------- :भगवान शिव---(५)
(१०)------:वृषभ अवतार:------
महा शिव पुराण और लिंग पुराण के अनुसार भगवान शिव ने भगवान विष्णु
के पुत्रों को मारने के लिए वृषभ अवतार धारण किया। कथा इस प्रकार
से है :--समुद्र मंथन में अमृत बाँटने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप रखा था। साथ ही कई अप्सराओं को भी पैदा किया था, जो दैत्यों से अमृत
की रखवाली में लगी थीं। अमृत का वितरण केवल देवताओं में किया
गया था। दैत्यों को अमृत के स्थान पर वारुणी पिला दी गयी था, जिससे दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। भगवान विष्णु दैत्यों का पीछा करते हुए
पाताल तक गए। वहाँ पर भगवान विष्णु द्वारा पैदा की गयी वे अपसराएँ
तपस्या कर रही थीं। भगवान विष्णु ने पूछा, बोलो ! तुम्हें क्या चाहिए ? अप्सराओं ने कहा, प्रभो ! हमें दो वर चाहिए:--(१) आप हमसे विवाह करें। (२) आप स्वयं को भूल जाएँ। भगवान
विष्णु ने तथास्तु कहा। भगवान विष्णु उन अप्सराओं के साथ रहने लगे। कई बच्चे हुए। सब के सब महा शैतान पाताल से देवलोक तक सब आतंक मचाए हुए थे। देवतागण भगवान शिव के पास गए। भगवान शिव ने इन्हें मारने के लिए वृषभ अवतार लिया। वृषभ देव ने इन सबको मार कर देवताओं का कल्याण किया। परन्तु भगवान विष्णु
ने अपने पुत्रों के लिए भगवान शिव से युद्ध किया। युद्ध समाप्त कराने के लिए देवता गण भगवान गणेश के पास गए।
भगवान गणेश ने उन अप्सराओं से मिलकर वरदान को वापस करने के लिए प्रार्थना की। अप्सराओं ने अपने वरदान वापस ले लिए। तब भगवान
विष्णु को स्मरण आया और युद्ध समाप्त हुआ।
---(११) -------:यतिनाथ अवतार:------------अर्बुदाचल पर्वत के निकट आहुक और आहुका नाम के भील दम्पति रहते थे। ये दोनो भगवान शिव के भक्त थे।एक बार भगवान शिव ने इनकी परीक्षा
के लिए यतिनाथ रूप धारण किया। भगवान यतिनाथ भील दम्पति के यहाँ पहुँचे। आहुक शिकार के लिए गया हुआ था। आहुका घर में थी। आहुका ने
यति को श्रद्धा पूर्वक बिठाया। तभी आहुक भी आ गया। भगवान यतिनाथ ने कहा, आज हम आपके यहाँ ठहरेंगे।
आहुक ने संकोच किया क्योंकि उसके यहाँ केवल दो लोगों के ठहरने के लिए ही स्थान था। परन्तु आहुका बोली, आप दोनो अन्दर लेटिएगा। हम पहरा देंगे। आहुक ने अपनी पत्नी से कहा, पहरा हम देंगे। भगवान यतिनाथ और आहुका अन्दर लेटे । आहुक हाथ में हथियार लेकर पहरेदारी करने लगा। रात में जंगली जानवरों ने उसे खा लिया। कुछ हड्डियाँ ही शेष बचीं। प्रातः जब यति ने आहुक को मरा हुआ देखा तो बहुत दुखी हुए। आहुका ने कहा, मेरे पति ने अपना कर्तव्य निभाते हुए इस संसार को छोड़ा है इसलिए आप दुखी न हों। आप मेरे लिए चिता लगा दें। भगवान यति ने चिता लगायी। जब वह चिता पर बैठने वाली थी, तब भगवान यतिनाथ ने शिव का रूप रखकर कहा, मैं यति का अवतार आप दोनों की परीक्षा के लिए धारण किया था। आप दोनों परीक्षा में सफल हुए। अगले जन्म में तुम विदर्भ नगर में भीमराज की पुत्री दमयन्ती बनोगी तथा तुम्हारा पति आहुक निषध के राजा वीरसेन का पुत्र नल बनेगा। मैं स्वयं हंस का रूप रखकर आप दोनों का विवाह कराने में सहायक बनूँगा। आहुका ने हाथ जोड़ा और पति के साथ सती हो गयी। यह था आहुक और आहुका का आतिथ्य सत्कार।
-(१२)-----:कृष्ण दर्शन अवतार:------
भगवान शिव भगवान कृष्ण के बाल रूप का दर्शन करने गोकुल आते हैं ।
जिस योगी का रूप रखकर भगवान शिव आते हैं, उस रूप को ही भगवान शिव का कृष्ण दर्शन अवतार कहते हैं।
भगवान शिव नन्द महल में पहुँचते हैं,
और दरवाजे पर खड़े होकर ज़ोर से बुलाते हैं:-- यशोदा मैया ! ओ यशोदा मैया ! लाला के दर्शन करा दे। बहुत देर
तक आवाज़ लगाते रहे, मगर कोई अंदर
से निकला नहीं। एक बूढ़ी पड़ोसन आयी और योगी से कहा, बाबा ! यहाँ तो कोई दिखता नहीं। चलो हमारे दरवाज़े पर हम तुम्हें भिक्षा देते हैं।योगिराज ने कहा, नहीं मैया ! मैं तो लाला का दर्शन करने आया हूँ और दर्शन करके ही जाऊँगा। वह बूढ़ी औरत
अन्दर गयी और ज़ोर से बोली, यशोदा बहन ! अरी ओ यशोदा बहन ! एक योगी द्वार पर आया है, वह भिक्षा नहीं चाहता है, वह लाला का दर्शन करना चाहता है। यशोदा बोलीं ! उन्हें भिक्षा दे आती हूँ। लाला को बाहर नहीं ले जाऊँगी। यशोदा ने एक थाल में खाने की वस्तुओं को सजाया और बाहर आकर योगी को देने लगीं। योगी बोले ! लाला के दर्शन करा दे। मैया ! यशोदा अन्दर गयीं, और थाल पर मोती का माला रखकर आयीं, और कहा, योगी बाबा ! इसे ले लो और जाओ। योगी बोले, मुझे हीरा मोती नहीं चाहिए मैया ! मुझे लाला को दिखा दे ! योगी ने अपने कमण्डल को उस थाल में पलट दिया, हीरा और अन्य जवाहरात से यशोदा का थाल भर गया और कहा, मैया इसे ले ले,और लाला के तनिक दर्शन करा दे। मैं दर्शन करने कैलाश से आया हूँ।यशोदा बोलीं, जब कैलाश से आए हो, तो वहीं शिव के दर्शन कर लेते। इतना कहकर ़यशोदा ने हीरे जवाहरात वहीं गिरा दिए और अन्दर चली गयीं। भगवान शिव ने आँख बन्द करके श्याम सुन्दर से कहा, कुछ करो ! कुछ करो !
प्रभो ! मैं बिना दर्शन कर लिए यहाँ से
जाने वाला नहीं हूँ। भगवान कृष्ण ने यहाँ आने से पहले अपनी योगमाया को भेज दिया था, जिन्हें लोग बुआ कहते थे। वह तत्क्षण वहाँ आ गयीं और भगवान शिव को प्रणाम् करके कहा, प्रभो ! आज आप यहाँ ! भगवान शिव बोले, श्यामसुन्दर के दर्शन के लिए आए हैं। योगमाया ने कहा, ठीक है, मैं यत्न करती हूँ। योगमाया ने यशोदा की भावनाओं को बदला, और अन्दर जाकर कहा, यशोदा बहन ! मैं योगी बाबा को जानती हूँ। ये बहुत जानकार हैं। चलो लाला के बारे में योगी बाबा से कुछ पूछते हैं। लाला को गोदी में लिया, और लाकर योगी बाबा की गोदी
में रख दिया और कहा, बाबा बताओ इस लाला के बारे में कुछ। भगवान शिव टकटकी लगाकर श्याम सुन्दर को
देखते रहे। फिर कहा, मैया ! यह त्रैलोक्य के स्वामी हैं। इनके बारे में हम
जितना कुछ बताएँगे वह कम ही होगा।
बस इतना जान लीजिए कि यह कंस को मारने के लिए ही आपके यहाँ आए हैं। आपके लाल को कोई मार नहीं सकता है, जो लाल को मारने आएगा, वह स्वयं आपके लाल के द्वारा मारा जाएगा। भगवान शिव ने श्याम सुन्दर को प्रणाम करने के लिए अपना सिर झुकाया और बालक को बुआ की गोदी में देकर भगवान शिव वहाँ से अन्तर्धान हो गए।
-(१३)----- :अवधूत अवतार:--------देवराज इन्द्र सभी देवताओं के राजा हैं।
कई बार उनको अपने राजा होने का अहंकार हुआ, जिसका उन्हें नुकसान भी उठाना पड़ा। एक बार इन्द्र अन्य देवताओं के साथ भगवान शिव के दर्शन हेतु कैलाश चले। देव गुरु बृहस्पति भी साथ में थे। भगवान शिव इन्द्र की परीक्षा हेतु अवधूत का अवतार लेकर मार्ग को रोककर खड़े हो गए। देवराज
इन्द्र ने मार्ग से हटने का आदेश दिया।
मगर अवधूत ने अनसुना कर दिया।
इन्द्र ने फिर से डाँटा और कहा, यदि मार्ग से नहीं हटे तो मारे जाओगे। अवधूत फिर भी रास्ते से नहीं हटा, तब
राजा इन्द्र ने वज्र का प्रहार करना चाहा। भगवान शिव अपने वास्तविक
रूप में आकर शाप देने ही वाले थे, तभी
गुरु वृहस्पति ने भगवान शिव को पहचान लिया और स्तुति प्रारम्भ कर दी। भगवान शिव प्रसन्न हुए और इन्द्र
शाप से बच गए।
(१४) -----:भिक्षु अवतार:----
विदर्भ नरेश सत्यरथ को युद्ध में उनके
शत्रुओं ने मार डाला। उनकी पत्नी गर्भवती थी। वह अपने गर्भ के बच्चे की रक्षा के लिए जंगल में भाग गयी। जंगल
में ही उसने अपने बच्चे को जन्म दिया।
एक दिन वह एक सरोवर के निकट अपने बच्चे को ज़मीन पर लिटा दिया, और वह सरोवर में पानी पीने गयी। उसे
घड़ियाल ने खा लिया। अब बच्चे की देख-भाल करने वाला कोई नहीं बचा।
बच्चा निःसहाय ज़मीन पर लेटा हुआ
रो रहा था। भगवान शिव ने भिक्षु का
अवतार लिया और उस बच्चे के पास
पहुँच गए। बच्चे को अभय का वरदान दिया। तभी एक अधेड़ महिला वहाँ आई। भगवान शिव के उस भिक्षु अवतार को नमन किया, और बोली
प्रभु ! मेरे लिए क्या आदेश है ? भिक्षु ने कहा, यह महाराज सत्यरथ का पुत्र है।
राजा सत्यरथ को शत्रुओं ने मार डाला,
इसकी माँ को घड़ियाल ने खा लिया।
अब इस संसार में इसका अपना कोई नहीं है। आगे चलकर यह बालक राजा बनेगा। तुम्हें इस बच्चे को पालना है। उस महिला ने सिर झुकाकर कहा, प्रभु आपकी कृपा बनी रहे, मैं इस बालक को अपना बालक समझकर पालूँगी। उसने उस बच्चे को उठा लिया। बच्चे को बड़ा किया। आगे चलकर इस बालक ने एक छोटी सेना बनाई और दुश्मन देश पर आक्रमण कर दिया। वह विजयी हुआ, और अपना खोया हुआ
राज्य वापस ले लिया।
--(१५)---:किरात अवतार:------कौरवों ने पाण्डवों का राज्य छल से हड़प कर बारह वर्ष के लिए वनवास भेज दिया। वनवास काल में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अर्जुन ने
शिवालिक पर जाकर तप करना प्रारम्भ किया। दुर्योधन ने अर्जुन को मारने के लिए मूड नाम के एक राक्षस को भेजा। राक्षस ने सुअर का रूप रखकर अर्जुन पर आक्रमण कर दिया। भगवान शिव ने किरात का रूप रखकर उस सुअर को मार दिया। मरते समय सुअर बहुत ज़ोर से चिल्लाया। अर्जुन का ध्यान टूट गया।
आँख खुली तो देखा, निकट ही सुअर मरा पड़ा है और सामने से एक किरात
धनुष-बाण लिए आ रहा है। अर्जुन ने डाँटा, और कहा, यह शिवालिक की परिधि भगवान शिव के क्षेत्र में आती है, यहाँ जीव हत्या करना निषेध है। आपने
इस क्षेत्र में जीव हत्या करके अपराध किया है। आपको इसके लिए दण्ड मिलेगा। किरात ने कहा, यदि मैं सुअर को न मारता तो वह आपको मार देता।
अपने क्षेत्र में अपने भक्तों की रक्षा करना भगवान शिव का दायित्व है। इसकी चिन्ता आपको नहीं करनी चाहिए। आप सावधान हो जाएँ। हम आपको क्षमा नहीं कर सकते। इतना कहकर अर्जुन ने अपना धनुष-बाण उठा लिया। दोनों में युद्ध प्रारम्भ हो गया। अर्जुन वार पर वार करते जा रहे थे।किरात शान्त पूर्वक वार को रोकता जाता था। अर्जुन का एक भी बाण किरात के शरीर को स्पर्श नहीं कर सका। सायं का समय हो गया। यह समय भगवान शिव के पूजन का समय
है, इसलिए हे किरात ! थोड़ी देर ठहरो।
पूजन के बाद फिर युद्ध करते हैं। यह कहकर अर्जुन ने युद्ध रोक दिया, और पूजन में लग गये, यह देखकर अर्जुन आश्चर्य में पड़ गए कि जो माला भगवान शिव को चढ़ायी वह किरात के गले में आ गयी। अब तो अर्जुन की समझ में आ चुका था कि ये और कोई नहीं, बल्कि स्वयं भगवान शिव हैं जो अपने भक्त को सुअर से बचाने के लिए किरात का रूप धारण किया है। अर्जुन ने प्रणाम् किया। भगवान शिव ने प्रसन्न
होकर अपना पाशुपत अस्त्र अर्जुन को दे दिया।
----(१६)---:सुनट नर्तक अवतार:---भगवान शिव ने पार्वती से विवाह के लिए नट नर्तक का अवतार लिया। इस अवतार से भगवान शिव ने एक हाथ में डमरू लेकर हिमाचल के दरबार में नृत्य
किया। नृत्य को वहाँ पर उपस्थित सभी लोगों ने सराहा। राजा हिमाचल भी नृत्य से बहुत प्रभावित हुए, और नर्तक से कुछ माँगने के लिए कहा। नर्तक ने
हिमाचल की बेटी पार्वती को माँग लिया। राजा हिमाचल बहुत क्रोधित हुए। पार्वती ने पिता को समझाया तब
पिता का क्रोध शान्त हुआ। भगवान शिव ने अपने वास्तविक रूप में आकर पार्वती को दर्शन दिया, और वहाँ से चले आए।
----(१७)----:ब्रह्मचारी अवतार:-------सती प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। सती भगवान शिव के मना करने के बाद भी
बिना आमंत्रण के पिता द्वारा आयोजित
उत्सव में आकर सम्मिलत हुयीं। दक्ष
प्रजापति ने भगवान शिव को अपशब्द कहे और देवताओं का यज्ञ भाग जब अलग किया तब भगवान शिव का भाग नहीं अलग किया। सती अपने पति का अपमान नहीं सहन कर सकी और उसी
यज्ञ कुण्ड में कूद कर अपना प्राण दे दिया। अगले जन्म में सती राजा हिमाचल के घर जन्मीं। इनका नाम पार्वती रखा। पार्वती बड़ी हुयीं तब
भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए
तप करने लगीं। भगवान शिव ने परीक्षा
के लिए ब्रह्मचारी का अवतार लिया।ब्रह्मचारी माता पार्वती के पास पहुँचे।
पार्वती ने ब्रह्मचारी का सत्कार किया।
ब्रह्मचारी ने पूछा, यह तप क्यों कर रही हो ? पार्वती ने उत्तर दिया, भगवान शिव
को प्राप्त करने से लिए। ब्रह्मचारी ने कहा, शिव ! वही शिव ! जो श्मशान में
रहता है, जिसके तन पर कपड़ा नहीं रहता, जो जले हुए मुर्दों की राख लपेटे रहता है, भूत प्रेत जिसके साथी हैं, क्या
उसी कापालिक को प्राप्त करने के लिए
तुम तपस्या कर रही हो ? पार्वती क्रोध में आकर बोली, हाँ ! हाँ ! इसके पहले
कि कुछ पार्वती आगे बोलतीं, भगवान
शिव ने अपने वास्तविक रूप में आकर
पार्वती को दर्शन दिया।
----(१८)---:अर्धनारीश्वर अवतार:------
सृष्टि सृजन का कार्य ब्रह्मा को दिया गया। ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना करना
प्रारम्भ किया। ब्रह्मा जी के मानसिक क्रिया के द्वारा रची गयी सृष्टि जब विस्तार नहीं पा सकी, तब ब्रह्मा जी
बहुत दुखी हुए। आकाशवाणी हुई कि हे ब्रह्मा ! तुम मैथुनी सृष्टि आरम्भ करो। ब्रह्मा जी ने विचार किया कि यह कार्य बिना भगवान शिव की कृपा से सम्भव नहीं है। ब्रह्मा शिव की तपस्या में लीन हो गए। भगवान शिव ब्रह्मा की तपस्या
से प्रसन्न होकर अर्धनारीश्वर का अवतार लेकर प्रगट हुए। भगवान शिव का आधा भाग पुरुष का था और आधा भाग नारी का। नारी का भाग शिव शक्ति अर्थात् शिवा का था। भगवान शिव ने शिवा का भाग अपने से अलग कर दिया। ब्रह्मा ने शिवा को प्रणाम किया और कहा, हे माते ! आप अपने अंश से मेरे पुत्र दक्ष की पुत्री के
रूप में अवतरित होने की कृपा करें। ब्रह्मा ने शिवा शक्ति से ही मैथुनी सृष्टि की रचना का आरम्भ किया जो आज तक चली आ रही है।
---(१९)---सुरेश्वर(इन्द्र) अवतार:----
व्याघ्रपाद का पुत्र उपमन्यु अपने मामा के यहाँ रहता था। उसे अपनी भूख मिटाने के लिए सदैव दूध चाहिए था, जो सम्भव नहीं था। एक दिन उसकी माँ ने कहा, यदि तुम्हें अपनी अभिलाषा पूर्ण करनी है तो तुम भगवान शिव की शरण में जाओ, वे ही तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण कर सकते हैं। वह जंगल में जाकर 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करने लगा।भगवान शिव उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर सुरेश्वर(इन्द्र) का अवतार लिए और उपमन्यु के सामने प्रकट हुए। उपमन्यु से पूछा, क्या चाहते हो ? उपमन्यु ने उत्तर नहीं दिया। सुरेश्वर ने फिर पूछा, तुम क्या चाहते हो ? जो चाहते हो वह सब मिलेगा। उपमन्यु ने उत्तर दिया, हम आपसे कुछ भी नहीं चाहते हैं। जो कुछ मुझे कहना होगा, भगवान शिव से कहेंगे। सुरेश्वर भगवान शिव की निन्दा करने लगे। उपमन्यु सुरेश्वर को मारने दौड़ा। शिव अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर उपमन्यु को दर्शन दिए तथा क्षीर सागर के समान उसे एक अनश्वर सागर प्रदान किया।
(२०) आदि शंकराचार्य अवतार:---
आदि गुरू शंकराचार्य जी का जन्म ७८८ ईसा पूर्व केरल के कालड़ी गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम शिव गुरू तथा माता का नाम विशिष्टा देवी(सती अथवा सुभद्रा) था। पुत्र प्राप्ति के लिए आपके माता पिता ने भगवान शिव की तपस्या की। भगवान
शिव प्रकट हुए और पूछा, आपको कैसा बालक चाहिए ? दीर्घायु और अल्पज्ञ अथवा अल्पायु और सर्वज्ञ ? शिवगुरू ने कहा, प्रभो ! मुझे अल्पायु और सर्वज्ञ
पुत्र चाहिए। आपकी पत्नी ने कहा, प्रभो ! मुझे आप जैसा पुत्र चाहिए। भगवान शिव ने तथास्तु कहा और अन्तर्धान हो गए। भगवान शिव ने स्वयं बालक का रूप रखकर आपके यहाँ अवतरित हुए।
जन्म के थोड़े दिन बाद ही आपके पिता इस संसार को छोड़ कर चले गए। आपकी माँ ने आपको गुरुकुल में पढ़ने भेजा। गुरुकुल के आचार्यों को आश्चर्य हुआ कि आपको वेद उपनिषद आदि ग्रन्थ पहले से कण्ठाग्र हैं। सात वर्ष की आयु में आपने सन्यास लेने की आज्ञा अपनी माँ से माँगा। माँ ने इस शर्त पर आज्ञा दी कि मेरे अन्तिम समय में तुम मेरे पास रहोगे। भगवान शंकराचार्य जी ने सन्यास ले लिया। आप गुरु दीक्षा के
लिए गोविन्दाचार्य जी के पास गए। गुरू गोविन्दाचार्य ने आपसे पूछा, तुम कौन हो बालक ? अपना परिचय दो। आचार्य शंकर ने जिन शब्दों में अपना परिचय दिया, वह निर्वाण षटकम् नाम से जाना जाता है।
निर्वाण षटकम्-----
(१) मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे। न च व्योम
भूमिः न तेजो न वायुः चिदानन्द रूपः
शिवोऽहं शिवोऽहं।
भावार्थ--न मैं मन हूँ, न बुद्धि हूँ, न अहंकार हूँ, न चित्त हूँ, न कान हूँ, न जिह्वा हूँ, न नासिका हूँ, न नेत्र हूँ, न भूमि हूँ, न अग्नि हूँ, न वायु हूँ, मैं चिदा रूप आनन्द हूँ, मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ।
(२) न च प्राण संज्ञो न वै पंच वायुः न वा सप्त धातुः न वा पंच कोशः। न वाक् पाणि पादो न चोपस्थपायु चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहं।
भावार्थ --- न मैं प्राण हूँ और न मैं प्राणों में (प्राण, उदान, अपान, ध्यान, समान) से कोई हूँ न मैं सप्त धातुओं( त्वचा, मांस, मेदा, रक्त, पेशी, अस्थि, मज्जा) में से कोई हूँ, और न मैं पंच कोशों (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्द मय) में से कोई हूँ, न मैं वाणी, हाथ, पैर हूँ, न मैं जननेन्द्रिय, गुदा हूँ। मैं चिदा रूप आनन्द हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ।
(३) न मे द्वेष रागो न मे लोभ मोहो मदो नैव मे नैव मात्सर्य भावः। न धर्मो न अर्थो न कामो न मोक्षः चिदाननन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहं।
भावार्थ--न मुझमे राग है, न द्वेष है, न लोभ है, न मोह है, न मद है ,न ईर्ष्या है।
न मैं धर्म हूँ, न अर्थ हूँ, न काम हूँ, न मोक्ष हूँ, मैं चिदारूप आनन्द हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ।
(४) न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं न मंत्रो न तीर्थं न वेदो न यज्ञः। अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूपः शिवोऽहं, शिवोऽहं।
भावार्थ--न मैं पुण्य हूँ, न पाप हूँ, न सुख हूँ, न दुख हूँ, न मंत्र हूँ, न तीर्थ हूँ, न वेद हूँ, न यज्ञ हूँ, न भोजन हूँ, न भोज्य हूँ, न भोक्ता हूँ। मैं चिदा रूप आनन्द हूँ। मै शिव हूँ। मै शिव हूँ।
(५) न मे मृत्यु शंका न मे जाति भेदः पिता नैव मे नैव माता न जन्मा। न बन्धुः न मित्रं गुरु नैव शिष्यं चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहं ।
भावार्थ--न मुझमे मृत्यु की शंका है, न मुझमे जाति भेद है, न कोई मेरा पिता है, न कोई मेरी माता है, न मैं जन्मा हूँ, न कोई मेरा भाई है, न कोई मित्र है, न कोई गुरू है, न कोई शिष्य है, मैं चिदारुप आनन्द हूँ। मैं शिव हूँ। मैं शिव हूँ।
(६) अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो विभुव्याप्य सर्वत्र सर्व इन्द्रियाँणाम्। सदा मे समत्वं न मुक्तिः न बन्धः चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहं।
भावार्थ --- मैं निर्विकल्प हूँ, निराकार हूँ, विभु हूँ, सर्व व्याप्य हूँ, सब जगह हूँ, सब इन्द्रियों में हूँ। सदा समान रहता हूँ। न मुक्त हूँ, न बन्धन में हूँ। मै चिदारूप आनन्द हूँ। मैं शिव हूँ। मै शिव हूँ।
इस तरह आचार्य शंकर ने गुरू गोविन्दाचार्य जी से दीक्षा लेकर वेद-वेदान्त की शिक्षा ली। आप काशी आए। गंगा स्नान करने के बाद आप काशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए चले। मार्ग में
चार कुत्तों को लिए हुए एक चाण्डाल मिला। आपने उससे कहा, दूर हट ! दूर हट ! चाण्डाल बोला, आप किसे हटने के लिए कह रह हैं ? इस अन्नमय शरीर को अपने शरीर से जो वह भी अन्नमय है, अथवा शरीर के अन्दर स्थित उस चैतन्य को जो ब्रह्म का अंश है और जो हमारे सभी क्रिया कलापों का दृष्टा और साक्षी है। आचार्य शंकर को अपने भूल का एहसास हो चुका था। आपने भेद रहित ब्रह्म में भेद रखने भूल की थी। आप समझ चुके थे कि वह साधारण मनुष्य नहीं है। आपने उस चाण्डाल को प्रणाम किया और उसकी स्तुति प्रारम्भ की। जिन शब्दों में आपने उसकी स्तुति की वह मनीषा पंचकम् कहलाती है।
मनीषा पंचकम्----
(१) जाग्रत स्वप्न सुषुप्तेषु स्फुटतरा या
संविदुज्जृम्भ्यते। या ब्रह्मादि पिपीलिकान्त तनुष प्रोता जगत्साक्षिणी। सेवाहं न च दृश्यवस्त्विति दृढ़प्रज्ञापि यस्यास्ति चेत्।
चाण्डालोस्तु स तु द्विजोस्तुं गुरुरित्येषा
मनीषा मम्।
भावार्थ---जो चेतना जाग्रत, स्वप्न, सुसुप्ति तीनो अवस्थाओं के ज्ञान को प्रकट करती है। जो चैतन्य विष्णु आदि देवताओं में स्फुरित हो रही है। वही चैतन्य चींटी आदि क्षुद्र जन्तुओं तक में स्फुरित है। जिस दृढ़ बुद्धि पुरुष की दृष्टि में सम्पूर्ण विश्व आत्मरूप से प्रकाशित हो रहा है। वह चाहे ब्राह्मण हो
अथवा चाण्डाल वह मेरा गुरू है।
(२) ब्रह्मैवाहमिदं जगच्च सकलं चिन्मात्र विस्तारितं सर्वं चैतद्विद्या त्रिगुणयाशेषं मया कल्पित मा इत्यं यस्य दृढ़मतिः सुखतरे नित्ये परे निर्मले
चाण्डालोस्तु स तु द्विजोस्तु गुरुत्येषा मनीषा मम्।
भावार्थ-- मैं ब्रह्म हूँ, चेतन मात्र से व्याप्त
यह समस्त जगत भी ब्रह्म रूप ही है।
समस्त दृश्य जाल मेरे द्वारा ही त्रिगुण मय अविद्या से कल्पित है। मैं सुखी, नित्य , निर्मल परब्रह्म रूप में हूँ। जिसकी ऐसी दृढ़ बुद्धि है वह चाण्डाल हो अथवा ब्राह्मण, मेरा गुरू है।
(३) शश्वन्त श्वरमेव विश्वमखिलं निश्चित्य
वाचा गुरोः। नित्यं ब्रह्म निरंतरं विमृशता निर्व्याज शान्तात्मना। भूतं भावि च दुष्कृतं प्रदहता संविन्मये पावके। प्रारब्धाय समर्पितं स्वपुरुत्येषा मनीषा मम्।
भावार्थ--जिसने अपने गुरू के वचनों से
यह निश्चित कर लिया है कि परिवर्तन शील यह जगत अनित्य है। जो अपने मन को वश में करके शान्त आत्मना
है। जो निरन्तर ब्रह्म चिन्तन में स्थित है। जिसने परमात्म रूपी अग्नि में अपनी भूत और भविष्य की सभी वासनाओं का दहन कर लिया है और जिसने अपनी प्रारब्ध का क्षय करके
देह को समर्पित कर दिया है। वह चाण्डाल हो अथवा ब्राह्मण वह मेरा गुरू है।
(४) या तिर्यं नर देवताभिरह मित्यन्तः स्फुटा गृह्यते यद्भाषा हृदयाक्ष देहविषया
भन्ति स्वतो चेतनाः। ताम भास्यैः पिहितार्कमण्डल निभां स्फूर्ति सदा भावय न्योगी निवर्त मानसो हि गुरुत्येषा
मनीषा मम्।
भावार्थ--सर्प आदि तिर्यक मनुष्य देवादि द्वारा मैं (अहम्) ऐसा गृहीता होता है। उसी के प्रकाश से स्वतः जड़ हृदय देह और विषय भासित होते हैं। मेघ से आवृत सूर्य मण्डल के समान विषयों से आच्छादित उस ज्योति रूप आत्मा की
सदा भावना करने वाला आनन्द निमग्न योगी चाण्डाल हो अथवा ब्राह्मण वह मेरा गुरू है।
(५) यत्सौख्याम्बुधि लेश लेशत इमे
शक्रादयो निवृता। यच्चिते नितरां प्रशान्त कलने लब्ध्वा मुनिर्निवृतः।
यस्मिन नित्य सुखाम्बुधौ गलित धीर्ब्रह्मैव न ब्रह्मविद्। यः कश्चित्स सुरेन्द्र
वन्दित पदो नूनं मनीषा मम्।
भावार्थ--प्रशान्त काल में एक योगी का
अन्तःकरण जिस परमानन्द की अनुभूति करता है, जिसकी एक बूँद मात्र इन्द्र आदि को तृप्त और संतुष्ट कर
देती है, जिसने अपनी बुद्धि को
परमानन्द सागर में विलीन कर दिया है वह मात्र ब्रह्मविद ही नहीं, स्वयं ब्रह्म है।
वह अति दुर्लभ है। जिसके चरणों की वन्दना देवराज भी करते हैं। वह मेरा गुरू है। ऐसी मेरी मनीषा है।
कहते हैं एक दिन जब आप वाराणसी की गलियों से निकल रहे थे तब आपने एक वृद्ध को पाणिनि के व्याकरण के सूत्रों को रटते हुए देखा, आपने उसे समझाया कि ईश्वर की आराधना करो, वह तुम्हें मुक्ति देगा। यह ज्ञान मरते वक्त
काम नहीं देगा। उस समय आपने 'भज गोविन्दं' लिखा। इसके कुछ श्लोक यहाँ प्रस्तुत किए जा रहे है----
भजगोविन्दम् अथवा मुद्गल(मोह नाश करने वाला) इसके १२ श्लोक मूल हैं इसलिए इसे द्वादश मंजरिका भी कहते हैं।
(१) भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढ़मते। सम्प्राप्ते सन्नहिते काले
नहि नहि रक्षति डुकृं करणे।-श्लोक-१
भावार्थ--हे मूढ़ ! तू गोविन्द को भज। तेरे मरने के वक्त तेरा ज्ञान काम नहीं आएगा।
(२) मूढ़ जहीहि धनागम तृष्णा कुरु सुबुद्धिं मनसि वितृष्णा। यल्लभसे निज कर्मोपात्तम वित्तं तेन विनोदय चित्तम्।
----श्लोक--२
भावार्थ---हे मू़ढ़ ! धन एकत्र करने के लोभ को त्याग हो। अपने मन से इन समस्त कामनाओं का त्याग करो। सत् पथ पर चलो। अपने परिश्रम से जो धन मिले उसमें प्रसन्न रहो।
(३) नारी स्तन नाभी देशं दृष्ट्वामागा
मोहावेशम्। ए तन्मांस वसादि विकारं
मनसि विचिन्तय बारं बारम्।
------श्लोक--३
भावार्थ---स्त्री का स्तन और नाभी को देखकर आसक्त मत होइए। अपने मन में बार-बार यह विचार कीजिए कि यह माँस और वसा के विकार के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
(४) यावत्पवनो निवसति देहे तावत्पृच्छति कुशलं गेहे। गतवति वायो देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन काये।
---------श्लोक --६
भावार्थ--जब तक शरीर में प्राण रहते हैं
तब तक ही लोग कुशल पूछते हैं। शरीर के प्राण वायु निकलते ही पत्नी भी उस शरीर से डरती है।
(५) बालस्तावत् क्रीड़ा सक्तः तरुण स्तावत तरुणी सक्तः। वृद्धस्तावत चिन्तासक्तःपरे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः।
------श्लोक--७
भावार्थ--बालपन में खेल में आसक्ति, युवापन में तरुणी में आसक्ति, वृद्धपन में चिन्ता में आसक्ति, ईश्वर में कभी भी आसक्ति नहीं।
(६) काते कान्ता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः। कस्यत्वं कः कुतः अयातः तत्वं चिन्तय यदिदं भ्रातः।
----श्लोक---८
भावार्थ --- कौन है मेरी पत्नी ? कौन है मेरा पुत्र ? यह संसार बड़ा विचित्र है। हम कहाँ से आए हैं ? इस पर विचार करो भाई।
(७) सत्संगत्वे निःसंगत्वं निःसंगत्वे निर्मोहत्वं। निर्मोहत्वे निश्चल तत्वं
निश्चलतत्वे जीवन्मुक्तिः।-श्लोक--९
भावार्थ--सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से अमोह, अमोह से तत्वज्ञान, तत्वज्ञान से मोक्ष प्राप्त होता है।
(८) वयसि गतेकः काम विकारः शुष्के नीरे कः कासारः। क्षीणे वित्ते कः परिवारो ज्ञाते तत्वे कः संसारः।
------श्लोक--१०
भावार्थ--आयु बीत जाने पर काम विकार नहीं रहता, पानी सूख जाने पर तालाब नहीं रहता। धन चले जाने पर परिवार नहीं रहता। तत्वज्ञान होने पर संसार नहीं रहता।
(९) मा कुरु धन जन यौवन गर्वं हरित निमेषा काला सर्वम्। मायामय मिद् अखिलं हित्वा ब्रह्मपदंत्वं प्रविश विदित्वा।--श्लोक--११
भावार्थ---धन, जन और यौवन पर गर्व मत करो। समय पल भर में इसे नष्ट कर देता है। इस विश्व को माया से घिरा हुआ जानकर तुम ब्रह्म पद में प्रवेश करो।
(१०) दिनया मिन्यौ सायं प्रातः शिशिर वसन्तो पुनरायातः। कालः क्रीडति गच्छत्यायुः तदपि न मुन्चत्याशा वायुः।
-----श्लोक--१२
भावार्थ--दिन- रात, शाम-सुबह, सर्दी-वसन्त बार-बार आते रहते हैं। काल के इस क्रीड़ा के साथ जीवन नष्ट होता रहता है, पर कामनाएँ नष्ट नहीं होतीं।
(११) काते कान्ता धनगत चिन्ता वातुल किं तव नास्ति नियंता। त्रिजगति
सज्जन संगति रेका भवति भवार्णव
तरणे नौका।--श्लोक--१३
भावार्थ--स्त्री, धन के बन्धन में फँसकर
व्यर्थ चिन्ता से हमें कुछ नहीं मिलेगा।
हमें सज्जनों की संगति ही भव करने की नौका बन सकती है।
(१२) जटिलो मुण्डी लुंक्षित केशः काषायाम्बर बहुकृत वेषः। पश्यन्नपि च पश्यति मूढ़ा उदर निमित्तं बहुकृत वेषः।
------श्लोक--१४
भावार्थ--बड़ी जटाएँ, मुण्डा सिर, विखरे बाल, भगवा वस्त्र, भाँति-भाँति के वेश।
ये सब अपना पेट भरने के लिए किए जाते हैं। अरे मूढ़ ! तू इसे देखकर भी नहीं देखता है।
(१३) अंगं गलितं पलितं मुण्डं दशन विहीनं जातं तुण्डम्। वृद्धो याति ग्रहीत्वा
दण्डं तदपि न मुंच्यत्याशा पिण्डम्।
------श्लोक--१५
भावार्थ--गले अंगों वाला, पके बाल वाला, दाँतों से रहित मुख वाला, हाथ में दण्ड लेकर चलने वाला वृद्ध भी आशा-पाश से बँधा रहता है।
(१४) कुरु ते गंगासागर गमनं व्रत परिपालं अथवा दानम्। ज्ञान विहीनः सर्व मतेन। भजति न मुक्तिं जन्म शतेन।
-------श्लोक--१७
भावार्थ--सब धर्मों के अनुसार ज्ञान विहीन को गंगासागर जाने से अथवा व्रत के पालन करने से, दान देने से, सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं मिल सकती है।
(१५) सुर मंदिर तरु मूल निवासः शैया भूतल मजिनं वासः। सर्व परिग्रह भोगत्यागः सत्य सुखं न करोति विरागः।
------श्लोक--१८
भावार्थ--देव मंदिर या पेड़ के नीचे निवास करने से, भूमि पर लेटने से, अकेले रहने से, सभी वस्तुओं के संग्रह
से, भोग के त्याग से, वैराग्य से किसी को सच्चे सुख (आनंद) की प्राप्ति नहीं होगी ।
(१६) पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनम्। इह संसारे
बहु दुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुरारे।
---------श्लोक--२१
भावार्थ--बार-बार जन्म, बार-बार मृत्यु ,
बार-बार माँ के गर्भ में शयन। इस संसार से पार जा पाना बहुत कठिन है। हे मुरारी ! कृपा करके मेरी इससे रक्षा करो।
(१७) कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः कामे
जननी को मे तातः। इति पर भावय सर्वं
सारम् विश्वं त्यक्त्वा स्वप्न विचारम्।
-------श्लोक---२३
भावार्थ--तुम कौन हो ? मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ? मेरी माँ कौन है ? मेरे
पिता कौन हैं ? सब प्रकार से इस जगत
को असार समझकर इसको एक स्वप्न की भाँति त्याग दो।
(१८) गेयं गीता नाम सहस्रं धेयं श्रीपति
रूपं जस्रम्। नेयं सज्जन संगे चित्तं देयं दीन जनाय च वित्तम्।--श्लोक--२७
भावार्थ--भगवान विष्णु के सहस्रों नामों को गाते हुए उनके सुन्दर रूप का अनवरत ध्यान करो। सज्जनों के संग में अपने मन को लगाओ, और गरीबों की अपने धन से सेवा करो।
(१९) सुखतः क्रियते रामा भोगः पश्चाद्धन्त शरीरं रोगः। यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुंचति पापाचरणम्। ---श्लोक--२८
भावार्थ--सुख के लिए लोग राम(वासना) का भोग करते हैं, जिसके बाद शरीर में रोग हो जाता है। यद्यपि इस संसार में सबका मरण सुनिश्चित है फिर भी लोग पापाचरण को नहीं छोड़ते हैं।
(२०) अर्थमनिर्थं भावय नित्यं नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम्। पुत्रादपि धन भजाय भीतिः सर्वत्तैषा विहितः रीतिः।
भावार्थ--धन अकल्याणकारी है। इससे
तनिक भी सुख नहीं मिलता है। धनवान व्यक्ति तो अपने पुत्रों से भी डरते हैं, यह सबको पता है।
(२१) प्राणायामं प्रत्याहारं नित्यानित्य विवेक विचारम्। जाप्य समेत समाधि विधानं कुर्ववधानं महदवधानम्।
---श्लोक----३०
भावार्थ---प्राणायाम, प्रत्याहार, नित्य-अनित्य का विवेकपूर्वक विचार करो।
प्रेम से प्रभु के नाम का जाप करते हुए
समाधि में ध्यान लगाओ। अधिक समय
तक ध्यान लगाओ।
(२२) भज गोविन्दं भज गोविन्दं गोविन्दं भज मूढ़मते। नामस्मरणा दन्यमुपायं नहि पश्यामो भव तरणे।-श्लोक--३३
भावार्थ--गोविन्द को भजो। गोविन्द के नाम के अतिरिक्त इस भवसागर से पार जाने का कोई मार्ग नहीं दिखता है।
आचार्य शंकर वाराणसी से बिहार आए। बिहार में मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ किया। मण्डन मिश्र शास्त्रार्थ में हार गए। परन्तु इनकी पत्नी भारती ने जब रति शास्त्र पर प्रश्न किया तब आपने यह
कहकर हार स्वीकार कर ली, कि मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ। कहते हैं कि आचार्य शंकर ने पर काया प्रवेश करके रति विज्ञान की शिक्षा ली, और पुनः आकर भारती से शास्त्रार्थ किया, और भारती को हराया। आपने सांख्य दर्शन के 'प्रधान कारण वाद' और मीमांसा दर्शन के 'ज्ञानकर्मसमुच्चयवाद' का खण्डन किया। आपने चार्वाक, जैन और बौद्ध धर्म का खण्डन करके वेदान्त दर्शन को प्रतिस्थापित किया। वाराणसी से आप बद्रीनाथ आए, यहाँ पर आपने मूर्ति स्थापित की। यहीं पास के क्षेत्र में आपने जोशी मठ का स्थापना किया। बद्रीनाथ के निकट व्यास गुफा में रुककर उपनिषदों तथा ब्रह्मसूत्र पर आपने भाष्य लिखा।आपने उत्तराखण्ड, अयोध्या, काशी, प्रयाग, दिल्ली, उज्जैन, कांची, कामरूप, गया, कोणार्क, जगन्नाथ, द्वारका, मथुरा, रामेश्वरम आदि चारो दिशाओं के तीर्थों की यात्रा की। आप यहाँ के विद्वानो ं से शास्त्रार्थ करके अपनी विद्वता की छाप भी छोड़ी। चारो दिशाओं में चार मठों की स्थापना की। नील पर्वत पर चण्डी देवी, शिवालिक पर शाकम्भरी देवी से साथ भीमा, भ्रामरी, शताक्षी देवियों के प्रतिमाओं को स्थापित किया। कामाक्षी देवी की भी स्थापना आपने की है। आप द्वारा रचित ग्रन्थों की संख्या लगभग २४० है। आपको जगतगुरू ही नहीं बल्कि लोग आपको भगवान कहते हैं। आप माँ को दिए हुए वचन के अनुसार माँ के अन्तिम समय में माँ के पास आए। माँ की सेवा की। माँ की मृत्यु के बाद जब आपने दाह संस्कार करना चाहा तब लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा। लोग कहते थे कि एक सन्यासी दाह संस्कार कैसे कर सकता है ? आपने कहा, मैने माँ को वचन दिया था, तभी माँ ने मुझे सन्यास लेने की अनुमति दी थी। जब मैने वचन दिया था तब मैं सन्यासी नहीं था। लेकिन लोगों ने आपकी एक न सुनी। लोग अपनी बात पर अड़े रहे। एक भी व्यक्ति आपके द्वार पर नहीं आया। आपने विवश होकर माँ का दाह संस्कार अपने द्वार पर ही किया। तभी से आज तक कालड़ी गाँव के लोग अपने परिवार का दाह संस्कार अपने द्वार पर ही करते हैं। आपका देहावसान ३२ वर्ष की आयु में हुआ। आप एक महान् लेखक और विचारक थे। आपने गीता, उपनिषद और ब्रह्म सूत्र को प्रस्थान त्रयी कहा। इन तीनों ग्रन्थों पर आपने भाष्य लिखा। आपमें जटिल विषयों को सरलता से प्रस्तुत करने की अभूतपूर्व क्षमता थी। आपकी रचना शैली बहुत ही रोचक है।
(१)आपने उत्तर भारत में जोशी मठ (ज्योतिर्मठ) की स्थापना उत्तराखण्ड में की। इस मठ के क्षेत्र में दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश प्रान्त आते हैं। इस मठ के वेद का केन्द्र है अथर्व वेद और महा वाक्य है-'अयमात्मा ब्रह्म'
इसके प्रथम आचार्य हुए--आचार्य त्रोटक।
(२) आपने पश्चिम में शारदा मठ की स्थापना गुजरात में की। इस मठ के क्षेत्र में गुजरात और महाराष्ट्र प्रान्त आते हैं।
इस मठ के वेद का केन्द्र है--सामवेद और महा वाक्य है--'तत्त्वमसि ' इसके पहले आचार्य हुए--आचार्य हस्तामलक।
(३) आपने दक्षिण में श्रृंगेरी मठ तमिलनाडु में स्थापित किया। इस मठ के क्षेत्र में आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक प्रान्त आते हैं। इस मठ के वेद का केन्द्र है--यजुर्वेद और महावाक्य है-- अहं ब्रह्मास्मि' इसके पहले आचार्य हुए--आचार्य सुरेश्वर।
(४) पूर्व में गोवर्धन मठ की स्थापना उड़ीसा में किया। इस मठ के क्षेत्र में
पश्चिम बंगाल और झारखंड,विहार प्रान्त आते हैं। इस मठ के वेद का केन्द्र है --
ऋगुवेद और महा वाक्य है--'प्रज्ञानं ब्रह्म' इसके पहले आचार्य हुए--आचार्य पद्मपाद। इन मठों के आचार्यों को शंकराचार्य कहते हैं। ये एक स्थान पर न रुककर अपने निर्धारित प्रान्तों में भ्रमण करते रहते हैं। इन मठों के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी दशनामी(सरस्वती, गिरि वन, पर्वत, पुरी, अरण्य, सागर, तीर्थ, आश्रम, भारती उप नाम वाले) व्यवस्था से नियुक्त किए जाते हैं। इनके प्रमुख सामाजिक संगठन का नाम 'अन्तर्राष्ट्रीय
जगदगुरु दशनाम गोसाईं (गोस्वामी) अखाड़ा परिषद' है।
मठों का उद्देश्य--धर्म, संस्कृति, ज्ञान के संरक्षण और प्रसार का कार्य।
दर्शन--वेदान्त दर्शन (उपनिषदों पर आधारित)----
(१) ब्रह्म ही सत्य है ---ब्रह्म सत्य है, जगत असत्य है क्योंकि यह निरन्तर परिवर्तन शील है। ब्रह्म का स्वरूप सत्, चित, आनन्द है। ब्रह्म निर्गुण है, सब आकारों से रहित है। अविद्या (अज्ञान) के कारण हम इसे सगुुण मानते हैं। ब्रह्म
एक ही समय में निर्गुण भी है और सगुण भी। इसी एकरूपता को अद्वैत कहा गया है।
(२) जगत ब्रह्म का विवर्त है---जगत ब्रह्म द्वारा निर्मित है। ब्रह्म जिस शक्ति से इस जगत (ब्रह्माण्ड) की रचना करता है उसे माया कहते हैं। जगत ब्रह्म का विवर्त (तत्व में अतत्व का भान) है। ब्रह्म जगत की रचना क्रीड़ा अथवा लीला के लिए करता है और स्वयं इसमें समाया रहता है।
(३) ब्रह्म और आत्मा एक है---आत्मा (जीव) शुद्ध रूप से चैतन्य और ब्रह्म स्वरूप है। ब्रह्म और आत्मा में भेद नहीं है। इसलिए इसे अद्वैत कहा गया है। ब्रह्म की माया शक्ति के कारण आत्मा ब्रह्म से अलग दिखती है। माया (अज्ञान) के नाश होते ही दोनो एक दिखते हैं।
(४) मानव अनन्त शक्ति एवं ज्ञान का स्रोत है----अज्ञान के कारण मानव अपनी शक्तियों को जान नहीं पाता है, इसलिए वह जीवन-मरण के बन्धन में पड़ा रहता है। जब अपनी शक्तियों को पहचान जाता है तब वह मुक्त हो जाता है।
(५) मानव जीवन का लक्ष्य मुक्ति प्राप्त करना है----सुख- दुख से प्रभावित न होकर तथा सभी प्राणियों में अपने स्वरूप (ब्रह्म) का दर्शन करके मुक्ति प्राप्ति की जा सकती है।
(६) मुक्ति का साधन ज्ञान है---ज्ञान की प्राप्ति ही मुक्ति कहा जाता है। ज्ञान के अभाव में व्यक्ति अज्ञान (अविद्या, माया) के प्रभाव में रहता है। जब जीव को ज्ञान प्राप्त हो जाता है तब वह 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ही ब्रह्म हूँ) ऐसा समझने लगता है।
कुछ अन्य कृतियाँ---
(१) दस श्लोकी (निर्वाण दशक)
न भूमिः न तोयं न तेजो न वायुः न खं
नेन्द्रियं वा न तेषां समूहः। अनेकान्तकत्वात सुषुप्त्येक सिद्धः तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम्।
भावार्थ-- मैं न भूमि, न जल, न अग्नि, न वायु, न आकाश, न इन्द्रियाँ, न इन सबका समूह हूँ। ये सब अस्थिर हैं। सुषुप्ति में अद्वितीय सिद्ध एवं एकमात्र अवशिष्ट शिव है, वही मैं हूँ।
(२) न वर्णा न वर्णाश्रमाचार धर्मा न मे
धारणा ध्यान योगादयोऽपि। अनात्मा श्रयाहं ममाध्यास हानात तदेको ऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम्।
भावार्थ--- मैं न वर्ण , न वर्णाश्रम के चार धर्म, न धारणा, न ध्यान न योगादि हूँ।
अध्यास द्वारा नष्ट हुआ अविद्या से उत्पन्न अहंकार एवं एक मात्र अवशिष्ट
शिव है, वही मैं हूँ।
(३) न माता पिता वा न देवा न लोका
न वेदा न यज्ञा न तीर्थं ब्रवन्ति। सुषुप्तौ
निरस्ताति शून्यात्मकत्वात तदेकोऽवशिष्टःशिवः केवलोऽहम्।
भावार्थ---मैं न माता, न पिता, न देव, न लोक, न वेद, न यज्ञ, न तीर्थ हूँ। सुषुप्ति में निरस्त शून्यात्मक होने से एक मात्र
अवशिष्ट शिव है, वही मैं हूँ।
(४) न सांख्यं न शैवं तत् पांचरात्रं न जैनं न मीमांसकादेर्मतं वा। विशिष्टानुभूत्या विशुद्धात्मकत्वात तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम्।
भावार्थ---मैं न सांख्य, न शैव, न पंचरात्र, न जैन, न मीमांसक हूँ। विशिष्टानुभूति से विशुद्ध एक मात्र अवशिष्ट शिव है, वही मैं हूँ।
(५) न चोर्ध्वं न चाधो न चान्तर्न वाह्यं
न मध्यं न तिर्यं न पूर्वाऽपरादिक। वियद्
व्यापकत्वा दखण्डैकरूपः तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम्।
भावार्थ---मैं न ऊर्ध्व, न अध, न अन्दर, न बाहर, न मध्य, न तिर्यक, न पूर्व, न पश्चिम आदि आकाश के समान व्यापक होने से जो अखण्डरूप एक मात्र अवशिष्ट शिव है, वही मैं हूँ।
(६) न शुक्लं न कृष्णं न रक्तं न पीतं न कुब्जं न पीनं न हृस्वं न दीर्घं। अरूपं तथा ज्योतिराकारकत्वात तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम्।
भावार्थ---मैं न शुक्ल, न कृष्ण, न लाल, न पीला, न टेढ़ा, न सीधा, न छोटा, न बड़ा, जिसका कोई रूप नहीं है, वह जो ज्योति स्वरूप एक मात्र अवशिष्ट शिव है, वही मैं हूँ।
(७) न शास्ता न शास्त्रं न शिष्यो न शिक्षा न चत्वं न चाहं न चायं प्रपंचः।
स्वरूपाव बोधो विकल्पः सहिष्णुः
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम्।
भावार्थ---मैं न गुरु, न शास्त्र, न शिष्य, न शिक्षा, न तुम, न मै और न यह प्रपंच स्वरूप के ज्ञान का असहनीय विकल्प का एकमात्र अवशिष्ट शिव है , वही मैं हूँ।
(८) न जाग्रन न मे स्वप्न को वा सुषुप्तिः
न विश्वो न वा तेजसः प्राज्ञको वा। अविद्यात्मकत्वात त्रयाणां तुरीयः
तदेकोऽवशिष्टःशिवः केवलोऽहम्।
भावार्थ-- मैं न जागरण , न स्वप्न, न सुषुप्ति, न विश्व, न तेजस, न प्राज्ञ इन तीनो अविद्या के अतिरिक्त तुरीय एक मात्र अवशिष्ट शिव है, वही मैं हूँ।
(९) अपिव्यापकत्वात हितत्त्व प्रयोगात
स्वतः सिद्ध भावः दनन्याश्रयत्वात।
जगत तुच्छ मेतत समस्तं तदन्यत्
तदेकोऽवशिष्टः शिवः केवलोऽहम्।
भावार्थ---तत्व व्यापक है यह स्वतः सिद्ध है। यह जगत तुच्छ है। जो स्वतंत्र एक मात्र अविशिष्ट शिव है , वही मैं हूँ।
(१०) न चैकं तदन्यद् द्वितीयं कुतःस्यात
न केवलत्वं न चाकेवलत्वम्। न शून्यं न चाशून्यं द्वैत कत्वात कथं सर्व वेदान्त सिद्धं ब्रवीमि।
भावार्थ--एक नहीं है तो दूसरा कहाँ से होगा ? न एकत्व है और न अनेकत्व है, न शून्य है और अशून्य है। द्वैत कहाँ ?
सब वेदान्तों से यही सिद्ध होता है।
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