----:भगवान शिव:-----(१)

कौन हैं भगवान शिव ? इनके माता -पिता कौन हैं  ? देवी पुराण में शिव की उत्पत्ति को लेकर एक आख्यान है ? एक बार नारद ने अपने पिता‌ ब्रह्मा से
पूछा, आप मुझे बताएँ कि इस संसार का सृजन किसने किया ? आपका,
भगवान विष्णु का तथा भगवान शिव 
का जन्म कैसे हुआ ? आपके माता- पिता कौन हैं ? ब्रह्मा जी ने बताया कि
भगवान सदाशिव आदि ब्रह्म हैं। वह ईश्वर हैं। परम ब्रह्म सदाशिव ने अपने शरीर से आदि शक्ति का सृजन किया।
देवी आदि शक्ति ही पार्वती हैं। वही प्रकृति हैं। वही महामाया हैं। भगवान
सदाशिव तथा आदि शक्ति के योग से ही
ब्रह्मा, विष्णु, और शंकर की रचना हुयी।
प्रकृति आदि शक्ति दुर्गा (पार्वती) ही मेरी माता हैं और परब्रह्म सदाशिव मेरे
पिता हैं।
   एक बार ब्रह्मा जी में और विष्णु जी में
झगड़ा हुआ। ब्रह्मा जी कहते थे कि सृष्टि की रचना मैने की है, विष्णु जी कहते थे कि तुम मेरी नाभि से निकले हो। तभी परम ब्रह्म सदाशिव इन दोनों के मध्य प्रगट हुए और‌ कहा कि तुम दोनों ही मेरे पुत्र‌ हो। एक को जगत की उत्पत्ति और दूसरे को पालन का कार्य दिया ‌है। शंकर और रुद्र संहारक हैं। ॐ
मेरा मूल मंत्र है । एक और आख्यान के अनुसार:--
एक बार ब्रह्मा और विष्णु दोनों में
सर्वोच्चता को लेकर लड़ाई छिड़ गयी।
तब ज्योतिर्लिंग रूप काल ने प्रकट होकर कहा, पुत्रों ! तुम दोनों ने तपस्या
करके मुझसे सृष्टि और पालन नामक दो कृत्य प्राप्त किए। इसी प्रकार मेरे विभूति स्वरूप रुद्र(शंकर) ने संहार और महेश्वर ने अकृत्य(तिरोभाव) मुझसे प्राप्त किए।
मैने इनको अपनी समानता(रुद्र और शिव) कोअपने जैसे वाहन, अपने जैसा वेश, हथियार, आसन और कृत्य सब कुछ अपने जैसा ही दिया है।
शिव पुराण में भी एक कथा है कि एक बार तीनों ही देवों में सर्वश्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ। जब विवाद नहीं हल हो सका ‌तभी‌ एक ज्योति‌ फूटी। यह ज्योति निराकार ब्रह्म की थी। ‌एक आवाज आयी--तुम तीनों‌ में से कोई श्रेष्ठ
नहीं। यही ज्योतिर्लिंग हैं। 'एको हि रुद्रो‌' एक ही रुद्र(शिव) है। यहाँ रुद्र का आशय भगवान शिव से है।
 शिव पुराण के अनुसार सदाशिव कहते हैं कि मुझमें, कैलाशपति शिव में, ब्रह्मा
और विष्णु में कोई भेद नहीं है। हम एक ही हैं। सृष्टि के काम के लिए हम अलग-अलग रूप लेते हैं।
ब्रह्मा और विष्णु सदाशिव के आधे अवतार हैं जब‌कि कैलाशपति शिव
सदाशिव के पूर्ण अवतार हैं। सदाशिव
और शिव देखने में एक जैसे हैं। लक्ष्मी, सरस्वती, पार्वती(दुर्गा) आदिशक्ति दुर्गा 
की अवतार‌ हैं। रुद्र का सदाशिव का रूप होने के कारण शिव कहलाए।
शिव पुराण में भोलेनाथ‌ की महिमा, इनके अलग-अलग स्वरूपों का वर्णन,
ज्योतिर्लिंगों का वर्णन, शिव के भोलेपन का वर्णन, शिव विवाह तथा इनके पुत्रों का वर्णन दिया ‌है।
अग्नि पुराण में भी  शिवलिंगों की चर्चा 
आई है।
कूर्म पुराण में शिव की उत्पत्ति का वर्णन
दिया हुआ है।
वायु पुराण में शिव की उपासना की चर्चा अधिक होने के कारण इस पुराण को  शिव पुराण का दूसरा अंग ही माना जाता है।
लिंग पुराण में आपके २८ अवतारों ‌का वर्णन, जीव‌ का जीवन-मरण के भय से
मुक्त होकर आप में लीन होने का वर्णन
और लिंगोद्भव तथा  रुद्रावतार का  वर्णन दिया हुआ है।
सदाशिव(शिव)और शंकर में अंतर:--
(१) शिव ज्योति बिंदु है, जब कि शंकर का शारीरिक आकार है।
(२) शिव सारी सृष्टि का रचयिता है, जबकि शंकर शिव की रचना है।
(३) शिव कल्याणकारी है, जबकि शंकर
संहारकारी ‌है।
(४) शिव परम धाम वासी है, जबकि
शंकर सूक्ष्म वतन वासी है।
(५) शिव‌ की प्रतिमा शिवलिंग‌ है, जबकि शंकर की प्रतिमा शारीरिक आकार की है।
(६) शिव रचयिता ‌है, दाता है, शिव को
किसी की तपस्या करने की जरूरत नहीं है। जबकि शंकर हाथ में माला लिए हुए
तपस्वी के रूप में दिखता है।
(७) शिव के अवतरण को शिवरात्रि कहते हैं, शंकर रात्रि नहीं।
(८) ब्रह्म देवाय नमः, विष्णु देवाय नमः,
शंकर देवाय नमः कहते हैं, जबकि शिव
को देव नहीं कहते हैं। शिव परमात्मा है,
शिव ईश्वर है, इसलिए शिव के लिए शिवाय नमः आता है।
(९) शिव इन तीन देवताओं से तीन अलग-अलग कार्य लेते है:--ब्रह्मा से सृष्टि के रचना का कार्य, विष्णु से‌ सृष्टि
के पालन का कार्य, शंकर‌ से संहार का‌ कार्य, इसीलिए भगवान शिव को त्रिमूर्ति
भी कहते ‌हैं।
शिव के गण:--नंदी, भृंगी, रिटी, टुंडी, श्रृंगी, नन्दिकेश्वर, बेताल, पिशाच, तोतला, भूतनाथ।
शिव ‌की अष्ट मूर्तियाँ:--(१) पृथ्वी मूर्ति--
शर्व (२) जल मूर्ति:--भव (३) तेज मूर्ति:-रुद्र (४) वायु मूर्ति:--उग्र (५) आकाश मूर्ति:--भीम (६) अग्नि मूर्ति:-- पशुपति
(७) सूर्य मूर्ति:--ईशान (८) चन्द्र मूर्ति:--
महादेव।
 शिव के मस्तक पर चन्द्र, गले में सर्प, अर्धनारीश्वर होते हुए भी‌ गृहस्थ, गृहस्थ होते हुए भी शमशानवासी, सौम्य,‌  वीतरागी, आशुतोष होते हुए भी भयंकर
रुद्र। इनका परिवार भी विरोधी भावों को रखता है, परन्तु आपस में सामंजस्य का उत्कृष्ट भाव रखता है:--भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर, मूषक। इस सबके बाद भी आप द्वंद्व मुक्त हैं।
आपका पूजन:--बिल्व पत्र, पुष्प,चंदन आपको प्रिय है। आपका स्नान दूध, दही, घी, गंगाजल, शहद इन पाँच पंचामृत से होता है।
शिव पुराण से उद्धृत द्वादश ज्योतिर्लिंग:
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्री शैले मल्लिका
अर्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालं ॐकारं अमलेश्वरम्। सेतुबन्धे तु रामेशं
नागेशं दारुकावने वारणस्यां तु विश्वेशं
त्रयम्बकं गौतमी तटे। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये। एतानि
ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः सप्त
जन्म कृतं पापं स्मरणेन विनश्यति।
इसका भाव यह है :--
(१) सोमनाथ--सौराष्ट्र, काठियावाड़, गुजरात। (२) मल्लिकार्जुन-- श्री शैल, आँध्र  (३) महाकाल--उज्जैन, म० प्र०
(४) अमलेश्वर--ॐकार में, इंदौर, म०प्र०
(५) वैद्यनाथ-- परली, झारखण्ड (६) भीमशंकर--डाकिनी, पुणे, महाराष्ट्र (७)
रामेश्वर--सेतुबन्ध, तमिलनाडु (८) नागेश्वर--दारुकवन में, द्वारका, गुजरात
(९) विश्वनाथ--वाराणसी, उ० प्र० (१०)
त्रयम्बकेश्वर--गौतमी, गोदावरी के तट पर, महाराष्ट्र (११) केदारनाथ-- हिमालय पर, उ० ख० (१२) घृष्णेश्वर--
शिवालय में दौलताबाद, महाराष्ट्र।
भगवान शिव के १०८ नाम:---(१) शिव (२) महेश्वर (३) शम्भू (४) पिनाकी (५)
शशि शेखर  (६) वामदेव (७) विरुपाक्ष
(८) कपर्दी (९) नील लोहित (१०) शंकर (११) शूलपाणी (१२) खटवांगी
(१३) विष्णुवल्लभ (१४) शिपिविष्ट (१५) अम्बिका नाथ (१६) श्री कण्ठ (१७) भक्तवत्सल (१८) भव (१९)शर्व
(२०) त्रिलोकेश (२१) शितिकण्ठ (२२)
शिवा प्रिय (२३) उग्र (२४) कपाली (२५) कामारि (२६) सुरसूदन (२७) गंगाधर (२८) ललाटाक्ष (२९) महाकाल
(३०) कृपानिथि (३1) भीम (३2) परशुहस्त (33) मृगपाणि‌ (३४) जटाधर
(३५) कैलाशपति (३६)‌ कवची (३७) कठोर (३८) त्रिपुरांतक (३९) वृषांक (४०) वृषभारूढ़ (४१) स्वरमयी भस्मोद्धूलितविग्रह (४२) सामप्रिय (४३)
स्वरमयी (४४) त्रयीमूर्ति (४५) अनीश्वर
(४६) सर्वज्ञ (४७) परमात्मा (४८) हवि
(४९) यज्ञमय (५०) सोम (५१) भर्ग
(५२) पंचवक्त्र (५३) सदाशिव (५४)
विश्वेश्वर (५५) वीरभद्र (५६) गणनाथ
(५७) प्रजापति (५८) हिरण्यरेता (५९)
(६०) दुर्धर्ष (६१) गिरीश  (६२) अनघ
(६३) गिरीश्वर (६४) भुजंगभूषण (६५)
गिरिधन्वा (६६) गिरिप्रिय (६७) रुद्र
(६८) कृतिवासा (६९) पुराराति (७०) भगवान (७१) प्रमथाधिप (७२) प्रमथ नाथ (७३) मृत्युंजय (७४) सूक्ष्मतनु (७५) जगद्व्यापी (७६) जगद्गुरु (७७)
व्योमकेश (७८) महासेनजनक (७९)
चारुविक्रम (८०) भूतपति (८१) स्थाणु (८२) दिगम्बर (८३) अष्टमूर्ति (८३) (८४)अनेकात्मा (८५) सात्विक (८६)
शुद्धविग्रह (८७) शाश्वत (८८) खण्डपरशु (८९) अज (९०) मृड (९१) पाशविमोचन (९२) पशुपति (९३) देव
(९४) महादेव (९५) अव्यय (९६) हरि
९७) अव्यग्र (९८) हर (९९) अव्यक्त (१००) सहस्राक्ष (१०१) सहस्रपाद (१०२) अनंत (१०३) तारक (१०४) परमेश्वर (१०५) अपवर्गप्रद (१०६)
भगनेत्रभिद् (१०७) पूषदंतभिद् (१०८)
अहिर्बुध्न्य।
सत्यम् शिवम् सुन्दरम्। सत्य के बिना शिव नहीं, शिव के बिना सुन्दर नहीं और
सुन्दर के बिना जीवन व्यर्थ। यही तीन शब्द जीवन का मूल है। यही तीन अक्षर
भगवान शिव को प्रिय है। शिव हैं क्या ?
शिव हमारे चारों ओर हैं। हम जो भी आचरण करते हैं, हम जो भी व्यवहार करते हैं, हम जो भी कर्म करते हैं, हम जो भी भोगते हैं, हम मरते हैं, हम जीते हैं, इस सबके मूल में शिव हैं। शिव के बिना प्रकृति नहीं, शिव के बिना प्रवृत्ति नहीं, जीवन नहीं, मृत्यु नहीं। शिव कण-कण में हैं। शिव आदि हैं, शिव‌ अनन्त हैं। शिव हमारा आलोक है, शिव हमारा भूमण्डल है। भगवान शिव ही हमें मरना और जीना सिखाते हैं। शिव ही बहुवाद से हटाकर हमें बताते हैं कि ईश्वर एक है। उसका रंग रूप और आकार नहीं है।
एक ही रुद्र है कोई दूसरा नहीं। शिव का एक ही महामंत्र है ॐ (अ उ म) अ, अकार यानी मस्तिष्क। उ, उकार यानी
उदर। म, मकार यानी मोक्ष। यह ॐ ही सर्वव्यापक है। भगवान शिव का अर्थ है:--
भ = भूमि, ग = गगन, व = वायु, अ = अग्नि, न = नीर। शिव का अर्थ है:- कर्मों की श्रेष्ठता। जन्म से मोक्ष तक जो साथ
साथ रहे वही शिव है।
भगवान शिव का पञ्चाक्षरी मंत्र:--
            'नमः शिवाय'
यह मूलमंत्र भी कहलाता ‌है।
आदि शंकराचार्य द्वारा लिखित पञ्चाक्षरी स्तोत्र:-- आचार्य मच्छंकर द्वारा रचित------ 
(१) नागेन्द्र हाराय त्रिलोचनाय भस्मांगरागाय महेश्वराय। नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै न काराय‌ नमः  शिवाय।
भावार्थ:-जो शिव नागराज वासुकि का
हार पहने हुए हैं, तीन नेत्रों वाले हैं, तथा भस्म‌ की राख को सारे शरीर में लगाए हुए हैं इस प्रकार महान ऐश्वर्य सम्पन्न वे
नित्य हैं शुद्ध हैं, दिशाएँ जिनके वस्त्रों का कार्य करती ‌हैं, ऐसे नकार स्वरूप शिव को मैं नमस्कार करता हूँ।
(२) मन्दाकिनी सलिल चन्दन च अर्चिताय नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय। मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मै म काराय नमः शिवाय।
भावार्थ:-जो मंदाकिनी के पवित्र जल से
संयुक्त हैं, तथा चन्दन से सुशोभित हैं।
नन्दीश्वर, प्रमथनाथ आदि गण आदि गण जिनकी सुरक्षा में हैं, जो मन्दार, पारिजात आदि अनेक पुष्पों द्वारा पूजित हैं, ऐसे म कार शिव को नमस्कार करता हूँ।
(३) शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय। श्री नीलकण्ठाय
वृषभध्वजाय तस्मै शि काराय नमः शिवाय।
भावार्थ:-जो शिव स्वयं कल्याण स्वरूप ‌हैं। जो पार्बती के मुख कमल को विकसित करने के लिए सूर्य हैं। जो दक्ष
प्रजापती के यज्ञ को नष्ट करने वाले हैं।
नील वर्ण का जिनका कण्ठ है। जो वृषभ पताका वाले हैं, ऐसे‌ शिकार‌ शिव
को मैं नमस्कार‌ करता ‌हूँ।
(४) वशिष्ठ कुम्भोद्भव‌गौतमार्य मुनीन्द्र देवार्चित शेखराय। चन्द्रार्कवैश्वानर लोचनाय तस्मै व काराय नमः शिवाय।
भावार्थ:--वशिष्ठ, अगस्त्य, गौतम आदि श्रेष्ठ मुनीन्द्र वृन्दों से तथा देवताओं से जिनका मस्तक पूजा‌ जाता है और जो सूर्य, चन्द्र वा अग्नि रूप तीन नेत्रों वाले हैं, ऐसे व कार शिव को मैं नमस्कार करता हूँ।
(५) यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाक हस्ताय सनातनाय। दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै य काराय नमः शिवाय।
भावार्थ:-यक्ष का जिनका अवतार है,
जिनके जटाएँ हैं, जिनके हाथ में पिनाक है,‌ जो नित्य हैं, शुद्ध हैं, जो‌ दिगम्बर हैं, चारों‌ दिशाएँ जिनके वस्त्र हैं, ऐसे य कार शिव को मैं नमस्कार करता ‌हूँ।
शिव षडाक्षर स्तोत्र(ॐ नमः शिवाय)--
 ॐकारं बिन्दु संयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः। कामदं मोक्षदं चैव ॐ काराय
नमो नमः।
भावार्थ-- जो ॐकार के रूप में हृदय में विद्यमान हैं, जिन्हें योगी निरन्तर ध्यान करते हैं। जो इच्छाओं की पूर्ति करने वाले हैं और जो मुक्ति प्रदान करने वाले हैं, ऐसे भगवान शिव को हम प्रणाम् करते हैं जिन्हें ॐ अक्षर से वर्णित किया
गया है।
नमंति ऋषियो देवा नमन्त्यप्सरां  गणाः। नरा नमन्ति देवेशं  नकाराय नमो नमः।
भावार्थ---
जिन्हें ऋषिगण, देवगण, अप्सराएँ, मनुष्यगण प्रणाम करते हैं ऐसे देवाधि देव भगवान शिव को हम प्रणाम करते हैं और जिन्हें न अक्षर से वर्णित किया गया है।
महादेवं महात्मानं महाध्यानं परायणं।
महापाप हरं देवं मकाराय नमो नमः।
भावार्थ--कौन है महादेव ? कौन है महात्मा ? कौन है ध्यान का परम लक्ष्य ? वह जो पापों का करने वाले हैं, ऐसे 
भगवान शिव को हम प्रणाम करते हैं।
जिन्हें म अक्षर से वर्णित किया गया है।
शिवं शान्तं जगन्नाथं लोकानुग्रह कारकम्। शिवमेकं पदं नित्यं शिकाराय नमो नमः।
भावार्थ--जो शुभ है, शान्त है, जगत का स्वामी है। जगत के कल्याण के लिए कार्य करता है‌, जो एक शाश्वत शब्द है।
ऐसे भगवान शिव को हम प्रणाम करते हैं। जिन्हें शि शब्द से वर्णित‌ किया है।
वाहनं वृषभो यस्य वासुकिः कण्ठ भूषणम्। वामे शक्ति धरं देवं वकाराय नमो नमः।
भावार्थ--जिनके वाहन नन्दी, जिनके कण्ठभूषण वासुकि हैं जिनके बायीं ओर देवि शक्ति विद्यमान हैं, ऐसे भगवान शिव को हम प्रणाम करते हैं।
जिन्हें व अक्षर से वर्णित किया गया है।
यत्र यत्र स्थितो देवः सर्वव्यापी महेश्वरः।
यो गुरुः सर्वदेवानां यकाराय नमो नमः।
भावार्थ--जो हर स्थान पर विद्यमान है, सर्वव्यापी है। देवताओं का गुरू है। ऐसे
भगवान शिव को हम प्रणाम करते हैं, जिन्हें य अक्षर से वर्णित किया गया है।
महाकाल स्तोत्र-----
अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सज्जनानाम्। अकालमृत्योः परिरक्षणार्थं वन्दे महाकाल महासुरेशम्।
भावार्थ:--महाकाल के नाम से विख्यात  महादेव जी को मैं नमन करता हूँ, जिन्होंने संतो को मोक्ष प्रदान करने के लिए अवन्तिकापुरी उज्जैन में अवतार लिया है।
जय जय हे शिव दर्पक दाहक  दैत्य  विघातक भूतपते। दशमुख नायक शायक दायक काल भयानक भक्तगते।
त्रिभुवन कारक धारक मारक संसृति कारक धीरमते। हरि गुण गायक ताण्डव
नायक मोक्ष विधायक योगरते।
भावार्थ--हे मदन दाहक, दैत्य मर्दक, अर्जुन को धनुष देने वाले, काल को भयभीत करने वाले, हे भक्तों के आश्रय देने वाले, त्रिभुवन के जनक, धारक, मारक हे धीरमति, हरि गुण गायक, ताण्डव नायक, मोक्ष प्रदायक, योगपरायण हे भगवान शिव आपकी जय हो, जय हो।
महामृत्युंजय मन्त्र:--एक पौराणिक कथा है कि एक मृकंडू नाम के एक ऋषि थे।
निःसन्तान होने के कारण वह और उनकी पत्नी मरुदमती बहुत दुखी रहते थे। इन्होंने सन्तान प्राप्ति की कामना से
घोर तपस्या की। प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और वरदान‌ माँगने के लिए ‌कहा। मृकण्डू ने कहा, भगवन् ! हमें पुत्र चाहिए। शिव ने पूछा, कैसा 
पुत्र ? मूर्ख दीर्घायु अथवा बुद्धिमान 
अल्पायु। मृकण्डू ने बुद्धिमान अल्पायु
पुत्र को भगवान शिव से माँग लिया। एक सुन्दर और बुद्धिमान पुत्र हुआ। इसका नाम मार्कण्डेय रखा। मार्कण्डेय
भगवान शिव के शरण‌‌ में गए और महा
मृत्युंजय मंत्र की रचना की। निश्चित समय पर यमराज आए परन्तु मंत्र के प्रभाव से वापस चले गए।
महामृत्युंजय मंत्र:--
त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मा मृतात्। -----यजुर्वेद
महर्षि वशिष्ठ के अनुसार इसमें ३३ अक्षर हैं। इसमें निम्नलिखित ३३ देवताओं की शक्तियाँ निहित हैं। वसु=८ रुद्र=११, आदित्य=१२, प्रजापति =१
षटकार=१।
श्लोक का भावार्थ:-- हम त्रिनेत्रधारी  भगवान शिव का पूजन करते हैं, जो
सुगन्धित हैं (कीर्तिवान हैं) और हमारा
पोषण करते हैं, जिस प्रकार ककड़ी का
फल पक जाने पर अपनी शाखा के बन्धन से मुक्त हो‌ जाता ‌है, उसी प्रकार
हम भी मृत्यु और नश्वरता ‌से मुक्त‌ हो जाएँ।
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