---:वेद और उपनिषद(६):----

        -----(१६)----:गर्भ उपनिषद:----- 
बच्चों के जन्म से जुड़ा हुआ यह उपनिषद है। यह मानव जीवन को  यज्ञ मानता हैऔर शरीर‌ की तीन अग्नियों का उल्लेख करता है। इसमें गर्भ में पल‌ रहे शिशु के बारे में भी उल्लेख है। इसमें बताया गया है कि पुरुष वीर्य‌ की अधिकता से लड़का एवं महिला वीर्य की अधिकता से लड़की तथा दोनों के समान वीर्य की स्थिति में उभय‌लिंगी बालक का जन्म होता है। बालक‌ के जन्म दोष‌ का‌ कारण गर्भाधान के समय माता-पिता में से किसी एक का चिन्तित होना अथवा आघात‌ से पीड़ित होना माना जाता है। गर्भस्थ शिशु भगवान से वादा करता है कि वह अपने बुरे करमों को नहीं दुहराएगा।
गर्भ उपनिषद‌के प्रमुख श्लोक--(१) सप्तधातुमिति कस्मात् यदा देवदत्तस्यद्रव्यादिविषया जायन्ते। परस्परं सौम्यगुणत्वात् षटविधो रसो रसाच्छोणितं शोणितान्मांसं मांसान्मेदो मेदसः स्रावा स्राव्नोऽस्थीन्यस्थिभ्यो मज्जा‌मज्ज्ञशुक्रं शुक्रशोणितसंयोगादावर्तते गर्भो ह्रदि व्यवस्थां नयति। ह्रदयेऽन्तराग्निः अग्निस्थाने पित्तं पित्तस्थाने वायुः वायुस्थान हृदयं प्राजापत्यात्क्रमात्।
गर्भ उपनिषद--2
भाव--सात धातुओं से निर्मित‌ कैसे हैं? जब देवदत्त नामक व्यक्ति को द्रव्य आदि भोग्य विषय जुड़ते हैं तब उनके परस्पर अनुकूल होने के कारण षट पदार्थ प्राप्त होते हैं जिनसे रस बनता है, रस से रुधिर, रुधिर‌ से मांस, मांस से मेद, मेद से स्रायु, स्रायु से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से शुक्र, ये सात धातुएँ उत्पन्न होती हैं। पुरुष‌ के शुक्राणु और स्त्री के रुधिर (अंडाणु) के संयोग से गर्भ धारण होता है। ये सब‌ धातुएँ हृदय में रहती‌ हैं। हृदय में अन्तराग्नि उत्पन्न होती है। अग्नि स्थान में पित्त, पित्त के स्थान में वायु और वायु से हृदय का निर्माण सृजन क्रम से होता है। गर्भ उपनिषद में गर्भ की स्थिति का वर्णन‌ व्यापक ढंग‌ से किया‌‌ गया है।
(2)  ऋतुकाले सम्प्रयोगादेकरात्रोषितं कलिलं भवति। सप्तरात्रोषितं बुदबुदं भवति। अर्धमासाभ्यन्तरेण पिण्डो भवति।‌ मासाभ्यन्तरेण कठिनो भवति।
मासद्वयेन शिरः सम्पद्यते।
मासत्रयेण पाद प्रवेशो भवति। अथ
चतुर्थे मासे जठर कटि प्रदेशो भवति।
पंचमे मासे पृष्ठवंशो भवति।
षष्ठे मासे मुख नासिकाक्षिश्रोत्राणि
भवन्ति। अष्टमे मासे सर्वसम्पूर्णो भवति।
पितूरेतोअतिरिक्तात पुरुषो भवति।
मातुःरेतोअतिरिक्तात्स्त्रियोभवन्त्यभयोर्बीजतुल्यत्वान्नपुंसको भवति।
व्याकुलितमनसो अन्धःखन्जाः कुब्जा वामना भवन्ति।
अन्योन्यवायुपरिपीडित शुक्रद्वैध्याइविधा
तनुः स्वायत्ततो युग्माः प्रजायन्ते।पञ्चात्मकःसमर्थःपञ्चात्मकतेजसे द्धरश्च समग्यज्ञानात्ध्यानात अक्षरमोंकार
चिन्तयति। तदेतदेकाक्षरं ज्ञात्वाऽष्टो प्रकृतयःषोडशविकाराःशरीरे तस्यैवे
देहिनाम्। अथमात्राऽशितपीतनाडीसूत्र गतेन प्राण आप्यायते। अथनवमेमासि सर्वलक्षण‌सम्पूर्णो भवति पूर्व‌ जातीः
स्मरति कृताकृतं च कर्म विभाति शुभाशुभं च कर्म विन्दति।
गर्भोनिषद--3
 भावार्थ:-
ऋतुकाल में सम्यक प्रकार से गर्भाधान होने पर एक रात्रि में शुक्र शोणित के संयोग‌ से कलल बनता है। सात रात‌ में बुदबुद बनता है। एक पक्ष में उसका पिण्ड (स्थूल आकार में ) बनता ‌है। वह एक ‌मास में‌ कठोर बनता ‌है। दो महीने में वह सिर से युक्त होता है। तीन महीने में पैर बनते हैं । चौथे महीने में पैर की ‌गुट्ठियाँ बनती हैं, पेट तथा कटि  प्रदेश तैयार होते हैं। पाँचवे महीने में
पीठ की रीढ़ तैयार ‌होती है। छठे महीने में मुँह, नाक, आँख और कान बन जाते हैं। सातवें ‌महीने जीव से युक्त होता है।
आठवें महीने सब लछणों से पूर्ण हो जाता है। पिता की शुक्र की अधिकता‌ ‌से पुत्र, माता के रुधिर की अधिकता से पुत्री, शुक्र तथा रुधिर की समानता से
नपुंसक, व्याकुल चित्त होकर समागम
करने ‌से अन्धा, कुबड़ा, लँगड़ा तथा ‌बौनी संतान पैदा ‌होती है। परस्पर वायु के संघर्ष से शुक्र टूट‌कर‌‌ जब दो भागों में बँट जाता ‌है‌‌ तो जुड़वा बच्चे होते हैं। नवें  महीने वह सभी ज्ञानेन्द्रियोे‌ं से युक्त संतान जन्म लेती है। पञ्चभूतात्मक शरीर के समर्थ स्वस्थ होने पर चेतना में पन्च ज्ञानेन्द्रियात्मक बुद्धि होती है। उससे गन्ध रस आदि ज्ञान होते हैं। वह अविनाशी अक्षर ॐकार का चिन्तन करता‌ है। तब‌ इस एकाक्षर को जानकर 
उसी चेतन के शरीर में आठ
 प्रकृतियाँ (पाँच तनमात्राएँ, प्रकृति, महतत्व और अहंकार) तथा सोलह विकार (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच स्थूलभूत तथा मन)/होते हैं। पश्चात माता का खाया हुआ अन्न एवं पिया हुआ जल नाड़ियों के सूत्रों द्वारा पहुँचाया जाकर गर्भस्थ शिशु के प्राणों को तृप्त करता है। तदनन्तर 
नवें महीने वह ज्ञानेन्द्रिय आदि सभी‌ लक्षणों से पूर्ण हो जाता है, तब वह पूर्व जन्म का‌ स्मरण करता‌ है। उसके शुभ-अशुभ कर्म भी उसके सामने आ‌ जाते हैं।
(3) नानायोनिसहस्राणि दृष्ट्वा चैव ततोमया। आहारा विविधाभुक्ताः पीताश्च
विविधाः स्तनाः।।
जातस्यैव मृतस्यैव जन्मचैव पुनः पुनः।
अहो दुःखोदधौ मग्नः न पश्यामि
प्रतिक्रियाम्।।
यन्मया परिजनस्यार्थे कृतं कर्म शुभाशुभम्। एकाकी तेन दह्यामि गतास्ते फलभोगिनः।।
यदि योन्यां प्रमुञ्चामि सांख्यं योगं
समाश्रये। अशुभक्षयकर्तारं फल मुक्ति
प्रदायकम्।।
यदि‌ योन्यां प्रमुञ्चामि तं प्रपद्ये
भगवन्तं नारायणं देवम्। 
अशुभक्षय कर्तारं फल मुक्ति प्रदायकम्।
यदि योन्यां प्रमुञ्चामि ध्याये ब्रह्म सनातनम्।।
अथ‌ जन्तुंः स्त्रीयोनिशतं योनिद्वारि
सम्प्राप्तो यन्त्रेणापीड्यमानो महता दुःखेन जातमात्रस्तु वैष्णवेन वायुना
संस्प्रश्यते तदा न‌ स्मरति जन्ममरणं न
च‌ कर्म शुभाशुभम्।
गर्भ उपनिषद --4
भावार्थ--
तब‌ जीव सोचने लगता है--मैने सहस्रो पूर्व जन्मों‌ को देखा। उनमे नाना प्रकार के भोजन किए, नानाप्रकारके नानायोनियो के स्तनो का पान किया। मैं बारम्बार उत्पन्न हुआ, मृत्यु को प्राप्त हुआ। अपने परिवार वालों के लिए जो मैने शुभाशुभ कर्म किए, उनको सोच कर मैं आज यहाँ अकेला दग्ध हो रहा हूँ। उनके भोगों को भोगने वाले तो चले गए, मैं यहाँ दुख के समुद्र में पड़ा कोई उपाय नहीं देख रहा हूँ। यदि इस‌ योनि से छूट जाऊँगा, इस गर्भ के बाहर निकल गया‌ तो अशुभकर्मों का नाश करने वाले तथा मुक्तिरूप फल प्रदान करने वाले महेश्वर के चरणों का आश्रय लूँगा। यदि मैं इस योनि से छूट जाऊँगा तो अशुभ कर्मों का नाश करने वाले और मुक्तिरूप फल प्रदान करने वाले भगवान नारायण की शरण लूँगा। यदि इस योनि से छूट जाऊँगा तो अशुभ कर्मों का नाश‌करने वाले और मुक्ति रूप फल प्रदान करने वाले सांख्य और योग का अभ्यास करूँगा। यदि मैं इस बार इस‌ योनि से छूट‌ गया तो मैं ब्रह्म का ध्यान करूँगा। पश्चात वह‌‌ योनि द्वार को प्राप्त होकर योनिरूप यन्त्र में दबाया‌ जाकर बड़े कष्ट से जन्म लेता है। बाहर निकलते ही वैष्णवी वायु (माया) के स्पर्श से वह अपने पिछले जन्म और मृत्युओं को भूल‌ जाता‌ है और शुभाशुभ कर्म भी उसके‌ सामने से हट जाते हैं।
(४) शरीरमिति कस्मात् ? साक्षादग्नयो
ह्यत्र श्रियन्ते ज्ञानाग्निर्दर्शानाग्निः कोष्ठाग्निरिति। तत्र कोष्ठाग्निर्नामाशित
पीतलेह्यचोष्यं  पचतीति। दर्शनाग्नी
रूपादीनां दर्शनं करोति। ज्ञानाग्निः शुभाशुभं च कर्म विन्दति। तत्र त्रीणि
स्थानानि भवन्ति। हृदये दक्षिणाग्निरुदरे
गाहर्पत्यं मुखमाहवनीयमात्मा यजमानो
बुद्धिं पत्नीं निधाय मनो ब्रह्मा लोभादयः
 पशवोधृतिर्दीक्षा संतोषश्च बुद्धीन्द्रियाणि
यज्ञपात्राणि कर्मेन्द्रियाणि हवींषि शिरः
कपालं केशा दर्भा मुखमन्तर्वेदिः चतुष्कपालं शिरः षोडश पार्श्वदन्तोष्ठ
पटलानि सप्तोतरं मर्मशतं साशीतिकं सन्धिशतं सनवकं स्नायुशतं सप्तशिरा सतानि पञ्चमज्जाशतानि अस्थीनि च ह
वै त्रीणि शतानि षष्टिश्चार्धचतस्रो रोमाणि कोट्यो हृदयं पलान्यष्टौ द्वादश पलानि
जिह्वा पित्तप्रस्थं कफ स्याढकं शुक्लं कुडवं मेदःप्रस्थौ द्वावनियतं मूत्रपुरीषमाहारपरिमाणात्। पैप्पलादं मोक्ष शास्त्रं परिसमाप्तं पैप्पलादं मोक्ष शास्त्रं परिसमाप्तमिति।
गर्भोपनिषद--(५)
भावार्थ--देह पिण्ड का शरीर नाम कैसे होता है ? इसलिए कि ज्ञानाग्नि, दर्शानाग्नि और जठराग्नि‌ के रूप में अग्नि इसमें आश्रय लेता है। इनमें जठराग्नि वह है जो खाए पिए चाटे और‌ चूसे हुए पदार्थों को पचाता‌है। दर्शाग्नि वह‌ है जो रूपों को दिखलाता है। ज्ञानाग्नि शुभाशुभ कर्मों को सामने खड़ा कर देता है। अग्नि के शरीर में तीन स्थान  हैं--आहवनीय अग्नि मुख में रहता है। गार्हपत्य अग्नि उदर में रहता है और दक्षिणग्नि हृदय में रहता‌ है। आत्मा यजमान है, मन ब्रह्मा है, लोभादि पशु हैं, धैर्य और संतोष दीक्षाएँ हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ यज्ञ के पात्र हैं, कर्मेन्द्रियाँ  हवि (होम करने की सामग्री) है, सिर कपा ल हैं, केश दर्भ हैं, मुख‌ अन्तर्वेदिका है, सिर चतुष्कपाल है।       पार्श्व की दन्तपंक्तियाँ षोडष कपाल हैं, एक सौ सात मर्म स्थान हैं, एक सौ अस्सी संधियाँ हैं, एक‌ सौ नौ स्नायु हैं, सात‌ सौ शिराएँ हैं, पाँच सौ मज्जाएँ हैं, तीन सौ साठ अस्थियाँ हैं, साढ़े चार करोड़ रोम हैं, आठ पल (तोला) हृदय है, द्वादश पल(बारह तोला) जिह्वा है, प्रस्थमात्र(एक सेर) पित्त है, आढक मात्र(अढ़ाई सेर) कफ है, कुण्डव मात्र (पाव भर) शुक्र है तथा दो प्रस्थ(दो सेर) मेद है, इसके अतिरिक्त शरीर में आहार के परिमाण से मल-मूत्र का परिमाण अनियमित‌ होता है। यह पिप्पलाद ऋषि के द्वारा प्रकटित मोक्ष शास्त्र है, पैप्पलाद मोक्ष शास्त्र है।
गर्भ उपनिषद‌ की प्रमुख सूक्तियाँ--
(१) सप्तधातुमिति कस्मात् ?
गर्भ उपनिषद--२
भाव--यह शरीर सप्त धातुओं से निर्मित‌ कैसे है ?
 (२) परस्परं सौम्यगुणत्वात् षटविधो रसो रसाच्छोणितं शोणितान्मांसं मांसान्मेदो मेदसः स्रावा स्राव्नोऽस्थीन्यस्थिभ्यो मज्जा‌मज्ज्ञशुक्रं वर्तते।
गर्भ उपनिषद--२
भाव --परस्पर अनुकूल‌ होने के कारण षट पदार्थ बनते हैं। इनसे‌‌ रस‌‌ बनता‌ है।रस से रुधिर, रुधिर‌ से मांस, मांस से मेद, मेद से स्रायु, स्रायु से अस्थि, अस्थि‌ से मज्जा और मज्जा से शुक्र बनता है। ये सात धातुएँ उत्पन्न‌ होती हैं।
(३) शुक्रशोणितसंयोगादावर्तते गर्भो।गर्भ उपनिषद--२
भाव--पुरुष के‌ शुक्राणु से और स्त्री‌ के रुॉधिर (रज) से गर्भ धारण होता है।
(४) ऋतुकाले सम्प्रयोगादेकरात्रोषितं कलिलं भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--ऋतु काल में सम्यक प्रकार से गर्भाधान होने पर एक रात्रि में कलल बनता है।
(५) सप्तरात्रोषितं बुदबुदं भवति। 
गर्भ उपनिषद--३
भाव--सात रात में बुदबुद बनता है
(६) अर्धमासाभ्यन्तरेण पिण्डो भवति।‌गर्भ उपनिषद--३
भाव--पन्द्रह दिन में पिण्ड बनता है।
 (७) मासाभ्यन्तरेण कठिनो भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव-- एक मास में पिण्ड कठोर बनता है।
(८) मासद्वयेन शिरः सम्पद्यते।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--दो मास में सिर बनता है।
(९) मासत्रयेण पाद प्रवेशो भवति।
गर्भ उपनिषद-३
भाव--तीन मास में पैर बनता है।
(१०) चतुर्थे मासे जठर कटि प्रदेशो भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--चौथे महीने में पैर की गुट्ठियाँ बनती हैं। पेट‌ तथा कटि प्रदेश तैयार होते हैं।
(११) पंचमे मासे पृष्ठवंशो भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--पाँचवे महीने में पीठ की रीढ़ तैयार होती है।
(१२) षष्ठे मासे मुख नासिकाक्षिश्रोत्राणि
भवन्ति। 
गर्भ उपनिषद--३
भाव--छठे मास में मुख,नाक आँख‌ और कान बनता है।
(१३) सप्तमेमासे जीवेन संयुक्तो भवति।गर्भ उपनिषद --३
भाव--सातवें महीने में जीव से युक्त‌ होता है।
(१४) अष्टमे मासे सर्वसम्पूर्णो भवति।गर्भ उपनिषद--३
भाव--आठ महीने में सब लक्षणों से पूर्ण हो जाता है।
(१५) पितूरेतोअतिरिक्तात पुरुषो भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--पिता के शुक्र की अधिकता‌से पुत्र
होता है।
(१६) मातुःरेतोअतिरिक्तात्स्त्रियोभवन्त्य।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--माता के रज की अधिकता से पुत्री होती है।
(१७) उभयोर्बीजतुल्यत्वान्नपुंसको भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--शुक्र और रज के समान अनुपात में होने से नपुंसक सन्तान होती है।
(१८) व्याकुलितमनसो अन्धःखन्जाः कुब्जा वामना भवन्ति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--व्याकुल चित्त‌‌ से समागम होने परउत्पन्न संतान अन्धी, लँगड़ी, कुबड़ी अथवा बौनी होती है। 
(१९) अन्योन्यवायुपरिपीडित शुक्रद्वैध्याइविधा तनुः स्वायत्ततो युग्माः प्रजायन्ते।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--परस्पर वायु के संघर्ष से जब शुक्र टूटकर दो भागों में बँट‌ जाता है तो संतान  जुड़वा होती है।
(२०) नवमे मासि सर्वलक्षणसम्पूर्णो भवति।
गर्भ उपनिषद--३
भाव--नवे महीने वह‌ संतान सभी ज्ञानेन्द्रियों से युक्त‌ जन्म लेती‌ है।
(२१) नानायोनिसहस्राणि दृष्ट्वा।
गर्भ उपनिषद--४
भाव-जीव गर्भ में सोचता है कि मैने सहस्रों पूर्व जन्मों को देखा।
(२२) आहारा विविधाभुक्ताः पीताश्च
विविधाः स्तनाः।
गर्भ उपनिषद--४
भाव--उनमें नाना प्रकार के भोजन किया और नाना योनियों में स्तन पान किया।
(२३) जातस्यैव मृतस्यैव जन्मचैव पुनः पुनः।
गर्भ उपनिषद--४
भाव--मैने बार-बार जन्म लिया और बार-बार मृत्यु को प्राप्त हुआ।
(२४) अहो दुःखोदधौ मग्नः न पश्यामि
प्रतिक्रियाम्।
गर्भ उपनिषद--४
भाव--अरे ! मैं दुख में जल रहा हूँ। कोई मार्ग नहीं दिखायी देता है।
(२५) यन्मया परिजनस्यार्थे कृतं कर्म शुभाशुभम्। एकाकी तेन दह्यामि गतास्ते फलभोगिनः।।
गर्भ उपनिषद--४
भाव--अपने परिवार के लिए जो मैने शुभ अशुभ कर्म किए। उसके फल भोगने में मैं अकेला जल रहा हूँ।
(२५) यदि योन्यां प्रमुञ्चामि सांख्यं योगं
समाश्रये। अशुभ क्षयकर्तारं फलमुक्ति प्रदायकम्।।
गर्भ उपनिषद--४
भाव--यदि मैं इस योनि से बाहर आ गया तो अशुभ कर्मफल का नाश करने वाले और मुक्ति प्रदान करने वाले सांख्य योग का अभ्यास करूँगा।
(२६) यदि योन्यां प्रमुञ्चीमि तं प्रपद्ये
महेश्वरम्।
गर्भ उपनिषद--४
भाव-- यदि मै योनि से बाहर आ गया तो मैं महेश्वर की शरण में जाऊँगा।
(२७) यदि‌ योन्यां प्रमुञ्चामि तं प्रपद्ये
भगवन्तं नारायणं देवम्। 
गर्भ उपनिषद--४
भाव--यदि मैं योनि से बाहर आ गया‌ तो भगवान नारायण के शरण में जाऊँगा।(२८) यदि योन्यां प्रमुञ्चामि ध्याये ब्रह्म सनातनम्।।
गर्भ उपनिषद--४
भाव--यदि मैं योनि से बाहर आ गया तो सनातन ब्रह्म का धंयान करूँगा।
(२९) वैष्णवेन वायुना‌ संस्प्रश्यते तदा न‌ स्मरति जन्ममरणं न च‌ कर्म शुभाशुभम्।गर्भ उपनिषद --4
भावार्थ--बाहर आने पर वैष्णवी वायु (माया) के सम्पर्क में आने से न वह जन्म मरण और न शुभ-अशुभ कर्म याद रहा।
(३०) कोष्ठाग्निर्नामाशित पीतलेह्यचोष्यं  पचतीति।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--जठराग्नि वह है जो खाए, पिए, चाटे और चूसे पदार्थों को पचाता‌ है। (३१) दर्शनाग्नी रूपादीनां दर्शनं करोति।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--दर्शनाग्नि वह‌ हैं‌ जो रूपों को दिखलाता‌ है।
(३२) ज्ञानाग्निः शुभाशुभं च कर्म विन्दति।
गर्भ उपनिषद--५ 
भाव--ज्ञानाग्नि वह है जो शुभ अशुभ कर्मों को सामने ला‌ देता है।
(३३) सप्तोतरं मर्मशतं ।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--शरीर में एक‌ सौ सात(१०७) मर्म स्थान हैं।
(३४) साशीतिकं सन्धिशतं। 
गर्भ उपनिषद--५
भाव--एक‌ सौ अस्सी(१८०) संधि स्थान हैं।
(३५) सनवकं स्नायुशतं।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--एक सौ नौ (१०९) स्नायु हैं।
(३६) सप्तशिरा सतानि ।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--सात‌ सौ(७००) शिराएँ हैं।
(३७) पञ्चमज्जाशतानि अस्थीनि।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--पाँच सौ(५००) मज्जाएँ हैं।
(३८) अस्थीनि ह वै त्रीणि शतानि षष्टिः।गर्भ उपनिषद--५
भाव--तीन सौ(३६०) अस्थियाँ हैं।
(३९) अर्धचतस्रो रोमाणि कोट्यो।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--साढ़े चार‌ करोड़‌ रोम हैं।
(४०) हृदयं पलान्यष्टौ।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--आठ पल(तोला) हृदय‌ है।
(४१) द्वादश पलानिजिह्वा 
गर्भ उपनिषद--५
भाव--बारह पल(तोला) जिह्वा है।
(४२) पित्तप्रस्थं।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--एक सेर पित्त है।
(४२) कफ स्याढकं ।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--ढाई सेर‌ कफ है।
(४३) शुक्लं कुडवं ।
गर्भ उपनिषद--५
भाव--पाव भर शुक्र है।
(४४) मेदःप्रस्थौ द्वावनियतं ।
गर्भ उपनिषद--दो सेर मेदा है।
(४५) मूत्रपुरीषमाहारपरिमाणात्। 
गर्भ उपनिषद--५
भाव-- मल-मूत्र भोजन के परिमाण पर निर्भर है।





 




------(१७)---:क्षुरिक उपनिषद:---
क्षुरिक उपनिषद में २५ मंत्र हैं।
सुषुम्ना ‌तु परे लीना विरजा‌ ब्रह्म रूपिणी
इडा ‌तिष्ठति वामेन पिंगला दक्षिणेन च।
            ‌‌‌‌‌‌                ------१६वाँ मंत्र
भावार्थ:--सुषुम्ना सर्वोच्च में लीन है,और
ब्रह्म रूप  है। इडा़ बाईं ओर तथा पिंगला दायीं और‌ स्थित है।
पाशं छित्वा यथा हंसो निर्विशंकं खमुत्क्रमेत्। छिन्नपाशस्तथा जीवः संसारं तरते सदा। --२२वाँ मंत्र
भावार्थ:-हंस‌ जिस तरह पाश‌ तोड़कर
बिना झिझक आकाश मैं उड़ जाता है,
उसी‌ तरह‌ से बन्धनों को तोड़कर जीव
संसार के पार चला जाता ‌है।
अमृतत्वं समाप्नोति यदा कामात्स मुच्यते। सर्वेषणा विनिर्मुक्तश्छित्वा ‌तं‌ तु
न बध्यत्इत्युपनिषत्।  ---- २४वाँ मंत्र
भावार्थ:--जब वह इच्छा से मुक्त हो जाता‌ है तब वह अमरता को प्राप्त करता है, उपनिषदों में कहा ‌गया ‌है कि
जो सभी कामनाओं से मुक्त हो जाता है 
तो वह शरीर से कट जाता है अर्थात् बँधा नहीं रहता है।
-





(१८) ----:शुक रहस्य उपनिषद:-----
इस उपनिषद में ५३ मंत्र हैं।
उपनयन संस्कार के शुभ अवसर पर
महर्षि वेदव्यास ने भगवान शिव से अपने पुत्र शुकदेव ‌को‌ ब्रह्म रहस्य का
उपदेश देने के लिए‌ आग्रहे किया:--
सर्वज्ञो भवतु क्षिप्रं मम् पुत्रो महेश्वरः।
तव प्रसाद सम्पन्नो लभेनमुक्तिं चतुर्विधाम्।  ----६वाँ मंत्र
भावार्थ:--हे महेश्वर ! मेरा पुत्र शीघ्र ही
सर्वज्ञानी हो और आपके अनुग्रह का ‌पात्र बनकर वह चतुर्विध मुक्ति    (सायुज्य, सामीप्य, सारूप्य ‌और सालोक्य) को प्राप्त हो जाए।
अथ महा वाक्यानि चत्वारि यथा। 
ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म, ॐ अहं ब्रहास्मि, ॐ छईँईळ,तत्त्वमसि, ॐ अयमात्मा ब्रह्म।        तत्त्वमसीत्यभेदवाचकमिदं ये जपन्ति ते
शिव सायुज्य ‌मुक्तिभाजो भवन्ति। 
                --------२२वाँ मंत्र
भावार्थ:-- अब ये चार महावाक्य दिए जाते है:-- प्रज्ञान ही ब्रह्म है, मैं ही ब्रह्म हूँ, वह(ब्रह्म) तू है,‌ यह आत्मा ब्रह्म ‌है।
इनमें से यह तत्तवमसि महा वाक्य ब्रह्म
से अभेद का प्रतिपादन करता है, जो साधक इसका जप (चिन्तन-मनन) करते हैं, वे भगवान  शिव से सायुज्य
मुक्ति का फल प्राप्त करते हैं।

 

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