------मन से बड़ा शत्रु कोई नहीं-------
मन बहुत बलवान है। मन बहुत चञ्चल है। जो लोग कहते हैं मैने मन को वश में कर लिया है, वे लोग झूठ बोलते हैं। मानव का मन से बड़ा शत्रु कोई नहीं।इसको वश में करना पहाड़ से टकराना है। इसको वश में करना समुद्र को लाँघना है। जिसने इसको वश में करना चाहा, वह चूूूूूूर-चूूर हो गया। जिसने इसको वश में करना चाहा, वह सदा के लिए गर्त मेें चला गया। यही संसार से बाँधता है और यही संसार से मुक्ति दिलाता है। जिसने भी इस पर विश्वास किया वह षट विकारों में उलझकर बर्बाद हो गया। यह उस बदकार स्त्री के समान है, जो अपने प्रेमी से मिलकर अपने पति की हत्या करवा देती है। इसी तरह मन विकारों से प्रेम करके मनुष्य को बर्बाद कर देता है। इसलिए मन को यदि वश में रखना है तो ईश्वर की ओर मुड़िए। ईश्वर में मन लगाइए। जैसे-जैसे ईश्वर में मन लगेगा, वैसे-वैसे संसार से मन छूटेगा। केवल ईश्वर का सानिध्य ही मन को शांत रख सकता है।
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