-हमारा शरीर जलकर राख हो जाएगा-
हमने इन आँखों से त्रेता युग में भगवान राम को देखा। हमने इन आँखों से द्वापर युग में भगवान कृष्ण को देखा। मगर हम पहचान नहीं सके। क्योंकि हमारी ये
आँखें मायिक थीं। हमारी ये मायिक आँखें भगवान को नहीं देख सकतीं।
भगवान को देखने के लिए हमारी आँखों में दिव्यता होनी चाहिए। ये तभी दिव्य हो सकती हैं जब भगवान इन आँखों को दिव्यता प्रदान करे। इसके अतिरिक्त यदि भगवान (ईश्वर) हमारे सामने आ जाएँ तो यह हमारा शरीर जलकर राख हो जाएगा। क्योंकि यह शरीर ईश्वरीय ऊर्जा के ताप को को नहीं सहन कर सकता है। इसीलिए ईश्वर के साक्षात्कार करने के पूर्व तप की आवश्यकता होती है। तप (साधना) से इस शरीर को तपाया जाता है, जिससे इस शरीर में ईश्वरीय ऊर्जा के ताप को सहन करने की क्षमता आ जाती है। तथा ज्ञान इंद्रियों को दिव्य बनाने के लिए ईश्वरीय कृपा की आवश्यकता होती है। बिना ईश्वरीय कृपा से ज्ञान इंद्रियाँ दिव्य नहीं बन सकती हैं। तप (साधना) से ज्ञान इंद्रियाँ कभी दिव्य नहीं बन सकती हैं।जब ईश्वर कृपा करके इन आँखों को दिव्य बनाएगा, तब हमारी ये आँखें ईश्वर का साक्षात्कार कर पाएँगी। जो लोग कहते हैं मैने ईश्वर का साक्षात्कार कर लिया है, वे झूठ बोलते हैं। ईश्वर के
साक्षात्कार के पूर्व पहले अज्ञान को ज्ञान से हटाते हैं, फिर ज्ञान को हटाने के लिए तप(साधना) करते हैं। ज्ञान(विद्या माया) के हटते ही हमारा हृदय स्थल निर्मल हो जाता है। सारे विकार पीछे छूट जाते हैं। ईश्वरीय कृपा प्राप्त होने लगती है। जैसे- जैसे ईश्वरीय कृपा मिलती है, वैसे-वैसे हमारी ज्ञानेन्द्रियों में दिव्यता आने लगती है। हमारे और ईश्वर के बीच का पर्दा हटने लगता है। इस प्रकार ईश्वर के प्रति हमारा समर्पण जितना गाढ़ा होता जाएगा, ईश्वर से हमारी निकटता उतनी ही बढ़ती जाएगी, और एक समय ऐसा आएगा जब हमारे लिए वह द्वार खुल जाएगा जहाँ से ईश्वर का साक्षात्कार हो सकेगा।
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