महर्षि कुषीतक के पुत्र कौषीतकि के नाम पर यह उपनिषद कौषीतकि उपनिषद कहलाता है।
यह उपनिषद ऋगुवेद के अन्तर्गत आता है। इसमें चार अध्याय हैं। जिसमें जीवात्मा और ब्रह्मलोक की व्याख्या की गयी है। प्राणतत्व की महिमा बतायी गयी है। सूर्य, चन्द्र, मेघ, विद्युत, आकाश, वायु, अग्नि, जल, दर्पण, प्रतिध्वनि तथा चैतन्य तत्व पर प्रकाश डाला गया है। अन्त में आत्मतत्व के स्वरूप और उसकी उपासना से प्राप्त फल पर भी विचार किया गया है। अब हम अलग- अलग अध्यायों की चर्चा क्रमशः आगे करेंगे:--
(१) चित्रो ह वै गार्ग्यायणिर्यक्षमाण आरुणिं वव्रे स ह पुत्रं श्वेतुकेतुं प्रजिघाय याजयेति तं हासीनं पप्रच्छ गौतमस्य
पुत्रास्ते संवृतं लोके यस्मिनमाधास्यन्यमहो बद्ध्वा तस्य लोके धास्यसीति स हो वाच नाहमेतद्वेद हन्ताचार्यं प्रच्छानीति स ह
पितरमासाद्य पप्रच्छेतीति मा प्राक्षीत्कथं
प्रतिब्रवाणीति स होवाचाहमप्येतन्न वेद
सदस्येव वयं स्वाध्यायमधीत्य हरामहेयन्नः परे ददत्येहयुभौ गमिष्याव इति। स ह समित्यपाणिश्चित्रं गार्ग्यायणिं
प्रतिचक्रम उपायानीति तं होवाच ब्रह्मार्होसि गौतम यो मामुपागा एहित्वा
ज्ञपयिष्मामीति।
कौषीतकि उपनिषद--१
भाव--गर्ग के प्रपौत्र सुप्रसिद्ध महात्मा चित्र यज्ञ करने वाले थे। इसके लिए उन्होंने अरुण के पुत्र उद्दालक (गौतम)
को प्रधान ऋत्विक के रूप में वरण किया। परन्तु उन प्रसिद्ध उद्दालक मुनि ने स्वयं न पधारकर अपने पुत्र श्वेतकेतु को भेजा और कहा, वत्स! तुम जाकर
प्रथम अध्याय:--इसमें गौतम ऋषि (उद्दालक) एवं गर्ग ऋषि के प्रपौत्र चित्र के संवादों द्वारा ब्रह्मज्ञान के लिए किए जाने वाले अग्निहोत्र तथा उसके फल का वर्णन किया गया है। जब मृत्यु के बाद साधक ब्रह्मलोक पहुँचता है,तो वह
ब्रह्मा से मिलता है जो एक अनुपम पलंग पर बैठे रहते हैं। साधक ब्रह्मा से बात करता है, इस बात को पर्यंक विद्या
भी कहते हैं। महर्षि चित्र यज्ञ करने का निश्चय करते हैं, और अरुण पुत्र गौतम
को प्रधान ऋत्विक के रूप में आमंत्रित करते हैं, परन्तु ऋषि गौतम स्वयं न आकर अपने पुत्र श्वेतकेतु को भेजते हैं।
चित्र श्वेतकेतु से प्रश्न करते हैं। उत्तर न जानने के कारण वे व्यास आसन से उतरकर नीचे आ जाते हैं और कहते हैं, इस प्रश्न का उत्तर हमें नहीं आता है। हम इसका उत्तर अपने पिता से पूछ कर
बताएँगे। ऐसा कहकर श्वेतुकेतु अपने पिता के पास आते हैं और उस प्रश्न का
उत्तर पिता से पूछते हैं। पिता ने कहा, इस प्रश्न का उत्तर तो मुझे भी नहींआता
है। गौतम ने पुत्र से फिर कहा, हम दोनों महर्षि चित्र की यज्ञशाला में चलकर इसका उत्तर जानेंगे। दोनों पिता-पुत्र समिधा लेकर चित्र की यज्ञशाला में पहुँचे। चित्र ने कहा, हे विप्रवर ! जो व्यक्ति यज्ञादि का अनुष्ठान करते हैं, वे इस लोक से चन्द्र लोक(स्वर्ग लोक) की ओर गमन करते हैं, परन्तु जो व्यक्ति स्वर्गीय सुख के प्रति आसक्त होकर
स्वर्गलोक(चन्द्र लोक) को स्वीकार कर
लेता है, उसके सभी पुण्य नष्ट होने पर
वह पुनः धरती पर वापस आ जाता है, उसे मोक्ष नहीं मिल पाता। गौतम ने प्रश्न किया, भगवन् ! मुझे बताएँ कि मैं कौन हूँ ? मुझे मोक्ष किस प्रकार मिल सकता है ? महर्षि चित्र ने ब्रह्म ज्ञान का उपदेश दिया। जीवात्मा इस लोक से ब्रह्मलोक तक दो मार्गों से ही जा सकता है, (१)
पितृयान मार्ग (२) देवयान मार्ग। पितृ यान मार्ग से जाने वाले साधक का बार-बार जन्म होता है। इसे मोक्ष नहीं मिलता है। परन्तु देवयान मार्ग से जाने
वाले साधक को बार-बार जन्म नहीं लेना होता है। उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है। महर्षि चित्र ने कहा, देवयान मार्ग से जाने वाला साधक क्रमशः अग्निलोक,
वायुलोक, सूर्य लोक, वरुण लोक, इन्द्रलोक वा प्रजापतिलोक आदि छः लोकों से होता हुआ वह ब्रह्मलोक में प्रवेश कर जाता है। ब्रह्मलोक के प्रवेश
द्वार पर 'अर' नाम का जलाशय है। यह
जलाशय काम, क्रोध, मोह आदि शत्रुओं
द्वारा निर्मित है। यहाँ पल भर का भी अहंकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मात्सर्य आदि सभी पुण्यों को नष्ट कर डालता है। लक्ष्य प्राप्ति में यह जलाशय बड़ी बाधा है। परन्तु जो इसे पार कर लेता है वह विरजा नदी के पुलिन पर पहुँच जाता है। इस नदी के दर्शन से ही वृद्धावस्था के समस्त कष्ट समाप्त हो जाते हैं। इसके आगे एक इल्य नाम का
वृक्ष है तथा यहाँ पर देवताओं के उपवन, कूप, सरोवर,नदी और जलाशय से युक्त नगर है जो कि विरजा नदी और
अर्ध चन्द्राकार परकोटे से घिरा है। ये सभी मन को मोहने वाला होता है। परन्तु जो साधक इसमें लिप्त नहीं होता
है, और आगे बढ़ जाता है, उसे 'अपराजिता' नाम का ब्रह्मा जी का विशाल देवालय मिलता है। सूर्य की प्रखर रश्मियाँ, मेघ, यज्ञ युक्त वायु तथा
इंद्र और प्रजापति द्वारा ऱक्षित आकाश को बिना मोहित हुए पार कर जाता है, तब वह ब्रह्म लोक में प्रवेश करता है। वहाँ पर विचक्षणा नामक वेदी पर सर्व
शक्तिमान ब्रह्मा जी एक अति सन्दर पलंग पर विराजमान दिखायी पड़ते हैं।
ब्रह्मा जी साधक से कुछ प्रश्न करते हैं।
प्रश्न का उत्तर देने के बाद ब्रह्मा जी कहते हैं। तुम मेरे उपासक हो। इसलिए यह तुम्हारा भी लोक है। ब्रह्मज्ञान की शिक्षा प्राप्त करके गौतम अपने पुत्र श्वेतकेतु के साथ महर्षि चित्र को प्रणाम करके लौट आए।
द्वितीय अध्याय:-इस अध्याय में प्राण तत्व की उपासना, अपने पाप नष्ट करने के लिए सूर्य उपासना, पुत्र की कुशलता के लिए चन्द्र उपासना,अपनी स्वास्थ्य के लिए सोम उपासना, मोक्ष प्राप्ति के लिए प्राण उपासना का वर्णन किया गया है।
तीसरा अध्याय:--इस अध्याय में इंद्र और राजा दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के संवाद द्वारा प्राण को प्रज्ञास्वरूप बताया है और कहा है कि इस प्रज्ञा से ही लोकहित सम्भव है।
सुषुप्त अवस्था में जब मनुष्य सोया हुआ रहता है तब सभी इंद्रियाँ और ज्ञान
प्राण में समाहित हो जाते हैं। लेकिन जब वह जागता है तब सभी प्रकार का
ज्ञान प्राण से निकल करअपनी-अपनी इंद्रियों में समा जाता है और सुषुप्त इंद्रियाँ सजग हो जाती हैं। इस उदाहरण को उपनिषद में मरणासन्न व्यक्ति अथवा ध्यानावस्थ योगी के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है। शरीर में प्राण ही वह प्रज्ञा है और प्रज्ञा ही वह प्राण है जो एक साथ इस शरीर में निवास करते हैं।
शरीर की समस्त इंद्रियों का संचालन
इन्हीं के द्वारा होता है। यह प्रज्ञा अथवा प्राण ही परमात्मा का आनन्दस्वरूप है।
यही समस्त लोकों का अधिपति है और यही सबका स्वामी है। यही हमारा आत्मा है। इसे जानकर ही हम ईश्वर कि उपस्थिति का अनुभव कर सकते हैंं।
चतुर्थ अध्याय:-इसमें गार्ग्य ऋषि और काशी नरेश अजातशत्रु के मध्य हुए वार्तालाप को आधार बनाकर ब्रह्माण्ड की विविध शक्तियों का वर्णन किया गया है, तथा आत्मा को ही ब्रह्म माना गया ह----
(१०)-:-बृहदारण्यक उपनिषद:---यह उपनिषद शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत आता है और ज्ञानयोग द्वैत-अद्वैत सिद्धान्त पर आधारित है। यह आकार में सबसे बड़ा उपनिषद है ।इसमें छः अध्याय हैं। और ४७ ब्राह्मण हैं। इसमें ३ काण्ड हैं:--(१) मधु काण्ड (२) मुनि काण्ड (३) खिल काण्ड। पहले अध्याय में = ६ ब्राह्मण, दूसरे अध्याय में
=६ ब्राह्मण, तीसरे अध्याय में=९ ब्राह्मण
चौथे अध्याय में =६ ब्राह्मण, पाँचवे अध्याय में = १५ ब्राह्मण, छठे अध्याय में =५ ब्राह्मण हैं। (१) पहला अध्याय:-अब हम पहले अध्याय के ब्राह्मणों का अलग -अलग विवरण प्रस्तुत करेंगे।
पहला ब्राह्मण:-इस ब्राह्मण में सृष्टि रूपी
यज्ञ को अश्व से उपमा दी गयी है।
दूसरा ब्राह्मण:--प्रलय के बाद सृष्टि की
उत्पत्ति का वर्णन किया गया है।
तीसरा ब्राह्मण:-- देवों और असुरों के प्रसंग से प्राण की महिमा और उसके भेद की व्याख्या की गयी है।
चौथा ब्राह्मण:--ब्रह्म को सर्व रूप कहकर उसके चार वर्गों के विकास का
उल्लेख किया गया है।
पाँचवा और छठा ब्राह्मण:-इनमें विभिन्न
अन्नों की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है। मन, वाणी और प्राण के महत्व का उल्लेख किया गया है तथा नाम, रूप एवं कर्म की प्रतिष्ठा की गयी है।
(२) दूसरा अध्याय:--दूसरे अध्याय में ६
ब्राह्मण हैं।
पहला ब्राह्मण:- डींग हाँकने वाले गार्ग्य
बालाकि तथा ज्ञानी राजा अजातशत्रु के
द्वारा ब्रह्म तथा आत्म तत्व को स्पष्ट किया गया है।
दूसरा ब्राह्मण और तीसरा ब्राह्मण:-प्राण
की उपासना तथा ब्रह्म के दो रूपों
(मूर्त रूप और अमूर्त रूप) का वर्णन किया गया है।
(1) द्वे वाव ब्राह्मणो रूपे मूर्तं चैवामूर्तं च।
बृहदा उप--अध्याय-2 ब्रा०-३,
भावार्थ:--निराकार एवं साकार ब्रह्म के दो स्वरुप होते हैं।
चौथा ब्राह्मण:--महर्षि यागवल्क्य और विदुषी मैत्रेयी का संवाद दिया गया है।
पाँचवाँ और छठा ब्राह्मण:- इसमें मधु विद्या तथा इसकी परम्परा का वर्णन किया गया है।
(2) न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति। न वा अरे जायायै कामाय जाया
प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति। न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति।
बृहदा उप-(अ०२,ब्रा०४श्लो५)
भावार्थ:--याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा, " अरे मैत्रेयी ! पति, पत्नी, बाप, बेटा आदि दूसरे के सुख के लिए प्रेम नहीं करते, सभी अपने सुख के लिए ही दूसरे से प्रेम करते हैं।
(3) यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति तदितर
इतरं श्रृणोति तदितर इतरमभिवदति
तदितर इतरं मनुते तदितर इतरं विजानाति। यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवा भूत्तत्केन कं जिघ्रत्तत्केन कं पश्येत्तत्केन
कं श्रृणुयात्तत्केन कमभिवदेत्तत्केन कं
मन्वीत तत्केन कं विजानीयात। येनेदं सर्वंविजानाति तं केन विजानीयाद्विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति।
बृहदा-अध्या-२ब्रा०४श्लो१४
भावार्थ:-- याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा, " निश्चित ही जहाँ द्वैत भाव सा होता है, वहाँ दूसरा दूसरे को सूँघता है,
वहाँ दूसरा दूसरे को देखता है, वहाँ दूसरा दूसरे को सुनता है, वहाँ दूसरा दूसरे को कहता है, वहाँ दूसरा दूसरे को जानता है, किन्तु(यत्र वा अस्य सर्वं एव) जहाँ सब कुछ आत्मा हो गया(तत् तेन कम्
जिघ्रेत) तब किससे किसको सूँघे ?, तब किससे किसको देखे? तब किससे किसको सुने ? तब किससे किसको कहे? तब किससे किसको विचारे ? तब किससे किसको जाने ? जिससे यह सब जाना जाता है, उसको किससे जानें। हे मैत्रेयी ! सब कुछ जानने वाले को कैसे जानें ?"
(३) तीसरा अध्याय:-इसमें ९ ब्राह्मण हैं।
राजाजनक के यज्ञ में महर्षि यागवल्क्य
से तत्ववेत्ताओं की प्रश्नोत्तरी दी गयी है।
विदुषी गार्गी ने दो प्रश्न किए। पहली बार
अति प्रश्न करने पर इन्हें मस्तक गिरने की बात कहकर रोका गया। गार्गी ने
सभा कि अनुमति के बाद दो प्रश्न किए
तथा समाधान पाकर वहाँ सभा में उपस्थिति लोगों से कहा, " इनसे कोई नहीं जीत जाएगा।" किन्तु शाकल्य
विदग्ध नहीं माने और अति प्रश्न करने
के कारण उनका मस्तक गिर गया।
चौथा अध्याय:--इसमें ६ ब्राह्मण हैं।
इनमें महर्षि याज्ञवल्क्य और जनक का संवाद तथा महर्षि याज्ञवल्क्य और विदुषी मैत्रेयी का संवाद दिया है।
पाँचवाँ अध्याय :--इसमें १५ ब्राह्मण हैं।
विविध रूपों में ब्रह्म की उपासना की गयी है। मनोमय पुरुष और वाक् की उपासना तथा मरने के बाद ऊर्ध्व गति के साथ अन्न और प्राण की उपासना की
गयी है। गायत्री मंत्र कि उपासना में
जपनीय तीन चरणों के साथ चौथे पद का भी उल्लेख किया गया है।
छठा अध्याय:--५ ब्राह्मण हैं। इसमें प्राण की श्रेष्ठता का तथा संतानोत्पत्ति के विज्ञान का वर्णन किया गया है। अंत में आचार्यों की श्रंखला दी गयी है।
उपनिषद के कुछ और प्रमुख श्लोक:--
(1) ॐ असतो मा सद् गमय। तमसो मा
ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। बृहदा उप-१/३/२८
इसका भाव यह है:-मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से
अमरता की ओर ले चलो।
(2)अहं ब्रह्मास्मि।
बृहदा उप --१/४/१०
इसका भाव यह है:- मैं ब्रह्म हूँ, तथा
भूतात्माएँ और मैं एक हूँ। उसके दृष्टा और दृष्टि, ज्ञाता और ज्ञेय इत्यादि भेद जब विलीन हो जाते हैं तब उसके प्राण
उत्क्रमण नहीं करते और वह जीवन्मुक्त हो जाता है।
(3)ॐ पूर्ण मदः पूर्ण मिदम् पूर्णांत् पूर्णं उदच्यते। पूर्णस्य पूर्ण मादाय पूर्णमेव
अवशिष्यते।
बृहदा उप--५/१//१
इस का भाव यह है:-परमात्मा सभी प्रकार से पूर्ण है। यह जगत भी उसी परमात्मा से ही पूर्ण है। यह पूर्ण(जगत)
उसी पूर्ण (परमात्मा) से उत्पन्न हुआ है। उस पूर्ण में से पूर्ण निकाल देने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।
नेति नेति का याज्ञवल्क्य का सिद्धान्त मुनिखण्ड में दिया हुआ है। महर्षि याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से ब्रह्म की व्याख्या
करते हुए नेति नेति के सिद्धान्त की बात कही है। इस सिद्धान्त ये अनुसार मान लिया हमें सत्य को जानना है तो इसके
लिए अन्य विकल्पों को नेति नेति (यह नहीं, यह नहीं) कहकर नकारना होता है और जो शेष बचता है, वह सत्य है।
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----(११)---:श्वेताश्वतर उपनिषद:---
यह उपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत आता है। इसमें ६ अध्याय हैं और ११३ मंत्र हैं। पहले अध्याय में=१६ मंत्र, दूसरे अध्याय में =१७ मंत्र, तीसरे
अध्याय में =२१ मंत्र, चौथे अध्याय में=
२२ मंत्र, पाँचवे अध्याय में = १४ मंत्र
और छठे अध्याय में =२३ मंत्र हैं। छठे
अध्याय के अंतिम ३ मंत्र उपसंहार के हैं
इस तरह कुल ११० ही मंत्र इस उपनिषद के कहे जा सकते हैं। ऋषि श्वेताश्वतर के नाम पर इस उपनिषद का नाम रखा गया है। इस सृष्टि का कारण ब्रह्म है। हम कहाँ से आए हैं ?हम किस आधार पर ठहरे हैं ? हमारी अंतिम स्थिति क्या होगी ? हमारे सुख-दुख का कारण क्या है ? जीव-जगत तथा ब्रह्म के स्वरूप और ब्रह्म के साधन क्या हैं ? इसकी व्याख्या की गयी है। यह उपनिषद योगिक अवधारणा की भी व्याख्या करता है। बह्म की शक्ति को ही प्रकृति अथवा माया कहते हैं।
यह अज और अनादि है तथा परमात्मा के अधीन है, यह स्वतंत्र नहीं है। जगत माया का प्रपंच है, वह क्षर अनित्य है। मूलतः जीवात्मा ब्रह्म स्वरूप है, परन्तु माया के वशीभूत होने के कारण अपने कोउससे पृथक मानता हुआ नानाप्रकार के कर्म करता है, तथा इन कर्मों के फल को भुगतने के लिएबार-बार जन्म लेताहै
और सुख-दुख के आवर्त में अपने को घिरा हुआ पाता है। संसार में जन्म-मरण
का क्रम निरंतर चल रहा है। इसे ब्रह्म चक्र अथवा विश्वमाया कहा गया है।जब
तक अविद्या के कारण जीव अपने को
भोक्ता, जगत को भोग्य, और ईश्वर को
प्रेरित मानता है, वह ब्रह्म चक्र से मुक्त नहीं हो सकता। सुख -दुख की निवृत्ति
तथा अमृत्तत्व की प्राप्ति का एक मात्र उपाय जीवात्मा और ब्रह्म का अभेदात्मक ज्ञान है। ज्ञान के बिना ब्रह्म
की उपलब्धि आकाश की चटाई बनाकर
लपेटने जैसा असंभव है।-६/१५/२०
निर्विशेष ब्रह्म का चिन्तन अत्यंत दुस्तर
होने से मनुष्य की आध्यात्मिक पहुँच के ॐ अनुसार अधिक दुःसाध्य होने से सगुण
और सगुण-निर्गुणरुप से उपासना का
विस्तार हुआ है। द्वितीय अध्याय में
प्राणायाम और योगाभ्यास की विधि
विस्तार पूर्वक बतायी गयी है।
श्वेताश्वतर उपनिषद के प्रमुख श्लोक -----
(1) शान्ति मंत्र:-श्वेताश्वतरउपनिषद के प्रथम अध्याय के पूर्व यह मंत्र दिया हुआ है।
ॐ सहना ववतु सहनौ भुनक्तु सः वीर्यं
करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
श्वेताश्वतर उपनिषद--शान्ति मंत्र
इसका भाव यह है:-
वह(परमात्मा) हम दोनों की साथ-साथ
रक्षा करें। हम दोनों का साथ-साथ पालन करें। हम साथ-साथ विद्या संबंधी
सामर्थ्य प्राप्त करें। हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो। हम द्वेष न करें।त्रिविधि आपकी शान्ति हो।
(2) तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था
विद्यतेऽयनाय।
श्वेताश्वतर उपनिषद-----३/८
भावार्थ:- उस परमात्मा को जानकर व्यक्ति मृत्यु को जीत लेता है। मुक्ति प्राप्ति का इससे भिन्न कोई उपाय नहीं।
(3) नव द्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः।
श्वेताश्वतर उपनिषद- 3/18 इसका भाव यह है:-- परमात्मा नव द्वार वाले इस शरीरी नगर में स्थित है।
(4) अपाणि पादो जवनो ग्रहीता पश्यत्य चक्षु: स श्रृणोत्यकर्ण-
श्वेताश्वतर उपनिषद ---३/१९
इसका भाव यह है :-वह हाथ पैरों सेरहित है पर ग्रहण ,गमन अपूर्व है। वह
आँख और कान के बिना सब कुछ देखता सुनता है।
(4) अणोरणीयान महतो महीयानत्मा
गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः।
स्वेता
श्वेताश्वतर उपनिषद--३/२०
इसका भाव यह है:--यह सूक्ष्म से अति सूक्ष्म, महत से अति महत है। यही जीवों की हृदय रूपी गुफा में निहित है।
(5) द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्या पिप्पलं स्वाद्ववत्तय नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति।
श्वेताश्वतर उपनिषद--४/६
इसका भाव यह है :-
दो सुन्दर पंख वाले पक्षी एक साथ एक ही पीपल वृक्ष पर रहते हैं जो एक दूसरे के सखा हैं। इनमें से एक तो पेड़ के फलों का स्वाद ले लेकर खाता है जबकि दूसरा बिना कुछ खाए हुए उसको देखता रहता है।
(6) समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचतिमुह्य मानः। जुष्टं यदा पश्यत्य
न्यमीशमस्य महिमा नमिति वीत शोकः।
श्वेताश्वतर उपनिषद---४/७
इसका भाव यह है:-_ उसी वृक्ष पर पुरुष भोगों में निमग्न रहता है, इस कारण वह प्रकृति के वशीभूत होकर
सांसारिक वस्तुओं से मोह करता हुआ
दुखों को प्राप्त होता है,परन्तु जब वह ध्यान करके अपने से अन्य ईश्वर को देखता है और उसकी महिमा का बोध हो जाता है तब वह शोकों से मुक्त हो जाता है।
(7) मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्। --श्वेताश्वतर उपनिषद- ४/१०
इसका भाव यह है-:--माया को प्रकृति(ईश्वर) की शक्ति जानो। तथा माया के अधीश्वर को महेश्वर समझो।
(8) ज्ञाज्ञो द्वाव अजावीशनीशा वजाह्येका
भोकृभोग्यार्थ युक्ता।
श्वेताश्वतर उपनिषद-----१/९
इसका भाव यह है:--दो अज हैं--(१)ज्ञ
(२) अज्ञ( एक जानने वालाऔर दूसरा न जानने वाला) तीसरी एक अजा है जो भोक्ता के भोग को लिए युक्त होती है।
न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत समश्चाभयधिकश्चदृश्यते। -
श्वेताश्वतर उपनिषद -- ६/८
इसका भाव यह है :--उसका न कार्य है और न करण है, तथा उसके बराबर ही नहीं कोई दिखता तो उससे अधिक की बात ही क्या ?
(9) देवात्शक्तिं स्व गुणैर्निगूढाम्। श्वेताश्वतर उपनिषद---१/३
इसका भाव यह है :--परमात्मा अपने ही गुणों से छिपा हुआ है।
(10) क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। तस्याभिध्या
नाद् योजनात् तत्तवभावाद् भूयश्चान्ते
विश्वमायानिवृतिः।-
श्वेताश्वतर उपनिषद---१/१०
भावार्थ:--प्रकृति नाशवान है और जीवात्मा अविनाशी है। वह एकमात्र ईश्वर नाशवान प्रकृति और जीवात्मा दोनों पर शासन करता है। उस एक (ईश्वर) पर ध्यान करने से और उसके साथ तदात्म हो जाने से अंत में समस्त अज्ञान से मुक्ति मिल जाती है।
(11) भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं
त्रिविधं ब्रह्म मेतता। (त्रेत वाद)
श्वेताश्वतर उपनिषद-१/१२
इसका भाव यह है :- भोक्ता, भोग्य और प्रेरित को जानकर सब जान लिया जाता है। इस प्रकार ये तीन प्रकार के ब्रह्म कहे गए हैं। वे सब एक ही रूप हैं।
(12) अजामेकं लोहित शुक्ल कृष्णां वह्वीः प्रजः सृजमानां सरूपः।
श्वेताश्वतर उपनिषद---४/५
इसका भाव यह है:- एक बकरी लाल (रज) सफेद (सत) और काले (तम) रंग की है, वह अपनी जैसी बहुत प्रजाओं को जन्म देती है।
---------_+--------+-------+-------+-----
(,12)----कालाग्निरुद्रोपनिषद--कालाग्नि रुद्रोपनिषद--ऋषि सनत्कुमार को त्रिपुण्ड पर दिया गया प्रवचन है जो शैव सम्प्रदाय का तिलक है। जिसमें पवित्र राख की तीन पंक्तियाँ होती हैं। इस उपनिषद में त्रिपुण्ड की प्रशंसा और सम्बन्धित मंत्रों और अनुष्ठानों के साथ शरीर के विभिन्न सिद्धान्तों पर त्रिपुण्ड के रूप में विभूति(पवित्र राख) के निर्माण की प्रक्रिया के बारे में बताया गया है।
कालाग्निरुद्रोपनिषद के प्रमुख श्लोक--
(१) तं होवाच भगवानकालाग्निरुद्रः
यद्द्रव्यं तदाग्नेयं भस्म सद्योजातादि
पञ्चब्रह्ममन्त्रैः परिगृह्याग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति भस्म व्योमेति भस्मेत्यनेनाभिमन्त्र्य।कालाग्निरुद्रोपनिषद--३
भाव--कालाग्नि रुद्र सनत्कुमार को समझाते हैं कि त्रिपुण्ड सामग्री अग्नि की राख होनी चाहिए। इस भस्म को पंच ब्राह्मण के तैत्तरीय आरण्यक से सत्योजातं भजन का पाठ करते हुए धारण करना चाहिए। अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, जलमिति भस्म, स्थलमिति भस्म, व्योमिमिति भस्म, पञ्चभूतादि मन्त्रों से अभिमन्त्रित करें।
(२) मानस्तोक इति समुदधृत्यमा नो महान्तमिति जलेन संसृज्य त्रियायुषमिति शिरोललाटवक्षःस्कन्धेषु त्रियायुस्त्रयम्बकैस्त्रिशक्तिभिस्तिर्यक्तिस्रोकालाग्निरुद्रोपनिषद--४
भाव--ऋगुवेद के मानस तोके भजन का पाठ करते हुए पवित्र राख को पानी में मिलाया जाना चाहिए। महामृत्युञ्जय (त्रयंम्बकं यजामहे) मंत्र का पाठ करते हुए राख के तीन क्षैतिज रेखाओं में सिर, माथे, छाती और कंधों पर लगाया जाता है। त्रयायुष, त्रयम्बक और त्र्रिशक़्ति भजनों का पाठ किया जाना चाहिए।
(३) रेखाः प्रकुर्वीत व्रतमेतच्छाम्भवंसर्वेषु देवेषु वेदवादिभिरुक्तं भवति तस्मात्तत्समाचरेन्मुमुक्षर्न पुनर्भवाय।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--५
भाव--त्रयम्बकं मन्त्र के द्वारा तीन रेखाएँ बनाएँ।इसी को शाम्भव व्रत कहा गया है। इस व्रत का वर्णन वेदज्ञों ने समस्त वेदों में किया है। जो मुमुक्ष जन यह आकांक्षा रखते हैं कि उन्हें पुनर्जन्म न लेना पड़े, तो उन्हें इसे धारण करना चाहिए।
(४) अथ सनत्कुमारः पप्रच्छ प्रमाणमस्य
त्रिपुण्ड्रधारणस्य त्रिधा रेखा
भवत्याललाटादाचक्षुषोरामूर्ध्रोराभ्रुवोर्मध्यश्च
कालाग्निरुद्रोपनिषद--६
भाव--ऐसा सुनने के बाद सनत्कुमार ने पूछा कि त्रिपुण्ड की तीन रेखाओं को धारण करने का प्रमाण(लम्बाई आदि) क्या है ? भगवान श्री कालाग्नि रुद्र ने उत्तर दिया कि तीन रेखाएँ दोनो नेत्रों के भ्रूमध्य से आरम्भ कर स्पर्श करते हुए ललाट-मस्तक पर्यन्त धारण करे।
(५) यास्य प्रथमा रेखा सा गाहर्पत्यश्चाकारो
रजो भूर्लोकः स्वात्मा क्रियाशक्तिरृग्वेदः
प्रातः सवनं महेश्वरो देवतेति।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--७
भाव--
पहली पंक्ति को गार्हपत्य(घरेलू रसोई में
पवित्र अग्नि) ॐ का अ अक्षर, रजस गुण,
पृथ्वी, बाहरी आत्मा, क्रिया, क्रिया की शक्ति ऋगुवेद, , सोम का प्रातःकालीन निष्कर्षण और महेश्वर के समतुल्य माना गया है।
(६) यास्य द्वितीय रेखा सा दक्षिणाग्निरुकारःस्वमन्तरिक्षमन्त्तरात्मा चेच्छा शक्तिर्यजुर्वेदो माध्यंदिनं सवनंदाशिवो देवतेति।कालाग्निरुद्रोपनिषद--८
भाव--राख की दूसरी लकीर दक्षिणाग्नि(पूर्वजों के लिए दक्षिण में जलायी जाने वालीप वित्र अग्नि) ॐकी ध्वनि, सत्वगुण, वातावरण, आन्तरिकआत्मा, इच्छा और इच्छा शक्ति, यजुर्वेद, मध्याह्न सोम निष्कर्षण और सदाशिव की याद दिलाती है।
(७) यास्य तृतीया रेखा साहवनीयो मकारस्तमो द्यौर्लोकः परमात्मा ज्ञानशक्तिः
सामवेदसितृतीय सवनं महादेवो देवतेति।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--९भाव--राख की तीसरी लकीर है आहवनीय(होम के लिए इस्तेमाल की जाने वाली अग्नि)ॐ में म अक्षर, तामस गुण, स्वर्ग, परमात्माअर्थात् सर्वोच्च आत्मा(ब्रह्म), धारणा की शक्ति, सामवेद, संध्याके समय सोम निष्कर्षण और महादेव रूप में है।।
(८) एवं त्रिपुण्डविधि भस्मना करोति यो विद्वान ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थौ यतिर्वास महापातकोपापातकेभ्यः पूतो भवति स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति स सर्वान्वेदानधीतो भवति स सर्वान्देवाञ्ज्ञातो भवति स सततं सकलरुद्रमन्त्रजापी भवति सकलभोगान्भुंक्ते देहं त्यक्त्वा शिवसायुज्यमेति न सपुनरावर्तत इत्याहभगवान कालाग्निरुद्रः।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०
भाव--कालाग्नि रुद्र मानवजीवन की चार अवस्थाओं(ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और सन्यास) में से किसी भी व्यक्तिद्वारा त्रिपुण्ड धारण करने के लाभों की प्रशंसा करते हैं।त्रिपुण्ड सभी पापों से मुक्ति दिलाता है। इस अनुष्ठान के साथ पाठ में कहा गया है कि वह उस व्यक्ति के बराबर हो जाता है जिसने सभी पवित्र स्थानों में स्नान किया है और जो अपना सारा समय रुद्र भजन का पाठ करने में बिताता है। एक सुखी और संतुष्ट जीवन जीने के बादवह मृत्यु पश्चात शिव के साथ एक हो जाता है और पुनर्जन्म का अनुभव नहीं करता है।
कालाग्निरुद्रोपनिषद की प्रमुख सूक्तियाँ--
(१) यद्द्रव्यं तदाग्नेयं भस्म।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--३
भाव-यह (त्रिपुण्ड) सामग्री अग्नि की राख होनी चाहिए।
(२) सद्योजातादि पञ्चब्रह्ममन्त्रैः।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--३
भाव--इस भस्म को पञ्चब्राह्मण के
सत्योजात भजन का पाठ करते हुए धारण करना चाहिए।
(३) परिगृह्याग्निरिति भस्म वायुरिति भस्म जलमिति भस्म स्थलमिति
भस्म व्योमेति भस्मेत्यनेनाभिमन्त्र्य।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--३
भाव-- अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, जलमिति भस्म, स्थलमिति भस्म,
व्योमिमिति भस्म, पञ्चभूतादि मन्त्रों से
अभिमन्त्रित करें।
(४) मानस्तोक इति समुदधृत्यमा नो महान्तमिति जलेन संसृज्य।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--४
भाव--ऋगुवेद के मानस्तोके भजन का पाठ करते हुए पवित्र राख को पानी में मिलाया जाना चाहिए।
(५) प्रातः सवनं महेश्वरो देवतेति।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--७
भाव--सोम का प्रातःकालीन निष्कर्षण
महेश्वर के तुल्य माना गया है।
(६) माध्यंदिनं सवनं सदाशिवो देवतेति।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--८
भाव--मध्याह्न सोम निष्कर्षण सदाशिव के तुल्य होता है।
(७) तृतीय सवनं महादेवो देवतेति।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--९
भाव--सन्ध्या के समय सोम निष्कर्षण
महादेव के तुल्य होता है।
(८) स महापातकोपापातकेभ्यः पूतो भवति
कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०
भाव,--त्रिपुण्ड सभी पापों से मुक्ति दिलाता है।
(९) स सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०
भाव--त्रिपुण्ड सभी तीर्थों के स्नान का पुण्य दिलाता है।
(१०) स सर्वान्वेदानधीतो भवति।
कालाग्निरुदिरेपनिषद--१०
भाव--त्रिपुण्ड सभी धर्मशास्त्रों के स्वाध्याय का पुण्य दिलाता है।
(११) स सर्वान्देवाञ्ज्ञातो भवपर ।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०
भाव--त्रिपुण्ड सभी देवों के स्मरण का पुण्य दिलाता है।
(१२) स सततं सकलरुद्रमन्त्रजापी भवति।
कालाग्निरनदंरोपनिषद--१०
भाव,--त्रिपुण्ड सभी रुद्रों के जाप का पुण्य दिलाता है।
(१३) सकलभोगान्भुंक्ते देहं त्यक्त्वा
शिवसायुज्यमेति।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०
भाव-- त्रिपुण्ड सभी सुखों के भोगने के बाद शरीर छोड़ने पर मनुष्य को शिव बना देता है।
(१४) न सपुनरावर्तत इत्याह भगवान कालाग्निरुद्रः।
कालाग्निरुद्रोपनिषद--१०
भाव--भगवान कालाग्निरुद्र कहते हैं कि त्रिपुण्ड धारण करने वाला का पुनर्जन्म
नहीं होता है ।
(१५)------:जबालो उपनिषद:--
जाबाल उपनिषद एक ऐसा ग्रन्थ है जो
सन्यास और ज्ञान के रहस्य को प्रकट करता है।
इस उपनिषद में ६ खण्ड हैं।
पहला खण्ड- बृहस्पति ने ऋषि याज्ञवल्क्य से पूछा-प्राण का स्थान कहाँ है ? ऋषि याज्ञवल्क्य ने प्राण का स्थान
ब्रह्मसदन या अविमुक्त (ब्रह्मरन्ध्र काशी) क्षेत्र बताया है। उसे ही इंद्रियों का देवयजन बताया है। इसी ब्रह्मसदन की उपासना से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
दूसरा खण्ड--आत्मा को कैसे जाने ?
आत्मा को जानने के लिए अविमुक्त की ही उपासना करनी चाहिए क्योंकि वह अनन्त , अव्यक्त आत्मा यहीं पर प्रतिष्ठित है। यह वरणा और नासी के मध्य विराजमान है। इन्द्रियों द्वारा किए समस्त पापों का निवारण वरणा करती है और इन पापों को नष्ट करमे का कार्य नासी करती है। भृकुटि और नासिका के सन्धिस्थल पर इनका स्थान है। यही द्युलोक और परलोक का संगम है।ब्रह्मविद्या में आत्मा की उपासना इसी सन्धिस्थल पर की जाती है।
तृतीय खण्ड-- मोक्ष कैसे प्राप्त करें ?
ऋषि याज्ञवल्क्य ने ब्रह्मचारी शिष्यों को बताया कि 'शतरुद्रीय' जप करने से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। इसके द्वारा साधक मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है।
चतुर्थ खण्ड--सन्यास क्या है ?
इस खण्ड में ऋषि ने राजा जनक को
सन्यास के विषय में बताते हुए ब्रह्मचर्य और सन्यासी के लिए सर्वप्रथम शर्त बताते हैं। ब्रह्मचर्य के उपरान्त गृहस्थी, उसके बाद वानप्रस्थी और फिर प्रवज्या ग्रहण करके सन्यास ग्रहण करना चाहिए। विषयों से विरक्त होने के उपरान्त किसी भी आश्रम के बाद
सन्यासी बना जा सकता है। सन्यासी को मोक्ष मंत्र ॐ का जाप हर पल करना चाहिए। वही ब्रह्म है और उपासना के योग्य है।
पंचम खण्ड--ब्राह्मण कौन है ? सन्यासी कौन है ?
ऋषि याज्ञवल्क्य कहते हैं कि ब्राह्मण वही है, जिसका आत्मा ही उसका यज्ञोपवीत है। जो जल से तीन बार प्रक्षालन और आचमन करे, भगवा वस्त्र
धारण करे, अपरिग्राही बनकर लोक मंगल के लिए भिक्षावृत्ति से जीवन यापन करे। मन और वाणी से विषयों का त्याग करे। वही सन्यासी है, लोक हितैषी है।
षष्ठ खण्ड--परमहंस सन्यासी कौन है ?
संवर्तक, आरुणि, श्वेतकेतु, दुर्वासा, ऋभु, निदाघ, जड़भरत, दत्तात्रैय और रेवतक आदि परमहंस सन्यासी हुए हैं। वे सभी सन्यास के चिह्नों से रहित थे। वे भीतरसे उन्मत्त न होते हुए भी बाहर से उन्मत्त लगते थे। ऐसे सन्यासी
निश्छल और निष्पृह होते हैं। वे निर्द्वन्द्व, अपरिग्रही, तत्व ब्रह्म में निरन्तर गतिमान तथा शुद्धमन वाले होते हैं। वे जीवन्मुक्त, ममतारहित, सात्विक,
अध्यात्मनिष्ठ, शुभ-अशुभ कर्मों को निर्मूल मानने वाले होते हैं। वे परमहंस
होते हैं।
जबालोपनिषद के प्रमुख श्लोक--(१) जबालोपनिषदख्यातं संन्यासज्ञानगोचरम्।
वस्तुतस्त्रैपदं ब्रह्म स्वमात्रमअवशिष्यते।
जाबालोपनिषद-- प्रारम्भिक मंत्र--।
भाव--जबाल उपनिषद एक ऐसा ग्रन्थ है
जो सन्यास और ज्ञान के रहस्य को प्रकट करता है। वस्तुतः ब्रह्म तीन अवस्थाओं(जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति) के पार जाकर केवल अपने शुद्ध स्वरुप में ही अवशेष रहता है।
(२) ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमदुच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय
पूर्णमेवावशिष्यते।।
जाबालोपनिषद--प्रारम्भिक मंत्र--२
ईशोपनिषद--५
बृहदारण्यक उपनिषद
भाव--वह(वाह्य जगत) पूर्ण है, यह(आन्तरिक जगत) भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण प्रकट होता है। पूर्ण में से पूर्ण लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।
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