{36} अनमोल रत्न: गुरु ग्रन्थ साहिब-भाग(४)

--------------पञ्ज पियारे------------------
---(१)------ भाई दया सिंह----
आपका जन्म 1 फरवरी सन्  1668 ई० में लाहौर में हुआ था। सन् 1681 में
आप अपने पिता भाई सुधा और माता डायली के साथ 13 वर्ष की  उम्र में आनन्दपुर साहिब  श्री गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज‌ के पास आए थे। आप यहीं रुक ‌गए और 4 वर्ष गुरू जी के पास रहे फिर आप लाहौर वापस‌  चले आए। आपने अपनी शादी की, और फिर अपनी बीवी दियाली के साथ पुनः 
गुरू जी के पास आनन्दपुर साहिब आ गए। 18 वर्ष गुरू जी के साथ रहे। आपकी उम्र 31 वर्ष हो चुकी थी। 30 मार्च सन् 1699 ई० दिन शनिवार को केशगढ़ में संगत की उपस्थिति में जब गुरू जी ने मंच से कहा , 'हमें एक सिर की आवश्यकता है।' तब भाई दयाराम खड़े हुए, अपना सिर झुकाया और बोले, "मैं अपना सिर देने को तैयार हूँ।"गुरू जी ने भाई दयाराम को मंच पर बुलाया और इन्हें तम्बू के अन्दर लेकर चले गए।
एक बकरे को काटा सिर कटने की आवाज़ बाहर आई। खून तम्बू के बाहर
निकला। वहाँ की संगतियों ने समझा कि दयाराम का‌ सिर गर्दन से अलग कर दिया गया। इस समय आपकी बीवी दियाली की उम्र 29 वर्ष थी। आपके बड़े पुत्र जवाहर की उम्र 13 वर्ष, छोटे पुत्र कृपालु की उम्र 11 वर्ष। आपके दो पुत्रियाँ भी थीं। बीबी मिन्नत और बीबी
आनन्द ‌कौर। आपने सरबत छका। आपने 27 वर्ष 10 महीना अकाल‌ चलाया।आप गुरू जी के साथ आनंदपुर साहेब से पाउन्टा साहेब आए। पाउन्टा साहेब से आप फिर आनंदपुर साहेब आए। इस बीच गुरू जी के साथ आप चार युद्ध ‌लड़े। फिर आप गुरू जी के साथ चमकौर आए। यहाँ आप‌ गुरू जी के साथ पुनः युद्ध में शामिल हुए। गुरू जी के आदेश से आप वहाँ से निकलकर माछीवाड़ा आए। और पुनः आप गुरू जी से यहाँ मिले। आप गुरू‌जी से जफरनामा लेकर दीना गाँव‌ से दिल्ली, आगरा होते हुए  अहमदनगर औरंगजेब के पास आए। आप जफर नामा को औरंगजेब को देकर फिर यहाँ से आप पुनः नांदेड़ गुरू जी के पास आ गए। गुरू जी के लीला संवरण के बाद आप 2 महीना 13 दिन इस संसार में रहे फिर 21 दिसम्बर सन् 1708 में नांदेड़ में आपकी ज्योति, ज्योति में समा गयी। गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज ने आपके
द्वारा लड़े गए भंगाणी युद्ध की सराहना
बचित्र नाटक में किया है। आपकी तुलना महाभारत के युद्ध में लड़ने वाले  गुरू द्रोणाचार्य‌ से की है। आप को समस्त जीव जन्तुओं के प्रति बहुत प्रेम था।
-----(2)----- भाई धर्म सिंह-------
आपका जन्म 12 अप्रैल सन् 1670 ई० में सैदपुर, हस्तिनापुर, मेरठ में हुथा। आपके पिता का नाम चौधरी सन्त राम तथा माता का नाम साभो था। 28 मार्च सन् 1695 में आपकी भेंट गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज से हुयी। आपने स्वयं को गुरू जी को समर्पित कर दिया, फिर वापस घर नहीं गए। आपकी पत्नी का नाम सुखवन्ती था। आपकी चार सन्तानें थीं। तीन पुत्र और एक पुत्री‌। पुत्रों के नाम फकीर चन्द, अमीरचन्द और वीर चन्द तथा पुत्री का नाम तरनतेई था।
आप गुरू के पास लगभग लगभग 14 वर्ष रहे। आपने 16 वर्ष 2 महीना और 26 दिन अकाल चलाया। वैसाखी वाले दिन 30 मार्च‌ सन् 1699 को गुरू के आवाहन पर आप द्वितीय पञ्च पियारे बने। मेरठ से संगत के साथ आपका पूरा परिवार आया था, सबने अमृत छका। भाई परम सुख सिंह उम्र 55 वर्ष,
(आपके भाई), भाई फकीर सिंह उम्र 15 वर्ष ने सरसा नदी के किनारे शहीदी पायी थी। आप गुरू जी के साथ अन्त तक रहे। गुरू जी द्वारा लड़ी गयी सभी लड़ाइयों में आपने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। दीना गाँव से जब गुरू जी द्वारा लिखा गया जफरनामा भाई दया राम‌ सिंह लेकर औरंगजेब को देने अहमद नगर गए तब आप भी साथ में थे। 14 जून  सन् 1711 में आप भी इस जगती को छोड़कर परलोक चले गए।
----(3)-----भाई हिम्मत सिंह---
आपके परिवार का गुरु गद्दी से पहले से जुड़ाव--
भाई हिम्मत सिंह पुत्र भाई गुलजार एवं दादा भाई छज्जू राम झींवर थे। यहाँ छज्जूराम झींवर के बारे में जानना बहुत आवश्यक है, यहाँ हम आपके दादा की
वह‌ कहानी प्रस्तुत करेंगे जो सिक्ख गुरु
गाथा में बहुत ही श्रद्धा के साथ कही-सुनी जाती है।
छज्जू राम झींवर की कहानी-----
आपका जन्म जगन्नाथ पुरी में सन् 1614 ई० में हुआ था। गरीबी के कारण
आपका विवाह देर से सन् 1636 ई० में 22 वर्ष की उम्र में मानकी बाई के साथ हुआ। पहली संतान सन् 1642 में हुयी, जिसका नाम गुलजार रखा। सन् 1657 में गुलजार का विवाह बीबी लालकौर के साथ हुआ। सन् 1658 में छज्जू राम जी की पत्नी मानकीबाई  दिवंगत हो गयीं। पत्नी के दिवंगत होने के बाद
छज्जू राम उदासीन हो गए। आप जगन्नाथ पुरी छोड़ दिए। आप इधर-उधर भटकने लगे। आपकी मुलाकात 
भाई संगूमल्ल से हुयी। आपने छज्जूमल्ल को प्रेरित करके नानक गद्दी
के सातवें गुरू, गुरू हरिराय जी महाराज की सेवा में लगा दिया। सन् 1661 में गुरू हरिराय जी के दिवंगत होने के बाद छज्जूराम आठवें गुरू, गुरू
हरि किशन जी महाराज की सेवा में लग ‌गए। आप झाड़ू-बुहारू एवं ‌चारा लाने का काम करते थे। गुरू‌ हरिकिशन जी 
महाराज जब कीरतपुर से दिल्ली चले तो पंजोकड़ा में निवास किए। छज्जूराम घोड़ी के लिए चारा लेने गए हुए थे। एक अहंकारी पंडित लालचन्द 
गुरू जी के पास आया और बोला, ' नाम तो बहुत बड़ा रख लिया है,क्या भगवान कृष्ण की गीता का अर्थ भी कर सकते हो ? या नाम ही हरिकृष्ण है।' गुरू जी बोले, पंडित जी ! अगर हमने अर्थ कर भी दिए तो आपको तसल्ली नहीं होगी, इसलिए अगर आपको नानक गद्दी की
बरकत और बख्शिश देखनी ही है तो 
किभी भी मनुष्य को पकड़ लाओ। गुरू कृपा से वह मनुष्य ही आपकी तसल्ली करवा देगा। पंडित लाल चन्द ने अच्छा समय जानकर एक ऐसे व्यक्ति की खोज में निकल पड़े जो उनके अहंकार
की पूर्ति कर सके अर्थात् जो पढ़ा-लिखा बिल्कुल ही न हो, जो ठीक से बोल न सकता हो, जिसमें सोचने और समझने 
की क्षमता न हो। पंडित लाल चन्द
गाँव पंजोखड़ा से कुछ ही दूर  चले थे कि उनकी नज़र एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी, जो अधेड़ उम्र ‌का दिखता था और वह घास काट रहा था। उसे नहीं मालूम था कि कुछ ही पलों बाद उसका भाग्य सँवरने वाला है। वह बेखबर होकर घास काटता रहा। पंडित लालचन्द ने उसे बुलाया। उसने सुना नहीं। वह कुछ ऊँचा
सुनता था। पंडित ने उसके पास जाकर
देखा, वह कई जगह से टेढ़ा था। पूछा,
'तुम्हारा नाम क्या है ?' वह बहुत देर में
ताकत लगाकर तुतलाकर  बोला, छ---ज्जू---। तुम पढ़े-लिखे हो ? उसने बाएँ-दाएँ सिर हिलाकर नहीं का इशारा किया। पंडित लालचन्द को प्रसन्नता हुयी, यह जानकर‌ कि उसे बिन माँगे मुराद मिल गयी है। पंडित ने उससे समझाकर कहा, 'चलो तुम्हें गुरू ने बुलाया है।' उसने घास बाँधी।अपने सिर पर घास को रख लिया और वह पंडित के पीछे-पीछे चलने लगा। पंडित लालचन्द ने गुरू के सामने उसे प्रस्तुत किया। पंडित लालचन्द सोच रहे थे, जो
ठीक से अपना नाम नहीं बता पा रहा था, उससे गीता का अर्थ भला कैसे बोला जाएगा ? गुरू जी ने बाबा गुरुदित्ता की ओर इशारा करते हुए कहा, इन्हें नहला-धुला कर साफ- सुथरे
कपड़े पहनाकर मेरे सामने लाओ, इनसे पंडित जी भगवान कृष्ण के गीता के श्लोकों का अर्थ करवाएँगे। छज्जूराम को पेश किया गया। गुरू जी ने अपनी छड़ी छज्जू के सिर पर रखी। छज्जू ने
पंडित जी से पूछा, पंडित जी बताइए !
चार वेद सुनाऊँ अथवा छः शास्त्रों के बारे में बताऊँ। पंडित लालचन्द हैरान
थे। उनका अहंकार खण्ड-खण्ड हो चुका था। जो अपना नाम नहीं बता पा
रहा था, वह विद्वानों जैसी बातें कर रहा है। पंडित लालचन्द गुरू हरि किशन
 जी महाराज के चरणों में गिर पड़े। रोने लगे। क्षमा माँगने लगे। ऐ पातशाह ! मुझे क्षमा कर दो। मेरा अहंकार टूट चुका है। छज्जूराम अपने सेवा का फल पा चुके थे। गुरू जी ने कहा, अब आप गुरू नानक देव जी के सिक्खी में प्रवीन हो गए हैं। जाओ ! गुरुमत का प्रचार करो और जाओ अपने परिवार को भी 
गुरु घर से जोड़ो। आपके घराने में ऐसी सन्तान होगी जो आपके कुल का मान बढ़ाएगी। यह वरदान पाकर छज्जूराम 
अपने घर जगन्नाथ पुरी आ गए और गुरू जी दिल्ली चले गए। भाई हिम्मत सिंह आपके ही पौत्र थे जो गुरु हरि किशन जी महाराज के वरदान से आपके पुत्र गुलजार और पुत्र बहू बीवी
लालकौर से जन्म लिया था। 
भाई हिम्मत सिंह का जन्म 17 मई सन् 1664 ई० में हुआ था। जब भाई हिम्मत की उम्र 14 वर्ष की हुयी तब 
परिवार सहित जगन्नाथपुरी से आप आनन्दपुर साहेब गुरू गोविन्द जी से मिलने आए। गुरू गोविन्द जी की उम्र
उस समय 12 वर्ष की थी। गुलजार जी ने कुछ रूपए और लालदेई जी ने दुःशाला गुरू जी को भेंट किया। गुलजार से गुरू जी ने कहा, बस इतनी ही भेट लाए हैं। यह तो बहुत कम है। मुझे और भेंट चाहिए। दोनों की आँखों में जल भर आया। कहा, ' हम गरीब सिक्ख हैं। जितनी हो सकी लेकर आए हैं।' आगे और अधिक लेकर आएँगे। गुरू तो प्रेम देखते हैं, उन्हें माया से क्या मतलब ? गुरू ने कहा, जो लाए हो, वह तो भेंट कर दो। क्या वापस ले जाने का इरादा है ? हिम्मत जी समझ गए। पिता से बोले, मेरी हाज़िरी लगाओ और मुझे भेंट कर दो। शायद गुरू जी प्रसन्न हो जाएँ। गुलजार जी ने अपने बेटे हिम्मत
का हाथ पकड़ा और कहा, 'लीजिए ! इसे भेंट किया। गुरू जी उठे हिम्मत जी को गले लगाया। हिम्मत जी को यहीं छोड़कर माँ- बाप जगन्नाथपुरी चले गए।
सन् 1684 ई० में हिम्मत जी की उम्र 20 वर्ष की हुयी तब आपका विवाह बीबी रामदेई के साथ हुआ। पति-पत्नी
दोनों गुरू जी के पास ही रहते थे। 13 अक्टूबर सन् 1685 ई० में पाउन्टा में 
गुरुदत्त जी, 5 जनवरी सन् 1687 ई० में पाउन्टा में हरिदत्त चन्द जी, 13 अप्रैल सन् 1688 ई० में आनन्दपुर साहेब में निधान चन्द जी,  25 दिसम्बर सन् 1690 ई० में नसीब कौर,  और 11 अप्रैल सन् 1693 ई० में ताराचन्द जी का जन्म हुआ। 30 मार्च सन् 1699 ई० को आप तीसरे पञ्ज पियारे बने। पूरे परिवार ने अमृत छका। सन् 1700 ई० में भाई हिम्मत सिंह की उम्र 36 वर्ष
की हुयी। सन् 1700 ई० से सन् 1704 ई० तक 5 बड़े युद्ध हुए। सभी युद्धों को भाई हिम्मत सिंह जी जीते। सन्1704 ई० में गुरू जी ने हुक्म दिया कि कवि, शायर, छोटे बच्चों वाले परिवार अथवा
युद्ध से घबराने वाले लोग अपने-अपने
सुरक्षित स्थानों पर चले जाएँ। गुरू जी ने अपने परिवार को अपने पास ही रखा। आपका एक बेटा हरिदत्त चन्द सिंह,  बेटी बीवी नसीब कौर संगत के साथ जगन्नाथपुरी चले गए। आपके पिता गुलजार सिंह, बेटा गुरुदत्त चन्द सिंह उम्र 19 वर्ष,  बेटा निधान चन्द सिंह उम्र 16 वर्ष , बेटा तारा चन्द सिंह उम्र 11 वर्ष आनन्द पुर साहेब में ही रहे। हिम्मत सिंह ने अपने छोटे पुत्र तारा
चन्द सिंह से पूछा, तुम यहाँ रहोगे अथवा अपने भाई हरिदत्तचन्द सिंह और अपनी बहन नसीब कौर के साथ 
जगन्नाथपुरी जाओगे ? तारा चन्द ने जवाब दिया मैं जोरावर सिंह और फतेह
सिंह की फौज का जरनैल हूँ। आवश्यकता पड़ी तो यहीं आनन्दपुर में  शहादत का जाम पियूँगा। हिम्मत सिंह का यह बेटा सिरसा नदी के किनारे 4 सितम्बर सन् 1704 ई० को युद्ध करते हुए शहीद हुआ। भाई हिम्मत सिंह, अपने पिता गुलजार सिंह, तथा दो बेटे गुरुदत्त चन्द सिंह, और निधान चन्द सिंह के साथ चमकौर गढ़ी में पहुँचे। दिन चलना शुरू हुआ तो सरहिन्द सूबा 
वज़ीर खाँ ने आदेश दिया कि सीढ़ी लगाकर देखो ! क्या अभी ज़्यादा लोग ज़िन्दा हैं ? नाहर खाँ और गनी खाँ 
सीढ़ियों पर चढ़े और गढ़ी के अन्दर देखने लगे। गुरू जी ने तीर चलाया। दोनों चिल्लाते हुए नीचे गिरे। आगे बढ़ने का हौसला फिर किसी ने नहीं दिखाया।
भाई दया सिंह गढ़ी के दरवाज़े की तरफ बढ़े तो भाई हिम्मत सिंह ने रोक दिया और कहा आज पहल की बारी मेरी है।
जब गुरू ने सिर माँगा था तो आप पहल कर गए थे, आज ऐसा नहीं होने दूँगा।
भाई हिम्मत सिंह जी गुरुदेव के सामने
हाथ जोड़कर खड़े हुए और दया सिंह की ओर देखकर कहा, उस दिन का 
हरजाना भरने के लिए मेरे ये दो पुत्र 
गुरुदत्त चन्द सिंह, निधान चन्द सिंह और मेरे पिता बाबा गुलजार सिंह मेरे
साथ शहीदी के लिए तैयार हैं। दो शागिर्द भाई फुम्मन सिंह और भाई सुरैन सिंह भी मेरे साथ हैं। गुरुदेव से कहा, दुश्मन फौज आगे बढ़ रही है, मुझे आदेश दें, हम युद्ध में जाएँ और इन्हें पीछे ढकेलें। गुरुदेव ने हिम्मत सिंह को गले लगाया और युद्ध में जाने की इजाज़त दी। गढ़ी का दरवाज़ा खुला।
जैकारे के साथ दुश्मन पर टूट पड़े। गढ़ी से दूर ढकेल ले गए। एक-एक सिंह हज़ारों दुश्मनों को मारकर शहीद हुए।
इस तरह 6 दिसम्बर सन् 1704 ई०को 
भाई हिम्मत सिंह अपने दो पुत्रों, अपने पिता एवं दो शागिर्दों के साथ शहादत 
देकर गुरु ऋण से मुक्त हो गए।
-----(4)---भाई मोहकम सिंह-------------
आपका जन्म जगजीवन राम और सम्हाली के घर 7 मार्च सन् 1679 ई०
को छींबा जाति में हुआ। आपके परदादा सवरतन जी आध्यात्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, और पोशाकें सिलने‌ का कार्य करते थे। एक बार आपने स्वप्न देखा कि भगवान (कोई दिव्य मूर्ति) आपके घर आए हैं और कह रहे हैं कि मुझे चोला (पोशाक) नहीं पहनाओगे ?
 मैं फिर आऊँगा। इसके बाद भाई
 सवरतन जी अपना सारा समय पोशाकें सिलने में ही खर्च करने लगे। भेंट द्वारका टापू था। इसमें नानकदेव जी का
आगमन हुआ। भक्तों ने कहा, 'यहाँ का पानी खारा है ! कुछ करिए। आपने एक  कुआँ खुदवाया। इसका पानी मीठा था। इसकी चर्चा फैल गयी। सवरतन जी भी मिलने को उत्सुक थे। नानक देव जी आपके घर आ गए। आपके खुशी का ठिकाना न रहा। आपने प्रेम से नानक देव जी को बिठाया। आँसुवों से पैैर धोया। खिलाया - पिलाया। तब नानक देव जी ने कहा, 
पोशाक नहीं पहनाओगे। सवरतन को
याद आया, यह तो वही भगवान हैं जो
सपने में आए थे। लाकर पोशाक पहनायी। आशीश देकर नानकदेव जी  चले गए। आपके चौथी पीढ़ी में मोहकम
का जन्म हुआ। आप बहुत सुन्दर थे। नीची जाति होने के कारण‍ कोई पंडित
नामकरण करने के लिए और कुण्डली
बनाने के लिए तैयार नहीं हुआ। कुछ दिन बाद एक साधू ने आकर दरवाज़ा खटखटाया। साधू बोला, "मैं उच्च कुल
 का एक पंडित ‌हूँ , सुना है आपके घर में बालक ने जन्म लिया है" जगजीवन राम ने जवाब दिया, "जन्म तो हुआ है, परन्तु नीची जाति का होने के कारण कोई पडित  बालक का नामकरण करने  के लिए तैयार नहीं हुआ।" साधू बोला, "ऊँच-नीच का भेद-भाव त्यागकर स्वास-स्वास ईश्वर का सिमरन करके जीवन निर्वाह कर रहा हूँ।" जगजीवन राम साधू को अन्दर ले गए, सम्मान के 
साथ बिठाया। प्रेम से खिलाया-पिलाया।
साधू ने बालक को देखकर कहा, " यह वही है, यह वही है, यह वही है। यह‌ बालक बहुत मोहने वाला ( सुन्दर) है, इसलिए इसका नाम मोहकम चन्द होना चाहिए। यह बालक योद्धा होगा। इसकी
नेकियों के कारण आपके परिवार को 
सुनहरे अक्षरों में लिखकर याद किया जाएगा।" जगजीवन राम ने कहा, फिर आइएगा।" साधू ने उत्तर दिया, "यह खुद मेरे पास आएगा।" मोहकम चन्द की उम्र 11-12 वर्ष की थी। सर्दी के दिन में एक लालचन्द नाम के पण्डित अपना मुश्किलों भरा जीवन बिता रहे थे। ठण्ढ
में ठिठुरते हुए आए और मोहकम चन्द
से मिलकर कहा,  " मेरे घर में खाने के लिए अन्न नहीं है, पहनने के लिए  कपड़े
नहीँ है, अपनी बिरादरी पंडितों से मदद के लिए‌ आग्रह किया किसी ने ध्यान नहीं दिया। मेरी मदद करो। भेंट द्वारका
मैं कई परिवार गुरु घराने से जुड़े हुए थे।
मोहकम चन्द उन घरानों से अन्न 
कट्ठा किए, पोशाक सिली और पंडित‌ लालचन्द को दिया। पंडितों की एक बैठक रामदत्त पंडित की अध्यक्षता में हुई। पंडित‌ दामोदर जी और पंडित कृपाल जी इसमें उपस्थित थे। इन सबों 
ने मोहकम चन्द पर क्रोध प्रकट किया।
सभी ने कहा, "यह नीच जाति का है, इसने ब्राह्मण समाज को भ्रष्ट किया है,
और यह भी झूठा आरोप लगाते हुए कहा कि यह हिन्दू देवी-देवताओं को गालियाँ देता है। इस पर पंडितों ने मुकदमा कर दिया। उस समय यहाँ के राजा थे यशवन्त राय जी। पंडित एकजुट थे। लगता था मोहकम चन्द दंडित कर दिए जाएँगे। सुनवाई की तारीख मुकर्रर हुई। पुकार हुआ। पंडितों ने अपना पक्ष रखा। जत्थेदार टीकामल्ल का लड़का संतामल्ल भी वहीं था। उसने पंडित लालचन्द के पास आकर कहा, चलो ! हक़ीकत का बयान करो वर्ना मोहकम दण्डित कर दिया जाएगा। लालचन्द की पत्नी ने भी कहा, शीघ्र जाओ ! और मोहकम को बचाओ। लालचन्द कचहरी में हाज़िर हुआ और अनुमति मिलने पर कहा, मेरे बच्चे और पत्नी भूख से तड़प रहे थे, पत्नी और बच्चों को तन ढकने के लिए कपड़े नहीं थे, बच्चे ठंढी से ठिठुर रहे थे। मै इन सब पंडितों के पास गया था, परन्तु इन सबने अपना मुख मोड़ लिया, किसी ने भी मेरी गरीबी में मदद नहीं की। उस
समय मोहकम ने भगवान बनकर मेरी
मदद की, अगर नेकी करने वालों को सजाएँ मिलने लगीं, तो कोई एक दूसरे
की मदद क्यों करेगा ? उपस्थित लोगों ने गवाही भर दी। झूठे पंडित एक-एक कर वहाँ से खिसकने लगे। पंडितों पर फटकार पड़ी। मोहकम की जीत हुई।
अब पंडित लालचन्द की माली हालत ठीक थी। मोहकम के घर आए और कहा, मोहकम ? आपने मेरी मदद की है ़, कुछ सेवा का अवसर मुझे भी दो।
मोहकम बोले, प्रीतियों से सेवाएँ नहीं ली जाती हैं। लालचन्द ने फिर कहा, कुछ
तो सेवा का अवसर देना ही पड़ेगा। मोहकम बोले, आप हमें और हमारे बच्चों को हिन्दी, संस्कृत पढ़ा दें। पंडितों ने लालचन्द को पढ़ाने से मना किया, परन्तु लालचन्द ने कहा, ये सब गुरु गोविन्द राय का गुणगान करते हैं, मैं स्वयं भी पुरोहिती छोड़कर गोविन्द गुरू का सच्चा भक्त बनूँगा। बैसाखी वाले दिन जब मोहकम पंज पियारों में शामिल हुए थे, उसी दिन लालचन्द भी
अमृत छककर लालचन्द से भाई लाल बने थे। भाई टीकामल जी के साथ द्वारका से जो संगत गुरू गोविन्द जी का दर्शन करने आन्न्दपुर में आई, इसी के साथ भाई मोहकम चन्द जी, अपने पिता जगजीवन राम और माता सम्हाली जी के साथ 5 अप्रैल सन् 1694 ई० में आए। एक चोला (पोशाक) भेंट‌ के लिए लाए थे। गुरू जी ने चोला को उठाकरअपने अंग से लगाया और कहा, इसकी एक-एक सिलायी में प्यार भरा हुआ है। पोशाक के ऊपर लगे हुए हीरे-मोती कुछ बयान कर रहे हैं। मोहकम चन्द खड़े हुए और हाथ जोड़कर कहा, पातशाह ! यह पोशाक मैने सिली है, लेकिन इसके ऊपर जो हीरे मोती टँके हुए हैं वह द्वारका के राजा यशवन्त राय 
जी के दिए हुए हैं। वे संगत को भेजने भी आए थे और उन्होंने ये पाँच‌ सौ (देते हुए) मोहरें आपको भेंट करने के लिए दी हैं तथा यह भी कहा है कि अगली बार मैं स्वयं गुरू‌जी से मिलने जाऊँगा।
गुरु बोले सिर्फ यही पोशाक भेंट करोगे
या और ‌कुछ ? पिता ‌जगजीवन राम ने
मोहकम का हाथ पकड़कर कहा, यह तो घर से कह रहा था, मैं रुककर वहीं गुरू ‌की‌ सेवा करूँगा। इसे मैं आपकी सेवा में भेंट करता हूँ। संगत एक महीना रुकी फिर वापस द्वारका चली गयी।
मोहकम जी रुक गए गुरु सेवा में।
तीन साल बीत ‌गए। पोशाकें सिलते। गुरु सेवा करते। अस्त्र-शस्त्र चलाना सीखते। घुड़सवारी करते। दाँव-पेंच सीखते। इस वर्ष द्वारका के संगतों के साथ द्वारका के राजा यशवन्त राय भी 
अपने परिवार के साथ कीमती नज़राना 
लेकर गुरु दर्शन के लिए आए। मोहकम
चन्द की गुरू से प्रशंसा भी की। भाई हंसराज ने अपनी पुत्री सुखदेई कौर की शादी के लिए जगजीवन राम से बात की। बात पक्की हो गयी। आनन्दपुर में ही 5 नवम्बर 1697 ई० में शादी हो गयी। कुछ दिन रुकने के बाद द्वारका के संगत के साथ पिता जगजीवन राम, माता सम्हाली और राजा यशवन्त राय 
वापस लौट गए। मोहकम जी, पत्नी सुखदेई के साथ गुरु सेवा में रुक गए।
30 मार्च सन् 1699 ई० दिन गुरुवार को पञ्ज पियारों में चौथे नम्बर पर आपने अपना सिर गुरू को सौंप दिया।
 मोहकम सिंह की उम्र 20 साल, पत्नी सुखदेई की उम्र 18 साल, पुत्र सुन्दर सिंह उम्र 3 महीने की थी। सुन्दर सिंह का जन्म 5 जनवरी सन् 1699 ई० में, दूसरा बेटा हीरा सिंह का जन्म 9
मार्च सन् 1700 ई० में और बेटी रत्नागर कौर का जन्म 26 सितम्बर 1702 ई० में हुआ। 1703 में द्वारका से संगत आई। जगजीवन राम जी और सम्हाली जी भी आई थीं। आप दोनों
मोहकम के परिवार को द्वारका ले जाना चाहते थे। सुन्दर सिंह 4 साल के, हीरा सिंह 3 साल ‌की और रत्नागर 4 महीने की थी। सुन्दर सिंह यहीं अपने नाना, हंसराज जी और नानी आज्ञा कौर के साथ रुक गए। शेष परिवार हीरा सिंह, रत्नागर और सुखदेई को लेकर जगजीवन राम जी, और सम्हाली जी
द्वारका पहुँच गए। आनन्दपुर की पहली लड़ाई 1701 में पैडे खाँ और दीना वेग
की 10 हज़ार फौज ‌को इन पञ्ज पियारों को साथ‌ लेकर भाई उदय सिंह और भाई आलम सिंह ने भेंड़ बकरियों जैसा खदेड़ दिया। दूसरी लड़ाई नवम्बर 1701 में हुयी, जिसमें भाई मोहकम सिंह ने हज़ारों फौज को अकेले मार डाला। तीसरी लड़ाई पहाड़ी राजाओं के साथ हुयी, इसे भी सिंहों ने जीता। चौथी
और पाँचवीं लड़ाई में भी सिक्खों की जीत हुयी। छठी लड़ाई में आनन्दपुर से हटना पड़ा। 6 दिसम्बर 1704 ई० को किला छोड़ दिया। सिरसा नदी पर मुगल
सैनिकों से मुकाबला हुआ। अँधेरी जाड़े की रात में सब विखर गए। गुरू जी के साथ मोहकम सिंह नदी पार हो गए, लेकिन भाई हंसराज जी, पत्नी आज्ञा कौर और मोहकम सिंह का पुत्र सुन्दर सिंह नदी नहीं पार कर सके और वहीं रात भर भटकते रहे। प्रातः सुन्दर सिंह
को देखा तो दुश्मन‌ चिल्लाए ! यह तो गुरू का छोटा बेटा है, मार ‌दो ! इसे मत जाने दो। ये दोनों हम उम्र और हम शक्ल थे। एक औरत ने आकर कहा, कि दुश्मन तुम्हें गुरू का ‌लड़का समझ कर मार देना चाहते हैं, तुम इन्हें अपनी सच्चाई बता दो, शायद तुम्हारी जान बच
जाए। 6 वर्ष के सुन्दर सिंह ने कहा, यही तो मैं चाहता हूँ। दुश्मन मुझे फतेह सिंह समझकर मार दें और फतेह सिंह को ढूँढना बन्द कर दें जिससे मेरे भाई फतेहसिंह की ज़िंदगी बच जाए। मुगल
फज़ल खाँ ने इन पर आक्रमण कर दिया और ये सभी सिंह और सिंहानियाँ
लड़ते हुए शहीद हो गए। यह थी सुन्दर सिंह की शहादत। 7 दिसम्बर 1704 ई० को गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज अपने दो पुत्रों अजीत सिंह एवं जुझार सिंह के साथ चमकौर की गढ़ी में पहुँचे।
5--5 के जत्थे बने। 10 लाख की मुगल सेना घेरे हुई थी। घमासान युद्ध हुआ।
अजीत सिंह के जत्थे में भाई मोहकम सिंह थे। इस युद्ध में तीन पञ्ज पियारे
भाई हिम्मत सिंह, भाई मोहकम सिंह और भाई साहिब सिंह शहीद हुए। दया सिंह और धर्म सिंह ये दो पञ्ज पियारे
गढ़ी से बाहर हुए और गुरू से माछीवाड़ा में मिले।
-----(5)--- साहिब सिंह---------------
भाई साहिब सिंह जी का जन्म 3 नवम्बर सन् 1675 ई० में बिदर‌ से 7 मील दूर नानक झींरा नामक स्थान पर नारायण जी और अनुकम्पा जी के घर में हुआ था। आपके चाचा जी का नाम
चमन एवं चाची या नाम विशनदेई था।
तथा दादा का नाम राईया दत्त तथा दादी
का नाम तुलसी था। आप नाई जाति के थे और बाल काटकर आपके परिवार का गुज़ारा होता था। नानक झींरा वह स्थान है जहाँ नानक‌देव जी के पहुँचने पर लोगों‌ ने आग्रह किया था, कि ‌यहाँ
का पानी खारा है, हमें मीठा पानी चाहिए। नानक जी ने एक पत्थर खिसकाया, वहाँ एक सोता निकला।
इस सोते का पानी मीठा था। आज भी वह झींरा बहता है। यहाँ के पुजारी खुशहाल जी थे। जब साहिब चन्द की
उम्र 11 वर्ष हुयी तब खुशहाल जी के
जत्थे के साथ आप अपने माता-पिता सहित सन् 1687 ई० में पाउण्टा साहिब पहुँचे। आपकी मुलाकात गुरू जी से हुयी। उस समय गुरू जी उम्र 21 वर्ष थी और आपकी उम्र 11 वर्ष। साहिब जी दौड़कर पैर पकड़ लिए। गुरू ने आपको कण्ठ से लगाया। साहिब जी
की आँखों से आँसू छलक पड़ा। गुरू जी के चरण को साहिब जी छोड़ ही नहीं रहे थे, बार-बार कह रहे थे कि  हमें
अपने पास रखकर सेवा करने का अवसर दें। पिता नारायण जी और माता अनुकम्पा जी ने पास में आकर कहा कि मैं अपना बेटा आपको भेंट करता हूँ। माँ-बाप संगत के साथ वापस चले गए और भाई साहिब जी गुरु सेवा में लग गए। भंगाणी युद्ध सन् 15 अप्रैल सन्
1687 ई० में हुआ, तब आपकी उम्र 
11वर्ष 4 माह थी। किन्तु आप युद्ध में
शामिल हुए थे। 9 फरवरी सन 1693 में
 इनके माँ-बाप संगत के साथ आए थे। तभी भाई तीर्थ राम जी ने अपनी बेटी निरंजनी का विवाह जिसकी उम्र 16 वर्ष की थी, साहिब जी से कर दिया। साहिब जी की उम्र 18 वर्ष की थी। 3 जुलाई सन् 1696 ई० में पुत्र गुरु दयाल
चन्द तथा 25 फरवरी सन् 1698 ई० में
पुत्र लाल चन्द का जन्म हुआ। 30 मार्च
सन् 1699 ई० में वैसाखी पर पाँचवे पञ्ज पियारे बने। ऐसे अवसर पर पूरा परिवार एवं रिश्तेदार यहाँ इकट्ठा था और सबने अमृत छका। साहिब चन्द की उम्र 24 वर्ष हो चुकी थी। 12 वर्ष से
अनवरत साहिब जी गुरु सेवा में रत थे।
25 जनवरी सन् 1791 में पुत्री गुरुचैन
कौर का जन्म हुआ।पत्नी निरंजनी कौर एक बहादुर स्त्री थीं। तलवार बाजी और घुड़सवारी इन्हें बेहद पसन्द थी। बीबियों की एक फौज तैयार की जिसकी जरनैल माता साहिब कौर थीं। सभी बीबियों को घुड़सवारी और अस्त्र-शस्त्र चलाने की शिक्षा देती थीं। 29 मार्च सन् 1704 ई० में सैद खाँ ने आनन्दपुर साहिब पर आक्रमण किया। गुरु के पास केवल 700 सिक्ख थे। इसके अतिरिक्त निरंजनी कौर की
बीबियों की सेना 200 थी। दुश्मन ने कहा, एक बार आनन्दपुर खाली कर दो, फिर आकर कब्जा कर लेना। गुरु ने मान लिया। गढ़ को खाली कर दिया।
दुश्मन ने पीछे से आक्रमण कर दिया।
निरंजन कौर ने मोर्चा सम्हाला जिससे
गुरू और उनके साथी बच सकें। घमासान युद्ध हुआ। दुश्मन फौज अत्याधिक थी। निरंजन कौर इस युद्ध में
शहीद हुयीं। दुश्मनों ने आनन्दपुर पर कब्जा करके लूट-पाट शुरू कर दिया।
बेटी गुरुचैन कौर की उम्र केवल 3 साल
3 महीना 4 दिन थी, गुरु दया सिंह की उम्र 8 वर्ष, लाल सिंह की उम्र 6 वर्ष थी। अगले दिन साहिब सिंह ने इन तीनों बच्चों को नज़ीरा बेगम को सौंपकर आगे बढ़ गए। नज़ीरा बेगम सैद बेग जो युद्ध में मारे जा चुके थे, की पत्नी थीं।
गुरुचैन कौर छोटी थी। बार-बार झाँकती थी। दुश्मनों की नज़र इस पर पड़ गयी।
पूछा, तू सैद वेग की पुत्री है। नहीं मैं साहिब सिंह की पुत्री हूँ। बड़ी होकर क्या करेगी ? ज़ालिमों और ज़ुल्म को
खत्म करूँगी। गुरुचैन के पेट में छुरा घोंपकर मार दिया। नज़ीरा बेगम ने बचाने की बहुत कोशिश की, मगर बचा नहीं सकीं। गुरु दया सिंह और लाल सिंह को बचाने में कामयाब रही थीं, परन्तु बहन के मारे जाने पर दोनो ने दुश्मन पर आक्रमण कर दिया और लड़ते हुए शहीद हो गए। भाई साहिब सिंह चमकौर गढ़ी में थे‌ और आखिरी जत्थे ने जो दुश्मनो से लड़ते हुए शहीद हुआ, उसके जत्थेदार थे। आपकी उम्र 29 वर्ष 1 महीना 3 दिन थी।
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