-(३)-----हक़ीकत ज़िंदगी की------
शब्दकोश बनाने वाले से मेरा निवेदन है महाशय ! आप अपने शब्दकोश से प्रीति, प्रेम, नेह, स्नेह, राग, अनुराग, ममता, वात्सल्य, प्यार, मुहब्बत, रति, चाह, सम्मान, श्रद्धा जैसे शब्द निकाल दीजिए। अब ये शब्द प्रासांगिक नहीं रह गए हैं। कोई कहता है मैं अपने बेटे-बेटी ---आदि से प्रेम करता हूँ। कोई कहता है मैं अपने बाप-दादा---- आदि का सम्मान करता हूँ। सब झूठ बोलते हैं। न कोई किसी से प्यार करता है और न कोई किसी का सम्मान करता है। मनुष्य बड़ा खुदगर्ज़ है। वह मनुष्यों में, पशु-पक्षियों में, कीट-पतंगो में और इस संसार में सुख ढूँढता है। वह इस दुखमय संसार में सुख ढूँठते- ढूँठते बूढ़ा हो जाता है, और मर जाता है। भला इस संसार में सुख कहाँ ? इस तरह मनुष्य सुख की आस में जीता है और दुख की मार से मर जाता है। परन्तु मनुष्य ईश्वर की ओर जब कभी मुड़ता है, उसे सुख की अनुभूति होने लगती है। यह है हक़ीकत ज़िंदगी की।
------नैश आत्मन्
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