-----यह संसार दुखमय है-----

मनुष्य दो प्रकार के होते हैं--(१) नासमझ (२)समझदार। नासमझ मनुष्य वे हैं जो अपने को देह मानते हैं। अपने को देह मानने वाला मनुष्य कभी सुखी 
नहीं रह ‌सकता। क्योंकि पहले तो वह अपनी देह के दुख से दुखी रहता है। फिर वह अपनी पत्नी के दुख से दुखी
रहता है और फिर वह अपने बच्चों के दुख से दुखी रहता है। कुछ लोग कहते हैं कि परिवार से सुख मिलता है। वे लोग झूठ बोलते हैं। सच तो यह है कि
परिवार से सुख किसी को नहीं मिलता है। परिवार दुख देने के लिए ही होता है।
जिसके कोई सन्तान नहीं है उसे सन्तान‌
न होने का दुख है। जिसके पास सन्तान हैं वह अपने सन्तान से दुखी है। यह तो रहा सांसारिक दुख। और यदि यह कहा जाए कि इस संसार में रहने वाला कोई व्यक्ति सुखी नहीं है। यह संसार दुखमय है, यहाँ सुख कहाँ ? तो यह बात गलत नहीं है, क्योंकि जिसके पास हज़ार है वह लाख पाने के लिए दुखी है। जिसके पास लाख है वह करोड़ पाने के लिए दुखी है। जिसके पास करोड़ है वह अरब पाने के लिए दुखी है, जिसके पास अरब है वह खरब पाने के लिए दुखी है। जो पैदल है वह साइकिल पाने के लिए दुखी है। जिसके पास साइकिल है वह मोटर साइकिल के लिए दुखी है। जिसके पास मोटर साइकिल है वह कार के लिए दुखी है। यहाँ दुखी सब हैं। दुख न रहे इसके लिए ईश्वर की तरफ मुड़िए। हम देह नहीं आत्मा हैं ऐसा मानकर इस संसार के दुख से मत दुखी होइए। ईश्वर की आराधना कीजिए। असली सुख इसी में है।

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