-----:-भगवान शिव:----(३)

------- (३)-----:नन्दी अवतार:-----
मुनि शिलाद ब्रह्मचारी थे। वंश को आगे न बढ़ता हुआ देखकर आपके पितरों ने
आपसे संतान उत्पन्न करने के लिए‌ कहा। इसके लिए आपने भगवान शिव की तपस्या की। भगवान शिव के प्रसन्न
होने पर आपने अयोनिज संतान की कामना की। भगवान शिव ने स्वयं पुत्र
रूप में अवतार‌ लेने की बात‌ कही। यज्ञ
से एक बालक की उत्पत्ति हुयी। इस बालक‌ का शिलाद मुनि ने नंदी नाम रखा। जब नंदी की उम्र ५ वर्ष हुयी, तब
भगवान शिव ने मित्र और वरुण ‌को मुनि शिलाद के पास भेजा। मित्र और वरुण ने मुनि शिलाद को बताया कि 
आपका यह पुत्र अल्प आयु का है।आप बहुत दुखी रहने लगे। बालक नन्दी ने आपसे दुखी रहने‌ का‌ कारण पूछा।
आपने अल्पायु होने की बात बता‌ दी। नन्दी ने कहा, मैं भगवान शिव की आराधना करुँगा। भगवान शिव प्रकट हुए और‌
वर माँगने लिए कहा। नन्दी ने सदा
साथ रहने का वर माँगा। भगवान शिव
ने बैल का सिर देकर अपना वाहन बना
लिया। नन्दी भगवान शिव के अवतार
थे ही इसलिए भगवान शिव के समान
आप सर्व गुण सम्पन्न एवं बलशाली थे।
भगवान शिव ने आपको अपने गणों का
अध्यक्ष बना दिया। बिना आपकी अनुमति के कोई भी कैलाश परिसर‌ में प्रवेश नहीं पा सकता। नन्दी अब
नन्दीश्वर हो गए थे। आपका विवाह मरुत पुत्री सुयशा से हुआ। आप सदा ही भगवान शिव के साथ रहे
आज भी जहाँ- जहाँ भगवान शिव का मंदिर है वहाँ- वहाँ भगवान शिव की ओर ही मुख किए हुए आप भी स्थापित रहते हैं। 
---------(४)-----:भैरव अवतार:------
एक बार ब्रह्मदेव एवं भगवान विष्णु, भगवान शिव से अपने को श्रेष्ठ समझने लगे। आप दोनो ने वेदों से पूछा। वेदों ने उत्तर दिया कि भगवान शिव आप दोनो से श्रेष्ठ हैं। भगवान शिव की शक्ति से ही
आप दोनों को क्रमशः सृष्टि सृजन, तथा सृष्टि पोषण का कार्य मिला हुआ है। मगर आप दोनो ने वेदों की बात‌ नहीं मानी। तभी‌ वहाँ एक‌ तेजोमय शक्ति के
साथ भगवान शिव प्रकट हुए। ब्रह्मा ने
कहा, चन्द्रशेखर आओ ! तुम मेरे पुत्र हो मेरी शरण में आ जाओ। भगवान शिव क्रोधित होकर काल भैरव के रूप में प्रकट हुए और अपने तेज नाखून से ब्रह्मा के पाँचवे सिर को काट दिया। पहले ब्रह्मा के पाँच सिर हुआ करते थे।
भगवान शिव ने काल भैरव को क्रोध शान्ति करने के लिए कहा और आदेश 
दिया कि आपको  निवास के लिए  काशी जाना होगा, ब्रह्म हत्या के दोष का  शमन तभी होगा, जब आप वहाँ निवास करेंगे।
----(५)----:अश्वत्थामा अवतार:------
अश्वत्थामा आचार्य द्रोण के पुत्र और भरद्वाज के पौत्र थे। आपकी माता का
नाम कृपी था जो कौरवों के कुलाचार्य
कृप की बहन थीं। कृपाचार्य महर्षि गौतम शरद्वान के पुत्र ‌थे। महर्षि गौतम
शरद्वान की तपस्या से घबड़ाकर इन्द्र ने
देव कन्या जानपदी को भेजा। शरद्वान
और ‌जानपदी से जुड़वा बच्चे हुए, जिन्हें
इन दोनो बच्चों को जंगल में छोड़कर
महर्षि शारद्वान और देव कन्या जानपदी वहाँ से चले गए। इन्हें हस्तिनापुर नरेश
महाराज शान्तनु ने पाला। कृपाचार्य ने  अपनी बहन कृपी का विवाह आचार्य
द्रोण से कर दिया। सन्तान के लिए आचार्य द्रोण ने भगवान ‌शिव‌ की तपस्या की। भगवान शिव से अपने जैसा पुत्र देने के लिए वरदान माँगा।
समय आने पर अश्वत्थामा का जन्म‌ हुआ।‌ जन्म लेते ही अश्वत्थामा ने घोड़े की ध्वनि(हिनहिनाना) की थी, इसीलिए
इनका नाम अश्वत्थामा पड़ा। अश्वत्थामा
भगवान‌ शिव के अवतार थे, इसलिए ये बहुत वीर और पराक्रमी थे। महाभारत के युद्ध में इन्हें कोई हरा नहीं सका था।
पांचाल नरेश महाराज द्रुपद आचार्य द्रोण के साथ भरद्वाज मुनि(द्रोण के पिता) के यहाँ साथ में पढ़े थे। उस समय अकारण द्रोण से द्रुपद ने कहा था कि  यदि मैं पांचाल नरेश हुआ तो आपको आधा राज्य दे‌ दूँगा। समय बीतता गया। द्रुपद पांचाल के राजा हो गए। द्रोण निर्धन हो गए। एक दिन अश्वत्थामा के हठ के कारण कृपी ने आँटा घोर कर पिला दिया। अश्वत्थामा बाहर निकल कर चिल्लाया, आज मेने भी‌ दूध पिया‌ है। द्रोण का हृदय यह‌ सुनकर रो उठा। वह अपने मित्र द्रुपद के
यहाँ कुछ धन माँगने गए। द्रुपद ने द्रोण
को पहचानने से इनकार कर दिया और कहा, कैसा मित्र ! राजा का मित्र राजा होता है। भिक्षुक कभी भी राजा का मित्र नहीं हो सकता। अपमानित करके  दरबार से निकाल दिया। वापस आकर कौरवों और पाण्डवों को पढा़ने‌ के ‌लिए
नौकरी कर ली। जब शिक्षा पूरी हुई तब दक्षिणा में द्रुपद को बन्दी बनाकर लाने के लिए कहा। अर्जुन ने द्रुपद को युद्ध में हराकर बन्दी बनाया और लाकर आचार्य द्रोण के सामने प्रस्तुत किया। आचार्य ने कहा, राजा का मित्र राजा होता है, भला एक बन्दी राजा का मित्र कैसे हो सकता‌ है। द्रुपद ! समय   बदलता रहता‌ है। कभी तुम राजा थे हम भिखारी, परन्तु आज मैं राजा हूँ तुम भिखारी। तुम मेरे मित्र हो। तुम्हारे कहने
के अनुसार‌ राजा ही राजा‌ का‌ मित्र हो
सकता है इसलिए मित्रता बनाए रखने के लिए आधा राज्य हम तुम्हें वापस ‌देते ‌हैं। पांचाल के दो टुकड़े कर दिए गए।    दक्षिण के राज्य का राजा अश्वत्थामा को
बना दिया गया, और उत्तर का भाग
द्रुपद को‌ दे‌ दिया। महाभारत के युद्ध में भीष्म के बाद आचार्य द्रोण कौरव दल के सेनापति बने। द्रोण को छल से मारा गया । श्री कृष्ण के कहने से  अश्वत्थामा नाम के हाथी को भीम ने मार दिया और शोर मचा दिया कि अश्वत्थामा मारा
गया। पुष्टि के लिए आचार्य द्रोण ने 
युधिष्ठिर से पूछा, युधिष्ठर ने उत्तर दिया,  ‌"अश्वत्थामा हतो नरो वा कुञ्जरो।" 'अश्वत्थामा हतो' आचार्य द्रोण ने सुना परन्तु नरो वा कुञ्जरो नहीं सुन ‌सके क्योंकि योजना पूर्वक उस समय शंख ध्वनि कर दी गयी थी। आचार्य द्रोण दुखी होकर अपने अस्त्र डाल‌ दिए और
सिर को झुकाकर बैठ गए। द्रुपद पुत्र
धृष्टद्युम्न ने आकर आचार्य द्रोण का सिर काट दिया। युद्ध में अश्वत्थामा ने घटोत्कच पुत्र अंजनपर्वा के अतिरिक्त
शत्रुञ्जय, वलानीक,जयानीक,जयाश्व,
श्रुताहुक तथा कुन्तिभोज के दस‌ पुत्रों
का वध ‌किया। पाण्डवों पर नारायण अस्त्र चला दिया। कृष्ण के कहने पर सभी ने अस्त्र डाल दिया, और हाथ‌ जोड़कर नमन किया। यह अस्त्र शान्त हो गया। दुर्योधन को जल बन्ध क्रिया
आती थी, इसलिए वह पास के एक सरोवर में छिप गया। परन्तु भीम के
ललकारने पर दुर्योधन बाहर निकला।
भीम अपनी गदा से वार करके उसकी
टाँग तोड़ कर घायल करके चले गए।
कौरव दल के कृपाचार्य, क‌ृतवर्मा और
अश्वत्थामा ही शेष बचे थे। दुर्योधन ने
अश्वत्थामा से कहा, मित्र ! हमें पाण्डवों
के सिर चाहिए। अश्वत्थामा रात के अँधेरे में पाण्डव शिविर में घुसने के पूर्व
धृष्टद्युम्न के शिविर मे घुसे। धृष्टद्युम्न सो रहे थे, सोते समय उनका सिर काटकर 
अपने पिता का बदला ले लिया, फिर
पाण्डव शिविर में घुसे और‌ द्रौपदी‌ के
पाँच पुत्र सोये हुए थे, ‌यह‌ समझकर कि   ये पाण्डव है, उनके सिर काटकर बोरे में भरकर दुर्योधन के पास ले आए।
दुर्योधन की सांस चल रही थी। सुबह होने वाली थी। बड़े गर्व के साथ अश्वत्थामा बोले, मित्र पांडवों के सिर
ले आया। सिर देखा तो ये सिर द्रौपदी के पुत्रों के थे। दुर्योधन चिल्लाया, यह क्या किया तूने ? तर्पण देने वाला भी परिवार में कोई नहीं बचा। यह कहकर
राज-पाट सब यहीं छोड़कर दुर्योधन   मर‌ गया। पाण्डवों को कृष्ण कहीं‌ लेकर
चले गए थे। प्रातः आए तो अश्वत्थामा
की करतूत देखी, तो लगे इसे खोजने।
इसने अर्जुन को लक्ष्य करके ब्रह्मास्त्र
चला दिया। अर्जुन ने भी ब्रह्मास्त्र चलाया। वेदव्यास आ गए और कहा, यह‌ क्या किया? इन्हें वापस लो। अर्जुन ने वापस ले लिया परन्तु अश्वत्थामा ने कहा, मुझे वापस लेना नहीं आता। इसे
उत्तरा के गर्भ की ओर मोड़ दिया।         परन्तु कृष्ण ने गर्भ को बचा लिया। अश्वत्थामा को बन्दी बनाकर द्रौपदी के पास लाया गया। द्रौपदी ने ब्राह्मण पुत्र होने के कारण क्षमा कर दिया,  परन्तु कृष्ण के कहने पर इसके माथे पर लगी हुयी मणि को निकालकर द्रौपदी को दे दिया। भगवान कृष्ण ने उसे यह कहकर उसे जाने दिया कि जाओ तुम अनन्त काल तक मर नहीं सकोगे और यह घाव तुम्हारा कभी अच्छा नहीं होगा।भगवान कृष्ण‌ के इस शाप‌ के‌ कारण
अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं।अपने मस्तक का घाव‌ ‌लिए इधर-उधर भटक रहे‌ हैं।
-----(६)------:वीरभद्र अवतार:-------दक्ष
प्रजापति ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं। इनके कई पुत्रियाँ थीं। फिर भी आपने एक अलौकिक पुत्री प्राप्त करने के लिए तप किया। देवी आद्या प्रकट ‌हुयीं, और स्वयं पुत्री के रुप में प्रकट होने का वरदान दिया । सती ने जन्म लिया । जब विवाह
के योग्य हुयीं तब दक्ष अपने पिता ब्रह्मा
के पास‌ जाकर परामर्श लिए। ब्रह्मा ने 
भगवान शिव से विवाह करने के लिए कहा। शिव सती का विवाह हो गया।
एक बार ब्रह्मा ने धर्म सभा आयोजित‌ की। सभी देवगण एकत्रित हुए। दक्ष
प्रजापति के आने पर सब देवगण खड़े हुए, परन्तु भगवान शिव नहीं खड़े हुए।
दक्ष क्रोधित हुए। दक्ष पहले से ही भगवान शिव से क्रोधित थे, क्योंकि 
भगवान शिव ने इनके पिता का सिर‌ काटा था। दक्ष प्रजापति ने वैष्णव यज्ञ
ठाना। इसके अग्रदेवता भगवान विष्णु थे और यज्ञ के पुरोहित ब्रह्मा थे। इसमें
भगवान शिव को नहीं बुलाया गया था।
जब सती को पता लगा कि पिता ने बहुत बड़ा यज्ञ ठाना है तब सती ने यज्ञ में जाने के‌ लिए भगवान शिव से आग्रह‌ किया। भगवान शिव ने समझाया परन्तु
सती के हठ पर जाने के लिए अनुमति दे‌ दी। सती यज्ञ मण्डप में पहुँचीं। दक्ष ने
सती के सामने ही भगवान शिव को भला-बुरा कहा। सती सुनती‌ रहीं परन्तु
जब यज्ञ में भगवान शिव का भाग नहीं लगा तब सती बोलीं, अरे ब्रह्मा ! तुम इस यज्ञ के पुरोहित हो, बिना शिव का
भाग निकाले, यह यज्ञ कैसे पूरी हो सकती है ?  मैं अपने पति का यह अपमान नहीं सह सकती हूँ, इसलिए मैं
अपने को इस यज्ञ देवि को समर्पित करती हूँ, इतना कहकर सती यज्ञ कुण्ड
में कूद कर जल‌ गयीं। यहाँ ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र  आदि अन्य देवगण उपस्थित थे।यज्ञ में भगवान शिव का भाग न देकर 
अन्याय हुआ था। इस घटना की जानकारी जब भगवान शिव को हुयी
तब भगवान शिव बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने अपनी जटा का एक बाल निकाला, इसे पत्थर पर ‌पटका। हज़ार    भुजाओं वाले त्रिनेत्र धारी, काली की भाँति लपलपाती जीभ वाले भगवान
वीरभद्र का अवतार हुआ। भगवान शिव
का आदेश हुआ, दक्ष के यज्ञ में जाओ। दक्ष को दण्डित करो यदि कोई उनकी मदद के लिए आए तो उन्हें भी मत छोड़ना। आदेश पाते ही क्षण भर में
वीरभद्र यज्ञ मण्डप में पहुँच गए। वीर भद्र का भयंकर रूप देखकर देवगण छिप‌ गए। परन्तु दक्ष के आग्रह पर भगवान विष्णु रुक ‌गए। दोनो में भयंकर युद्ध होने लगा। भगवान विष्णु
ने बहुत यत्न किया पर एक भी अस्त्र
का प्रभाव भगवान वीरभद्र पर नहीं हुआ। हज़ार धारवाले सुदर्शन चक्र से
जब भगवान विष्णु ने वार किया तो उस
चक्र को भी भगवान वीरभद्र निगल लिए। ब्रह्मा ने भगवान विष्णु को समझाया कि आप अब युद्ध न करें। ये
भगवान शिव के अवतार हैं, इन्हें युद्घ में
हरा पाना असम्भव है। आप युद्ध से हटिए, दक्ष ने अन्याय किया है, उन्हें दण्ड मिलना ही चाहिए। भगवान विष्णु
हट गए। भगवान वीरभद्र ने दक्ष को  
उठाया,एक शिला पर पटका और उनके
सिर को धड़ से अलग कर दिया। सिर‌ को अग्नि कुण्ड में डाल दिया। अब वहाँ कोई नहीं था। दक्ष को उनके किए गए
अपराध का दण्ड मिल चुका था। वीरभद्र भगवान शिव के पास वापस लौट गए। ब्रह्मा और विष्णु भगवान शिव के पास पहुँचे और दक्ष को जीवन दान ‌देने के लिए आग्रह किया । भगवान शिव ने दक्ष के सिर पर बकरे का सिर
लगा कर दक्ष को जीवन दान दिया।
----(७)---:गृहपति अवतार:---------नर्मदा के तट पर धर्मपुर नाम के नगर में
 एक वैश्वानर नाम के मुनि रहते थे। आपकी पत्नी का नाम शुचिष्मती था।
सन्तान‌ के लिए आप दोनों ने भगवान शिव की घोर‌ तपस्या ‌की। प्रसन्न होकर
भगवान शिव ने दर्शन दिया। आप दोनों
ने वरदान माँगा कि हमें आप जैसा पुत्र
चाहिए। भगवान शिव ने तथास्तु कहा। कालान्तर में शुचिष्मती के गर्भ से एक बालक ने जन्म लिया। ब्रह्मा ने  इस बालक का नाम गृहपति रखा।ज्योतिषियों ने बालक को बताया कि
यह अल्पायु का‌ है। आप फिर भगवान
शिव ‌की आराधना में लग गए। इन्द्र देव प्रकट हुए और कहा वर माँगो। आपने
इन्द्रदेव से कहा, मुझे आप से कुछ नहीं चाहिए। इन्द्रदेव नाराज़ हुए। तभी भगवान शिव प्रकट हुए और कहा, ‌यह तो तुम्हारी परीक्षा ली जा रही थी, तुम परीक्षा में सफल हुए। यह बालक मेरा अवतार है, यमराज इसका कुछ नहीं
बिगाड़ सकते। इस बालक के लिए तुम
निश्चिन्त रहो।
----(८)----:दुर्वासा अवतार:--------
दुर्वासा का जन्म:---
एक बार नारद जी ब्रह्म लोक पहुँचे।ब्रह्माणी से कहा, सती अनुसूया जैसा
पति धर्म निभाने वाली नारी  इस त्रैलोक्य में दूसरा कोई नहीं है। कैलाश पहुँचे, वहाँ भी  उमा जी से वही बात
दोहराई। विष्णु लोक पहुँचे, लक्ष्मी जी से भी वही बात कही। ये तीनो देवियाँ
एकत्र हुयीं और योजना बनाने लगीं कि‌ कैसे अनुसूया की परीक्षा ली‌ जाए ? अंत में तय किया कि अपने-अपने पतियों को वहाँ परीक्षा लेने हेतु भेजा जाए। ब्रह्मा, विष्णु और शिव परीक्षा लेने हेतु चल दिए। ये‌ तीनो ब्राह्मण वेश में थे। वहाँ पहुँच कर कहा, हम तीनो बहुत दूर से आए हैं। बहुत भूखे हैं।
अनुसूया ने कहा, आप बैठें। जलपान करके विश्राम करें। मैं आप तीनों के लिए भोजन की व्यवस्था करती हूँ।
भोजन तैयार हुआ। माता अनुसूया ने कहा, भोजन तैयार है। आप भोजन
करने बैठिए। मैं भोजन लाती हूँ। उन तीनों ब्राह्मण वेशधरियों ने कहा, भोजन हम तभी कर सकते हैं जब आप नग्न होकर भोजन परोेसें। यदि आप ऐसा नहीं करेंगी तो हम बिना भोजन किए हुए चले जाएँगे। अनुसुया ने सोचा, आखिर ये अशोभनीय बात करने वाले हैं कौन ? ध्यान किया, तो हँसीं ! और मन में कहा, अच्छा आप लोग आए हैं।
अनुसूया ने कहा, आइए ! भोजन की थाल पर बैठिए। हम नग्न होकर आपको भोजन परोसेंगे। प्रातः जो पति
का चरण धोया था, उसकी कुछ बूँदें लोटे में बची थीं, थोड़ा उसमें और जल मिलाया तथा उन तीनो पर छिड़क दिया। तीनों शिशु बन गए। माँ के दूध के लिए चिल्लाने लगे। अनुसूया माँ ने उन्हें
दूध पिलाया। अब‌ तो वे तीनों शिशु थे। उन्हें नहलाना-धुलाना, तेल लगाना‌,  कपड़े पहनाना और काजल टीका करना बस यही नित्य का काम था माता
अनुसूया का। महर्षि अत्रि जब घर पर आए तब तीन शिशुओं को अनुसूया की 
गोद में देखा  तो ‌अचम्भे में पड़‌ गये। ध्यान किया तो हँसने लगे और कहा, आप लोग इसतरह माँ के दूध के लिए रुदन कर रहे हैं। कैसी विचित्रिता है ?
अब तो महर्षि अत्रि भी इन्ही शिशुओं के
पालन में लग‌ गए। बहुत दिन हो गए जब ये तीनो देव वापस अपने अपने लोक में नहीं लौटे तो देवियों ने नारद को याद किया। नारद ने माताओं से बताया 
वे वहाँ शिशु बनकर माता अनुसूया की गोद में खेल कर सुख पा रहे हैं। फिर 
नारद ने पूरी घटना का उल्लेख किया।
वे तीनो माता अनुसुया के आश्रम में पहुँची। माता अनुसुया ने कहा, आप लोग अपने अपने पतियों को पहचान लीजिए और ले  जाइए। इनका पालन  पोषण कीजिए। उमा, रमा ब्रह्माणी तीनों ने माता अनुसूया से क्षमा‌ माँगी और कहा, माते !  इसमें दोष हम तीनों का है। अब आप इन्हें मुक्त करें। तीनो
ब्रह्मा, विष्णु और शिव को अनुसूया ने मुक्त कर दिया। तीनों ने कहा ,माते ! हम तीनों आपका पुत्र बनकर जन्म लेंगे। कालान्तर में विष्णु दत्तात्रेय के रूप में,
ब्रह्मा सोम के रूप में तथा शिव दुर्वासा
के रूप में माता अनुसूया के यहाँ अवतार लिए।
(१) दुर्वासा और शकुन्तला:-- यह एक पौराणिक कथा ‌है। महाभारत में भी यह कथा है। परन्तु काव्य शिरोमणि कालिदास कृत अभिज्ञान शाकुन्तलम् में
इस कथा को बहुत ही कारुणिक ढंग ‌से
प्रस्तुत किया  है।
विश्वामित्र की तपस्या से भयभीत देवराज इन्द्र ने मेनका ‌को भेजा। मेनका के रूप लावण्य में विश्वामित्र फँस‌‌ गए    इन दोनो से एक बालिका ने जन्म लिया। विश्वामित्र को
अपनी भूल पर पछतावा हुआ। वे तुरन्त
बालिका को जंगल में अकेला  छोड़कर पुनः तपस्या‌ करने चले गए। मेनका भी वहाँ‌ से स्वर्गलोक चली गयी। इस नवजात‌‌ बालिका‌ को शकुन्त पक्षियों ने पाला। इसलिए इस‌ बालिका का नाम शकुन्तला पड़ा। इसको कण्व ऋषि अपने आश्रम में ले आए। शकुन्तला जब शादी‌ के योग्य हुयी, तब‌ एक‌ दिन हस्तिनापुर नरेश दुष्यन्त, जो आखेट हेतु जंगल में आए हुए थे,‌‌ इनकी मुलाकात शकुन्तला से हुयी। शकुन्तला मेनका अप्सरा की‌ कन्या थी, इसलिए बहुत सुन्दर थी। दुष्यन्त ने शकुन्तला से गन्धर्व विवाह किया और वहीं एक महीना ठहरे। मुनि
कण्व कहीं गए हुए थे। इसलिए राजा दुष्यन्त ने शकुन्तला को अपनी अँगूठी
दी और कहा जब मुनि आ जाएँ तब मुनि की अनुमति लेकर हस्तिनापुर आ जाना। एक दिन जब शकुन्तला अपने पति की याद में खोई हुयी थीं, तब दुर्वासा‌ ऋषि आए। कई बार आवाज़ दी
मगर‌ शकुन्तला ने ध्यान नहीं दिया। ऋषि दुर्वासा ने‌ शाप‌ दे‌ दिया कि ‌तू जिसकी याद में खोई हुयी है वह तुम्हें भूल जाएगा। शाप सुनते ही शकुन्तला
का ध्यान मुनि की ओर गया। वह मुनि से क्षमा माँगने लगी। मुनि ने दया करके
कहा, जब तू उनकी ‌दी हुयी अँगूठी दिखाएगी तब उन्हें याद आ ‌जाएगी।
जब कण्व ऋषि आए, तब  उन्होंने तैयारी करके एक शिष्य के साथ शकुन्तला को हस्तिनापुर भेज दिया।
रास्ते में स्नान करते समय अँगूठी नदी में गिर‌‌ गयी। शकुन्तला को राजा‌ ने पहचानने से इन्कार कर दिया। जब अँगूठी को दिखाना चाहा, तो वह हाथ की उँगली में नहीं थी। शकुन्तला दरबार से बाहर आयी और पुनः कण्व ऋषि के
आश्रम में नहीं लौटी। शकुन्तला गर्भवती थी। इसने एक बालक को जन्म
दिया। बालक का नाम भरत‌ था। अँगूठी
को एक मछली ने निगल लिया था। एक मछुवारे ने जब नदी में जाल डाला तो वह मछली उसके जाल मैं फँस‌ गयी। मछुवारे ने जब मछली को‌‌ काटा तब वह
अँगूठी उसको मिली। उस अँगूठी‌‌ को लाकर उसने राजा को दी। राजा ने अँगूठी देखी‌ तो उन्हें शकुन्तला याद आयी। राजा आश्रम पर गए परन्तु वहाँ
शकुन्तला नहीं थी। वह लौट रहे थे‌ तो उन्होंने देखा कि एक बालक सिंह के दाँत गिन रहा है। बालक की वीरता पर
राजा को अचम्भा हुआ। राजा उस‌ बालक से पास पहुँचे। उसका परिचय पूछा, फिर उसी के साथ‌ उसके आश्रम
में पहुँचे। वहाँ शकुंतला से भेंट हुई।
शकुन्तला राजा ‌के साथ राजमहल में
आ गयी।
(२) दुर्वासा और कुन्ती:---
महाभारत के आदिपर्व(सम्भवपर्व) के अध्याय ११० में दुर्वासा और कुन्ती का
प्रसंग दिया हुआ है। भगवान कृष्ण के
दादा, वसुदेव के पिता महाराज शूरसेन
की कन्या पृथा थी। महाराज शूरसेन ‌के
फुफेरे भाई कुन्तिभोज सन्तानहीन थे।
महाराज शूरसेन ने कहा था कि पहली
सन्तान हम‌ आपको देंगे। पहली सन्तान
कन्या ‌हुयी जिसका नाम पृथा रखा। इसे
कुन्ती भोज को दे दिया। कुन्तिभोज के
यहाँ पलने के कारण इनका नाम कुन्ती
हो गया। कुन्ती बड़ी हुयी। एक बार ऋषि दुर्वासा कुन्तीभोज के यहाँ आए।
कुन्ती ने ऋषि की बड़ी सेवा की। कुन्ती के भाग्य को पढ़कर ऋषि दुर्वासा ने यह वरदान दिया कि जिस भी देवता को तुम
आवाहन करोगी, वे‌ आकर तुम्हें अपने जैसा पुत्र देकर जाएँगे। समय बीतता गया। एक दिन कौतूहल वश कुन्ती ने
भगवान सूर्य को याद किया। भगवान
सूर्य उपस्थित हुए। कुन्ती अभी कुमारी
थी, वह‌ डर‌ गयी। सूर्य की बहुत प्रार्थना
की । परन्तु भगवान सूर्य ने कहा, वरदान झूठा नहीं हो सकता। हम तुम्हें अपने जैसा एक पुत्र देकर ही जाएँगे।
कुन्ती गर्भवती हो गयीं। एक सुन्दर बालक ने जन्म लिया। लोक-लाज के भय‌ से बालक को नदी में बहा दिया।
सारथि अधिरथ और इनकी पत्नी राधा ने नदी से बाहर निकाल कर इस बालक को पाला-पोसा। इसका नाम कर्ण रखा।
कुन्ती का स्वयंवर रचा गया, जिसमें कुन्ती ने पाण्डु को चुना। कालान्तर  में  सन्तान न होने से पाण्डु बहुत दुखी थे।
कुन्ती ने दुर्वासा ऋषि के वरदान का उल्लेख किया। पाण्डु ने सहमति दिखायी। पवनदेव से भीम, धर्मदेव से
युधिष्ठिर, इन्द्रदेव से अर्जुन जन्म लिए।
 कुन्ती ने माद्री को भी मंत्र के आवाहन की विधि बतायी, माद्री ने अश्वनीकुमारों
आवाहन का किया। माद्री से नकुल और सहदेव जुड़वा पैदा हुए। महाभारत के युद्ध में जब कर्ण सेनापति हुए तब कुन्ती ने जाकर कर्ण‌ का परिचय दिया
और अपनी विवशता का उल्लेख किया।
कर्ण ने माँ कुन्ती से यह वादा किया कि 
अर्जुन के सिवा हम किसी भाई को युद्ध में नहीं मारेंगे।
    (३) ---:दुर्वासा और दुर्योधन:-----
जब पाण्डव वनवास काल बिता रहे थे, तब एक‌ दिन ऋषि दुर्वासा दुर्योधन के 
पास आए। दुर्योधन ने बहुत‌ सेवा‌ की।
दुर्वासा ने प्रसन्न होकर कहा, कुछ माँग‌ लो। दुर्योधन ने कहा,  यदि आप मुझ पर
प्रसन्न हैं तो मैं चाहता हूँ कि आप युधिष्ठिर के पास भी‌ जाएँ।
     (४)--:दुर्वासा और पाण्डव:----
दुर्वासा ऋषि अपने दस हज़ार शिष्यों के साथ जंगल में युधिष्ठिर के पास पहुँचे और‌ कहा, हम स्नान करके अभी आते हैं। हम सभी के लिए‌ आप भोजन की व्यवस्था करें। अक्षय पात्र से भोजन निकालकर द्रौपदी भोजन कर चुकी थीं।
अब अक्षय पात्र से उस‌ दिन भोजन नहीं
मिलने वाला था। पाण्डव घबराये। दुर्वासा बहुत क्रोधी स्वभाव के थे। तुरन्त
शाप देते थे। अभी स्नान करके ऋषिगण आएँगे तो भोजन कैसे दिया जाएगा ? इसी विषय पर पाण्डव विचार‌कर कर रहे थे। जब कोई उपाय
नहीं दिखा, तब द्रौपदी ने भगवान कृष्ण
को याद‌ किया। भगवान‌ कृष्ण प्रगट हुए। द्रौपदी ने वस्तुस्थिति की‌ जानकारी
दी। भगवान कृष्ण ने कहा, अक्षय पात्र
लाओ। अक्षयपात्र में चावल‌ का एक दाना चिपका हुआ था। भगवान कृष्ण ने
उस दाना को ज्यों ही मुख में रखा, ऋषि
दुर्वासा और उनके शिष्यों का पेट बिना
भोजन किए हुए ही भर गया।‌ सब वहीं
नदी के पुलिन पर लेट गए। ऋषि दुर्वासा ने खबर भिजवायी कि हम सब
भोजन नहीं करेंगे। बिना भोजन किए हुए ही हम यहाँ से चले‌ जाएँगे हमारा पेट भरा हुआ है।
 (५)-----:दुर्वासा और‌ गोपियाँ:------
एक बार भगवान कृष्ण गोपियों से समय पर पहुँचने का वादा ‌करके भी विलम्ब‌ से पहुँचे। गोपियों ने विलम्ब से आने का‌ कारण पूछा, तब भगवान
कृष्ण ने बताया कि मेरे गुरु आए थे,‌ मैं
उनकी सेवा में था। गोपियों ने पूछा, आपके गुरू कहाँ ठहरे हैं ? और उनका
क्या नाम है ? मेरे गुरू का नाम दुर्वासा है। वे यमुना के उस पार जंगल में ठहरे हैं। गोपियों ने पूछा, क्या हम‌ लोग‌ भी 
आपके गुरू का दर्शन कर सकते‌ हैं ?
बिल्कुल दर्शन कर सकती हैं, जाइए
दर्शन कर आइए। गोपियाँ अपने-अपने
घर गयीं। थालें सजाकर ले आईं। इन
थालों में खाने के  लिए विभिन्न प्रकार के मिष्ठान और व्यञ्जन थे। गोपियों ने
पूछा ,हम सब यमुना कैसे ‌पार करेंगे ? भगवान कृष्ण ने कहा, यमुना से‌ कह देना यदि कृष्ण बाल योगेश्वर हैं ‌तो मुझे
उस पार जाने का रास्ता ‌दे‌  दो। गोपियाँ
यह‌ कहते हुए चल‌ दीं कि ये साहब दिन
भर हम लोगों के पीछे लगे रहते हैं और
कहते हैं कि हम बालयोगेश्वर‌ हैं। चलो
चलकर देखते हैं। वे यमुना पर पहुँचीं, और यमुना से कहा, यदि कृष्ण बालयोगेश्वर हैं तो हमे रास्ता दे दो। यमुना जी ने रास्ता‌ दे दिया। उस पार गयीं। दुर्वासा से मिलीं, और उनसे
कहा, हम सब कुछ आपके खाने के लिए लाएँ हैं। दुर्वासा ऋषि ने कहा, ठीक‌‌ है खिला ‌दो। सबने खिलाया। परन्तु फिर ‌भी खड़ी रहीं। दुर्वासा ऋषि ने कहा, तुम सब‌ जाओ। रात हो‌ गयी ‌है। एक गोपी ने कहा, हम सब यमुना कैसे पार ‌करेंगे ? ऋषि ने कहा,यमुना से कह‌ देना कि यदि दुर्वासा केवल और केवल दूर्वा ही खाकर रहते हैं‌ तो हमें रास्ता‌ दे ‌दो। गोपियाँ वहाँ‍ से चल दीं,   यह‌ कहते हुए कि हम सबों के थाल‌ चट कर‌ गये, प्रसाद के लिए भी नहीं छोड़ा और कहते हैं‌ कि केवल दूर्वा ही खाकर रहते हैं। चलो इनको भी आजमाते‌ हैं। यमुना तट पर पहुँचते ही कहा, यदि दुर्वासा केवल दूर्वा घास ही लेते‌ हैं और कुछ नहीं खाते तो आप हमें रास्ता ‌दे दें। यमुना ने रास्ता ‌दे‌ दिया।  गोपियों ने‌ आकर कृष्ण से अपनी शंका ‌का निवारण करना चाहा  ‌‌परन्तु भगवान कृष्ण ने सोचा ! इन्हें समझाना कठिन है, इसलिए चर्चा का विषय ही बदल दिया।
(६) दुर्वासा और यदुवंश:------
महाभारत युद्ध के बाद जब‌ भगवान
कृष्ण माता गान्धारी से मिलने आए तो
माता गान्धारी ने कृष्ण से‌ कहा, कृष्ण !
यदि तुम चाहते ‌तो महाभारत का युद्ध
टल‌ सकता था, परन्तु तुमने युद्ध को नहीं रोका। मेरे परिवार का नाश तुमने कराया है, इसलिए मैं तुम्हें शाप देती हूँ‌ कि युद्ध में जिस तरह मेरे परिवार का   नाश हुआ है उसी तरह तेरे परिवार का भी नाश हो जाएगा। भगवान द्वारका चले आए। एक ‌दिन नदी किनारे दुर्वासा ऋषि आकर ठहरे थे। भगवान कृष्ण के लड़के साम्ब और उनके साथियों ने विचार किया कि‌ ऋषि दुर्वासा को परेशान‌ करना है। इसके लिए साम्ब ने पेट में कड़ाही बाँधी और ऊपर से जनाना कपड़ा पहना, फिर अपने साथियों के साथ ऋषि दुर्वासा के  पास पहुँचे, इनके साथियों ने पूछा ! इसके पेट में क्या है ? ऋषि ने ध्यान‌ किया और क्रुद्ध  होकर शाप दे‌ दिया। तुम
यदुवंशियों का अहंकार बढ़ गया है, इसलिए मैं शाप देता हूँ कि यदुवंशियों
का नाश हो जाएगा और जो पेट में बाँध रखा है, वही नाश का कारण बनेगा।     यदुवंशी बहुत पछताए, लेकिन अब शापित तो हो चुके थे। इन्होंने कड़ाही
को पत्थर पर घिसा और नदी में बहा दिया, जिसको लहरों ने लाकर ऊपर फेंक दिया जिससे एक घास जमी जिसकी पत्तियाँ धारदार थीं। इससे यदुवंशियों ने अस्त्र बनाए। और एक 
दूसरे पर वार करने लगे। यह सब         माता गांधारी और ऋषि दुर्वासा के शाप के कारण था। यदुवंशी आपस में ही
लड़-भिड़ कर मर गये। कड़ाही के एक टु‌कड़े को एक‌ मछली निगल गयी थी।मछुवारे ने इस मछली को पकड़ा, जिससे एक बहेलिए ने खरीद‌ा। मछलीे के काटने पर वह ‌‌कड़ाही‌ का टुकड़ा 
बहेलिया को‌ मिला जिसे उसने अपने
तीर में लगा‌ लिया। भगवान कृष्ण ने 
समझ लिया कि इस धरती से जीने का समय अब ‌गया, जिस कार्य के लिए वे
इस धरती पर आए थे, वे ‌सारे कार्य पूरे
हो चुके हैं। वे नदी ‌के किनारे एक पेड़ के तले लेट गए। पैर-पैर के ऊपर रखे थे। पैर में कमल का निशान था, जिसे
उस जरा नाम के बहेलिए ने हिरन की आँख समझ कर तीर चला दिया। तीर विष में बुझी थी। भगवान कृष्ण पर उस तीर का असर होने लगा। बहेलिया आया और क्षमा माँगने लगा। भगवान कृष्ण ने उसका ध्यान पूर्व जन्म पर पहुँचाया, जब वह बालि था, और उसने शपथ ली थी कि जिस तरह आपने मुझे छिप कर मारा है उसी तरह हम भी आपको मारेंगे। तब मैं राम था, आज मैं कृष्ण हूँ। तब ‌तुम बालि थे, आज‌ तुम जरा हो। इतना कहकर भगवान कृष्ण अपने लोक को चले गए। बहेलिया अपने सिर पर‌ हाथ रखकर रोता ‌रह‌ गया।
    (७) --:दुर्वासा और इन्द्र:--------
एक बार दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ जा रहे थे। रास्ते में एक अप्सरा
खड़ी थी, जिसके हाथ में अलौकिक फूलों की एक माला थी। यह माला बहुत
सुन्दर लग‌ रही थी। ऋषि दुर्वासा ने इसे
उस अप्सरा से माँग‌ लिया। इसे अपनी
जटाओं में बाँधना चाहते थे।‌ उधर से 
देवराज इन्द्र अपनी ऐरावत पर बैठे हुए
आ रहे थे। ऋषि ने सोचा, यह माल देवराज इन्द्र के गले में अधिक ।शोभा देगा। इसको देवराज इन्द्र को‌ दे दिया।
देवराज इन्द्र ने इसे ऐरावत ‌के सिर‌‌ पर
डाल दिया। ऐरावत ने अपने सिर‌ से उठाकर इसे भूमि पर डाल‌ दिया।‌ और
यह अलौकिक माला ऐरावत के पैरों तले कुचल दिया गया। ऋषि ने सोचा,  इन्द्र ने जान बूझकर मेरा अपमान किया है। ऋषि कुपित हो गए, और देवराज इन्द्र को शाप दे ‌दिया। तू अहंकारी हो‌
गया है, इसलिए मैं तुझे शाप देता ‌हूँ, तेरा सारा वैभव नष्ट हो जाएगा। राजा बलि ने देव‌लोक पर आक्रमण करके देवलोक को जीत लिया। देवराज इन्द्र 
का सारा वैभव‌ राजा बलि ने छीन लिया।
 (८).  -:दुर्वासा और राम-लक्ष्मण:----- 
भगवान राम का‌ जिस हेतु  इस धरती
पर आगमन हुआ था, वे‌ सारे काम‌ सम्पन्न हो चुके थे, तभी‌ एक‌ दिन एक
साधु आए और कहा मुझे राम से मिलाइए। मैं अतिबल का दूत हूँ, शीघ्र
मुझे मिलना है। भगवान राम को ‌जब समाचार मिला, तब कहा, उन्हें शीघ्र ही
ससम्मान बुला लाइए। अंदर आते ही
कहा प्रभु ! पहले मुझे यह आश्वस्त कीजिए कि अंदर कोई नहीं आएगा, जो
आएगा, उसे प्राण दण्ड दिया ‌जाएगा।
भगवान राम ने लक्ष्मण से कहा, तुम दरवाजे पर‌ रहो, किसी को अन्दर मत
आने देना। कुछ पल बाद ही ऋषि दुर्वासा आए। उन्होंने कहा, मैं एक‌‌ हज़ार वर्ष का व्रत रखे‌ हुए था। आज ‌मुझे पारण करना है। मैं राम के हाथ से
पारण करना चाहता हूँ। शीघ्र मुझे ‌राम से मिलाओ। लक्ष्मण ने कहा, अभी‌ बाहर निकलते हैं, तब मिलिए। ऋषि
कुपित हुए और कहा, मुझे शीघ्र मिलाओ वर्ना हम शाप दे देंगे, पूरी
अयोध्या जल‌कर‌ राख हो जाएगी।  लक्ष्मण ने सोचा, मेरा जीवन जाए ‌तो जाए, ‌मगर अयोध्या‌ को ‌बचाना आवश्यक‌ है। लक्ष्मण अन्दर गए और प्रभु से बोले, ऋषि दुर्वासा आए हैं तथा
शीघ्र मिलने इच्छा व्यक्त की है। अन्दर अतिबल के ‌दूत महाकाल थे, जो भगवान राम से यह‌ कहने आए थे ‌कि समय पूरा‌ हो ‌चुका ‌है, अब आपको और जो आपके साथ आए थे उन्हें चलना है।
लक्ष्मण के अन्दर पहुँचते ही महाकाल उठे और बाहर निकलकर चले गए। प्रभु
राम बाहर निकले और ऋषि को प्रणाम
किए। बिठाया। उन्हें पारण‌ कराया। वे आशीर्वाद देकर चले गए। लक्ष्मण ने
प्रभु राम से पूछा, मेरे लिए क्या आदेश है? मैं आपकी आज्ञा का पालन नहीं कर सका। भगवान राम‌ ने कहा, यह तुम्हीं तय‌ कर‌‌ लो। प्रभु का ‌चरण स्पर्श
किया और सरयू की ओर चल पड़े। हाथ
जोड़कर अयोध्या नगरी को प्रणाम् किया और नदी में प्रवेश कर गए।
------------------------------------------------




Comments

Popular posts from this blog

उपनिषद की‌ सूक्तियाँ--

ऋगुवेद सूक्ति--(56) की व्याख्या

(2) Second Guru Angad Dev Ji Maharaj-- When Emperor Humayun pulled out his sword and try to attack on the neck of Guru Angad Dev Ji, his hand was paralyzed--Read more--