---मानव दूसरों के सुख से भी दुखी है--
जो लोग कहते हैं कि मानव केवल अपने दुख से ही दुखी रहता है। वे झूठ बोलते हैं। सच तो यह है कि मानव दूसरों के सुख से भी दुखी रहता है। इसे समझने के लिए हमें मानव के स्वभाव को जानना, समझना और परखना होगा।
मानव तीन प्रकार के इस समाज में होते हैं--(१) पहले प्रकार के वे मानव जो इस समाज में रहकर भी अपने काम से काम रखते हैं। उन्हें अपने काम से फुर्सत ही नहीं है कि वे दूसरों के बारे में कुछ सोचें। समाज उनके बारे में क्या सोचता है ? इस पर भी ऐसे मानव कभी विचार नहीं करते हैं। अपना सुख उनका
अपना सुख है उनका दुख उनका अपना दुख है। परन्तु इनमें से कुछ ऐसे भी मानव होते हैं जो परिवार को भी अपने दुख-सुख में शामिल कर लेते हैं। और परिवार के सुख दुख में शामिल हो जाते हैं। उनके लिए वे और उनका परिवार ही उनकी दुनिया है। दूसरे प्रकार के वे मानव हैं जो अपने दुख से दुखी नहीं होते है बल्कि दूसरों के दुख से दुखी होते हैं।अपना दुख तो अपना दुख है ही, दूसरों का दुख भी उन्हें दुखी करता है। अपना सुख तो अपना सुख है ही, मगर ऐसे मानव दूसरे के सुख में सुखी रहते हैं। ऐसे मानव सदा-सर्वदा समाज के हित चिन्तन में ही अपना समय बिताते है। तीसरे प्रकार के वे मानव हैं जिनका अपना सुख-दुख तो अपना है ही मगर
ऐसे मानव दूसरों को कभी सुखी नहीं देखना चाहते हैं। जब किसी दूसरे के दुख का समाचार मिलता है तो अन्दर-अन्दर ही सुख का अनुभव करते हैं, और जब सुख का समाचार मिलता है तो अन्दर-अन्दर ही दुखी हो जाते हैं।
कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो दूसरों को दुख पहुँचाने के लिए अपना समय तो खर्च करते ही हैं, अपना धन भी खर्च करते हैं। इस तरह के मानव की समाज में संख्या बहुत अधिक है, जो दूसरों का
हमेशा अहित ही सोचते रहते हैं। कभी-कभी हम सोचते हैं कि फलाँ व्यक्ति मुझसे क्यों नाराज है ? इसको मैने कभी
नुकसान नहीं पहुँचाया है, फिर भी यह मेरा नुकसान पहुँचाने में अपना धन भी खर्च करता है, अपना समय भी बर्बाद
करता है ? ऐसा क्यों ? ऐसा इसलिए कि उसका इस तरह का स्वभाव है। ऐसे लोगों से बचिए, इनसे उलझिए मत। इनसे बचाने वाला केवल और केवल
ईश्वर है। आप ईश्वर की ओर मुड़िए। प्रत्येक कार्य को ईश्वरीय कार्य समझ कर करिए। ईश्वर ऐसे लोगों से आपको बचाएगा।
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