--------:भगवान शिव:---- :(२):----

शिव यजुर्मंत्र:-----
कर्पूर‌गौरं करुणावतारं संसार सारं ‌भुजगेन्द्र हारम्। सदा वसतं‌ हृदयार्विन्दे
भवं भवानी सहित नमामि ।
भावार्थ:-- जो ‌कर्पूर जैसे गौर वर्ण वाले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार‌ हैं और भुजंगों का हार धारण करते हैं। वे भगवान शिव माता भवानी के साथ सदा हृदय में निवास करें। उन्हें मेरा‌ नमन है।
मन्दार माला  कुलितालकायै, कपालमाला कित कन्धराय। दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय, नमः शिवाय च नमः शिवाय।
भावार्थ:--मन्दार पुष्प माला पहने हुए अति रूपवती दिव्य वस्त्र धारणी पार्बती
‌ को कपालमाला धारी दिगम्बर शिव ने अपना अर्ध शरीर दिया है, उस शिव को नमस्कार है।
अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्।
अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकाल महासुरेशम्।
भावार्थ:--जो भगवान शंकर संतजनो को मोक्ष प्रदान करने के लिए अवंतिका
पुरी उज्जैन में अवतार धारण किए हुए हैं, अकाल मृत्यु से बचने के लिए उन देवों के भी देव महाकाल नाम से विख्यात महादेव जी की मैं  वन्दना करता हूँ।
सौंदर्य ‌लहरी:-इसक़े पीछे एक कथा है:-
एक बार आदि शंकराचार्य शिव और
पार्बती की पूजा करने कैलाश गए। वहाँ
भगवान शिव ने उन्हें १०० श्लोकों वाली
एक पाण्डुलिपि दी, जिसमें भगवान शिव द्वारा माता पार्बती के सौंदर्य के बारे में वर्णन किया गया था। जब शंकराचार्य जी कैलाश से लौट रहे थे तो
रास्ते में नन्दी ने इन्हें रोका और उस पाण्डुलिपि को शंकरचार्य के हाथ से छीनकर उसके दो टुकड़े कर दिए। नन्दी ने कहा, इस पाण्डुलिपि में माता जी के
नख-शिख का वर्णन है जो तुम्हारे काम का नहीं। परन्तु उसका एक भाग शंकराचार्य जी के हाथ में आ गया जिसे लेकर आप पुनः जाकर भगवान शिव से
मिले और घटना की चर्चा की। भगवान शिव ने कहा, "इसमें ४१ श्लोक हैं, शेष
५९ श्लोक तुम स्वयं लिख लेना। आचार्य शंकर ४१श्लोकों की पाण्डुलिपि
लेकर वापस आए और ६२ श्लोक लिखकर उसमें जोड़ दिए, इसे सौंदर्य लहरी कहते हैं। पाण्डुलिपि में अंकित ४१ श्लोकों को आनन्द लहरी कहते हैं।
दोनो मिलाकर १०३ श्लोक हैं। इनमें से कतिपय श्लोकों की ‌चर्चा आगे की जा रही है।
मुखे ते ताम्बूलं नयन युगले कज्जल कला। ललाटे काश्मीरं‌ विलसति गले
मौक्तिकलता। स्फुरति काञ्ची शाटी पृथु कटितटे हाटकमयी। भजामि त्वां
गौरीं नगपति किशोरीमविरतम्।
          ----श्लोक:३---आनन्द लहरी
 भावार्थ:--तुम्हारे मुख में पान है। नयनों में काजल की पतली रेखा है। ललाट में केसर की बिंदी‌ है। गले में मोती का हार
सुशोभित ‌हो रहा है। कटि के निम्न भाग में सुनहरी साड़ी है, जिसपर रत्नमयी
करधनी(मेखला) चमक रही है, ऐसी भेषभूषा से सजी हुयी गिरिराज हिमालय की गौरवर्ण कन्या, तुमको मैं
सदा ही भजता हूँ।
महीं मूलाघारे कमपि मणिपूरे हुतवहं।
स्थितं स्वधिष्ठाने हृदि मरुतमाकाशमुपरि
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वा कुलपथं। सहस्रारे पद्मसहरहसिपत्या
विहरसे।  ---श्लोक:-९: आनन्द लहरी
भावार्थ:--पृथ्वी तत्व को मूलाधार में और जल तत्व को भी, मणिपुर में अग्नि तत्व को जिसकी स्थिति स्वाधिष्ठान में,
हृदय में वायु तत्व को और ऊपर विशुद्ध चक्र में, आकाश तत्व को और मन को भी भ्रूमध्य में। इस प्रकार सकल कुल पथ( शक्ति के मार्ग) को वेध करके तू
सहस्रार पद्म में अपने पति के साथ एकान्त में विहार करती है।
सुधा धारा सारैश्चरण युगलान्त‌र्विगलतैः।
प्रपञ्चं सिन्चञ्ती पुनरपि रसाम्नाय महसः। अवाप्य स्वां भूमिं  भुजगनिभमध्युष्ट वलयं।स्वमात्मानं कृत्वा स्वपिषि कुलकुण्डे कुहरिणि।
     ---श्लोक---१०: आनन्द लहरी
भावार्थ:--अमृतधाराओं की वर्षा में, जो तेरे दोनो चरणों के बीच से टपकती है। प्रपञ्च को सींचती हुयी अपनी भूमि पर उतरकर अपने आपको सर्पिणी के सदृश साढ़े तीन कुण्डल डालकर हे कुहरिणी ! तू कुल कण्ड में सोती है।
महान्तं विश्वासं तव चरण पंकेरुह युगे।
निधायान्यन्नैवाश्रित मिहमया दैवतमुमे।
तथापि त्वच्चेतो यदि मयि न जायेत सदयं। निरालम्बो लम्बोदर जननि कं
यानि शरणम्।-श्लोक:-११:आनन्दलहरी
भावार्थ:--मैने आपके चरण कमलों में
बहुत विश्वास रखा है, और मेरे लिए
यहाँ कोई अन्य सहारा नहीं है तो भी यदि ‌तेरा मन मुझ पर दया नहीं‌ करता तो हे लम्बोदर की माँ ! फिर मैं किसकी शरण लूँ।
कदा काले माता कथय कलितालक्तक रसं, पिबेयं विद्यार्थी तव 
चरणनिर्णेजनजलम्। प्रकृत्या
 मूकानामपि च कविताकारणतया, 
यदाधत्तै वाणी मुखकमल  ताम्बूलरसताम्। -श्लोक-९८: सौन्दर्य
लहरी।
भावार्थ:--हे माँ ! बताओ ! वह समय कब आएगा ? जब मैं एक विद्यार्थी तेरे
चरणों के धुले जल‌ का पान कर सकूँगा,
जिसमें सरस्वती के मुख कमल से निर्गत शब्द ब्रह्मरूपी ताम्बूल की सुरभि
मिली हुयी होगी। वह चिदानन्द रूपी
किञ्जलक राशि जो जन्म के गूँगे को भी कविता‌ रचने की अपूर्व क्षमता प्रदान कर देती है।
शिव ताण्डव स्तोत्र:--मान्यता है कि एक
बार अहंकार वश रावण ने कैलाश को उठा लिया। भगवान शिव ने पर्वत को अपने पैर के अंगूठे से दबा दिया, जिससे उसका अँगूठा पर्वत के नीचे दब गया। वह बहुत रोया चिल्लाया। रोने के
कारण ही उसका नाम रावण पड़ गया।
भगवान शिव ने ध्यान नहीं दिया, तब वह स्तुति करने लगा। कालान्तर में वही स्तुति शिव ताण्डव स्तोत्र कहलाया।
भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए, उसे चंद्र हास(तलवार) देकर अजेय बना दिया।
साथ ही सुख समृद्धि का वरदान भी दिया। यह स्तोत्र बहुत लोकप्रिय है।
क्योंकि इसमें अनुप्रास और समास भरा पड़ा है, जिसके कारण इसमेंअत्याधिक
प्रवाह है। यह स्तोत्र पञ्चचामर छन्द में है। इसमें १६ श्लोक हैं। कतिपय श्लोक
आगे प्रस्तुत है:---
प्रफुल्लनीलपंकज प्रपञ्चकालिमप्रभा
विडंबि कंठकंधरारुचि प्रबन्धकंधरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे।
      ----श्लोक:-९: शिव तांडव स्तोत्र
भावार्थ:--मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूँ। जिनका कण्ठ मंदिरों की चमक से बँधा है। पूरे खिले हुए नील कमल के फूलों की गरिमा से लटकता हुआ, जो ब्रह्मांड की कालिमा सा दिखता है, जो कामदेव को‌ मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया, जिन्होंने सांसारिक जीवन के बन्धनों 
को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया, जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं, और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।
अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्।
स्मरांतकं पुरांतकं भवांतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे।
 ---श्लोक:--१०:शिव तांडव स्तोत्र
भावार्थ:--मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूँ, जिनके चारों ओर मधुमक्खियाँ उड़ती रहती हैं। शुभ कदम्ब के फूलों को सुन्दर गुच्छों से आने वाली शहद की मधुर सुगंध के कारण, जो कामदेव को मारने वाले हैं,
जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया, जिन्होंने
सांसारिक जीवन के बन्धनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,
जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया,
जो हाथियों को मारने वाले ‌हैं, और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित‌ किया।
शिवाष्टक स्तोत्र:--यह स्तोत्र गणेश प्रसाद तिवारी 'नैश' द्वारा लिखित नैश रामायण से लिया गया है, जिसमें भगवान शिव के नामो का ही उल्लेख किया गया है, इसलिए इसका भावार्थ
लिखना आवश्यक नहीं है। 
नमामीश कामारि आकाशयोनिं
पृथुं चीरवासं द्युतं चन्द्रमौलिम्।
अजं लेलिहानं यतिं मीढ़वानं
नमामीश्वरं नीलकण्ठं गिरीशम् ।१।
हुतं रौद्र रूपं प्रशान्तं सुवक्त्रं
भवव्यक्ष योगी सुनेत्रं विशालम्।
प्रचण्डं अकाली प्रकृष्टं अगेहं
आगामी करालं कृपालं अखण्डम् ।२।
भवेशं तुरीयं अजन्मा भजेहं
परेशं अदूजा गिरीन्द्रं निरीहम्।
अहं क्रोध निर्मूलनं शूलपाणिं
महाकाल सर्वं विभुं देवरूपम् ।३।
तदेकं  तदानी ‌ चिदाकाशरुद्रं
गुणी काल कण्ठं गुरू तीक्ष्णदृँष्ट्रं।
प्रसन्नं   भवानीपतिं   तापनाशं
महाग्रीव क्रुद्धं प्रभारूप रौद्रम् ।४।
जयी कृष्ण ग्रीवं वृषं भूतनाथं
क्षमी ऊर्ध्व लिंगं यती चन्द्रभालं।
तदाकार दुष्च्याव शम्भुः पुराणं
नभं दुर्लभं सर्व सृष्टा भजेहम् ।५।
पुरारी निपाती प्रभो मन्मथारी
कलातीत गोतीत मोहापहारी।
अनंगी अनंता यती गंगधारी 
महापाद पञ्चाननं भस्मधारी ।६।
नमामीश उग्रं शिवं ऊर्ध्वशायी
कपर्दी त्रिनेत्रं शिवाकान्त धन्वी।
उमानाथ  श्रंगी  भजेहं  भजेहं
स्वधारूप भृंगी भजेहं भजेहम् ।७।
नमस्ते भवानीपतिं चन्द्रमौलिम्
त्रयः शूलपाणिं नमस्ते  नमस्ते।        नमस्ते नमस्ते महादेव शम्भो 
क्षमी ऊर्ध्वरेता नमस्ते नमस्ते ।८।
भगवान शिव के अवतार:--
लिंग पुराण के अनुसार भगवान शिव के २८ अवतार है, यहाँ १९ अवतारों की चर्चा की जाएगी:--(१)शरभ(२)
पिप्लाद(३)नन्दी(४)भैरव(५)अश्वत्थामा(६)वीरभद्र(७)गृहपति(८)दुर्वासा(९)
हनुमान(१०)वृषभ(११)यतिनाथ(१२)
कृष्णदर्शन(१३)अवधूत(१४)भिक्षु(१५)
किरात(१६)सुनट(१७)ब्रह्मचारी(१८)अर्धनारी(१९)सुरेश्वर।
(१) शरभ अवतार:--भगवान ने भक्त प्रहलाद की  के लिए नृसिंह का अवतार
लिया और हिरण्यकश्यपु का बध किया। भगवान नृसिंह क्रोध में थे। क्रोध
शान्त करने के लिए देवताओं के आग्रह
पर भगवान शिव ने शरभ अवतार लिया। आधा भाग मृग का था और आधा भाग शरभ पक्षी का। भगवान शिव ने पहले क्रोध को शान्त करने के लिए कहा। जब क्रोध शान्त नहीं हुआ तब भगवान शिव नृसिंह को उठाकर
आसमान में लेकर चले गए तब क्रोध शान्त हुआ।
(२) पिप्लाद अवतार:--पिप्लाद महर्षि
दधीचि के पुत्र तथा‌ महर्षि अथर्वा के पौत्र और भगवान शिव के अवतार थे। आपकी माता का नाम गभस्तिनी था, ‌   जो लोपमुद्रा की बहन थीं। दैत्यों और दानवों के डर से देव गण अपना अस्त्र-शस्त्र महर्षि दधीचि‌के आश्रम में रख गए थे, क्योंकि दैत्य-दानव महर्षि दधीचि के श्राप से डरते थे। दधीचि ने अस्त्र-शस्त्र को जल से स्नान कराया फिर इस जल को अभिमंत्रित करके पी लिया। वृत्तासुर ने देवताओं पर पुनः आक्रमण  कर दिया। देव गण दधीचि के पास आए। दधीचि ने कहा, मैने इनका तेज पी लिया‌ ‌है, यह तेज मेरी अस्थियों में    पहुँच चुका है। देवताओं ने आपसे अस्थियाँ देने हेतु आग्रह किया। आपने मंत्र से अग्नि को प्रज्वलित किया और स्वयं को जला दिया।  इनकी अस्थियों से अस्त्र-शस्त्र बना, जिससे देवों ने  वृत्तासुर सहित दैत्यों का संहार किया। इधर गभस्तिनी गर्भ से थीं। इन्होंने अपने पेट को फाड़ दिया और हाथ से बच्चे को निकाल कर बाहर किया फिर अपने पति की बची हुयी    अस्थियों के साथ सती हो गयीं। बच्चे को वन के जीव जन्तुओं  एवं वनस्पतियों ने पाला।
जब आप बड़े हुए तो वनपस्तियों से पूछा, मैं मनुष्य हूँ। आप लोगों ने मुझे पाला है परन्तु यह तो बताओ कि मेरे माँ-बाप कहाँ हैं ? वनस्पतियों ने पूरी
घटना का उल्लेख किया और यह भी बताया कि तुम्हें तुम्हारी माँ ने पीपल के
पेड़ के नीचे हमें ‌सौंपकर स्वयं ‌इस संसार से विदा हुयी थीं, इसलिए तुम्हारा
नाम पिप्लाद ‌पड़ा। आपने वनस्पतियों‌ से अपनी कहानी सुनी और‌ देवताओं‌‌ से बदला‌ लेने के लिए आपने भगवान शिव को याद किया। भगवान शिव ने आपकी मदद के लिए कृत्या  को भेजा। पिप्लाद
का आदेश पाते ही कृत्या देवों के बध‌ ‌के
लिए आगे बढ़ी। देवगण देवलोक छोड़कर भागे और भगवान शिव के शरण में गए। भगवान शिव ने कहा, पिप्लाद की शरण में जाओ। पिप्लाद ने
देवताओं को क्षमा  कर दिया,और कृत्या को भगवान शिव के पास भेज दिया।
कथा इस तरह भी आती है कि पिप्लाद
ने देवताओं से पूछा, कि मेरे साथ ऐसा
क्यों हुआ ? देवताओं ने बताया कि आपके शनि अरिष्ट थे। पिप्लाद ने उठाया अपना ब्रह्मदण्ड और शनि के ऊपर‌ प्रहार किया। इसप्रहार से शनि का पैर टूट गया और इनकी गति मन्द हो गयी तथा  नक्षत्र मण्डल से नीचे गिर   आए। शनि भगवान शिव के‌ पास  गए। भगवान शिव ने आकर पिप्लाद को समझाया कि शनि देव का कोई दोष  नहीं है, इन्होंने केवल सृष्टि के 
नियमों का पालन किया है। पिप्लाद ने 
कहा, परन्तु आज‌ से इनका प्रभाव १४
वर्ष से कम आयु के बालक पर नहीं पड़ेगा। शनि पुनः नक्षत्र मण्डल में स्थापित हो गए। आज भी महर्षि पिप्लाद का स्मरण करने से,  तथा पीपल के पेड़ के नीचे पूजा करने से शनि के कष्ट से छुटकारा मिलता है, और
१४ वर्ष की आयु से कम आयु वाले बालक पर ‌शनि का कौई ‌प्र‌भाव नहीं पड़ता है।
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