर
रस्सी बँटते रहते हैं। मैने उनसे पूछा, भाई ! क्या कभी ईश्वर का नाम भी लेते हैं ? उन्होंने कहा, मुझे अपने कर्म पर विश्वास है। मैं सदा ही अपने कर्म में लगा रहता हूँ, यही कर्म योग है। मैं अपना समय कभी बर्बाद नहीं करता।
आपकी कोई सीख मुझे नहीं चाहिए। आप मेरा समय मत बर्बाद कीजिए। मैंने
उनसे और बातें नहीं की, चुपचाप अपने
घर लौट आया। क्या यही कर्म योग है ?  एक मेरे भाई साहब हैं। उन्होंने रेल विभाग में नौकरी की है। उनकी भी  आयु लगभग अस्सी की होगी। उन्होंने मुझे बताया कि मैने अपनी नौकरी के काल खण्ड में कभी अपने रेस्ट में आराम नहीं किया। जब एक दिन की
छुट्टी सप्ताह में मुझे मिलती थी तब घर 
 की खेती का काम निबटाता था। कभी
जीवन में एक-आध बार बीमार हुआ तब की बात और है। इनसे भी मैने पूछा
कि कभी ईश्वर का भी नाम लेते हैं। उन्होंने कहा नहीं। बातचीत में ईश्वर की चर्चा ज़रूर कर लेता हूँ। बाकी आज तक कभी ईश्वर का नाम‌ लेने का अवसर ही नहीं मिला। शाम को जब सोने के लिए बिस्तर पर जाता हूँ, तब भी मन जो आज कार्य अधूरा रह जाता है, उसे पूरा करने पर विचार करता रहता हूँ। एक गाँव में अधेड़ आयु की महिला थीं। बात आज से लगभग साठ साल पहले की है। दो लड़के थे दोनो बाहर नौकरी करते थे, परन्तु इन्हें कुछ भी नहीं देते थे। कर्नलगंज घर से पाँच कोस अर्थात पन्द्रह किलोमीटर था। मुझे याद है एक बार मैने उनसे पूछा, तब उन्होंने जो बताया था, उसे भी आपको जानना आवश्यक है। गाँव में दो दिन बाज़ार लगती थी। बुधवार और शनिवार। वे बाजार में पान की दुकान लगाती थीं। मंगलवार को कर्नलगंज आती थीं। पान-डली खरीदकर वापस घर चली जाती थीं। बुधवार को पान की दुकान लगाती थीं। शुक्रवार को फिर कर्नलगंज आतीं, डली-पान खरीदकर घर वापस हो जातीं, शनिवार को फिर बाज़ार में पान लगातीं। यह उनकी
दिनचर्या थी। मैने उनसे पूछा था, काकी ! क्या भगवान का नाम जपती हो ?
नहीं भइया जब मैं रात में बिस्तर पर जाती हूँ, तो सिर्फ यही सोचती हूँ कि दो पैसा कैसे ज्यादा कमा लूँ ? इस भाग-
दौड़ की ज़िंदगी से आदमी को अंत में क्या मिलता है ? जो लोग कहते हैं मैने यह किया, मैने वह किया, वे झूठ बोलते हैं। सच तो यह है कि उन्होंने कुछ भी नहीं किया। इस दुनिया में आदमी‌ अपने आनन्द (सुख) की प्राप्ति के लिए इधर से उधर दौड़ रहा है। वह सोचता है आज नहीं मिला तो कल मिलेगा। यहाँ नहीं मिला तो वहाँ मिलेगा। इस कार्य ‌के करने से नहीं मिला तो उस कार्य के करने से मिलेगा। जब इस संसार में सुख (आनन्द) है ही नहीं तब आपको कैसे मिलेगा ? आप प्रतिदिन पैदल तीस किलोमीटर के स्थान पर सौ किलोमीटर चलें। आप ढाई बजे उठने के बजाय रात-दिन जग कर काम करें, सारे काम तब भी आप नहीं निबटा सकते। आज तक किसी का नहीं निपट सका। सारे लोग अपना अधूरा काम छोड़कर इस
 दुनिया से चले जाते हैं। इस भाग-दौड़ की दुनिया में सब अपने सुख के लिए
भटक रहे हैं। जिस सुख (आनन्द) की खोज में आप भटक रहे हैं, उसे यदि आप सचमुच प्राप्त करना चाहते हैं तो आप ईश्वर की तरफ मुड़िए। जैसे- जैसे विकार आप से हटते जाएँगे, वैसे वैसे आपको आनन्द की अनुभूति होती जाएगी। आपको अनुभव होगा कि आपके सारे काम भी निपट रहे हैं, और
आप व्यर्थ की भाग-दौड़ से भी बचे रहेंगे।

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