------ईश्वरीय कृपा प्राप्त करने के लिए अन्तःकरण की शुद्धि आवश्यक‌ है-----

जो लोग कहते हैं कि साधना से ईश्वर‌ की प्राप्ति की जा सकती है, वे झूठ बोलते हैं। सच तो यह है कि बिना ईश्वर
की कृपा से उसकी प्राप्ति सम्भव नहीं है। निरन्तर साधना से विकार गलते हैं।
जैसे-जैसे विकार गलते जाते हैं अन्तःकरण शुद्ध‌ होता‌  जाता हैं। जब विकार पूर्णतयः गल जाते हैं तब अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। अन्तःकरण शुद्ध होने पर ही ईश्वरीय कृपा मिलती ‌है। भगवान बुद्ध के बारे मेें एक ‌प्रसंग आता है कि एक बार वे एक दरवाज़े पर पहुँचकर भोजन के लिए आग्रह‌ करते हैं। एक महिला भोजन लेकर बाहर निकलती है। भोजन देते हुए वह आप से दीक्षा देने के लिए आग्रह करती है। आप बिना कुछ कहे हुए भोजन लेकर वहाँ से चले आते हैं।
इस तरह जब कभी आप उसके दरवाजे पर जाते थे। वह दीक्षा के लिए आप से
आग्रह करती थी। और एक दिन जब उसने बहुत व्यथित होकर आपसे दीक्षा के लिए आग्रह किया तब आपने कहा, आज के पन्द्रहवें दिन जब मैं पुनः आऊँगा, तब तुम्हें दीक्षा दूँगा। उसके खुशी का ठिकाना न रहा। वह उस दिन की प्रतीक्षा करने लगी। आखिर वह दिन आ ही गया। उसने उस दिन बहुत प्रकार‌ के व्यंजन बनाए। और तथागत के आने की प्रतीक्षा करने लगी। भगवान बुद्ध उसके दरवाजे पर पहुँचते हैं और भोजन के लिए अपना पात्र उसके आगे कर देते हैं। पात्र में मल-मूत्र देखकर वह बोली,"इस पात्र में भला भोजन मैं कैसे दे सकती हूँ ?" आपने कहा, तुमसे इससे क्या मतलब ? पात्र शुद्ध है अथवा अशुद्ध। भोजन देना है, उसे तुम दे दो।
वह बोली, "ऐसा कैसे हो सकता है?" बिना पात्र शुद्ध हुए इसमें भोजन नहीं दिया जा सकता है। लाइए इसकी गंदगी मैं साफ कर देती हूँ। उसने उस पात्र को लेकर उसकी गंदगी को हटाया और धुल करके उसमें भोजन लेकर आयी। फिर 
वह बोली, प्रभो मैं सब कुछ समझ गयी।
जब मेरा अन्तःकरण ही शुद्ध नहीं है, तब आप मुझे दीक्षा कैसे दे सकते हैं ? प्रभो अब मैं पुनः आपसे दीक्षा देने के लिए तब तक नहीं कहूँगी, जब तक मैं अपना अन्तःकरण शुद्ध नहीं कर लेती। ईश्वरीय कृपा के मिलने पर इन्द्रियाँ दिव्य हो जाती हैं और ईश्वर की निकटता का आभास होने लगता है। यह सब कुछ अनुपात में होता है। जैसे-जैसे साधना हमारी बढ़ती है, उसी अनुपात में हमारा अन्तःकरण शुद्ध होता जाता है। जैसे-जैसे अन्तःकरण शुद्ध होता जाता है, उसी अनुपात में ईश्वरीय कृपा मिलती जाती है, और जैसे-जैसे ईश्वरीय कृपा मिलती जाती है, उसी अनुपात‌ में हमारी इन्द्रियाँ दिव्य होती जाती हैं। जैसे-जैसे इन्द्रियाँ दिव्य होती जाती हैं, उसी अनुपात में हमारे और ईश्वर के बीच का आवरण हल्का होता जाता है, कुछ और हल्का होता है, कुछ और हल्का होता है, हल्का होते-होते एक समय ऐसा भी आता है, जब हमारे और ईश्वर के बीच का आवरण पूरी तरह से हट जाता है। यही वह पल होता है जब ईश्वर का साक्षात्कार होता है।
 

Comments

Popular posts from this blog

उपनिषद की‌ सूक्तियाँ--

ऋगुवेद सूक्ति--(56) की व्याख्या

(2) Second Guru Angad Dev Ji Maharaj-- When Emperor Humayun pulled out his sword and try to attack on the neck of Guru Angad Dev Ji, his hand was paralyzed--Read more--