------:भगवान शिव:----(४)
---(९)-------:हनुमान अवतार:------------अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तएतै
चिरजीविऩः। सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं
मार्कण्डेयमथाष्टमम्। जीवेद्वर्षतं योनि
सर्व व्याधि विवर्जित।
भावार्थ:---अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृप और परशुराम
ये सात चिरंजीवी(अमर) हैं। ये सात, आठवें मार्कण्डेय को जो नित्य स्मरण करता है, वह सुखी होता है और सब व्याधियों से मुक्त रहता है। इस तरह हनुमान आठ चिरंजीवियों में हैं।
पुञ्जस्थला नाम की एक अप्सरा जो
देवराज इन्द्र की सभा में नृत्य किया करती थी, कौतूहल वश वह पृथ्वी पर आयी और एक नदी के तट पर टहलने लगी। नदी ये तट पर ही ऋषि दुर्वासा
ध्यान में थे। पुञ्जस्थला ने कई बार ऋषि के ऊपर पानी उछाला। ऋषि का
ध्यान टूट गया। ऋषि ने शाप दिया तू वानरों जैसा कौतूहल करती है, तू वानरी बन जाएगी। तभी एक राजकुमार जो आखेट के लिए निकला था, एक हिरन का शिकार किया। घायल हिरन भागता
हुआ ऋषि के आश्रम में छिप गया। राजकुमार भागता हुआ आया और घोड़े पर बैठे ही बैठे पूछा, क्या इधर हिरन आया है ? ऋषि ने कहा, तू यहाँ से चला जा। हम ईश्वर की आराधना करते हैं।
हमारे ईश्वरीय आराधन में व्यवधान मत
डाल। राजकुमार बिना ऋषि के अनुमति के आश्रम में घुस गया। ऋषि
ने राजकुमार को भी शाप दे दिया, तेरा
स्वभाव वानरों जैसा है, तू वानर हो जाएगा। पुञ्जस्थला और राजकुमार दोनो भगवान शिव का तप करने लगे।
भगवान शिव प्रसन्न हुए और पुञ्जस्थला से पूछा, बोलो क्या चाहती
हो ? वह बोली आप जैसा पुत्र चाहिए।
भगवान शिव ने तथास्तु कहा। पुञ्जस्थला अगले जन्म में वानर राज
पुञ्जर के यहाँ जन्मीं। इनका नाम अञ्जना रखा।इसीतरह भगवान शिव प्रसन्न हुए और राजकुमार के सामने भी प्रकट हुए तथा पूछा क्या चाहिए ?राजकुमार ने कहा, प्रभु ! हमें आप जैसा पुत्र चाहिए। भगवान शिव ने तथास्तु कहा। राजकुमार वानर राज वासुकि
के यहाँ जन्म लिए। इनका नाम केसरी रखा। बड़े हुए, तब वानर राज वासुकि ने
अपने पुत्र केसरी का विवाह वानर राज
पुञ्जर की पुत्री अञ्जना से कर दी।
भगवान शिव ने पवन देव को बुलाया
और अपना दिव्यपुञ्ज देते हुए कहा, इसे ले जाकर अञ्जना के गर्भ में आरोपित कर दो। देवपत्र में उस दिव्य
पुञ्ज को लेकर पवन देव चले। राजा
दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए श्रृंगी ऋषि
से पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था। अग्नि देव एक पायस लेकर प्रकट हुए थे, उसमें चरु था। महाराज दशरथ उस चरु को लेकर
स्वयं रानियों को खिलाने महल में जा रहे थे। तभी एक कौवे ने उस चरु का कुछ भाग निकालकर उड़ गया। मार्ग में
कौवे के मुख से कुछ भाग उस देव पत्र
में गिर गया, जिसे पवन देव लेकर जा रहे थे। उस दिव्य पुञ्ज को पवन देव ने माता अञ्जना के कर्ण से अन्दर गर्भ में आरोपित कर दिया, और आकाशवाणी की। ऐ अञ्जना ! तुमने पिछले जन्म में भगवान शिव की तपस्या की थी और उनके जैसे पुत्र की कामना थी। इसलिए तुम्हारे गर्भ में भगवान शिव स्वयं अपने अंश से प्रविष्ट हुए हैं। इस आकाशवाणी
को महाराज केसरी ने भी सुनी। दोनों को खुशी का ठिकाना न रहा। भगवान शिव पवन देव पर प्रसन्न हुए और कहा कुछ माँग लो। पवन देव ने कहा प्रभो ! मैं चाहता हूँ यह बालक मेरा पुत्र कहलाए। आशुतोष भगवान शिव ने तथास्तु कह दिया। समय पर बालक ने जन्म लिया।
हनुमान जी का बालपन:---- हनुमान अभी छोटे ही थे।
एक दिन प्रातः माता अञ्जना अपने बेटे
के खाने के लिए कुछ लेने दूसरे कक्ष में
गयी थीं। बालक बहुत भूखा था। सामने
भगवान अंशुमाली(सूर्य) का आगमन हो रहा था। बालक ने फल समझकर उन्हें अपने मुख में रखना चाहा, इसके लिए लपके। भगवान सूर्य को मुख में रख लिया। भगवान सूर्य को निगलने का अधिकार केवल राहु को प्राप्त था। राहु
भागकर देवराज इन्द्र के पास पहुँचा और कहा, महाराज ! यह अनहोनी कैसे
हो रही है ? सूर्य को कोई और निगल रहा है। इतना सुनकर देवराज इन्द्र वज्र लेकर दौड़े और वज्र का वार कर दिया।
वज्र बालक को लगा और वह मूर्छित होकर गिरने लगा। पवनदेव ने बालक को गोद में ले लिया। पवन देव ने क्रुद्ध होकर वायु के संचरण को ही रोक दिया। इन्द्रदेव आदि ब्रह्मा के पास पहुँचे और सारी घटना का उल्लेख किया। त्रैलोक्य का दम घुटने लगा। ब्रह्मा के साथ सभी देवगण पवन देव के पास पहुँचे और वायु संचरण के लिए आग्रह किए। वज्र से बालक की ठोढ़ी(चिबुक) कट गयी थी। ब्रह्मा ने बालक को नाम दिया:--हनुमान। सभी देवों ने अपनी-अपनी शक्ति देकर हनुमान को अभय और अजेय किया। हनुमान समस्त सिद्धियों से अलंकृत हो गये। पवन देव ने पुनः वायु को संचरित किया। कहते हैं उस कौवे ने वह चरु लाकर अपने मादा कौवे को दिया जिसने काग भुशुण्डि को जन्म दिया।
महाराज केसरी और माता अञ्जना से पाँच पुत्र और हुए:--(१) मतिमान (२) श्रुतिमान(३) केतुमान (४) गतिमान(५) धृतिमान।
हनुमान जी को शाप:-----
हनुमान जी बाल्यकाल में बहुत चञ्चल थे। भगवान शिव के अवतार थे ही, देवताओं ने भी अपनी-अपनी शक्तियों से इन्हें विभूषित कर रखा था, इसलिए हनुमान जी बहुत ऊर्जावान थे। कभी ऋषि-मुनियों के कमण्डल लेकर आसमान में उड़ जाते, कभी उनकी लंगोटी लेकर नदी में घुस जाते। साधना में बहुत बाधा पहुँचाते थे। महाराज केसरी भी हनुमान की उद्दण्डता से व्याकुल थे। ऋषि- मुनियों से परामर्श किया कि हनुमान को कैसे शान्त रखा
जाए ? आपस में निर्णय लिया गया कि इन्हें शाप दे दिया जाए। ऋषियों ने शाप दे दिया कि ऐ हनुमान ! तुम अपनी शक्ति भूल को जाओगे। जब तुम्हें कोई
याद दिलाएगा तब तुम्हें अपनी शक्ति का भान होगा।
हनुमान जी की शिक्षा:-- अब हनुमान जी बहुत गम्भीर हो चुके थे। महाराज केसरी ने हनुमानजी को शिक्षा हेतु भगवान सूर्य के पास भेजा।
भगवान सूर्य ने शिक्षा देने हेतु अपनी सहमति दे दी, परन्तु एक बाधा थी।
भगवान सूर्य ने हनुमान जी से कहा, हनुमान ! मैं दिन रात भागता रहता हूँ।
मेरे लिए रुकना सम्भव नहीं है। हनुमान ने कहा, आपको रुकने की आवश्यकता
नहीं है। हम भी आपके साथ-साथ चलते रहेंगे। इस तरह हनुमान जी की शिक्षा प्रारम्भ हुयी।
हनुमान जी का विवाह:-हनुमान जी की शिक्षा अबाध रूप चल रही थी, तभी एक बाधा आकर खड़ी हो गयी। शिक्षा का कुछ भाग ऐसा भी था,जो विवाहितों
को ही दिया जा सकता था। हनुमान जी
विवाह के पक्ष में नहीं थे परन्तु शिक्षा भी अधूरी नहीं रखना चाहते थे। भगवान सूर्य ने अपनी पुत्री सुवर्चला से विवाह हेतु बात की। सुवर्चला विवाह हेतु तैयार हो गयी। इसतरह हनुमान जी का पहला विवाह सुवर्चला से सम्पन्न हो गया। इसी के साथ आपकी शिक्षा भी
पूरी हो गयी। विवाह के बाद सुवर्चला
तप में लीन हो गयी। हनुमान जी का
एक मंदिर हैदराबाद तेलंगाना के खम्माम जिले में स्थित है जिसमें हनुमान जी के साथ उनकी पत्नी सुवर्चला की भी प्रतिमा स्थापित है। पति-पत्नी में जहाँ मनमुटाव रहता है, यहाँ तक कि तलाक की स्थिति भी आ गयी हो तो ऐसे लोग जब इस मंदिर में आकर दर्शन करते हैं तो इनके परिवार का अनबन समाप्त हो जाता है और प्रेम के साथ रहने लगते हैं। इसतरह पारिवारिक मनमुटाव दूर करने के लिए यह मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। दूर-दूर से
दर्शन करने लोग आते हैं । हैदराबाद से यह मंदिर की दूरी २२० किलोमीटर है। (पराशर संहिता के अनुसार)
हनुमान जी का दूसरा विवाह:---
स्वयंभू कृत पउम चिरउ(पद्म चरित) में पद्म, भगवान श्री राम के लिए आया है।
वरुण देव और रावण में युद्ध होता है।
हनुमान जी वरुण देव की ओर से लड़ते हैं। हनुमान जी ने रावण के सभी पुत्रों को बन्दी बना लिया। रावण हार जाता है। हनुमान जी के रण कौशल पर मोहित होकर रावण अपनी पुत्री अनंग
कुसुमा का विवाह हनुमान जी से कर देता हैं।
हनुमान जी का तीसरा विवाह:-
स्वयंभू कृत परम चिरउ(पद्म चरित) के अनुसार वरुण देव हनुमान जी के रण कौशल से ही युद्ध में रावण से विजयी होते हैं, इसलिए वरुण देव अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह हनुमान जी से कर देते हैं।
हनुमान जी का चौथा विवाह:--
थाईलैण्ड की रामकियेन रामायण
तथा कम्बोडिया की रामकेर रामायण के अनुसार समुद्र पार करने के लिए जब पुल का निर्माण होने लगता है तब उस समय रावण अपनी पुत्री सुवर्णमत्स्या से कहता है कि तुम अपनी मत्स्य सेना को लेकर जाओ, पुल निर्माण हेतु जो पत्थर लाए जाएँ उन्हें हटवा दो। पुल मत बनने दो। सुग्रीव की बन्दर सेना जितने भी पत्थर लाते थे, रात में वे समस्त पत्थर हट जाते थे। हनुमान जी रात में पहरा देने लगे। पत्थर ले जाने वालों का पीछा किया।हनुमान जी की मुलाकात सुवर्णमत्स्या से हुयी। हनुमान जी ने पूछा तुम कौन हो और पुल निर्माण में क्यों बाधा पहुँचाती हो ? उसने बताया, मेरा नाम सुवर्णमत्स्या है। मैं रावण की बेटी हूँ। पुल निर्माण को रोकने का दायित्व पिता ने मुझे दिया है। हनुमान जी के समझाने पर वह बात मान जाती है। कहते हैं सुवर्ण मत्स्या (सुवर्णमच्छा) का हनुमान जी से प्रेम हो गया और इनसे एक बेटा भी हुआ जिसका नाम मैक्चून (मच्छनु) है। थाईलैण्ड में सुवर्णमत्स्या को शुभ मानते हैं और इनका चित्र अपने दूकानों में लगाते हैं। हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी हैं। इन्होंने विवाह किया, मैं इसे नहीं मानता। मेरे जैसे हनुमान भक्त की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए ही तमाम रामायण की रचना हुयी है।
हनुमान जी का भगवान राम से मिलन:-वानरराज सुग्रीव अपने चार सचिवों के
साथ ऋष्यमूक पर्वत पर रहते हैं । हनुमान, नल, नील और ऋक्षराज जामवन्त। कपिराज सुग्रीव ने वहीं पर्वत से पम्पापुर सरोवर पर दो युवकों को देखा। हनुमान जी को पता लगाने के लिए भेजा। हनुमान जी विप्र रूप रख कर आए और पूछा , आप कौन हैं ? और यहाँ किसलिए आए हुए हैं। हम अयोध्या नरेश दशरथ के पुत्र हैं।
पिता की आज्ञा मानकर वन में आए हुए हैं। मेरा नाम राम, ये मेरे छोटे भाई
लक्ष्मण हैं। साथ में मेरी पत्नी सीता भी थीं, जिसे राजा रावण ने हरण कर लिया है। मैं उसी की खोज में यहाँ तक आया हूँ। भगवान राम ने हनुमान से पूछा, हे विप्र ! अबआप मुझे बताएँ आप कौन हैं? मैं किष्किंधापति सुग्रीव का मंत्री हूँ। यहीं ऋष्यमूक पर्वत पर हम रहते हैं।
वहीं चलें। पर्वत ऊँचा है। आप दोनो
हमारे कन्धे पर बैठ जाएँ। हम तत्काल वहाँ पहुँचाते हैं। हनुमान जी ने राम-लखण को कन्धे पर बिठाया और सुग्रीव
के पास लाए।
सुग्रीव और राम की मित्रता:--- पवनसुत हनुमान जी ने परिचय दिया कि ये राम और लक्ष्मण अयोध्या नरेश दशरथ के पुत्र हैं पिता की आज्ञा से वन में आए हुए हैं। चित्रकूट से इनकी पत्नी सीता को रावण ने हरण किया है। सुग्रीव का परिचय देते हुए हनुमान जी ने कहा, ये किष्किंधानरेश बालि के भाई सुग्रीव हैं। बालि ने इनका सब कुछ छीन कर राज्य से भगा दिया है। इनकी पत्नी रूमा को भी छीन लिया है। आप दोनो को एक दूसरे की आवश्यकता है। इसलिए आप दोनो मैत्री कर लें। हनुमान जी ने आग जलायी और अग्नि को साक्षी मानकर सुग्रीव और राम ने एक दूसरे की मदद करने की शपथ ली। सुग्रीव ने बताया कि एक विमान पर एक तरुणी को रोते हुए मैने देखा था। उसने जब हम सबको एक साथ बैठे हुए देखा तब उसने एक पोटली भी नीचे फेंका, जिसे हमने सुरक्षित रख लिया था। हनुमान ! वह पोटली ले आओ। हनुमान पोटली ले आए। पोटली का कपड़ा देखकर राम ने कहा, हाँ। यह सीता का ही है। पोटली खोली, तो नूपुर को देखकर लक्ष्मण ने नूपुर को हाथ में लेकर कहा, हाँ इसे मैं पहचानता हूँ। नित्य प्रातः जब मैं चरण छूता था, तो चरण कमल में इसे देखता था। इसके अतिरिक्त मैंने माता जी का मुख कभी नहीं देखा इसलिए मैं कुण्डल को नहीं पहचान सकता। सुग्रीव ने कहा, सीता जहाँ कहीं भी होगी हम उसे खोज निकालेंगे। लंका को तहस-नहस करके सीता को ले आएँगे। और हे दशरथ नन्दन ! क्या आप मेरा खोया हुआ राज्य दिला देंगे ? क्या आप सचमुच बालि को मारेंगे ? राम ने कहा, हम बालि को एक बाण में मार देंगे, और तुम्हारा खोया हुआ राज्य तुम्हें वापस दिला देंगे, मगर हे किष्किन्धाका नरेश ! यह तो बताओ कि आप बालि से इतना डरते क्यों हैं ? और इन सचिवों के साथ यहाँ क्यों रहते हैं ? वानरराज सुग्रीव बोले, हे दशरथ नन्दन ! बालि बहुत बलशाली है। वह दुश्मन की आधी शक्ति खींचकर दुश्मन को शक्तिहीन बना देता है।
मायावी राक्षस :--- सुग्रीव ने आगे कहा कि एक बार मायावी नाम का राक्षस आकर बालि को लड़ने के लिए उकसाया। बालि ने मायावी को खदेड़ा। मायावी भागकर एक गुफा में छिप गया। मैं भी बालि के साथ था। बालि ने कहा, तुम मेरी यहीं प्रतीक्षा करना। इतना कहकर बालि भी उस गुफा में घुस गया। मैं बालि की एक महीने तक प्रतीक्षा करता रहा। तभी गुफा के अन्दर से बहता हुआ रक्त बाहर निकला। मैने समझा बालि को मायावी ने मार दिया। मैं डर गया। एक बड़ा पत्थर खिसका कर गुफा का मुँह बन्द कर दिया और वहाँ से दुखी मन से लौटकर किष्किन्धा आ गया। यहाँ सचिवों ने मुझे सिंहासन पर बिठा दिया जबकि मैं सिंहासन पर बैठना नहीं चाहता था। बालि मायावी को मार कर बाहर आया। मुख पर पत्थर देखकर उसने मुझे बहुत पुकारा। फिर वह पत्थर को किसी प्रकार से तोड़कर बाहर निकला । यद्यपि वह मुझे बहुत प्यार करता था। परन्तु मुझे बाहर न देखकर वह मुझ पर बहुत क्रोधित हुआ। वह किष्किन्धा आया। मुझे सिंहासन पर बैठा देखकर वह सीधे मेरे पास आया और मुझे नीचे ढकेल दिया और कहा तुम लौटकर किष्किन्धा मत आना। उसने मेरी पत्नी रूमा को भी मुझसे छीन लिया। मैं अपने सचिवों के साथ भागकर यहाँ आ गया।
सुग्रीव की शंका का निवारण:--- सुग्रीव ने आगे बताया कि एक दुन्दुभि नाम का एक राक्षस था। उसका मुख भैंसा जैसा था। वह वर के कारण एक हज़ार हाथी का बल रखता था। वह बहुत बलशाली था। वह पहले सागर के पास गया और कहा, हम तुमसे लड़ना चाहते हैं। सागर ने कहा, मेरे पास इतना सामर्थ्य नहीं है, कि मैं तुमसे लड़ सकुूँ । मुझसे से बड़ा हिमालय है, उसके पास जाओ। वह हिमालय के पास गया और कहा , हम तुमसे लड़ना चाहते हैं। हिमालय ने कहा, मेरे पास इतनी सामर्थ्य नहीं है कि मैं तुमसे लड़ सकूँ। तुम बालि के पास जाओ। वह हमसे अधिक बल रखता है। वह बालि के पास गया और कहा, हम तुमसे लड़ना चाहते हैं, बालि ने कहा, भाग जाओ, अन्यथा मारे जाओगे। उसने कहा, मैं समझ गया कि तुम ऐसा क्यों कहते
हो ? क्योंकि तुझमें मुझसे लड़ने की शक्ति नहीं है। बालि ने उसे उठाकर फेंका, वह दूर जाकर गिरा और रक्त वमन करने लगा। उसे होश आया, तब वह फिर आकर भिड़ा। बालि ने उस महिषासुर की हड्डी पसली तोड़ डाली। वह मर गया तब उसे उठाकर फेंक दिया, जो एक योजन दूर पर गिरा। यहीं मतंग ऋषि साधना करते थे। जब उस महिषासुर की रक्त छींट मतंग ऋषि पर पड़ी तो मतंग ऋषि ने श्राप दे दिया, ऐ बालि ! जब तू इस पर्वत पर आएगा तब तू अवश्य मरेगा। हम सब इसीलिए इस पर्वत पर रहते हैं,यह पर्वत पूरी तरह बालि से सुरक्षित है। उस महिषासुर का
भयानक शव अभी यहीं निकट में पड़ा है, हे राम ! आप मेरे साथ चलें। आप उसे देखेंगे तो आपको एक अनुमान हो
जाएगा कि बालि कितना बलशाली है।
राम के साथ सुग्रीव आदि सब वहाँ पहुँच गए जहाँ पर उस महिषासुर दुंदुभि
का शव पड़ा हुआ था। भगवान राम ने अपने पैर के अँगूठे से उस शव को उछाल दिया जो दस योजन दूर जाकर गिरा। सभी वाह-वाह करने लगे। सुग्रीव
ने कहा, मुझे विश्वास हो गया है कि बालि प्रभु राम के हाथों मारा जाएगा।
सुग्रीव भगवान राम को वहाँ ले गया, जहाँ साल के सात पेड़ एक सीध में लगे थे। कहा, भगवन् इन्हें एक बाण से आप
बींधने का कष्ट करें। वहाँ एक जनश्रुति
थी कि जो एक बाण से इन सातों साल के पेड़ों को बींधेगा, वही बालि को मारे गा, इसीलिए सुग्रीव भगवान राम को वहाँ लाया था, और एक बाण में उन्हें बींधने के लिए कहा था। भगवान राम ने
एक बाण चलाया, वह सातों पेड़ों को
बींधकर वापस तरकश में आ गया।
सुग्रीव ने राम से कहा, प्रभु मुझमें अब
संशय नहीं रहा। आप स्वयं परमेश्वर हैं।
यह सीता हरण, वन गमन यह सब आपकी लीला का एक अंश है। आपकी
इस लीला में मेरी भी एक भूमिका निश्चित है इसीलिए आप मुझ तकआए। बालि बध:---
सुग्रीव से भगवान राम ने कहा, चलो मित्र पहले आप बालि से भिड़ो, बालि और सुग्रीव दोनो भिड़ गए। सुग्रीव गले में पुष्पमाल पहने हुए था।भगवान पेड़ के पीछे छिपे हुए थे। अवसर पाकर प्रभो राम ने एक बाण चला दिया जिससे घायल होकर वह भूमि पर गिर पड़ा। सामने प्रभु राम, लखण खड़े थे। बालिबोला, मैने आपके साथ क्या अपराध किया था ? जो छिपकर आपने मेरा प्राण ले लिया। प्रभो ! आप तो करुणाकर हैं। सबसे बराबर नेह रखते हैं। पृथ्वी का भार हटाने के लिए आपने
अवतार लिया है, फिर आपने मुझे इस तरह मारकर अपना उपहास क्यों कराया है ?अगर आप मुझसे कहते तो एक दिन में मैं सीता को ला देता और रावण को भी उठवा कर आपके सामने प्रस्तुत कर देता। भगवान राम बोले, हे वाली ? जब मनुष्य में अहंकार का मद चढ़ता है, तब मृत्यु के साथ यह उतरता है। वह केवल अपना ही धुनता है दूसरे कि नहीं सुनता। तेरा भाई मायावी के डर से भाग कर आया था। उसे राज्य नहीं चाहिए था। उसे ज़बरदस्ती सिंहासन पर बैठाया गया था। वह इस बात को आपसे कहना चाहता था मगर आपने सुना ही नहीं। उसे आपने भगा दिया, उसकी पत्नी रूमा को भी छीन लिया। आज जब मृत्यु सामने है तब आपका अहंकार समाप्त हुआ है और अच्छे और बुरे का ज्ञान हुआ है। हम तो केवल सुग्रीव को न्याय दिलाने किष्किंधा में आए हैं।
प्रभो मुझे क्षमा करें, इतना कहकर बालि
ने इस धरती को छोड़ दिया। सुग्रीव राजा बने और बालि पुत्र अंगद युवराज। सीता की खोज:---
सुग्रीव ने वानरों को एकत्रित होने का आदेश दिया। करोड़ो वानर किष्किंधा में आ गए। वीर शतबली के नेतृत्व में उत्तर की ओर, वीर विनय के नेतृत्व में पूर्व की ओर, वीर सुषेण के नेतृत्व में पश्चिम
की ओर तथा युवराज अंगद के नेतृत्व में
दक्षिण की ओर वानरों की सेना लेकर
सीता की खोज के लिए जाने का आदेश
किष्किंधा नरेश सुग्रीव का मिला। सुग्रीव ने हनुमान को बुलाकर कहा, तुम अंगद के साथ जाओगे और रावण ने सीता को
जहाँ भी छुपा कर रखा हो, पता लगाकर सीता से तुम मिलकर आओगे।
प्रभु राम ने अपनी मुद्रिका देकर कहा, हवुमान ! इसे साथ में रखना, जब सीता इसे देखेगी तब तुम्हें पहचानेगी। अंगद सेना ने विन्ध्याचल पर्वत के हर एक गुफा को छान डाला। सीता नहीं मिलीं। वानर भूखे प्यासे थे। सामने कुछ पक्षी दिखायी दिए। हनुमान जी ने बन्दरों से
कहा, चलो उधर ही चलो जिधर पक्षी उड़ते हुए दिखायी देते हैं। जब वहाँ पहुँचे तो देखा एक गुफा थी जिसका द्वार लताओं से घिरा हुआ था। आगे-आगे हनुमान चले पीछे-पीछे वानर सेना चली। गुफा लम्बी थी। गुफा पार की तो
देखा सामने एक बगीचा था। बड़े-बड़े
भवन बने हुए थे। इसके अन्दर गलीचा
बिछा हुआ था। सामने एक पलंंग पर एक योगिनी बैठी थी। रौद्र रूप था।
हनुमान जी ने पूछा, मैया आप कौन हैं ?
यह सुन्दर जगह किसकी है ? वह बोली,
विश्वकर्मा की पुत्री हेमा इस सुन्दर नगरी
की स्वामिनी है। मैं गन्धर्व दिव्य की पुत्री
स्वयंप्रभा हूँ तथा हेमा की सहेली हूँ। हेमा यह दायित्व मुझे देकर ब्रह्म लोक
चली गयी कि त्रेता युग में अयोध्या नरेश दशरथ के पुत्र राम, लखण तथा उनकी पुत्रबधू सीता वन में आएँगे, सीता को लंका का राजा रावण हरण करके लंका ले जाएगा। सीता की खोज में भूखी- प्यासी वानर सेना यहाँ आएगी। तुम उन्हें जलपान कराना तथा सागर तट पर पहुँचा कर यह राम काज कर लेना। मुझे
मुक्ति की चाहत थी, इसलिए मैं यहाँ रुकी रह गयी। यहाँ के दिव्य फलों को
खाने से तथा यहाँ के सरोवर का जल पीने से फिर जीवन भर भूख-प्यास नहीं
लगती है। तुम सब जाओ पेट भरकर फल खाओ और सरोवर में जल पीकर
अपनी प्यास बुझाओ। अंगद की वानर सेना के वानर पेड़ों पर चढ़ गए और भर पेट फल खाए तथा सरोवर में जाकर ठंडा पानी पिए। मारुत नन्दन हनुमान जी स्वयंप्रभा के पास आए और कहा, मैया ! अब मुझे सागर के तट पर पहुँचाइए। स्वयं प्रभा बोली, तुम सब अपनी-अपनी आँखें बन्द करो। सबके सब सागर तट पर पहुँच जाओगे। वहाँ
पहुँच कर अपनी आँखें खोलना। सबने
ऐसा ही किया औरू सबके सब विशाल सागर के तट पर थे। मारुति ने सोचा ! जिस कार्य के लिए हम आए थे, वह कार्य तो अभी तक हुआ नहीं। अंगद बोले, हे मारुति ! हम से भला तो जटायु था, जिसने भगवान राम के कार्य के लिए अपना प्राण दे दिया। सम्पाती ने
जटायु का नाम सुना तो वह बाहर आया, जो गिरि महेन्द्र की एक गुफा में रहता था, उसने कहा, मेरा नाम सम्पाती है जटायु मेरा छोटा भाई था। अब आप मुझे बताएँ कि मेरा भाई रावण से क्यों
लड़ा था ? और आप लोग कहाँ जा रहे हैं ? महावीर हनुमान ने सम्पाती से हर
घटना का बयान किया। सम्पाती ने कहा, यहाँ से सौ योजन दूर त्रिकूट पर
लंका द्वीप बसा हुआ है, वहाँ एक सुन्दर
अशोक वाटिका है जिसमें एक शीशम पेंड़ के नीचे एक नारी बैठी हुयी है। वहाँ कुछ और भी नारियाँ हैं। वे आपस में बात कर रहीं हैं। मैं गीध हूँ, मुझे बहुत दूर तक दिखाई देता है। वे आपस में क्या बातें कर रही हैं ? वह मैं नहीं सुन पा रहा हूँ। वह नारी सीता ही है, ऐसा मुझे प्रतीत होता है। जो सौ योजन का यह समुद्र लाँघ सकता है, वह जाकर सीता से मिल कर सारी जानकारी ला सकता है। मेरे पंख जले हुए हैं, अन्यथा मैं जाता और माता सीता से मिलकर, सम्पूर्ण जानकारी लेकर वापस आ जाता।
हनुमान जी का लंका गमन:----
जामवन्त ने कहा, हे मरुत नन्दन ! तुम मरुत देव के मानस पुत्र हो। तुम बहुत
वीर और बलशाली हो। तुम मरुत वेग से उड़ सकते हो। तुम से रण में कोई नहीं जीत सकता। तुम्हारी भुजाओं में गरुड़ पंख की शक्ति समाहित है। जब तुम अपना आकार बढ़ाओगे तब अम्बर छोटा पड़ जाएगा। जब तुम अपना कदम बढ़ाओगे तब सिन्धु संकुचित हो
जाएगा। हनुमान उठे। सिन्धु देव को नमन किया, और महेन्द्र पर्वत से छलाँग लगा दी। सिन्धु फाड़कर मैनाक पर्वत ऊपर आया और कहा, हे मरुत नन्दन !
थोड़ा विश्राम कर लीजिए। मारुति बोले, हे गिरिवर ! मुझे भगवान राम के कार्य सम्पन्न होने के पूर्व विश्राम कहाँ। मार्ग में नागों की माता सुरसा राक्षसी के रूप में मिलीं। सुरसा ने कहा, मैं बहुत भूखी हूँ। तुम मेरे मुख में आ जाओ। हनुमान जी ने कहा, मुझे जाने दो। मैं भगवान राम के कार्य के लिए जा रहा हूँ। मुझे शीघ्र ही लौटना है। सुरसा बोली, ऐ वानर ! मैं तुझे नहीं जाने दूँगी। उसने मुख फैलाया कि मैं तुझे अभी खा लूँगी।
हनुमान जी ने भी अपना रूप बनाया। उसने अपना रूप और बढ़ा लिया।हनुमान जी ने अपना रूप बहुत छोटा
बनाकर उसके मुख में घुस गए और बाहर भी निकल आए। मारुति बोले, हे माता ! मैने आपकी आज्ञा का पालन कर लिया है। आपने मुख में आने का आदेश दिया था, मैने आपके मुख की
फेरी कर ली है। आप मुझे क्षमा करें मुझे सीता का दर्शन करके शीघ्र ही लौटना है। सुरसा ने अपना रूप बदला
और कहा, मै नागों की माता सुरसा हूँ।
देवताओं ने परीक्षा लेने हेतु भेजा था।
ऐ हनुमान ! तुम बहुत बुद्धिमान, वाकपटु, और बलशाली हो। जाओ ! प्रभु का कार्य सम्पन्न करो। थोड़ी ही दूर
बढ़े थे तभी कोई शक्ति उन्हें नीचे की ओर खींचने लगी। सिंहिका नाम एक निश्चरी समुद्र तल पर लेटी रहती थी।
जब किसी जीव की छाया समुद्र में पड़ती थी, तब वह उसे खींचकर उसे खा लेती थी। हनुमान जी को भी उसने निगल लिया। हनुमान जी उसका पेट फाड़कर बाहर निकल लिए। वह राक्षसी
मर गयी।
हनुमान जी का लंका में प्रवेश:---
हनुमान जी ने त्रिकूट पर पहुँचकर एक गहरी सांस ली। मारुति ने देखा लंका में
बड़े-बड़े सुन्दर भवन बने हुए थे। उसके
चारो ओर ऊँची भीति बनी हुयी थी। यह
नगरी चारो ओर से समुद्र से घिरी हुयी थी। मारुति ने सोचा ! दिन में चलना ठीक नहीं है। रात्रि हुयी पर आसमान में
पूर्ण चन्द्र खिला हुआ था। ऊँचे भवनों से वेदों की ध्वनि सुनायी पड़ती थी। हनुमान जी ने छोटा रूप बनाया और छिपकर मार्ग पार करना चाहा, तभी लंकिनी सामने आ गयी। वह बोली, अरे
वानर ! तुम अन्दर कैसे आ गए ? और एक थप्पड़ हनुमान जी को मारा। हनुमान जी ने उसे एक घूसा लगाया। वह वहीं अचेत होकर गिर पड़ी। जब होश आया तो उसे एक घटना याद आयी। उसने हनुमान जी को बताया, ऐ वानर ! ब्रह्मा ने मुझे बताया था, कि जब
वानर आकर तुम्हें मारेगा तब समझ लेना कि रावण मारा जाएगा। उसने पूछा, क्या तुम पवन पुत्र हनुमान हो ?
हनुमान जी बोले, हाँ मैं हनुमान हूँ।उसने कहा, जाओ सीता अशोक वाटिका में बन्दी है, उनसे मिलो और राम से कह देना कि पुल बाँधकर शीघ्र आ जाएँ। रावण निश्चित मारा जाएगा। इतना बताकर वह राम-राम कहती हुयी ब्रह्मलोक चली गयी। हनुमान जी ने सोचा, आश्चर्य ! होनी की रचना पहले ही बनी हुयी है, फिर मुझमें इतनी व्याकुलता क्यों ? विचारों को एक मोड़ देते हुए हनुमान ने आगे सोचा, सम्पाती भी अशोक वाटिका की बात करता था। हनुमान जी अशोक वाटिका में :---- हनुमान जी ने लघु रूप बनाकर सारी लंका का भ्रमण किया। फिर विचार किया कि अब अशोक वाटिका में चलना चाहिए और वहीं किसी पेंड़ पर बैठकर विश्राम करना चाहिए। हनुमान
जी अशोक वाटिका में आ गए।
प्रातः हुआ, तब हनुमान जी ने देखा कि यह बहुत रमणीक उपवन है। इसमें एक रमणीक सरोवर है जिसमें कमल खिले हुए हैं और इसमें एक झरना गिरता है। रंग-बिरंगे पक्षी इसमें कलरव कर रहे हैं। एक शीशम पेंड़ के नीचे एक चबूतरा बना हुआ था जिस पर राक्षसियाँ बैठी हुयी थीं। वहीं एक तृण के आसन पर एक मानवी लेटी थी। लगता था यही जनक की बेटी सीता हैं। तभी वहाँ पर रावण आया। साथ में उसके महारानी मन्दोदरी भी थीं। कई दासियाँ भी थीं। आहट पाकर सीता उठ पड़ीं। रावण अकड़कर बोला, हम दो मास की अवधि तुम्हें देते हैं। तुम रक्ष धर्म स्वीकार कर लो, अन्यथा मुझे बल प्रयोग करना पड़ेगा। सीता तृण की ओट रख कर बोली। रावण ! तू राम से डरता है। तू राम का सामना कभी नहीं कर सकता। जिस दिन तू राम के सन्मुख आएगा उसी दिन तू मारा जाएगा। रावण क्रोधित होकर म्यान से खड्ग निकाला, जिसे मन्दोदरी ने रोक लिया। लंकेश वहाँ से लौट पड़ा। कई मास से सीता बन्दीगृह के कष्टों को झेल रही थी। सीता ने सोचा !राम-लखण यहाँ नहीं आ पाएँगे। एक दिन ये राक्षस मुझे मार कर खा जाएँगे। अब अच्छा यही होगा, मुझे मर जाना चाहिए। सीता उठीं। अपने खुले हुए केशों को झुकी हुयी डाल में बाँधने का यत्न करने लगीं। हनुमान जी ने अच्छा अवसर देखा। वह राम कथा सुनाने लगे:--राम-लक्ष्मण, भरत-शत्रुहन राजा दशरथ के घर में जन्म लिए। पिता की आज्ञा से राम-लक्ष्मण और सीता वन में आए। रावण पञ्चवटी में जाकर राम की पत्नी सीता का हरण करके लंका ले आया। गीधराज जटायु ने रावण का
विरोध किया। रावण ने जटायु के पंख काटकर घायल कर दिया। इन्होंने राम को सीता हरण का समाचार दिया। राम-लखण किष्किन्धा आए। यहाँ सुग्रीव से मित्रता की। सुग्रीव के भाई बालि का बध किया और सुग्रीव को किष्किन्धा का राजा बना दिया। सुग्रीव ने आज्ञा देकर सब वानरों को बुला लिया। सभी
दिशाओं में सीता की खोज के लिए वानरों को भेजा। उन्हीं वानरों में एक वानर मैं भी हूँ। मुझे हनुमान कहते हैं।
मैं भगवान राम की व्यथा लेकर आया हूँ। भगवान राम की कथा सुनकर सीता ने कहा, तुम कौन हो ? सामने आओ।
हनुमान छोटे बन्दर का रूप रखकर नीचे आए और कहा हे माते ! मैने ही राम कथा सुनायी है। मैं नृप सुग्रीव का मंत्री हूँ। भगवान राम ने मुझे यह मान दिया कि जाकर सीता का समाचार लेकर आओ। सीता बोलीं, लंका के निशाचर भिन्न-भिन्न रूप रखकर आते हैं, और हमें भ्रमित करते रहते रहते हैं। हनुमान जी ने कहा, हे माते ! हम भगवान राम की कृपा से सौ योजन का समुद्र लाँघकर आए हैं। भगवान राम ने
यह मुद्रिका आपको देने के लिए दी है।कहा था इसे दे देना, तब वह तुम्हें पहचानेगी। मुद्रिका लेकर सीता ने उसे
अपनी आँखों से लगाया। आँखों से बहते हुए आँसुओं को पोंछते हुए प्रभु राम का हाल पूछा। मारुति ने प्रभु राम का समाचार बताते हुए कहा, माते ! मैने आपका समाचार सुन लिया और जान भी लिया। हे माते ! आप धैर्य धारण करें। प्रभु राम शीघ्र आएँगे और रावण का वध करके आपको ले जाएँगे। आप मुझे कोई चिन्ह दीजिए जिसे दिखाकर
हम भगवान राम को विश्वास दिलाएँ कि हम आपसे मिलकर आए हैं। सीता ने
चूड़ामणि उतार कर हनुमान जी को दिया, और जयन्त की घटना भी बतायी। आगे कहा, हे वत्स ! प्रभु को
अवधि बीतने के पहले आने के लिए मना लेना और यह कहते हुए शंका भी व्यक्त की। कहा, हे हनुमान ! रावण की सेना बहुत भयानक है इनसे बन्दर कैसे लड़ पाएँगे ? हनुमान ने मन ही मन में सोचा, माते को शंका है, इस शंका को
मिटाने के लिए कुछ करना चाहिए।
सीता का शंका निवारण:---
हनुमान ने कहा माते ! मुझे बहुत भूख लगी है। यहाँ पेड़ों पर फल लगे हुए हैं,
यदि आपका आदेश पाऊँ तो इन फलों से अपना पेट भर लूँ। सीता का आदेश मिलते ही हनुमान जी पेड़ो को उखाड़ कर पूरी वाटिका को तहस -नहस कर डाला। वन रक्षक महल में गए और कहा, एक वानर आया है जिसने बाग को उजाड़ दिया है। रावण ने दस लाख रक्षकों को एक साथ भेज दिया जिन्होंने पूरी वाटिका को घेर लिया। मारुति ने अपनी गदा से सबको पीस डाला। अपने दस लाख भृत्यों का मरण सुनकर
रावण घबड़ाया और जाम्बमाली को सेना के साथ भेजा। सेना सहित जाम्बमाली को हनुमान जी ने मार दिया। पाँच बहादुर सेनापतियों के साथ
सेना को भेजा। हनुमान जी के सामने ये
भी नहीं टिक पाए और सबके सब मारे गए। अब रावण सुत अक्षय कुमार सेना के साथ आया। अक्षय कुमार भी मारा गया। इन्द्रजीत आया और ब्रह्मास्त्र चलाकर हनुमान जी को बाँध लिया। इस अस्त्र का प्रभाव मात्र एक मुहूर्त तक हनुमान जी पर रहना था। रावण
के सामने लाकर मजबूत रस्से से एक
खम्भे से बाँध दिया। रावण ने हनुमान जी से पूछा, कहो तुम कहाँ से आए हो ?
और यहाँ क्या करने आए हो ? हनुमान जी बोले, मेरा नाम हनुमान है। हम सीता
की खोज में यहाँ आए हैं। सीता की खोज में चारो ओर वानरों को नृप सुग्रीव
ने भेजा है। बालि को मारकर प्रभु राम ने सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाया है। राम और सुग्रीव ने आपस में मित्रता कर ली है। हे रावण ! जब एक दिन प्रभु
राम की वानर सेना लंका में घुस आएगी
तब सोचो तुम्हारी लंका कैसे बच
पाएगी ? हम एक राजा के दूत हैं। हम तुम्हें यह सीख देते हैं कि तुम सीता को लौटाकरप्रभु राम से क्षमा माँग लो, वे तुम्हें क्षमा कर देंगे।
लंका जलकर खाक हुयी:---- रावण क्रोधित होकर बोला, इसे मार दो। विभीषण ने खड़े होकर कहा, यह दूत है, इसे नहीं मारा जा सकता। इसे अंगहीन किया जा सकता है। रावण बोला, वानर का प्रधान अंग पूँछ है। इसे
जला दो और पूरे नगर में घुमाकर भगा दो। हनुमान जी ने पूँछ बढ़ा दी। भटों ने
नये पुराने कपड़े बाँधकर तेल डाला और आग लगा दी। रस्से में बाँधकर नगर के गलियों में घुमाने लगे। सीता ने जब यह
सुना तो अग्निदेव से ठंढे होने हेतु प्रार्थना की। हनुमान जी ने सोचा, पूँछ में
आग लगाकर इन्होंने पूरे नगर में घुमाया है। सबने बहुत हँसी उड़ाई है। कुछ और करना चाहिए। अपना रूप छोटा किया। रस्सा की पकड़ ढीली हुयी, तब हनुमान जी ने रस्सा को हटा दिया और पर्वताकार होकर एक भवन पर चढ़ गए। वह भवन धू-धू करके जलने लगा।
अब एक भवन से कूदकर दूसरे भवन पर, दूसरे से तीसरे पर इस तरह पूरी लंका में आग लगा दी। मारुति से शनि
बोले, इसतरह से सोने की लंका जलकर और चमक जाएगी। रावण ने मुझे उलटा बाँध रखा है, मुझे सीधा कर दो।
जब मेरी सीधी दृष्टि इस पर पड़ेगी, तब सोना कस्कुट हो जाएगा। हनुमान ने शनि की गाँठ खोल दी। सोने की लंका कस्कुट की बन गयी। और इसमें रखा
सारा सामान जलकर खाक हो गया। हनुमान जी ने समुद्र में कूदकर अपनी पूँछ बुझाई। सीता जी की वाटिका हरी-
भरी थी। आग का प्रभाव इस वाटिका
पर नहीं पड़ा था।
हनुमान जी सीता जी के पास आकर बोले, माते आदेश दीजिए ! अब मैं जाऊँ। हे मारुति ! मेरे शंका का निवारण हो गया। रावण को मारने की क्षमता तुम अकेले रखते हो। मारुति सीता से आदेश लेकर अनिष्ट पर्वत पर आए और वहाँ से छलाँग लगाकर महेन्द्र पर्वत पर आकर उतर लिए। इधर अंगद आदि इकट्ठे हुए तब हनुमान जी ने वह सब कुछ बताया जो लंका में घटा था।
जाम्बवन्त ने कहा, हे मारुति ! चलो ! अब शीघ्र चलो ! राम और किष्किन्धा पति वहाँ व्यथित होंगे। हनुमान और अंगद की सेना वहाँ आई जहाँ प्रभु राम
और सुग्रीव बैठे थे। हनुमान जी ने सारी
घटना का उल़्लेख किया। प्रभू राम ने कहा, हनुमान ! तुमने वह कार्य किया है
जो किसी से सम्भव नहीं था। इतना कहकर सीने से लगा लिया। हनुमान जी ने चूड़ामणि निकालकर प्रभु राम को दिया।
लंका कूच:--नृप सुग्रीव ने वानरों को आदेश दिया कि सबको मलयाचल को पार करके महेन्द्र गिरि पर पहुँचना है। रात-दिन चलना है। हनुमान जी से कहा, तुम राम को कन्धे पर बिठाओ।अंगद से कहा, तुम लक्ष्मण को कन्धे पर बिठाओ और महेन्द्र गिरि की ओर कूच करो। सभी वानरों को रास्ते में खाते-पीते साथ में चलना है। इसतरह नृप सुग्रीव की सेना महेन्द्र पर्वत पर आकर रुकी। रावण ने अपने भाई विभीषण का तिरस्कार किया तो विभीषण भगवान राम की शरण में आ गए। भगवान राम ने नृप सुग्रीव से कहा, सिन्धु पार करने के लिए सेतु बाँधना होगा। सिन्धु देव ने राम से कहा, प्रभु ! विश्वकर्मा के पुत्र नल जिस पत्थर को स्पर्श करेंगे वह पत्थर जल में नहीं डूबेगा।
शिवलिंगकी स्थापना:---मारुति ने राम
से कहा, प्रभु ! रावण को मारना कठिन है क्योंकि वह भगवान शिव का भक्त है।
इसलिए समुद्र पार करने के पहले हमें
भगवान शिव की पूजा करना चाहिए।
भगवान राम ने हनुमान से पूछा, पूजन कराने हेतु यहाँ पंडित कहाँ उपलब्ध होंगे ?हनुमान जी ने कहा, रावण से बड़ा
पंडित कौन है ? भगवान राम ने कहा, जाओ, रावण से कह देना कि शिव का पूजन करवाने के बदले में वह जो दक्षिणा माँगेगा, वह मिलेगा, परन्तु जो भी पूजनके लिए आवश्यक होगा, वह
अपने साथ लेकर आएगा। छद्मवेश में
हनुमान जी लंका जाकर रावण से मिले और भगवान राम का संदेशा कहा, रावण ने कहा, हम पूजन कराने आएँगे।
हनुमान जी ने आकर भगवान राम से
कहा, रावण आएगा। भगवान राम ने हनुमान जी से कहा, हनुमान ! जाओ !शिव पर्वत से शिवलिंग लेकर आओ।
हनुमान जी शिवलिंग लेने हेतु चल दिए।
कहते हैं, ठीक समय पर रावण सीता को लेकर आया, और रेत का लिंग बनाकर शिव का पूजन करा दिया। राम ने रावण से कहा, आपने ठीक प्रकार से
पूजन करा दिया, बोलो दक्षिणा क्या चाहिए ? रावण ने कहा, मैं जिस तरह से इस जग में मान से जिया हूँ, उसी तरह मान से मरना चाहता हूँ। भगवान रामने कहा, ऐसा ही होगा। रावण सीता को लेकर चला गया। हनुमान जी शिव लिंग लेकर आए, परन्तु विलम्ब हो चुका था। हनुमान जी समय पर नहीं आ पाए थे, इसके कारण मन भारी था। भगवान राम ने कहा, इस शिव लिंग को भी यहीं प्रतिष्ठित करो। भगवान राम ने शिवलिंग को नमन किया और कहा, इन दोनो लिंगो की पूजा की जाएगी। भगवान राम के यह वचन सुनकर हनुमान जी
मुस्कराए। पाँच दिनो में ही सौ योजन का पुल बनकर तैयार हो गया। सारी सेना उस पार हुयी और सुवेल पर्वत पर वानर सेना ने अपना पड़ाव डाला।
लक्ष्मण पर मय शक्ति का प्रयोग:---- वानर एवं राक्षसों का युद्ध आरम्भ हो गया। लक्ष्मण ने रावण के बली पुत्र अधिकाय का वध कर दिया। रावण स्वयं लड़ने आया। रावण ने देखा, कि उसका भाई विभीषण गदा लिए खड़ा है। उसने मय शक्ति चला दी। लक्ष्मण ने यह सोचकर कि भइया ने इन्हे अभय दिया है, तुरंत विभीषण को पीछे करके उस शक्ति को स्वयं रोक लिया। लक्ष्मण मूर्छित होकर गिर पड़े।
रावण ने उठाने का बहुत प्रयत्न कि़या परन्तु लक्ष्मण को उठा न सका। मारुति ने उछलकर रावण के सीने पर एक मूका मारा, वह भू पर बैठ गया और उसके मुख से रक्त की धार बह निकली। वह उठकर रथ पर गया और बाणों से हनुमान जी को बींध दिया। प्रभो राम ने मारुति को घायल देखा तब स्वयं राम रावण से युद्ध करने आ गए। रावण का रथ, मुकुट, क्षत्र, ध्वज, धनुष, पताका सब कुछ नष्ट कर दिया, और एक बाण
चलाकर रावण को भी बेसुध कर दिया।
सारथी ने दूसरे रथ को मँगवाकर रावण
को लिटाया और महल की ओर लेकर चला गया। लक्ष्मण को भी अंगद उठाकर शिविर में ले आए। विभीषण ने कहा, लंका में एक सुषेण वैद्य रहते हैं, यदि वह आ जाएँ तो लक्ष्मण का प्राण बच सकता है। मारुति बोले, वह कहाँ रहता है ? लंकापति विभीषण ने वह जगह बता दी। मारुति उसको घर सहित उठा लाए। उसने नाड़ी देखी और कहा,
ये बच तो सकते हैं मगर वह औषधि मेरे पास नहीं है। वह द्रोणाचल पर मिलेगी।
पवनपुत्र ने भगवान राम से कहा, मैं द्रोणाचल को जाता हूँ और वह बूटी लेकर समय के अन्दर आ जाऊँगा।
हनुमान का बूटी लाना:---+
हनुमान बूटी लाने चल पड़े। जब रावण ने सुना कि हनुमान बूटी लाने जा रहे हैं तो वह कालनेमि के पास पहुँचा और कहा, तुरत जाओ और मार्ग में हनुमान को भ्रमित करो। मारुति ने देखा कि सुन्दर आश्रम है। वहीं एक स्वच्छ जल
से भरा हुआ एक सरोवर है जगह-जगह
ऋषि मुनि बैठे राम-राम जप रहे हैं। वहीं
तुलसी की माला लिए हुए पीत वस्त्र में एक दिव्य पुरुष सुन्दर आसन पर बैठा है। राम नाम की ध्वनि आकाश मण्डल में साफ सुनायी दे रही थी। हनुमान जी
कालनेमि के इंद्रजाल में फँस गए। महावीर हनुमान नीचे उतरकर कालनेमि के पास आए और हाथ जोड़कर प्रणाम् किया। उसने आशीर्वाद दिया और कहा, हे पवनसुत ! मुझे भूत-भविष्य सब दिखता है। लक्ष्मण को होश आ गया है।
वहाँ का वातावरण सब राममय और
लक्ष्मणमय है। सब खुशियाँ मना रहे हैं।
द्रोणाचल जाने का अब कोई प्रयोजन नहीं बचा। इस सरोवर में स्नान करके आओ, दीक्षा लो। फिर पेड़ों पर मीठे -मीठे फल लगे हुए हैं, उन्हें खाकर अपनी क्षुधा मिटाओ। हनुमान स्नान करने सरोवर में गए। तभी मारुति का एक पैर पकड़कर एक मकड़ी ने निगलना प्रारम्भ किया। हनुमान ने उस मकड़ी का दोनो जबड़ा दोनो हाथों से पकड़कर फाड़ दिया। यह एक धान्यमाली नाम की अप्सरा थी, जो शापित थी और हनुमान जी के हाथों उसे शाप मुक्त होना था। वह मुक्त होकर
स्वर्ग लोक चली गयी, और जाते समय उसने बताया, कि हे कपीश्वर ? यह रावण के दूत कालनेमि की माया है।इसने तुम्हें रोकने के लिए यह माया रची है। इसे मार दो। हनुमान जी नहाकर ऊपर आए। कालनेमि ने कहा, आओ हम तुम्हें दीक्षा दें। हनुमान जी ने कहा, हम दक्षिणा पहले दे दें। हनुमान जी ने उछलकर उसे एक मुक्का मारा। वह राक्षस के रूप में आया और फिर उसका प्राणान्त हो गया। आंजनेय वहाँ से चले और द्रोणाचल पर आ गए। बूटी पहचान में नहीं आयी तब द्रोणाचल को ही उठा लाए। सुषेण वैद्य ने बूटी का रसायन बनाया और लक्ष्मण को पिला दिया। लक्ष्मण उठ बैठे। कुम्भकर्ण को
राम ने, मेघनाथ को लक्ष्मण ने मारा और फिर अन्त में रावण प्रभु राम के हाथों मारा गया। विभीषण का राजतिलक हुआ। सीता की अग्नि परीक्षा हुयी। राम, लक्ष्मण और सीता विमान पर आसीन हुए। हनुमान, सुग्रीव आदि भी इसी विमान पर बैठे। विमान अयोध्या में
आकर रुका। चारो समुद्र का हनुमान जी जल लाए और इस जल से भगवान राम का राज्याभिषेक किया गया।
हनुमाान का सीना चीर कर दिखाना:----
राज्याभिषेक के बाद उपहार बाँटे जा रहे थे। माता सीता ने प्रसन्न होकर हनुमान जी को अपना बहुमूल्य रत्नों का हार दिया। हनुमान जी उस माला के रत्नो मे से एक रत्न निकालते थे फिर अपने दाँतों से उस रत्न को फोड़ते थे और फिर फेंक देते थे। लक्ष्मण को बुरा लगा। हनुमान जी से कहा,इस बहुमूल्य
रत्न का अपमान क्यों कर रहे हो ?
हनुमान जी ने उत्तर दिया, जिसमें भगवान राम न दिखें, वह बहुमूल्य कैसे
हो सकता है ? तुम्हारे शरीर में भी राम नहीं दिखते हैं ते क्या शरीर को त्याग दोगे ? हनुमान ने उत्तर दिया, निश्चित ही ऐसा करूँगा। लक्ष्मण बोले, दिखाओ। हनुमान ने अपने नाखून से अपने सीने को चीर दिया जिसमें स्थित
भगवान श्री राम को सबने देखा।
राम-हनुमान युद्ध:-- एक बार काशिराज ने गुरु विश्वामित्र का अपमान कर दिया। गुरु विश्वामित्र ने क्रुद्ध होकर भगवान राम से कहा, हमें काशिराज का सिर चाहिए, काशिराज ने मेरा अपमान किया है। भगवान राम ने युद्ध के लिए
आदेश कर दिया। काशिराज से नारद मिले और कहा, तुम्हारी रक्षा केवल माँ अंजना कर सकती हैं। काशिराज माँ अंजना के शरण में गए। माँ अन्जना ने
हनुमान को बुलवाया और आदेश दिया कि काशी नरेश की रक्षा करनी है। हनुमान जी माँ का आदेश नहीं टाल सकते थे इसलिए उन्हें राम से युद्ध करना पड़ा। हनुमान ने अपनी ऊर्जा कवच के अन्दर काशिराज को छिपा लिया था जहाँ भगवान राम का बाण नहीं पहुँच सकता था। भगवान राम जितने बाण हनुमान जी पर छोड़ते थे
एक भी बाण हनुमान जी को नहीं लगते थे, क्योंकि युद्ध के समय हनुमान जी केवल राम का नाम जपते थे। राम की इस विवशता को विश्वामित्र ने देखा तब युद्ध को रुकवा दिया और काशिराज को क्षमा कर दिया।
भगवान ने अपने महाप्रयाण के समय
हनुमान जी से कहा, हनुमान तुम यहीं रुको। तुम्हें भक्तों का उद्धार करना है।
हनुमान जी द्वापर में:--
हनुमान जी का प्रसंग द्वापर में दो स्थान पर आता है। पहला:--बली भीम के अहंकार को तोड़ने के संदर्भ में। दूसरा:-अर्जुन के अहंकार को तोड़ने के संदर्भ में।
बली भीम के अहंकार को तोड़ना:---जब नारायण आश्रम में भीम आदि ठहरे हुए थे। एक पुष्प हवा के झोंको के साथ उड़कर आया। जहाँ द्रौपदी बैठी थी, वहीं आकर गिरा। द्रौपदी ने उस पुष्प को उठा लिया। इतना सुन्दर पुष्प, इतनी अच्छी महक वाला पुष्प द्रौपदी ने कभी नहीं देखा था। द्रौपदी ने भीम से कहा, प्राणेश्वर ! हमें इस पुष्प का पौध चाहिए। यह अद्वितीय है। इसे हम काम्यक वन में रोपेंगे। भीम चल दिए।
जब कदली वन में आए तो देखा कि बीच डगर में एक बूढ़ा वानर अपनी पूँछ
फैलाए बैठा है। भीम ने कहा, ऐ वानर !
तू कितना धृष्ट है ? अपनी पूँछ को रास्ते में फैला रखा है। इसे तुरन्त हटाओ। हनुमान जी ने सुनकर भी अनसुना कर दिया। भीम ने फिर डाँटा और कहा, तुम बहरे हो क्या ? नहीं भाई ! बहरा तो नहीं हूँ मगर बूढ़ा ज़रूर हूँ। तुम्हीं हटाकर रास्ता बना लो और चले जाओ। भीम ने क्रोधित होकर पूँछ को उठाना चाहा, परन्तु यह क्या ? भीम ने सारी शक्ति लगा दी फिर भी यह हिली तक नहीं।
भीम ने कई बार यत्न किया परन्तु बेकार। पूँछ को हिला भी न सके। अन्त में हाथ जोड़कर पूँछा, आप हैं कौन ? कृपया आप अपना परिचय दें। मैं तुम्हारा बड़ा भाई हनुमान हूँ। तुम्हें यह बताने आया हूँ कि क्रोध मनुष्य को निर्बल बना देता है। इसलिए क्रोध को नियंत्रित करो। भीम ने हनुमान जी के चरण छुए, और क्रोध को नियंत्रित करने का वचन दिया तथा युद्ध में सहायता के लिए प्रार्थना की। हनुमान जी ने वचन दिया कि हम तुम्हारे रथों के ऊपर पताका लेकर बैठेंगे।
अर्जुन का अहंकार तोड़ना:--महाभारत के उपरान्त अर्जुन का अहंकार तोड़ने हेतु भगवान कृष्ण ने एक बार हनुमान जी को याद किया। हनुमान जी उपस्थित हुए और बोले, प्रभो ! आपने
मुझे याद किया। भगवान कृष्ण ने कहा,
हनुमान ! अर्जुन को अहंकार हो गया है, उसे हटाना है। हनुमान जी ने कहा, ठीक है प्रभो। आप मुझ पर कृपा बनाए रखें, बस यही मेरी प्रार्थना है। हवुमान जी अर्जुन से मिले। परिचय हुआ। बात होने
लगी। अर्जुन ने कहा, आपने समुद्र पार
करने के लिए पत्थर से पुल बनवाया, यदि मैं होता तो बाणो का पुल बना देता। हनुमान जी ने कहा, आपके बाणों द्वारा बना पुल हमारे वानरों का भार
सहन नहीं कर सकता था। पास में एक सरोवर था। अर्जुन ने अहंकार में कहा, मै इस सरोवर पर पुल बनाता हूँ, आप इसे तोड़कर दिखाइए। अर्जुन ने सरोवर
पर बाणों का पुल बना दिया। हनुमान ने
जय श्री राम कहकर जैसे ही कदम रखा
पुल धराशायी हो गया। अर्जुन का अहंकार जा चुका था। अर्जुन ने सिर
झुकाकर हनुमान जी को प्रणाम किया,
और अपने अहंकार पूर्ण बातों के लिए
क्षमा माँगी।
हनुमान जी की स्तुति:-------
(१) अतुलित बलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुज वन कृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकल गुण निधानं वानराणांधीशं, रघुपति प्रिय भक्तं वातजातं नमामि।
भावार्थ:--जो असीमित बल के धाम हैं,
जिनका शरीर स्वर्ण पर्वत के समान कान्तिमय है, जो राक्षस वन के अग्नि
के समान हैं, जो ज्ञानियों में अग्रगणी हैं,
जो सब गुणों के खजाना हैं, जो वानरों के स्वामी हैं, ऐसे रघुनाथ जी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ।
(२) मनोजवं मारुततुल्य वेगं जितेन्द्रियं
बुद्धिमतांवरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथ मुख्यं श्री रामदूतंशरणंप्रपद्यै।
भावार्थ:--जिनकी मन के समान गति है,
वायु के समान वेग है, जो जितेन्द्रिय है,
जो ज्ञानियों में वरिष्ठ है, उस पवनपुत्र
वानरों के प्रमुख श्री रामदूत की मैं शरण लेता हूँ।
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