---साधना से स्थायी सुख नहीं मिलता---

साधना (ध्यान) केवल आत्मज्ञान करा सकता है। साधना से से स्थायी सुख नहीं मिलता। इससे केवल अल्पकाल के लिए साधक को सुख मिलता है, इसके बाद सुख समाप्त हो जाता है। जो लोग कहते हैं साधना से स्थायी सुख प्राप्त होता है, वे झूठ बोलते हैं। सच तो यह है कि जब तक साधक समाधि में रहता है, उसे अलौकिक सुख प्राप्त होता रहता हैं, परन्तु जैसे ही उसकी समाधि खुलती है, उसे पुनः माया घेर लेती है। वह पुनः
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, भय, अहंकार आदि विकारों के पाश में बँध जाता है। ठीक वैसे ही जैसे मधुमक्खियों से घिरा व्यक्ति पानी में डुबकी लगाने से अल्पकाल के लिए मधुमक्खियों से बचाव कर सकता है, परन्तु जैसे ही वह पानी के अन्दर से अपना सिर बाहर निकालता है, मधुमक्खियाँ पुनः उसे घेर लेती हैं। एक सामान्य व्यक्ति के लिए यह सम्भव नहीं है कि वह सदा सर्वदा के लिए पानी के अन्दर ही बना रहे। मधुमक्खियों की भाँति विकार भी व्यक्ति के चारों ओर हर समय चक्कर लगाते रहते हैं और इस बात की प्रतीक्षा करते रहते हैं कि कब साधक का ध्यान टूटे जिससे वह उन्हें अपना ग्रास बनाए। और यह भी सम्भव नहीं है कि साधक दिन-रात हर पल  समाधि में ही बना रहे। यदि व्यक्ति चिरस्थायी सुख प्राप्त करना चाहता है, यदि व्यक्ति सदा -सर्वदा के लिए आनन्द की प्राप्ति चाहता है तो उसे सगुण, साकार, सविशेष  ईश्वर की आराधना करनी होगी। ईश्वर के समक्ष उसे रोना-गिड़गिड़ाना होगा। ईश्वर की अविरल भक्ति करनी होगी। ईश्वर के शरण‌ में जाना होगा। ईश्वर को अपना बनाना होगा। ईश्वर से प्रेम करना होगा। स्वयं को ईश्वर को समर्पण करना होगा। ईश्वर से अनुराग बनाना ही होगा। ईश्वर से भक्ति करनी ही होगी। ईश्वर के निकट पहुँचना ही होगा। जैसे -जैसे आपकी ईश्वर से निकटता बढ़ेगी उसी अनुपात में आपके विकार गलते जाएँगे। एक अवस्था ऐसी आएगी जब आपका ईश्वर से साक्षात्कार होगा। उस अवस्था के आने पर न माया रह जाती है और न माया के विकार। एक बार ईश्वर का
साक्षात्कार हो जाने पर साधक को सदा सर्वदा के लिए आनंद की प्राप्ति हो जाती है। उसे सदा सर्वदा के लिए चिरस्थायी सुख की प्राप्ति हो जाती है।
उसे पुनः इस संसार में लौटना नहीं होता है। वह जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है। इस संसार में जब तक वह रहता है, वह अमृतमयी प्रेमानन्द में विचरण करता रहता  है। ऐसे व्यक्ति इस संसार में जितने दिन रहते हैं, उनके  लौकिक कार्य स्वयं कुदरत करती है। ऐसे व्यक्ति को कुछ भी कार्य करने को शेष नहीं रह जाता है।

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