------------जीव और ईश्वर-----------
तत्व तीन हैं--- मैं, यह और वह। मैं अर्थात् (जीव)। यह अर्थात् (माया)। वह अर्थात् (ईश्वर)। जीव और माया, ये दोनों ईश्वर की शक्तियाँ हैं। जीव शक्ति तटस्थ शक्ति है। तटस्थ अर्थात् तट पर स्थित। इसे हम नदी के तट से समझ सकते हैं। नदी के तट से एक ओर भूमि है और दूसरी ओर जल है। इसी प्रकार जीव के एक ओर माया है और दूसरी ओर ईश्वर। इसीलिए जीव तत्व को तटस्थ शक्ति कहा गया है। जीव को ईश्वर का अंश भी कहा जाता है। यहाँ अंश का अर्थ टुकड़े से नहीं है। यहाँ
अंश का आशय शक्ति से है। जिस तरह सूर्य की रौशनी का अस्तित्व सूर्य से है और चिनगारी का अस्तित्व आग से है, इसी तरह जीव का अस्तित्व ईश्वर से है। जीव और ईश्वर में भेदाभेद सम्बन्ध है। जीव और ईश्वर में भेद--जीव अल्पज्ञ है, ईश्वर सर्वज्ञ है। जीव भृत्य है, ईश्वर भर्ता है। जीव अल्प व्यापक है, यह केवल शरीर में व्याप्त है, ईश्वर सर्वव्यापक है, टट्टी और पाखाना में भी। जीव नियम्य है, ईश्वर नियामक है। जीव अंश है, ईश्वर अंशी है। जीव मायाधीन है, ईश्वर मायाधीश है। जीव परतंत्र है, ईश्वर स्वतंत्र है। जीव और ईश्वर में अभेद----जीव चेतन है, ईश्वर भी चेतन है। जीव अनादि है ईश्वर भी अनादि है। जीव सनातन हैं, ईश्वर भी सनातन है। ज्ञान, इच्छा और क्रिया जीव में है, ज्ञान, इच्छा और क्रिया ईश्वर में भी है। जीव चित्त है, ईश्वर भी चित्त है। जीव
अणु चित्त है, ईश्वर अनन्त चित्त है। जीव स्वयं चेतन है और जहाँ रहता है उसे भी
चेतन बनाए रखता है। जब यह चेतन निकल जाता है तब शरीर जड़ हो जाता है। ईश्वर में परा शक्ति होती है। इसे स्वरूप शक्ति, योगमाया शक्ति अथवा अंतरगा शक्ति भी कहते हैं। इसी शक्ति से ईश्वर, ईश्वर है। इसी शक्ति से ईश्वर जब भी कुछ सोचता है, वह हो जाता है। सोचा और हो गया। जो लोग कहते हैं ईश्वर मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारा में ही रहता है, वे झूठ बोलते हैं। सच तो यह है कि ईश्वर हर जगह विद्यमान है। जीव और ईश्वर हृदय में एक साथ रहते हैं परन्तु एक दूसरे के विपरीत मुख किए हुए हैं। जीव ईश्वर को नहीं पहचानता है इसलिए, वह ईश्वर से विमुख है। जीव भोक्ता है और ईश्वर देखता है। ईश्वर व्यक्ति की भावनाओं को नोट करता रहता है और जीव के कर्म के अनुसार
वह फल भी देता है। आप क्यों ईश्वर से
विमुख हैं ? आप ईश्वर की ओर मुड़िए।
ईश्वर की आराधना की आराधना में जुट जाइए। ईश्वर आगे का रास्ता प्रशस्त करेगा।
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