-----भगवान‌शिव (६)

--------- :भगवान शिव का परिवार:-----
बहन:--बहन एक थी। असावरी देवी। जब पार्वती व्याह कर आयीं, तो उन्हें एकान्त अखरने लगा। पार्वती ने शिव से कहा, मुझे एक ननद‌ चाहिए। भगवान शिव ने माया से असावरी देवी को प्रकट ‌किया और पार्वती से कहा, देवि ! यह
तुम्हारी ननद असावरी देवि हैं। यह बहुत मोटी थीं। इन्होंने पार्वती से कहा, मुझे भोजन चाहिए। पार्वती जितना भी व्यवस्था करती थीं, वह सब खा जाती थीं। वह इतनी अधिक मोटी थीं, कि कोई भी कपड़ा इनका तन नहीं ढक पाता था। एक बार पार्वती को इन्होंने
अपने पैरों के बीच में छिपा लिया था, भगवान शिव ने इनसे पूछा, पार्वती कहाँ हैं ? तब यह ‌पैर पटककर कहने लगी, हमें क्या मालूम ? उसके पैर पटकने पर पार्वती मुक्त हो पायीं। अन्त में तंग होकर पार्वती ने  शिव से कहा, इन्हें ससुराल‌ भेज‌ दो। भगवान शिव ने अपनी माया को समेट लिया।
भगवान शिव की आठ सन्तानें:---
(१) गणेश (२) कार्तिकेय (३) अशोक सुन्दरी (४) मनसा देवी (५) ज्योति (६)
अन्धक (७) जलन्धर (८)अयप्पा।
(१) भगवान गणेश:-- मुद्गल पुराण के अनुसार  भगवान गणेश ने हर युग में 
अवतार‌ लिया। सतयुग में महर्षि कश्यप
और माता अदिति से महोत्कट विनायक
नाम से जन्म लिया और देवान्तक तथा
नरान्तक नाम के‌ दैत्यों का बध किया।
त्रेता युग में  भगवान शिव और माता उमा (पार्वती) से भाद्रपद की‌ चतुर्थी को
गणेश नाम से जन्म लिया और सिन्धु 
नाम के दैत्य का बध किया। ब्रह्मा की दो
कन्याएँ ऋद्धि और सिद्धि से विवाह किया। आपके दो पुत्र हुए शुभ और लाभ। द्वापर में पुनः भगवान शिव और
उमा(पार्वती) से भगवान गणेश का जन्म हुआ। पार्वती जी ने आपको जंगल में छोड़ दिया।आपका पालन-पोषण 
पराशर मुनि ने किया। आपने सिन्दुरासुर
का वध करके उसके द्वारा कैद किए गए
अनेक राजाओं को मुक्त कराया।
भगवान गणेश के द्वादश नाम का स्तोत्र:------
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्ण पिंगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्
लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्न राजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम्।
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एकादशं गणपतिं च द्वादशं तु गजाननम् ऊपर लिखे द्वादश नामों को पढ़ने से बहुत लाभ होता है। यथा:--
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्। पुत्रार्थी लभते पुत्रां मोक्षार्थी लभते गतिम्।
द्वादश नाम के एक अन्य स्तोत्र के अनुसार:--
सुमुखश्चैक दन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
धूम्रकेतुः गणाध्यक्षो भालचन्द्रोगजाननः 
लम्बोदरश्च विकटो च विघ्ननाशो विनायकः।
(१)सुमुख(२)एकदन्त(३)कपिल(४) गज कर्ण(५)धूम्रकेतु(६)गणाध्यक्ष(७)
भालचन्द्र(८)गजानन(९)लम्बोदर(१०) विकट(११) विघ्नराज(१२)विनायक
विद्या के आरम्भ के समय, विवाह के समय, घर में प्ररवेश करते समय और घर से बाहर जाते समय, संग्राम और संकट के समय ऊपर लिखे द्वादश नामों का पाठ करना बहुत हितकारी है। 
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा
संग्रामे संकटे चैव विघ्न तस्य न जायते।
भगवान गणेश की स्तुति :---
 (१) गजाननं भूत गणादि सेवितं, कपित्थ जम्बू फल चारु भक्षणम्।
उमासुतं शोक विनाश कारकं नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्।
भावार्थ:--हाथी के मुखवाले, भूत गणों द्वारा सेवित, कैथ और जामुन को चाव से भक्षण करने वाले, शोक के नाश कर्ता, उमा के पुत्र के चरण कमल में
नमन करता हूँ।
(२) वक्रतुण्डं महाकाय  कोटिसूर्य सम प्रभा। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु
सर्वदा।
भावार्थ: --हे वक्रतुण्ड महाकाय, करोड़ो
सूर्यों के समान आभा वाले गणेश‌ जी !
मेरे सभी कार्यों में विघ्न का अभाव‌ करो।
(३) अभिप्रेतार्थ सिद्धयर्थं पूजितो यः
सुरासुरैः। सर्व विघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः।
भावार्थ:--मनोवांछित कार्य की सिद्धि हेतु जिनका पूजन सुर-असुर करते हैं , उन सभी विघ्नों का उच्छेदन करने वाले  गणों के स्वामी गणेश जी का मैं नमन ‌करता हूँ।
(४) एकदन्तं महाकायं लम्बोदर गजाननम्। विघ्न नाश करं देवं हेरम्बं प्राणम्यहम्।
भावार्थ:--एक दाँत वाले, स्थूलकाय वाले, दीर्घाकार पेट वाले, हाथी के समान मुख वाले, विघ्नों का नाश करने वाले हेरम्ब(गणेशजी) को मैं प्रणाम करता हूँ।
(५) आलम्बे जगदालम्बे हेरम्ब चरणाम्बुजे। शुष्यन्ति यद्रजः स्पर्शात्सद्यः प्रत्यूहवार्धयः।
भावार्थ:-- इस संसार के आलम्ब स्वरूप
हेरम्ब(गणेशजी) का मैं शरण लेता हूँ। जिसके चरणधूल के स्पर्श से विघ्न बाधाओं के समुद्र तुरन्त सूख जाते हैं।
गणेश जी के आठ अवतार:----
(१) वक्रतुण्ड (२) एकदन्त (३) महोदर
(४) गजानन (५) लम्बोदर (६) विकट
(७) विघ्नराज (८) धूम्रवर्ण ।
(१) वक्रतुण्ड अवतार:--
वक्रतुण्डावतारश्च देहानां ब्रह्म धारकः।
मत्सरासुर हन्ता स सिंहवाहनगः स्मृतः।
भावार्थ:-- भगवान गणेश जी का वक्रतुण्ड अवतार ब्रह्मस्वरूप से सम्पूर्ण
शरीरों को धारण करने वाला है। मत्सर
असुर का बध करने वाला है ‌तथा सिंह
वाहन पर चलने वाला है।
एक  राक्षस था जिसका नाम था    मत्सरासुर। उसने भगवान शिव की तपस्या करके अजेय होने का वरदान प्राप्त कर लिया। इसके दो बेटे थे। सुन्दर‌प्रिय और विषयप्रिय। शुक्राचार्य के कहने पर मत्सरासुर‌‌ ने स्वर्गलोक को जीत लिया। इसके बाद इसने शिवलोक  पर आक्रमण कर दिया और  भगवान शिव को पाश में बाँध लिया। इस तरह मत्सरासुर ने इन्द्रलोक तथा शिवलोक दोनो लोकों में हाहाकार मचा ‌दिया। इनके‌ दोनो बेटे बहुत‌ अत्याचारी‌ थे। भगवान दत्तात्रेय के कहने पर देवताओं ने भगवान गणेश की आराधना की। भगवान गणेश ने वक्रतुण्ड का अवतार रखकर मत्सरासुर से युद्ध किया। युद्ध में इसके दोनों बेटे मारे ‌गए। शुक्राचार्य के कहने पर मत्सरासुर ने भगवान गणेश की शरण में जाकर अपने जीने की अभिलाषा ‌व्यक्त की और क्षमा माँगी। भगवान वक्रतुण्ड ने‌ उसे क्षमा कर दिया तथा इ‌न्द्र लोक और शिव लोक को छोड़कर  उसे पाताल में जाकर रहने का आदेश दिया। 
--(२) --------:एक दन्त अवतार:-----
एकदन्तावतारो वैदेहिनां ब्रह्म धारकः।
मदासुरस्य हन्ता सा आखुवानगः स्मृतः। भावार्थ:--भगवान गणेश का एक दन्तावतार ब्रह्म देहि का धारक है। यह मदासुर का बध करने वाला है तथा मूषक‌ वाहन पर चलने वाला है।
यह मदासुर च्यवन मुनि का पुत्र था। इसने मातृ शक्ति कि तपस्या‌‌ की। माता ने इसे अजेय होने का वरदान दिया। इसने प्रमदासुर की बेटी सालसा के साथ विवाह किया। इसने पृथ्वी लोक के
समस्त राजाओं को जीता। इसने इन्द्र को परास्त करके स्वर्ग लोक को जीता।
इसने भगवान शिव को भी परास्त करके शिवलोक को भी जीता। सनत्कुमारों के कहने पर देव गणों ने भगवान गणेश की आराधना की।
भगवान गणेश ने एकदन्त का अवतार लेकर मदासुर से युद्ध किया। मदासुर पराजित हुआ और भगवान गणेश के शरण में चला गया। भगवान एकदन्त  ने इसे क्षमा कर दिया और पाताल लोक को जाने का आदेश दिया।                   --(३)------:महोदर अवतार:--------
महोदर इति ख्यातो ज्ञान ब्रह्म प्रकाशकः
मोहासुरस्य शत्रुर्वै आखुवानगः स्मृतः।
भावार्थ:-- भगवान गणेश जी का महोदर अवतार ब्रह्मज्ञान का प्रकाशक है। यह मोहासुर का बध करने वाला है तथा मूषक वाहन पर चलने वाला है। मोहासुर ने भगवान सूर्य की तपस्या की। भगवान सूर्य ने मोहासुर को अजेय
होने का वरदान दिया। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने इसे दैत्यों का राजा बना दिया। इसने पृथ्वी लोक के समस्त राजाओं को जीता। स्वर्ग लोक को जीतकर इसने देवताओं को स्वर्ग ‌से भगा दिया। देवताओं ने भगवान गणेश जी की आराधना की। भगवान गणेश जी ने महोदर का अवतार लेकर मोहासुर को परास्त किया। मोहासुर ने भगवान महोदर के शरण में जाकर अपने जीवन की‌ भिक्षा माँगी। भगवान
महोदर ने उसे जीवन दान देकर पाताल जाने का आदेश दिया।
    ---(४)----:गजानन अवतार:----
गजाननः स विज्ञेयः सांख्येभ्यःसिद्धि दायकः। लोभासुर प्रहर्ता वै आखुगश्च
प्रकीर्तितः।
भावार्थ:--भगवान गणेश का गजानन अवतार सांख्य ब्रह्म का धारक है। यह
सांख्य योगियों के लिए सिद्धि देने वाला
है। यह लोभासुर का बध करने वाला तथा मूषक वाहन पर चलने वाला‌ ‌है।
एक बार कैलाश पर कुबेर आए। वह अपलक माता पार्वती को देखते रह गए। माता पार्वती ने उन्हें बहुत डाँटा और अपने केश का एक बाल उखाड़ कर रख दिया जिससे लोभासुर उत्पन्न
हुआ। यह बहुत पराक्रमी था। इसने पहले पृथ्वी के समस्त राजाओं को जीता। फिर स्वर्गलोक ‌को जीतकर देवताओं को भगा दिया। शिवलोक को
जीता, विष्णुलोक को जीता। भगवान शिव कैलाश छोड़ कर चले गए। रैभ्य मुनि के कहने पर देवताओं ने भगवान गणेश की आराधना की। भगवान‌ गणेश‌
ने गजानन का अवतार लिया। भगवान गणेश का गजानन रूप देखकर वह ‌डर
गया और वह आपके के शरण में आ गया। आपने उसे क्षमा कर दिया और कहा, पाताल भाग जाओ फिर इधर कभी लौटकर मत आना।
--(५)--- :लम्बोदर अवतार:---
लम्बोदरावतारो वै क्रोधासुर निर्बहणः।
शक्ति ब्रह्माखुगः सद यत तस्य धारक उच्यते।
भावार्थ:-भगवान गणेश का लम्बोदर
अवतार सत्स्वरूप तथा शक्ति का धारक‌ है। वह क्रोधासुर का बध करने वाला तथा मूषक वाहन पर चलने वाला है।
देवताओं और असुरों के मध्य अमृत वितरण हेतु भगवान विष्णु ने मोहनी का अवतार लिया था। भगवान शिव मोहनी
रूप पर मोहित हो गए थे। भगवान शिव के तेज से क्रोधासुर उत्पन्न हुआ। इसने 
शम्बरासुर दैत्य की रूपवती कन्या प्रीति
से विवाह ‌किया। इसने सूर्य भगवान की ‌तपस्या की। सूर्य भगवान ने इसे अजेय होने का वरदान दिया।  इसने पहले पृथ्वीलोक ‌को ‌जीता, फिर स्वर्गलोक को जीता, शिवलोक को जीता, विष्णुलोक ‌को जीता और फिर सूर्य लोक को भी जीत‌ लिया। देवताओं ने भगवान गणेश  की आराधना की। भगवान गणेश ने 
लम्बोदर का अवतार‌ लिया। भगवान लम्बोदर ने क्रोधासुर से युद्ध‌ किया। क्रोधासुर पराजित हुआ, और भगवान
लम्बोदर के शरण में आकर स्तुति करने  ‌लगा। आपने उसे क्षमा कर दिया और पाताल में जाने का आदेश‌ दिया।
   ---(६)------:विकट अवतार:------
विकटोनाम विख्यातः कामासुर्विदाहकः।
मयुर वाहनश्चापं सौर ब्रह्मधरः स्मृतः।
भावार्थ:-- भगवान गणेश का विकट ‌  अवतार सौर ब्रह्म का धारक ‌है। यह कामासुर का‌ बध करने वाला है। और
मयुर वाहन पर चलने वाला है।
एक बार नारद जी जलन्धर के राजमहल में पहुँचे। जलन्धर भगवान शिव के तीसरे नेत्र की ज्योति से उत्पन्न हुआ था। नारद जी ने जलन्धर से कहा, तुम्हारे पास सब कुछ है परन्तु अच्छी स्त्री नहीं है। जलन्धर ने पूछा, मुझे सुन्दर स्त्री कहाँ मिलेगी। नारद ने कहा, शिव की पत्नी पार्वती। उसने राहु को भगवान शिव के पास भेजा और उससे कहलवाया कि अपनी पत्नी पार्वती को तुरन्त जालन्धर के पास भेज दीजिए। भगवान शिव ने राहु की बात सुनकर उसे आसमान पर बहुत ऊँचे उड़ा दिया। जलन्धर भगवान शिव से लड़ने आ  गया। भगवान शिव जलन्धर को नहीं मार पा रहे थे क्योंकि उसकी पत्नी वृन्दा पतिव्रता थी। भगवान शिव ने भगवान विष्णु को याद किया। भगवान विष्णु ने जलन्धर का रूप रखकर जलन्धर की पत्नी का सतीत्व नष्ट किया तब भगवान शिव ने जलन्धर का बध किया। भगवान‌‌ विष्णु के तेज‌ से कामासुर उत्पन्न हुआ। कामासुर ने गुरु शुक्राचार्य से दीक्षा ली और भगवान शिव की तपस्या करने लगा।भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसे
मृत्युंजयी होने का वरदान दिया। शुक्राचार्य ने उसे असुरराज के पद पर
राज्याभिषेक कर दिया। महिषासुर की पुत्री से उसका विवाह हुआ। कामासुर ने
महिषासुर, शम्बरासुर, रावण तथा बलि को अपनी सेना का सेनापति बनाया।
पृथ्वी के राजाओं को जीता, स्वर्ग को जीतकर इन्द्र को भगा दिया। देवताओं ने भगवान गणेश की आराधना की। भगवान गणेश ने विकटा अवतार लेकर
युद्ध में कामासुर को परास्त किया। कामासुर भगवान विकट की शरण में आ गया। भगवान विकट ने उसे पाताल
में जाकर रहने का आदेश ‌दिया।
   ---(७)----:विघ्नराज अवतार:----विघ्नराजावतारश्च शेषवाहन उच्येत।
ममतासुर हन्ता स विष्णु ब्रह्मेतिवाचकः।
भावार्थ: भगवान गणेश का विघ्नराज अवतार विष्णु ब्रह्म‌ का धारक है। वह
शेषनाग पर विराजमान है। यह अवतार
ममतासुर का बध करने वाला है।
एक बार पार्वती सखियों से बातें करती हुयी ज़ोर से हँसीं जिससे ममतासुर ‌उत्पन्न हुआ। पार्वती ने इसको भगवान गणेश के पञ्चाक्षरी मंत्र का जाप करने को कहा। भगवान गणेश ने इसे अजेय होने का वरदान दे दिया। गुरु शुक्राचार्य ने इसे असुर पति बना दिया। इसने पृथ्वीलोक, इन्द्रलोक, ब्रह्म‌लोक, शिवलोक,और विष्णुलोक को जीत‌ लिया। देवताओं ने भगवान गणेश की आराधना की। भगवान गणेश ने विघ्नराज का अवतार लेकर ममतासुर को परास्त किया। नारद के कहने पर
ममतासुर ने भगवान विघ्नराज की स्तुति की। भगवान विघ्नराज ने उसे
क्षमा करके पाताल लोक जाने का आदेश दिया।
-----(८)---:धूम्रवर्ण अवतार:-----
धूम्रवर्णावतारश्चाभिमानासुर नाशकः।
आखुवाहन एवासौ शिवात्मा तु स उच्येत।
भावार्थ:--भगवान गणेश का धूम्रवर्णावतार शिव तत्व का धारक ‌है।
वह मूषक वाहन पर चलने वाला है‌ तथा
अभिमानासुर का बध करने वाला है।
एक बार ब्रह्मा ने भगवान सूर्य देव को
कर्माध्यक्ष बना दिया। भगवान सूर्य को
अहंकार हो गया। आपकी छींक से 
अभिमानासुर(अहंतासुर) उत्पन्न हुआ।
इसने गुरु शुक्रचार्य से दीक्षा ली और भगवान गणेश के तप में लीन हो गया।
हज़ारों वर्ष के बाद भगवान गणेश प्रकट हुए और वर माँगने के लिए कहा, इसने
अजेय होने का वरदान माँगा।  भगवान गणेश ने तथास्तु कहा। शुक्राचार्य ने इसे
दैत्यराज घोषित कर दिया। इसने स्वर्गलोक, ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि सभी लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया। देवताओं ने भगवान गणेश की आराधना की। भगवान गणेश ने धूम्रवर्ण
का अवतार ‌लेकर युद्ध में अहंतासुर को
परास्त किया। गुरु शुक्राचार्य के कहने पर अहन्तासुर ने भगवान धूम्रवर्ण  की 
स्तुति करने लगा। भगवान धूम्रवर्ण ने‌
उसे क्षमा कर दिया और पाताल में जाकर रहने का आदेश दिया।
(२) ------:भगवान कार्तिकेय:-- माता सती दक्ष प्रजापति की बेटी थी। दक्ष प्रजापति ने एक यज्ञ आयोजित किया  था, जिसमें दक्ष द्वारा भगवान शिव का अपमान किए जाने के कारण माता‌ सती ने यज्ञकुण्ड में कूदकर अपनी
आहुति दे दी थी। माता सती ने पर्वत राज हिमालय के यहाँ जन्म लिया। राजा
हिमालय ने आपका नाम पार्वती रखा।
बड़ी होकर पार्वती ने भगवान शिव को
प्राप्त करने के‌ लिए तप किया। तारकासुर ने स्वर्ग लोक को जीतकर‌ देवों को ‌स्वर्ग से भगा दिया था। इसको वरदान था कि इसे भगवान‌‌ शिव‌ का
पुत्र ही मार सकता है। देवताओं ने  यत्न
करके भगवान‌ शिव का विवाह माता पार्वती से कराया। विवाह के उपरान्त
माता पार्वती और भगवान शिव एक गुफा में चले गए। वहाँ भगवान शिव का तेज निकला जिसे अग्निदेव ने कबूतर ‌बनकर ग्रहण कर लिया और वहाँ से चल दिए। अग्नि देव तेज को नहीं सम्हाल ‌सके तब इसे गंगा जी को दे दिया। गंगा‌ का पानी उबलने लगा, तब इसे लाकर गंगा जी ने शरवण में स्थापित कर ‌दिया। गंगा ‌जी में  बहता हुआ ‌‌यह तेज छः भागों में विभाजित हो‌ गया था, इसलिए छः बालकों का जन्म हुआ।  सप्त ऋषियों की‌ पत्नियाँ कृतिकाएँ गंगा स्नान कर रही थीं। उन्होंने जब बहते हुए बालकों को देखा, तब उनमें वात्सल्य प्रेम जागृत हो गया, जिससे उनके स्तन में दुग्ध उतर आया। उन्होंने बालकों को गोद में ले लिया और दुग्ध पान कराने लगीं तथा उन बालकों को अपने देश में ले आयीं। जब ये बड़े हुए‌ तब नारद ने भगवान शिव और माता पार्वती को यह भेद बताया। पुत्र प्रेम के कारण ‌ये अपने पुत्रों को  लेने कृतिकाओं के पास पहुँच गए। पार्वती ने इन पुत्रों को एक साथ अपने  वक्षस्थल से चिपकाया जिससे ये सब बालक एक हो गए परन्तु सिर छः थे। इन्हें षडानन
कहा गया। कृतिकाओं ने इन्हें पाला था
इसलिए इनका नाम कार्तिकेय पड़ा। 
कार्तिकेय जब कुछ बड़े हुए तब देवताओं ने कार्तिकेय के नेतृत्व में तारकासुर से युद्ध किया। युद्ध में भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर का बध
करके देवताओं का कल्याण किया।  एक बार भगवान शिव और पार्वती ने जुआ खेला जिसमें भगवान शिव अपना सब कुछ हार गए और कैलाश छोड़कर चले गए। जब यह बात कार्तिकेय को मालूम हुयी तब कार्तिकेय ने माता पार्वती से जुआ खेला जिसमें पार्वती हार गयीं। कार्तिकेय ने भगवान शिव ‌का सारा सामान लाकर अपने पिता को दे दिया। जब गणेश जी को पता लगा, तब
गणेश जी ने जाकर भगवान शिव से जुआ खेला जिसमें भगवान शिव हार गए। गणेश जी ने आकर माता को यह
बताया तब माता पार्वती ने कहा कि तुम
अपने पिता को साथ नहीं लाए। भगवान गणेश ने जाकर घर  वापस‌ चलने के लिए निवेदन किया। भगवान विष्णु ने भगवान शिव से कहा, मैं पासा
बन जाऊँगा। आप फिर जुआ खेलें। तब शिव जी ने गणेश जी से कहा, मै चलूँगा लेकिन एक बार‌ फिर जुआ खेला‌ जाएगा, वह भी मेरे पासे से। ‌पार्वती ने भगवान शिव ‌से कहा, तुम्हारे पास क्या है ? जो तुम जुआ खेलोगे।नारद ने जुए में अपना वीणा आदि सामान रख दिया। जुआ खेला गया परन्तु भगवान शिव बार-बार जीत रहे थे। गणेश जी ने इस भेद को बता दिया तब माता पार्वती ने शाप‌ दे दिया। भगवान कार्तिकेय को शाप दिया‌ कि‌ तुम हमेशा बालक ही बने रहोगे। भगवान शिव को शाप दिया कि तुम गंगा का बोझ हमेशा सिर पर लिए घूमोगे। रावण ने बिल्ली का रूप रखकर गणेश जी के वाहन मूषक को भगा दिया था इसलिए रावण और भगवान विष्णु को शाप दिया कि‌ तुम दोनो त्रेतायुग में एक दूसरे के दुश्मन बनोगे। विष्णु रावण को मारेंगे। नारद‌ को शाप दिया कि तुम एक स्थान पर कभी नहीं टिक पाओगे।
भगवान‌ कार्तिकेय बड़े थे। भगवान शिव ने कार्तिकेय के राजतिलक के अवसर पर सभी देवताओं को‌ आमंत्रित किया।
भगवान विष्णु और ब्रह्मा भी इस अवसर पर आए थे। परन्तु माता पार्वती भगवान गणेश का राज‌तिलक चाहती थीं। देवताओं ने आपस में परामर्श करके एक प्रतियोगिता आयोजित की और गणेश और कार्तिकेय से कहा, जो
इस पृथ्वी की प्रदक्षिणा करके पहले लौटेगा। उसी का राजतिलक किया ‌जाएगा। भगवान कार्तिकेय की
सवारी मोर है। मोर पर बैठकर भगवान कार्तिकेय पृथ्वी की प्रदक्षिणा‌‌ करने हेतु
उड़े। भगवान गणेश की सवारी मूषक है। माता पार्वती ने गणेश से कहा, त्रिलोकी नाथ यहीं बैठे हुए हैं। तुम
अपने पिता-माता और समस्त देवताओं की प्रदक्षिणा कर लो, बस तुम्हारी पृथ्वी
की प्रदक्षिणा पूरी हो जाएगी। गणेश ने ऐसा ही किया।‌ गणेश‌जी का‌ राजतिलक कर दिया गया। 
कार्तिकेय जी जब पृथ्वी की प्रदक्षिणा
करके लौटे तब बहुत विलम्ब हो चुका था। राज‌तिलक‌ गणेश जी का हो चुका था। माता पार्वती ने गणेश का पक्ष‌ लिया है यह जानकर कार्तिकेय जी  बहुत दुखी हुए और क्रोधित होकर    माता पार्वती से कहा, हे माते ! आपने
पक्ष लेकर अच्छा नहीं किया ! आपके तेज से बना यह मांस और खाल मैं आपको अर्पित करता हूँ, ऐसा कहकर
भगवान कार्तिकेय ने अपना मांस तथा खाल उतार कर माता पार्वती के श्री
चरणों में रख दिया और कहा, मेरे इस स्वरूप को जो नारी देखेगी वह सात
जन्म तक विधवा रहेगी। देवताओं ने
भगवान कार्तिकेय के शरीर पर सिन्दूर
और तेल का लेपन किया। भगवान कार्तिकेय वहाँ से उत्तराखण्ड के रुद्र
प्रयाग जिले में क्रौंच पर्वत पर आकर
ध्यान में बैठ गए। यहीं उनका  अंतिम
अवसान भी हुआ। यहाँ भगवान कार्तिकेय का विशाल मंदिर बना हुआ है जिनका दर्शन‌ करने दूर-दूर से लोग आते हैं। उत्तर के प्रदेशों में यही एक मात्र मंदिर है। एक दूसरे मत के अनुसार वहाँ से भगवान कार्तिकेय दक्षिण की ओर चले गए। दक्षिण के प्रदेशों में भगवान कार्तिकेय को मुरुगन नाम से लोग पूजते हैं। आपका प्रसिद्ध और विशाल मंदिर तमिलनाडु प्रदेश के पलानी में स्थित है। श्री लंका, मलेशिया, सिंगापुर में भी आपकी पूजा की जाती है। आपका एक‌ नाम स्कंद भी है। षष्ठी को स्कंद भगवान के नाम से आपको लोग पूजते हैं। भगवान कार्तिकेय की दो पत्नियाँ थीं:-(१) देवराज इन्द्र की पुत्री देवसेना (देवयानी) और एक आदिवासी राजा की पुत्री वल्ली अथवा भगवान विष्णु की पुत्री वल्ली। देवसेना अथवा देवयानी को छठी माता के रूप में महिलाएँ सन्तान प्राप्ति के लिए अथवा अपने सुहाग की रक्षा के लिए पूजती हैं। लोक परम्परा में छठी माता
भगवान सूर्य की बहन और ब्रह्मा की
मानस पुत्री कही जाती हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार राजा प्रियव्रत ने महर्षि कश्यप से पुत्र प्राप्ति
हेतु यज्ञ कराया था परन्तु मृत पुत्र प्राप्त
हुआ तब आपने आत्म हत्या करने की चेष्टा की उस समय छठी माता ने प्रकट होकर आपको आत्म हत्या ‌करने से रोका और‌ कहा जो मेरा व्रत करेगा उसे ‌दीर्घायु पुत्र प्राप्त होगा। राजा और उनकी पत्नी ने छठी माता का व्रत रखकर भगवान सूर्य को अर्ध्य दिया। उन्हें‌ पुत्र प्राप्त हुआ।‌‌ तभी से छठी माता के पूजन की परम्परा चली आ रही है।
 प्रज्ञा विवर्धन ‌स्तोत्र:--------( -मूक भी बोलने लगता है नीचे लिखे २८ नामों के पढ़ने से)।
योगीश्वरो महासेनः कार्तिकेयो अग्निनन्दनः। स्कन्दः कुमारः सेनानी स्वामी शंकरसम्भवः।१।
गांगेयस्ताम्रचूडश्च ब्रह्मचारी शिखिध्वजः।
तारिकारिरुमापुत्रः क्रौंचाराति
 षडाननः।२।
शब्दब्रह्म समुद्रश्च सिद्धः सरस्वती गुहः।
सनत्कुमारो भगवान्भोग मोक्ष 
फलप्रदः।३।
शरजन्मा गणाधीशः पूर्वजो मुक्ति मार्ग कृत। सर्वांगम् प्रणेता च वांछितार्थ
प्रदर्शनः।४।
स्कंद षष्ठी पर पढ़ा जाने वाला मंत्र:--
(राजनीति वा तकनीकी शिक्षा में सफलता हेतु)।
देव‌ सेनापते स्कंद कार्तिकेय भवोद्भव
कुमार ‌गुह गांगेय शक्तिहस्त नमोस्तुते।
कार्तिकेय गायत्री मंत्र:--(कष्टों के नाश को लिए)।
ॐ तत्पुरुषाय विद्यमहे महासेन्या धीमहि
तन्नो स्कंदा प्रचोदयात्।
शत्रु नाश के लिए:--ॐ शारवाना भावाया नमः। ज्ञानशक्ति धरा स्कंदा वल्ली ई कल्याणा सुन्दरा देवसेना मनः कान्ता कार्तिकेया नमोस्तुते।
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