-(२)----कामनाएँ------
विकारों( काम, क्रोध, लोभ आदि) की
जननी माया (संसार) है। माया जब तक विद्यमान है, विकार नहीं जा सकता है।
कौन कहता है मैने काम पर विजय प्राप्त कर ली है ? कौन कहता है मैने
क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली है ? कौन कहता है मैने लोभ पर विजय प्राप्त कर ली है। सब झूठ बोलते हैं। कामनाओं (इच्छाओं) से घिरा हुआ मनुष्य भला कैसे क्रोध और लोभ से मुक्त हो सकता है ? एक कामना पूरी हुयी, तो दूसरी
कामना सामने खड़ी हो जाती है। दूसरी पूरी हुयी तो तीसरी, तीसरी पूरी हुयी तो
चौथी---। यह क्रम नहीं टूटने वाला है,
क्योंकि एक कामना पूरी होते ही मनुष्य
को लोभ घेर लेता है, फिर वह दूसरी, तीसरी और चौथी की कामना करने लगता है। यदि उसकी कामना नहीं पूरी
हुयी तो उसमें क्रोध आ जाता है। क्रोध इतना भयानक होता है कि उसकी कामना में बाधा डालने वाले मनुष्य की वह हत्या तक कर देता है। क्रोध अंधा होता है, उसे अपना -पराया नहीं दिखता। बाप बेटे की, बेटा बाप की, माँ बेटे की, बेटा माँ की, भाई-भाई की हत्या
करते हुए हम रोज़ देखते हैं। बस इसी क्रोध और लोभ के बीच में झूलते हुए, झूलते हुए मनुष्य कब बूढ़ा हो जाताहै ? वह जान भी नहीं पाता है और अपने किए पर पछताता हुआ रो-रो कर मर जाता है। इस संसार में मैने सबको रोते हुए देखा है। मनुष्य का रोना-धोना तभी
समाप्त होता है जब वह ईश्वर की ओर
मुड़ता है।
--------नैश आत्मन्
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