---:भगवान शिव:----(७)
---(३)-----अशोक सुन्दरी:---------
अशोक सुन्दरी भगवान शिव एवं माता
पार्वती की पुत्री हैं। ये भगवान कार्तिकेय
से छोटी एवं अन्य भाई बहनों से बड़ी हैं। माता पार्वती ने अपना एकान्तपन
हटाने के लिए कल्पवृक्ष से इन्हें माँगा था। अशोक सुन्दरी बहुत सुन्दर थीं। माता पार्वती ने इनको इन्द्र के समकक्ष
पौरुष वाले से विवाह होने का वरदान दिया था। एक बार अशोक सुन्दरी को राक्षस हुण्ड ने देखा तो वह मोहित हो गया और विवाह के लिए आग्रह किया। अशोक सुन्दरी ने मना कर दिया
और कहा उसका विवाह राजा नहुष से होगा। उसने कहा , हम नहुष की हत्या
कर देंगे। अशोक सुन्दरी ने उसे शाप दिया कि तू नहुष के हाथों से मारा जाएगा। राक्षस हुण्ड ने नहुष का अपहरण कर लिया, इन्हें हुण्ड की एक दासी ने बचाया। नहुष का पोषण महर्षि
वशिष्ठ के आश्रम में हुआ। नहुष ने राक्षस हुण्ड का वध किया। अशोक सुन्दरी का विवाह नहुष से सम्पन्न हुआ।
अशोक सुन्दरी और नहुष से महाराज
ययाति जैसा यशस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। महाराज ययाति से महाराज भरत हुए
जिनके नाम से अपने देश का नाम
भारत पड़ा। इन्द्र का पद रिक्त होने पर
महाराज नहुष को इन्द्रासन पर बैठा दिया गया। इसे अहंकार हो गया, इसने
माता इन्द्राणी से कहा, इन्द्रासन पर मेरा अधिकार है इसलिए तुम पर मेरा
अधिकार स्वतः हो गया। इन्द्रणी को जब नहुष से बचने का कोई उपाय नहीं दिखा तो कहा, जब तुम डोली लेकर आओगे तब हम तुम्हारे साथ चलेंगे, परन्तु डोली उठाने वाले सप्त ऋषि होंगे। नहुष ने डोली मँगायी, सप्त ऋषियों को बुलाया, स्वयं डोली पर बैठा और सप्त ऋषियों को डोली ले चलने का आदेश दिया। हाथ में चाबुक लिए हुए था। शीघ्र पहुँचने के लिए वह ऋषियों पर सर्प सर्प कहकर चाबुक चला रहा था। बहुत विहंगम दृश्य था। माता शची(इन्द्राणी) ने सोचा, ये कैसे हैं सप्त ऋषि ! जो डोली लेकर मुझे ब्याहने आ रहे हैं। बहुत दुखी होकर माता शची ने मुनि अगस्त्य का ध्यान
किया और कहा, प्रभो ! शची की अस्मत अब आपके हाथ में है। कुछ
करो प्रभो ! मुनि अगस्त्य ने महारानी शची की विवशता को समझा। ज्यों ही
उसने चाबुक उठाकर सर्प सर्प कहा, मुनि अगस्त्य ने शाप दे दिया:-- जा तू सर्प हो जा और वह नहुष ! जो महारानी
शची को ब्याहने चला था वह सर्प हो गया तथा माता अशोक सुन्दरी विधवा
हो गयीं।
----(४)-----:मनसादेवी:-------------
भगवान शिव और पार्वती मान सरोवर में जल क्रीड़ा कर रहे थे, तभी भगवान
शिव का तेज निकला, जिसे सर्पणियों
ने अपनी कुण्डली में रोक लिया। इससे
जिस कन्या का जन्म हुआ, वही मनसा देवी हैं। नारद के कहने पर भगवान शिव और माता पार्वती नाग लोक जाकर अपनी पुत्री मनसा देवी को कैलाश ले आए। भगवान शिव से वासुकि ने कहा, प्रभो ! हमारी कोई बहन नहीं है। आप कृपा करके मनसा देवी को मेरी बहन बनने का अधिकार मुझसे न छीनें। यह नागवंश की सुरक्षा का अंतिम सहारा है इसी की सन्तान बुआ कद्रू के शाप से नाग वंश को बचाएगा। प्रभो ! जैसा कि आप जानते हैं कि बुआ कद्रू एवं इनकी सौत विनीत (गरुड़ की माता) में बाजी लगी थी कि उच्चैश्रवा घोड़े के पूँछ के बाल किस रंग के हैं ? विनीत ने कहा था, सफेद। बाजी जीतने के लिए बुआ कद्रू को काली कहना ही था। बुआ ने अपने सभी संतानों से कहा था, जाओ ! घोड़े के काले बाल बनकर लटक जाओ। जो ऐसा नहीं करेगा, वह पाण्डव वंशीय
राजा जन्मेजय के सर्प यज्ञ में जलकर भस्म हो जाएगा। इसलिए हे प्रभो !इन्हें आप नाग लोक वापस भेज दें। भगवान शिव ने ऐसा ही किया। मनसा देवी का पोषण नाग लोक में ही हुआ। एक दूसरी कथा के अनुसार यह
भगवान शिव का तेज महर्षि कश्यप की
पत्नी कद्रू (सर्पों की माँ ) की प्रतिमा से
टकराया, तब मनसा देवी का जन्म हुआ। एक अन्य कथा के अनुसार मनसा देवी महर्षि कश्यप के मस्तक से
निकली हैं। मधु श्रावणी के अनुसार इस
तेज को सर्पणियों ने निगल लिया, तब
पाँच नाग कन्याओं का जन्म हुआ। इन कन्याओं के नाम:---(१) जया (२) विष हर (३) शामिलबारी (४) देव (५) दोतलि। मनसा देवि का शरीर तप के कारण बहुत जीर्ण हो गया था। इसलिए
इनका एक नाम जरत्कारु भी पड़ गया था। जर का अर्थ है क्षीण होना। एक जरत्कारु ऋषि थे। ये केवल़ हवा पीकर
रहते थे, बाल ब्रह्मचारी थे। जंगल में विचरण कर रहे थे तभी इन्होंने कुछ मनुष्यों को एक खाईं के ऊपर उलटा लटके हुए देखा। इनके दोनों पैर एक
खस के जड़ से बँधा था। जड़ों के सारे
धागे टूट चुके थे केवल एक धागा बचा हुआ था, उसे भी एक चूहा कुतर रहा था। जरत्कारु को यह देखकर दया आ गयी। पास पहुँचकर आपने कहा कि आपके पैर जिन जड़ के धागों से बँधे हुए थे वे टूट चुके हैं, आखिरी धागा बचा है उसे भी चूहा कुतर रहा है। यदि मेरे तप बल से आप लोगों का कल्याण हो सके तो मैं देने को तैयार हूँ। उन्होंने कहा, तप बल तो हमारे पास भी है।आगे उन्होंने कहा, हमारे वंश में सभी समाप्त हो चुके हैं केवल एक व्यक्ति बचा है जो वंश बढ़ा सकता है। उसी का
प्रतीक वह एक धागा शेष बचा है। उसे भी काल रूपी चूहा कुतर रहा है। जरत्कारु ने उनसे पूछा, वह कौन है जो आपके वंश में अभी शेष है। उन्होंने उत्तर दिया, जरत्कारु ! जरत्कारु बोले, वह मै ही हूँ। मैने विचार किया था, मैं विवाह नहीं करूँगा। परन्तु आपकी यह दशा देखकर अब मुझे विवाह करना होगा, जिससे वंश आगे चल सके। जंगल में एक स्थान पर बैठकर आवाज़ लगायी। मैं उसी लड़की से विवाह करूँगा जिसका नाम चरत्कारु हो। मैं जीवन भर उसके पोषण का दायित्व नही ंलूँगा। जिस दिन वह मुझे दुखी करेगी उसी दिन मैं उसे छोड़कर चला जाऊँगा। मनसा देवी का विवाह चरत्कारु से हो गया। इन्हे नागलोक में एक अच्छे भवन में रहने की व्यवस्था की गयी। एक दिन सायं काल ऋषि अपनी पत्नी के पैर पर सिर रखकर सो
रहे थे। सूर्य भगवान अस्त होने वाले थे।
ऋषि के संध्या का समय होने वाला था।पत्नी जगाती है तो पति के क्रोध का भय है, यदि नहीं जगाती है तो वह अपने दायित्व के साथ अन्याय करेगी। वह बोलीं, प्रभो उठें ! संध्या वंदन का समय होने वाला है। ऋषि उठ बैठे और अपने पत्नी से बोले, क्या तुम्हें यह नहीं ज्ञात
है ? कि सूर्य मेरे उठने की प्रतीक्षा नित्य करता है। तुमने मुझे जगाकर दुखी किया है। तुम गर्भवती हो। एक बहुत प्रतापी बालक जन्म लेगा। अब मैं चलता हूँ। समय पर इनसे एक पुत्र हुआ जिसका नाम आस्तिक रखा। इसी बालक ने अपने मामा तक्षक को पाण्डव वंशीय महाराज जन्मेजय के सर्पयज्ञ में भस्म होने से बचाया था।
मनसा देवी के संदर्भ में ब्रह्म वैवर्त पुराण में चर्चा आयी है। इसके अनुसार:--
जरत्कारुः जगदगौरी मनसा सिद्ध
योगिनी। वैष्णवी नाग भोगिनी शैवी
नागेश्वरी तथा। जरत्कारुप्रिया ऽऽस्तीक
माता विषहरीति च। महाज्ञानयुता चैव
सा देवी विश्वपूजिता। द्वादश एतानि
नामानि पूजा काले तु यः पठेत। तस्य नाग भयं नास्ति तस्यवंशोद्भवस्य च।
----(५)-----:ज्योति:----------
भगवान शिव के तृतीय नेत्र से निकले
तेज से ज्योति माता का जन्म हुआ है।
एक दूसरी कथा के अनुसार माता ज्योति की उत्पत्ति माता पार्वती के मस्तक से निकली एक चिनगारी से हुयी है। तमिलनाडु के कई मंदिरों में माता ज्योति की पूजा होती है। इनका एक नाम ज्वालामुखी भी है।
---(६)---अंधकासुर:----
वामन पुराण के अनुसार:---
एक बार भगवान शिव ध्यान मुद्रा में पूरब की ओर मुँह किए बैठे थै। पीछे से पार्वती ने आकर अपने दोनों हाथों से
भगवान शिव की दोनों आँखों को ढक लिया। त्रैलोक्य अँधेरे में डूब गया। भगवान शिव ने त्रैलोक्य को प्रकाशित करने के लिए अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। माता पार्वती भगवान शिव के तीसरे नेत्र के ताप को नहीं सहन कर सकीं और उनके माथे पर पसीना आ गया। इस पसीने से एक बालक की उत्पत्ति हुयी। इसका नाम अंधक रखा गया क्योंकि इसकी उत्पत्ति अँधेरा के कारण हुयी थी। राक्षस राज हिरण्याक्ष
ने पुत्र की कामना से भगवान शिव का तप किया। भगवान शिव ने पार्वती नन्दन अंधक को हिरण्याक्ष को दे दिया।
इसका पालन पोषण राक्षसी परम्परा में हुआ। यह अंधकासुर नाम से विख्यात हुआ। इसने ब्रह्मा की तपस्या की। ब्रह्मा से इसने यौन लालसा का वरदान माँगा।
ब्रह्मा ने इससे कहा, तू जिससे चाहेगा उससे यौन सम्बन्ध बना सकता है, परन्तु जिस दिन तू अपनी माता से संबंध बनाना चाहेगा उस दिन तू मारा
जाएगा। अंधकासुर बहुत प्रसन्न हुआ। यह हिरण्याक्ष को अपना पिता समझता था, परन्तु यह नहीं जानता था कि मेरी कोई माँ भी है। अंधकासुर को
असुरों का राजा बना दिया गया। फिर इसने बहुत अत्याचार करना प्रारम्भ किया। इसके अत्याचार से सारा संसार ही नहीं बल्कि त्रैलोक्य त्राहि-त्राहि करने लगा। अब इसे अपने विवाह की चिन्ता थी। इसने पता लगाया कि त्रैलोक्य में सबसे सुन्दर कौन है ? उसी से यह विवाह रचायेगा। इसे पता लगा कि सबसे सुन्दर शिव पत्नी पार्वती हैं। यह कैलाश पहुँच गया और माता पार्वती से विवाह का प्रस्ताव रख दिया। माता पार्वती ने इसे डाँटा। भगवान शिव को जब यह ज्ञात हुआ तब उन्होंने अंधकासुर से युद्ध किया और सारी असुर सेना का नाश कर दिया। अंत में अंधकासुर का भी बध कर दिया।
----(७)-----:जलन्धर:---------------
पुराणों की कथा के अनुसार एक बार
देवराज इन्द्र और देव गुरु बृहस्पति भगवान शिव से मिलने कैलाश आए।
अपेक्षा के अनुसार यहाँ देवराज इन्द्र
को सम्मान न मिलने के कारण देवराज ने भगवान शिव को अपमानित कर दिया। भगवान शिव क्रुद्ध हो गए और
ताण्डव करने लगे। इन्द्र डर कर छिप गए। भगवान शिव का तेज निकला और यह तेज समुद्र में जाकर गिरा और लहरों में समा गया। इस तेज से जलन्धर की उत्पत्ति हुयी। जलन्धर बहुत बली और प्रतापी हुआ। इसने पहले पृथ्वी के वीरों को जीता फिर स्वर्ग लोक को जीता। इसके बाद जलन्धर ने विष्णु लोक पर आक्रमण कर दिया। भगवान विष्णु ने उससे युद्ध किया। परन्तु उसका बध नहीं किया। लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु से कहा था कि जलन्धर मेरा भाई है उसका बध मत करना। इसलिए विष्णु लोक भी उसने
जीत लिया। लक्ष्मी जी को भी इसने अपने अधिकार में लेना चाहा परन्तु लक्ष्मी जी ने बताया कि हम भी समुद्र से निकले हैं और तुम भी। हम दोनों में भाई-बहन का रिश्ता है। लक्ष्मी जी की यह बात उसके समझ में आ गयी। वह
विष्णु लोक से चला आया। अब उसकी
दृष्टि माता पार्वती पर थी। उसने कैलाश पर आक्रमण कर दिया। भगवान शिव और जलन्धर में युद्ध होने लगा। उसकी
सारी सेना को भगवान शिव ने मार डाला। परन्तु जलन्धर पर विजय नहीं
प्राप्त कर पा रहे थे इसलिए आपने भगवान विष्णु को याद किया। जलन्धर की पत्नी वृन्दा पतिव्रता थी। वृन्दा के
सतीत्व के कारण ही भगवान् शिव उस
पर विजय नहीं प्राप्त कर पा रहे थे।
भगवान विष्णु ने जलन्धर का रूप बनाया और वृन्दा के पास पहुँच गए।
वृन्दा ने भगवान विष्णु के छद्म रूप को
नहीं पहचाना और अपना सतीत्व गवाँ
बैठी। भगवान शिव ने जलन्धर को मार दिया। जब वृन्दा ने यह जाना तब उसने
भगवान विष्णु को पत्थर(शालिग्राम) बन जाने का शाप दे दिया। भगवान विष्णु शालीग्राम बन गये जब यह समाचार विभिन्न लोकों में पहुँचा तब
विष्णु लोक, शिव लोक तथा स्वर्ग लोक
के सभी देवगण और देवियाँ वहीँ पहुँच गयीं। लक्ष्मी जी की याचना पर वृन्दा ने
भगवान विष्णु को क्षमा कर दिया और उनको शाप मुक्त कर दिया। भगवान विष्णु ने वृन्दा को वरदान दिया कि मेरे शालिग्राम रूप के साथ तुम्हारी पूजा
होगी। वृन्दा अपने पति के साथ सती हो गयी। वहाँ पर तुलसी का पौधा उगा, जिसे वृन्दा का प्रतीक माना गया। वर्ष में
एक बार माता वृन्दा और शालिग्राम का
विवाह आज भी कार्तिक पूर्णिमा को आयोजित किया जाता है। तुलसी की
पत्ती शालिग्राम पर चढ़ा कर पूजन करने की परम्परा तभी से आज तक
चली आ रही है।
----- (८)------:अयप्पा:---------------
पुराणों की कथा के अनुसार भगवान शिव भगवान विष्णु के मोहिनी रूप पर मोहित हो गए थे, जिससे भगवान शिव का तेज निकला जो समुद्र में जाकर गिरा और लहरों में समा गया। इससे एक बालक का जन्म हुआ। इस बालक को भगवान विष्णु और भगवान शिव ने
ले जाकर पम्पा सरोवर के तट पर रख दिया और उसके गले में एक घण्टी बाँध दी। इस बालक को पांडलम के राजा
राजशेखर ने उठा लिया और अपने महल में ले आए। राजा पांडलम सन्तान
हीन थे। इस बालक का नाम मणिकण्ठा रखा। बाद में इस का नाम अयप्पा हो गया।राजा ने इसका पालन पोषण किया। राजा के एक और सन्तान हुयी। इस बालक के होने के बाद रानी कोपेरुण्डेवी का व्यवहार अयप्पा के प्रति सौतेला हो गया। राजा राजशेखर
अयप्पा के प्रति रानी के सौतेले व्यवहार से दुखी थे। अयप्पा बड़े हुए। रानी अयप्पा को अपने लड़के के मार्ग से हटा
देना चाहती थी। एक मंत्री के उकसावे में आकर रानी ने एक नाटक रचा। उसने बीमार होने का नाटकीय अभिनय किया, और राजा से कहा, मुझे अच्छा होने के लिए बाघिन का दूध चाहिए।
बाघिन का दूध अयप्पा ला सकते हैं। अयप्पा बाघिन का दूध लाने के लिए जंगल की ओर चल देते हैं। अयप्पा को हर स्थिति में रानी समाप्त कर देना चाहती थी। उसे भय था कि राजा अपने बाद राजसिंहासन बड़ा पुत्र होने के कारण अयप्पा को दे सकते हैं। इसके लिए उसने महिषी से भी सम्पर्क किया और महिषी से कहा, कि हर स्थिति में
अयप्पा का बध कर देना है। रानी आश्वस्त थीं। उन्हें विश्वास था कि बाघिन
उसे मारकर खा जाएगी, और यदि किसी तरह बच भी गया तो महिषी उसका काम तमाम कर देगी। महिषी
महिषासुर की बहन थी। महिषासुर के
बाद कोई भी असुर शेष नहीं बचा था।
सबके सब मार डाले गए थे। महिषी ने ब्रह्मा की
तपस्या की। अमर होने का वरदान माँगा। ब्रह्मा ने कहा, इसके सिवा कुछ भी माँग सकती हो। उसने बहुत विलक्षण वरदान माँगा। उसने माँगा कि
विष्णु और शिव से उत्पन्न होने वाली
सन्तान से मैं मारी जाऊँ। उसने सोचा होगा कि दो पुरुषों से भला कैसे सन्तान हो सकती है ? वह अपने को अजेय
समझ रही थी। उसने बहुत अत्याचार
मचा रखा था। अयप्पा जंगल में पहुँचे।
महिषी ने आक्रमण कर दिया। भीषण युद्ध हुआ। महिषी मारी गयी। अयप्पा
ने एक बाघिन को बुलाया और कहा, तुम्हें मेरे साथ चलना है। हम सायंकाल
होने से पहले तुम्हें मुक्त कर देंगे। बाघिन चलने को तैयार हो गयी। अयप्पा बाघिन पर सवार हुए और महल की ओर चल पड़े। जब प्रजा ने देखा कि अयप्पा बाघिन पर सवार होकर आ रहे हैं तो सब जय जयकार करने लगे। महल में पहुँचकर माँ से कहा, लो माँ ! मैं बाघिन का दूध ही नहीं
बाघिन को भी साथ लेकर आया हूँ। बाघिन को देखकर रानी डर से बेहोश होकर गिर पड़ी और.जब होश आया तब हाथ जोड़ कर कहने लगी, मुझसे भूल हुयी है, मैं अपराधी हूँ। राजा ने भी
अपनी पत्नी द्वारा किए गए अपराध पर क्षमा माँगी। अयप्पा जिस कार्य के लिए
इस संसार में आए थे, वह कार्य पूरा हो चुका था। इसलिए पिता से एक मंदिर सबरी पहाड़ी पर बनवाने का आग्रह करके अयप्पा महल से ही नहीं, बल्कि उसी बाघिन पर बैठकर इस संसार से ही वह दूर चले गए। लोगो ने देखा कि वे
कुछ दूर जाकर अन्तर्धान हो गए। राजा ने मंदिर बनवाया। जब मंदिर बनकर तैयार हुआ तब भगवान परशुराम ने स्वयं एक अयप्पा की मूर्ति का निर्माण किया और मंदिर में अपने हाथ से इसे स्थापित किया। यह विश्व प्रसिद्ध मंदिर है। इसमें दर्शन से इकतालीस दिन पहले अयप्पा दीक्षा(कठिन व्रत करना होता है) लेनी पड़ती है। इकतालीस दिन ब्रह्मचर्य के साथ रहना होता है। इन दिनों मांस-मदिरा से भी दूर रहना होता है। भूमि पर दर्शनार्थी सोता है। नंगे पैर चलता है, और तब पहाड़ी पर पैदल चढ़कर भगवान अयप्पा का दर्शन करता है। यह मंदिर समुद्र तल से चार हज़ार फिट ऊँचाई पर स्थित है। मकर संक्रान्ति के एक महीना पहले और एक महीना बाद तक बहुत भीड़ रहती है। लगभग तीस लाख लोग प्रतिवर्ष यहाँ दर्शन करते हैं। ये ब्रह्मचारी देवता हैं। यहाँ महिलाओं के लिए दर्शन वर्जित था। २०२१ में उच्चतम न्यायालय ने महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटाया है।
स्वामी अयप्पा का स्तुति मंत्र:--
(१) स्वामीये शरणं अयप्पा।
भावार्थ:-- स्वामी अयप्पा ! आपकी शरण में हूँ।
(२) स्वामी अयप्पा का गायत्री मंत्र:--
ॐ भूतादिपाय विद्महे महादेवाय धीमहि
तन्नो शास्ता प्रचोदयात्।
अथवा
ॐ भूतादिपाय विद्महे भव पुत्राया धीमहि तन्नो शास्ता प्रचोदयात्।
अथवा
ॐ भूतादिपाय विद्महे भव नन्दाय
धीमहि तन्नो शास्ता प्रचोदयात्।
अयप्पा अथवा अयप्पन के अन्य नाम;--
शास्ता, हरि हर सुधन, मणिकंदन, सबरी
नाथ, सस्तवु।
भगवान शिव के रुद्रावतार:---
(१)शिव पुराण के अनुसार:--(११)
(१)कपाली(२)पिंगल(३)भीम(४)
विरुपाक्ष(५)विलोहित(६)शास्ता(७)अजपाद(८)आपिर्बुध्य(९)शम्भू(१०)चण्ड
(११)भव।
एकादशैते रुद्रास्तु सुरभी तनयः स्मृतः।
देवकार्यार्थमुत्पन्ना शिवरूपास्सुरवास्पदम्।
भावार्थ:--ये एकादश रुद्र सुरभी के पुत्र
कहलाते हैं। ये सुख के निवास स्थान हैं
तथा देवताओं के कार्य सिद्धि के लिए शिव रूप से उत्पन्न हुए हैं।
(२)शैव आगम के अनुसार:--(११)
(१)शम्भु(२)पिनाकी(३)गिरीश(४)स्थाणु
(५)भर्ग(६) सदाशिव(७)शिव(८)हर(९)
शर्व(१०)कपाली(११)भव।
(३)श्री मद् भागवतके अनुसार:--
(१)मन्यु(२)मनु(३)महिनस
(४)महान्(५)शिव(६)ऋतध्वज(७) उग्ररेता(८)भव(९)काल(१०) वामदेव(११)धृतव्रत।
(४)तन्त्र(दस महाविद्याओं)के अनुसार:-
रुद्र एवं इनकी शक्तियाँ:--१०
(१)महाकाल~~महाकाली(२)तारा~~
तारादेवी(३)भुवनेश्वर~~भुवनेश्वरी(४)
षोडश(श्रीविद्येश)~~षोडशी(५)भैरव~~भैरवी(६)छिन्नमस्तक~~छिन्नमस्ता (७)धूमवान~~धूमावती(८)बगलामुख~~बगलामुखी(९) मातंग~~मातंगी
(१०)कमल~~कमला।
तंत्र देवी सूक्त के अनुसार ' या देवी
सर्व भूतेषु मातृ रूपेण संस्थितः। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
रुद्रयामल तंत्रानुसार दुर्गा नाम का जप
सदाशिव भी करते हैं। उनका पञ्चानन
नाम इसी जप के कारण प्रसिद्ध हुआ है। ' दुर्गानाम जपोयस्य किं तस्य कथयामि ते। अहं पञ्चाननः कान्ते तज्जापदेव सुव्रते।'भगवान शिव के पाँच
मुखों के नाम क्रमशः सद्योजात, वामदेव अघोर, तत्पुरुष और ईशान है। इन्हीं से
शैव आगमों तथा शाक्त आगमों का विस्तार हुआ है। इन्हीं से पञ्चआम्नाओं का उद्भव हुआ है। शिव को यह शक्ति
दुर्गा नाम जप के कारण प्राप्त हुयी है।
' गौरी त्वमेव शशि मौलिकृत प्रतिष्ठा।'
दक्षपुत्री सती को ही गौरी (महाविद्या)
कहा गया है। दस महाविद्याओं के प्रादुर्भाव का सम्बन्ध सती से जोड़ा गया है। महाभागवतपुराण में कथा आई है कि दक्ष प्रजापति के यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया। सती ने तब भी उस यज्ञ में जाने के लिए भगवान शिव से अनुमति माँगी। दक्ष प्रजापति के शत्रुता पूर्ण व्यवहार को ध्यान में रखते हुए भगवान शिव ने सती को समारोह में जाने से रोका। सती अपने निश्चय पर अटल रहीं। उन्होंने कहा, मैं प्रजापति के यज्ञ में अवश्य जाऊँगी, या तो यज्ञ भाग प्राप्त करूँगी
अथवा यज्ञ को नष्ट कर दूँगी।
ततोहं तत्र यास्यामि तदाज्ञापय वा न वा।
प्राप्स्यामि यज्ञभागं वा नाशयिष्यामि वा
मखम्।---भागवत ८/४२।
इतना कहते ही सती जी के नेत्र क्रोध से
लाल हो गए। वह शिव को उग्र रूप से देखने लगीं। उनके अधर फड़फड़ाने लगे। उन्होंने ज़ोर से अट्टहास किया।
अट्टहास सुनकर भगवान शिव भयभीत
हो गए। सती का शरीर क्रोधाग्नि से जलकर काला पड़ गया। इस विकराल रूप को देखकर भगवान शिव भगे। सती ने दस दिशाओं में भागते हुए रुद्र
(भगवान शिव)को दस रूप धारण कर
रोकने का प्रयत्न किया। दसो दिशाओं में भगवान शिव के समक्ष सती की अंगभूता दस मूर्तियाँ खड़ी हो गयीं। सती की ये दस मूर्तियाँ ही दस महाविद्याएँ हैं। भगवान शिव ने इन महाविद्याओं का परिचय पूछा, तब
सती ने उत्तर दिया, हे शिव ! तुम्हारे सामने खड़ी कृष्णा मूर्ति काली है। तुम्हारे ऊपर नीलवर्णा तारा है। तुम्हारे
दाएँ छिन्नमस्ता तथा तुम्हारे बाएँ भुवनेश्वरी खड़ी हैं। तुम्हारे पीछे बगला
मुखी, तुम्हारे अग्निकोण में धूमावती
तथा तुम्हारे नैऋत्य कोण में त्रिपुर सुन्दरी विद्यमान है। वायव्य कोण में मातंगी तथा ईशान कोण में षोडषी विद्यमान है और मैं स्वयं भैरवी रूप में तुम्हें अभयदान देने के लिए खड़ी हूँ।
वैदिक शास्त्र भगवान शिव को ब्रह्म का
नामान्तर मानते हैं। माँडूक्य में भगवान शिव को शान्त, अद्वैत और चतुर्थ कहा
गया है। ' शान्तं शिवंद्वैतं चतुर्थम्।' पृथ्वी, जल, तेज, वायु,आकाश, चन्द्र, सूर्य, दिशा, काल, तथा जीवात्मा, ये दस तत्व भगवान शिव के ही रुप हैं। इन तत्वों में निहित शक्तियाँ ही क्रमशः दस महाविद्याएँ हैं। वस्तुतः रुद्र दस ही हैं।
ग्यारहवाँ तो आत्मा है।
'दश ते वायवः प्रोक्ता आत्मा चैकादश स्मृतः।'
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