--------माया----------

माया ईश्वर की रचना है। यह ईश्वर‌ की जड़ शक्ति है। जो‌ लोग कहते हैं‌ कि माया को‌ समझ पाना बहुत कठिन है, वे झूठ बोलते हैं सच तो यह है कि माया‌ क्या है ? इसे समझना सरल है, परन्तु इसके घेरे से निकल पाना बहुत कठिन है। मानव के पास पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। इन्हीं दस इन्द्रियों के सहयोग से मानव अपने समस्त‌ कार्य सम्पन्न‌ करता है। इन‌ इन्द्रियों का राजा मन है। मन ईश दूत है। जो बहुत चञ्चल है। अभी यहाँ फिर पल‌ भर‌ ‌में लाखों-करोड़़ों किलोमीटर दूर, और फिर पुनः पल भर में यहाँ
अपनी यात्रा पूरी करके वापस आ जाता है। इसे रहना तो मानव‌ के हृदय में चाहिए, परन्तु इसका कोई ठिकाना नहीं है कि यह कहाँ-कहाँ रहता है। यह माया रचित संसार भी बहुत अद्भुत है। यहाँ पर उपस्थित नाना प्रकार की वस्तुएँ मानव की ज्ञानेन्द्रियों को आकर्षित ‌करती हैं। यही माया है। इन आकर्षक वस्तुओं और ज्ञानेन्द्रियों का मेल कराने वाला मन है। मन जिधर चाहता है उधर ज्ञानेन्द्रियों को ले जाता  है। जीव मन का गुलाम है, इसलिए यह तमाम उन वस्तुओं से ज्ञानेन्द्रियों का मेल करा देता है जो मानव के लिए उपयोगी नहीं है। इन्हीं बेमेल मिलन से मानव में विकार आ जाते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य। ये षट विकार कहलाते हैं। हम जिस वस्तु
को चाहते हैं, जब वह नहीं मिलती है, तब क्रोध उत्पन्न होता है, और जब मिल
जाती है, तब उसे और पाने की इच्छा कहती है। काम से मानव कभी अघाता नहीं है। यह विश्वामित्र जैसे तपस्वी का मन विचलित कर देता है। फिर सामान्य व्यक्ति की कौन कहे ? यह मन मानव का बड़ा दुश्मन है। कहाँ, किसको, किस
मोड़ पर‌ लाकर यह विकारों में फँसा दे कहा नहीं जा सकता है। इसलिए आप इस माया के बन्धन से निकलने के लिए,
इन विकारों से बचने के लिए ईश्वर की ओर मुड़िए, ईश्वर की आराधना कीजिए। जैसे-जैसे आप ईश्वर की ओर बढ़ते जाएँगे, विकार स्वतः आप से दूर हटते जाएँगे।

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