--:वेद (२):--
----(२)----: यजुर्वेद:---------
यजुस + वेद = यजुर्वेद। यजुस का अर्थ
है समर्पण। इस वेद के मंत्र गद्य में हैं।
गद्य के मंत्र को यजुस कहते हैं। इसमें जो पद्य का भाग है वह ऋगुवेद अथवा
अथर्ववेद से लिया गया है। इस वेद में कुल ३९८८ ऋचाएँ हैं। यजुर्वेद में गायत्री मंत्र ३६/३ पर तथा महामृत्युंजय
मंत्र ३/६० पर दिया है। यह वेद कर्मकाण्ड प्रधान है। इसमें यज्ञों और हवन के बारे में चर्चा है। संस्कारों एवं
यज्ञीय कार्यक्रमों में अधिकाँश मंत्र इसी
वेद के प्रयोग किए जाते हैं।
यज्ञ:---अग्निहोत्र, अश्वमेध, वाजपेय,
सोमयज्ञ, राजसूय, अग्निचयन।
अग्निहोत्र एक नित्य वैदिक यज्ञ है।
यजुर्वेद के दो भाग हैं:-- (१) कृष्ण यजुर्वेद(ब्रह्म सम्प्रदाय) (२) शुक्ल यजुर्वेद(आदित्य सम्प्रदाय)
कृष्ण यजुर्वेद की शाखाएँ:---चार हैं।
(१) तैत्तिरीय (२) मैत्रायणी (३) काठक
(४) कठ कपिष्ठल।
शुक्ल यजुर्वेद की शाखाएँ -प्रमुख दो हैं।
(१) माध्यान्दिन(मध्य दिन)------उत्तर भारत
(२) कण्व:---महाराष्ट्र
यजुर्वेद के ब्राह्मण:----छः हैं।
(१) शतपथ ब्राह्मण (माध्यान्दिनी)
(२) शतपथ ब्राह्मण (कण्व)
(३) तैत्तिरीय ब्राह्मण
(४) मैत्रायणी ब्राह्मण
(५) कठ ब्राह्मण
(६) कपिष्ठल ब्राह्मण
यजुर्वेद के आरण्यक:--चार हैं।
(१) माध्यान्दिनी बृहदारण्यक
(२) कण्व बृहदारण्यक
(३) तैत्तिरीय आरण्यक
(४) मैत्रायणी आरण्यक
यजुर्वेद के उपनिषद:--
(१) ईश उपनिषद, यह शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत आता है।
(२) कठ उपनिषद, यह कृष्ण यजुर्वेदीय
शाखा के अन्तर्गत आता है। (३) तैत्तिरीय उपनिषद, यह कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत आता है।
(४) बृहदारण्यक उपनिषद, यह शुक्ल
यजुर्वेदीय शखाके अन्तर्गत आता है।
(६) श्वैताश्वतर उपनिषद, यह कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत आता है।
(७) हंस उपनिषद, यह शुक्ल यजुर्वेदीय
शाखा के अन्तर्गत आता है।
(८) पैंगल्य उपनिषद, यह शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गतआताहै।
(९) रुद्र उपनिषद, यह कृष्ण यजुर्वेदीय
शाखा के अन्तर्गत आता है।
(१०) जाबाल उपनिषद, यह शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत आता है।
(११) गर्भ उपनिषद, यह कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत आता है।
(१२) क्षुरिक उपनिषद, यह उपनिषद
कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत आता है।
(१३) शुक रहस्य उपनिषद, यह उपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के
अन्तर्गत आता है।
एक कथा है:-- भगवान वेदव्यास के शिष्य वैशम्पायन के २७ शिष्य थे। इसमें
सबसे प्रतिभाशाली शिष्य याज्ञवल्क्य थे। एक बार एक यज्ञ में अपने साथियों
की अज्ञानता से याज्ञवल्क्य क्षुब्ध हो गए। इस बात की जानकारी जब गुरु वैशम्पायन को हुयी, तब गुरु ने याज्ञवल्क्य से कहा," मेरी यजुर्वेद की सिखायी विद्या मुझे वापस कर दो"।
याज्ञवल्क्य ने यजुर्वेद का वमन कर दिया। यह देखकर दूसरे शिष्यों ने तीतर
बनकर यजुर्वेद के दानो को चुग लिया।
यही वमित यजुर्वेद जो शिष्यों द्वारा चुग कर संग्रहीत किया गया, कृष्ण यजुर्वेद कहलाता है। याज्ञवल्क्य ने यजुर्वेद के ज्ञान के लिए भगवान सूर्य की आराधना की। भगवान सूर्य ने जो यजुर्वेद का ज्ञान याज्ञवल्क्य को दिया, वह शुक्ल
यजुर्वेद कहलाता है।
शुक्ल तथा कृष्ण यजुर्वेद में अंतर:---
शुक्ल यजुर्वेद में केवल मूल मंत्र हैं जबकि कृष्ण यजुर्वेद में मंत्रों के साथ
ब्राह्मण का मिश्रण है। शुक्ल यजुर्वेद का
ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण कहलाता है जिसे महर्षि याज्ञवल्क्य ने लिखा है। कृष्ण यजुर्वेद का ब्राह्मण तैत्तिरीय ब्राह्मण कहलाता है जिसे आचार्य तित्तिर ने लिखा है। शुक्ल यजुर्वेद के श्रौत्र सूत्र को कात्यायन ने लिखा है, जिसे कात्यायन श्रौत्र सूत्र कहते हैं।
कृष्ण यजुर्वेद के आठ श्रौत्र सूत्र हैं:--
(१) बोधायन श्रौत्र सूत्र
(२) आपस्तम्ब श्रौत्र सूत्र
(३) सत्यषाढ़ या हिरण्यकेशी शौत्र सूत्र
(४) वैखासन श्रौत्र सूत्र
(५) भारद्वाज श्रौत्र सूत्र
(६) वाधल श्रौत्र सूत्र
(७) वाराह श्रौत्र सूत्र
(८) मानव श्रौत्र सूत्र
शुक्ल यजुर्वेद के कण्व शाखा का आखिरी अध्याय ही ईश उपनिषद कहलाता है।
शुक्ल यजुर्वेद की दोनों शाखाओं को मिलाकर चालीस अध्याय हैं।
पहले और दूसरे अध्याय में चन्द्र दर्शन और पूर्णमासी यज्ञ का मंत्र। तीसरे अध्याय में दैनिक अग्निहोत्र तथा चातुर्मास का मंत्र। चौथे अध्याय से आठवें अध्याय तक सोमयज्ञ और पशु बलि का विधान। नवें अध्याय और दसवें अध्याय में वाजपेय यज्ञ में
क्षत्रियों के शौर्य तथा अन्य कार्य का विवेचन। ग्यारह अध्याय से अट्ठारह अध्याय तक अग्नि चयन तथा वेदी
निर्माण सम्बंधी मंत्र। उन्नीस अध्याय से
इक्कीस अध्याय तक सौत्रामणि यज्ञ का
वर्णन। बाईस अध्याय से पच्चीस अध्याय तक अश्वमेध यज्ञ का वर्णन।
छब्बीस अध्याय से तीस अध्याय तक
पुरुष मेध, सर्व मेध, पितृ मेध आदि का वर्णन। इकतीस अध्याय से उनचालीस
अध्याय तक पुरुष विधान सूक्त का वर्णन। चालीसवें अध्याय में ईश उपनिषद दिया है।
यजुर्वेद की प्रमुख सूक्तियाँ:---
(१) कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
यजुर्वेद--४०/२
भाव--इस लोक में कर्म शील
रहते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करें।
(२) ओइम क्रतो स्मर ।
यजुर्वेद--४०/१५
भाव--हे कर्म शील मनुष्य ! तू ओइम का स्मरण कर।
(३) ईशा वास्यमिदं सर्वम्।
यजुर्वेद--४०/१
भाव--इस सारे जगत में ईश्वर व्याप्त है।
(४) वयं स्याम पतयो रयीणाम्।
यजुर्वेद--१९/४४
भाव-- हम सम्पूर्ण सम्पत्तियों के स्वामी हों।
(५) मा भेर्मा संविक्थाअउर्जं धत्स्व।
यजुर्वेद--६/३५
भाव-- मत डर। मत घबरा। धैर्य धारण कर।
(६) ओइम खं ब्रह्म।
यजुर्वेद--४०/१७
भाव--ओइम् ब्रह्म सर्वव्यापक है।
(७) आरे बाधवस्य दुच्छुनाम्।
यजुर्वेद--१९/३८
भाव--दुष्ट पुरुषों को दूर भगाओ।
(८) लोकं कृणोतु साधुया ।
यजुर्वेद--२३/४३
भाव--जनता को सद्चरित्र बनाएँ।
(९) तनूपाअग्निः पातु दुरितादलद्यात।
यजुर्वेद--४/१५
भाव--ईश्वर हमें निन्दनीय दुराचरण से बचाए।
(१०) गोस्तु मात्रा न विद्यते।
यजुर्वेद--२३/४८
भाव-- गौ का मूल्य नहीं है।
(११) प्रमृणीहि शत्रून।
यजुर्वेद १३/१३
भाव--शत्रुओं को कुचल डालो।
(१२) परिमाग्ने दुश्चरिताद बाधस्व।
यजुर्वेद--४/२८
भाव-- हे ईश्वर ! आप हमें दुष्ट आचरण से हटाएँ।
(१३) शन्नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे।
यजुर्वेद--३६/८
भाव--ईश्वर दो पाँव वाले मनुष्य और चार पाँव वाले पशुओं के लिए कल्याणकारी हो।
(१४) सहोअसि सो मयि धेहि।
यजुर्वेद--१९/९
भाव--हे प्रभु ! आप सहनशील हैं। मुझमें सहनशीलता लाइए।
(१५) नेनद्दवा आप्नुवन पूर्वमषत।
यजुर्वेद--४०/४
भाव-- परमात्मा भौतिक इन्द्रियों और अविद्वानों का विषय नहीं है।
यजुर्वेद की शिक्षाएँ--
(१) यज्ञों के माध्यम से आत्मिक और सामाजिक उन्नति सम्भव है।
(२) सत्य, अहिंसा, दान और अनुशासन का पालन करना चाहिए।
(३) प्रकृति का संतुलन बनाए रखना चाहिए।
(४) सभी जीवों का सम्मान करना चाहिए।
निष्कर्ष--यजुर्वद जीवन में कर्तव्यपरायणता और आध्यात्मिकता को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण ग्रन्थ है जो
भक्ति और कर्म नें संतुलन स्थापित करता है।
------+------+-------+------+------+------
----(३)-------:सामवेद:--------------सामवेद आकार में सबसे छोटा है, परन्तु
इसकी प्रतिष्ठा सबसे अधिक है क्योंकि
गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं:--'वेदानां सामवेदोऽस्मि'।
सामवेद में १८७५ मंत्र हैं, जिसमें से १७
मंत्र यजुर्वेद और अथर्व वेद के हैं। ९९ मंत्र को छोड़कर शेष मंत्र ऋगुवेद के हैं।
सामवेद के दो भाग हैं:---(१) आर्चिक (२) गान। पुराणों में जो विवरण मिलता है, उसके अनुसार सामवेद की हज़ार शाखाएँ हैं, जिसमें मात्र तीन उपलब्ध हैं:-
(१) कौमुथीय (२) राणायनीय (३) जैमनीय। इसका अध्ययन करने वाले को पञ्चविश या उद्गाता कहते हैं। पुराणों के अनुसार सामवेद के विभिन्न
मंत्रों के जाप से रोगमुक्त हुआ जा सकता है, तथा कामनाओं की प्राप्ति की
जा सकती है। सामवेद को ज्ञान, कर्म तथा भक्ति की त्रिवेणी कहा जाता है।
ऋषियों ने इसमें से मंत्रों को संकलित करके गायन की पद्धति विकसित की।
समस्त स्वर, ताल, लय, छन्द, गति, राग
तथा नृत्य का भाव सब सामवेद से ही निकले हैं। छान्दोग्य उपनिषद में सामवेद को उद्गीथों का रस कहा गया है। जिसतरह ऋगुवेद के मंत्रों को ऋचा,
यजुर्वेद के मंत्रों को यजुस कहा जाता है
उसीप्रकार सामवेद के मंत्रों को सामया अथवा सामानि कहते हैं और वेदमंत्रों के
गाने वाले को सामग कहते हैं।
वैदिक ऋषियों को ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों की जानकारी थी, जिसे हजारों साल बाद वैज्ञानिक पता लगा पाए, जैसे:
इन्द्र ने पृथ्वी को घुमाते हुए रखा है अथवा चन्द्र के मण्डल में सूर्य की किरणें विलीन होकर चन्द्रमा को प्रकाशित करती हैं, आदि आदि। नारदीय शिक्षा ग्रन्थ में सामवेद की गायन पद्धति का वर्णन मिलता है।जिसको आधुनिक हिन्दुस्तानी सा, रे, गा, मा, पा, धा, नि के नाम से जानते हैं। (१)षडज:-सा (२)ऋषभ-रे (३) गांधार--गा(४) मध्यम:-मा (५) पंचम:-पा (६) धैवत:-धा (७) निषाद:नि। आरोह और अवरोह से युक्त मंत्रों का गान ही सामगान कहलाता है। सामवेद में ऋगुवेद की उन्हीं ऋचाओं को लिया गया है जिन्हें गाने योग्य समझी गयी थी। ऋचाओं का गान ही सामवेद का
मुख्य उद्देश्य माना गया है। सामवेद
मुख्यतः उपासना से सम्बद्ध है। इसमें
देवी देवताओं की स्तुतियाँ हैं। यज्ञ सम्पादन काल में उद्गाता इन मंत्रों का गान करता है। सम्पूर्ण सामवेद में सोमरस, सोमदेवता, सोमयाग, सोमपान
का महत्व दर्शाया गया है, इसीलिए इसे
सोम प्रधान वेद भी कहते हैं।
सामगान में प्रयुक्त स्वर:--
(१) उदात्त:--ऊँचा स्वर (२) अनुदात्त:--
नीचा स्वर (३) स्वरित:--मध्यम स्वर
इन्हीं स्वरों के प्रयोग के आधार पर गान के तीन स्वरूप हैं:--१:--आर्चिक गान (इसमें एक स्वर का प्रयोग होता है) २:--
गायिक गान(इसमें दो स्वर का प्रयोग होता है) ३:--सामिक गान (इसमें तीन स्वर का प्रयोग होता है)। ऊँचे स्वर, नीचे
स्वर तथा मध्यम स्वर से सात स्वरों से साम वैदिक स्वरों का विकास हुआ।
(१) ऋष्ट:- मा (२) प्रथम:- गा (३) द्वितीय:- रे (४) तृतीय:- सा (५) चतुर्थ:-
धा (६) मन्द्र:-नि (७) अतिस्वार्य:-धा
वेद कालीन नृत्य:--रज्जु, अरुण, प्रकृति,
पुष्प, बसन्त।
वैदिक काल के वाद्य:--चार प्रकार के थे।
(१) तंतु वाद्य:--वीणा, कर्कटी आदि।
(२) फूँक से बजने वाला वाद्य:-वंशी आदि।
(३) चमड़े से मढ़े हुए वाद्य;--दुंदुभि, ढोल आदि।
(४) धातु से निर्मित वाद्य:-अघाटि आदि
ब्रह्मचर्य का तप:--ब्रह्मचर्येण तपसा देवा
मृत्युमपाघनत।--सामवेद--११/५/१९
भावार्थ:--ब्रह्मचर्य के तप से देवताओं ने
मृत्यु पर विजय प्राप्त की।
सामवेद की प्रमुख सूक्तियाँ--
(१) अतिथिं स्तुषे मित्रमिव प्रियम।
सामवेद--५
भाव--मित्र की तरह अतिथि का स्वागत करते हैं।
(२) आ ते वत्सो मनो यमत्।
सामवेद--८
भाव-- आपका शुद्ध मन संयमित हो।
(३) स्तुहि सत्यधर्माणम।
सामवेद--३२
भाव-- सत्यनिष्ठ की प्रशंसा करें।
(४) मित्रं न शंसिषम्।
सामवेद--३५
भाव--मित्र की भाँति वार्तालाप करें।
(५) प्र देव्येतु सूनृता।
सामवेद--५६
भाव--प्रिय एवं सत्यवाणी हमें प्राप्त हो।
(६) सं महेमा मनीषया।
सामवेद--६६
भाव-- हम प्रजा के द्वारा श्रेष्ठ कार्य करें।
(७) भद्रा हि नः प्रमतिः।
सामवेद--६६
भाव-- हमारी बुद्धि कल्याणकारिणी हो।
(८) सख्ये मा रिषाम।
सामवेद--६६
भाव-- मित्रता में हम कम न रहें।
(९) हस्तच्युतं जनयत प्रशस्तम्।
सामवेद--७२
(१०) श्रद्धा माता
सामवेद -९०
भाव-- श्रद्धा ही जननी है।
(११) मनुः कविः।
सामवेद--९०
भाव--भविष्य को ध्यान में रखकर चलने वाला ही मनुष्य है।
(१२) न रिपुरीशीत मर्त्यः।
सामवेद--१०४
भाव--असहयोगी व्यक्ति उन्नत शील नहीं होता।
(१३) त्वं सख्यमाविथ।
सामवेद--१०८
भाव--आप मित्रता का चयन करें।
(१४) भद्रा उत प्रशस्तयः।
सामवेद--१११
भाव-- सुन्दर वाणियाँ कल्याणकारी होती हैं।
(१५) सनिं मेधामयासिषम्।
सामवेद--१७१
भाव-- अर्जन शील बुद्धि को प्राप्त करें।
(१६) पावका नः सरस्वती।
सामवेद--१८९
भाव--विद्या ही हमें पवित्र करने वाली है।
(१७) समानमु प्रशंसिषम्।
सामवेद--२०४
भाव-- सहयोगियों की संवर्धना करें।
(१८) मित्रास्यान्त्यद्रुहः।
सामवेद--२०६
भाव-- स्नेही मित्र ही संरक्षक होते हैं।
(१९) तवेदं सख्यमस्तृतम्।
सामवेद--२२९
भाव--आपकी यह मित्रता निरन्तर विद्यमान रहे।
(२०) अस्मांअवन्तु ते धियः।
सामवेद--२३९
भाव--आपकी कुशलता हमारी रक्षा करे।
महत्व--सामवेद को भारतीय शास्त्रीय संगीत का मूल स्रोंत माना जाता है।
यह वैदिक यज्ञ परम्परा का महत्वपूर्ण आधार है। इसमें निहित भक्तिभाव से
उपनिषदों और भक्ति परम्परा का विकास हुआ।
निष्कर्ष--सामवेद वेदों में सबसे संगीतमय वेद है। जो संगीत, मन्त्रों और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम प्रस्तुत
करता है।
-----------+-------+-----+-------+-------
-----(४)-----:अथर्ववेद:----------
यस्य राज्ञो जनपदे अथर्वा शान्ति पारगः
निव सत्यपि तद्राराष्ट्रंवर्धतेनिरुपद्रवम्।
------१/३२/३
भावार्थ:--जिस राजा के राज्य में अथर्ववेद जानने वाला विद्वान शान्ति की स्थापना के कर्म नें निरत रहता है, वह राष्ट्र उपद्रव रहित रहकर निरंतर उन्नति करता जाता है।
अथर्ववेद का ज्ञान सबसे पहले भगवान ने महर्षि अंगिरा को दिया था, महर्षि अंगिरा ने इसका ज्ञान ब्रह्मा को दिया।
चरणव्यूह ग्रन्थ के अनुसार अथर्ववेद की
९ शाखाएँ हैं। (१) पिप्लाद (२) दान्त (३) प्रदान्त (४) स्नात (५) सौल (६) ब्रह्मदाबल (७) शौनक (८) देवदर्शत (९) चरण विद्या। इनमें से केवल पिप्लाद और शौनक ही मिलते हैं। अथर्ववेद मैं ७५९ सूक्त तथा ६००० मंत्र हैं।
ब्रह्माण्ड:-अवलोकन योग्य ब्रह्माण्ड का व्यास २८ अरब पारसैक(९१प्रकाशवर्ष)
है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का व्यास अनन्त है।
काण्ड:-यह विभिन्न काण्डों एवं सूक्तों में
विभक्त है।
प्रथम एवं द्वितीय काण्ड:---विविध रोग,
शत्रु एवं दीर्घायु की कामना के मंत्र।
तृतीय काण्ड:---शत्रु सेना के वशीकरण
का मंत्र, राजा का निर्वाचन, कृषि एवं पशुपालन।
चतुर्थ काण्ड:---ब्रह्मविद्या, विष नाशक,
राजा का राज्याभिषेक, पापमोचन एवं
वर्षा जल से सम्बन्धित मंत्र।
पञ्चम काण्ड:-- ब्राह्मण जाति का महत्व एवं शत्रु नाश का वर्णन।
षष्ठ काण्ड:---दुःस्वप्न नाश एवं अन्न समृद्धि विषयक मंत्र।
सप्तम काण्ड:--आत्म विषयक एवं विजय प्राप्ति के मंत्र।
अष्टम काण्ड:--ऋगुवेद के सात छन्दों की व्याख्या।
नवम काण्ड:--मधुकषा नामक औषधि, अतिथि सत्कार।
दसम काण्ड:--ब्रह्म विद्या का वर्णन।एकादश काण्ड:--ब्रह्मचर्य का महत्व।
द्वादश काण्ड:--भूमि सूक्त।
त्रयोदश काण्ड:--अध्यात्म का वर्णन।
चतुर्दश काण्ड:--विवाह संस्कार के मंत्र।
पञ्चदश काण्ड:--परमात्मा की महिमा।
षोडश काण्ड:--दुख हरण मंत्र।
सप्तदश काण्ड:--वशीकरण मंत्र।
अष्टदश काण्ड:--अन्त्येष्टि का वर्णन।
नवमदश काण्ड:--ज्योतिर्विज्ञान, यज्ञ, नक्षत्र, राज्याभिषेक, राजसूय यज्ञ एवं
काल का महत्व
विंशतिः काण्ड:--सोमयाग का वर्णन,
इन्द्र की स्तुति के मंत्र।
सूक्त:--
(१) भेषज सूक्त:--रोगों के लक्षण, रोगों की चिकित्सा, शारीरिक विकार। रोगों की संख्या ९९ बतायी गई है, इसमे ज्वर, कुष्ट, मूर्छा, कफ, श्वास, नेत्र रोग, गंजापन, सर्प दंश की चिकित्सा, उन्माद की चिकित्सा।
(२) आयुष्य सूक्त:--स्वास्थ्य एवं दीर्घ जीवन के लिए प्रार्थनाएँ,मुण्डन संस्कार,
उपनयन संस्कार, १०० वर्ष के रोगमुक्त जीवन के लिए प्रार्थनाएँ।
(३) पौष्टिक सूक्त:--कृषक, व्यापारी, चरवाही तथा जुए के खेल में विजय प्राप्त करने के लिए प्रार्थनाएँ, अशुभ निवारण, पशुधन की सुरक्षा, व्यवसाय में वृद्धि के लिए मंत्र।
(४) श्रृंगार सूक्त:-- भय, सुरक्षा, बुराई से बचाव, आशीर्वाद एवं प्रसन्नता प्राप्ति के
लिए प्रार्थनाएँ( हे पृथ्वी मुझे, थन, रत्न और सुवर्ण दे)।
(५) प्रायश्चित सूक्त:- प्रायश्चित का विधान एवं अपराधों के निवारक मंत्र।
यज्ञ अथवा उत्सव में होने वाली गलतियों के लिए प्रायश्चित वाले मंत्र।
(६) स्त्री कर्माणि सूक्त:-- विवाह और प्रेम, पति-पत्नी में अनुराग बढ़ाने वाली
औषधियों और मंत्रों के द्वारा वश में रखने वाले मंत्र, वशीकरण मंत्र(प्रेमी-प्रेमिका को वश में रखने का मंत्र)।
(७) राज कर्माणि सूक्त:--राजाओं का वर्णन, शत्रु पर विजय कि प्रार्थनाएँ,
राज्याभिषेक, देशरक्षा, राजा के कर्तव्य,
प्रजा द्वारा राजा का निर्वाचन, न्याय और दण्ड के विधान का मंत्र, दुंदुभि का
वर्णन(युद्ध क्षेत्र में सैनिकों के उत्साह के लिए)।
(८) याज्ञिक सूक्त:--बीसवें काण्ड में यज्ञ
सम्बन्धी मंत्र, सामयाग का वर्णन, स्तुति
परक मंत्र।
(९) कुन्ताप सूक्त:--बीसवें काण्ड में याज्ञिक दान, स्तुतियाँ वा पहेलियाँ और
उनके समाधान। यजमान और राजकुमार में सम्बन्ध।
(१०) दार्शनिकसूक्त :--ब्रह्म, माया, ईश्वर,
एकेश्वरवाद, जीवात्मा, प्रकृति, पुनर्जन्म,
स्वर्ग, नर्क आदि का वर्णन।
(११) भूमि सूक्त:--राष्ट्रीय भावना के कारण भूमि को माता तथा स्वयं को पृथ्वी का पुत्र कहा गया है।
अथर्ववेद नें भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति की झलक मिलती है। सामाजिक वा राजनैतिक अवस्थाओं का सुन्दर वर्णन मिलता है। कहीं-कहीं
अन्धविश्वास, जादू-टोना और वशीकरण
का वर्णन मिलता है। यह जन साधारण का वेद है। शिक्षित-अशिक्षित सभी इससे लाभान्वित होते हैं। जादू-टोना, मंत्र-तंत्र तथा वशीकरण की व्याख्या होने के कारण यह वेद अन्य वेदों की तुलना में अधिक प्रचलित है।
अथर्ववेद के प्रमुख श्लोक:--
(१) यथाद्यौश्च पृथ्वी च न बिभीतो न रिष्यतः। येषामेप्राण मा विभेः।
------११/१/११
भावार्थ:--जिसप्रकार आकाश और पृथ्वी न भयग्रस्त होते हैं और न नष्ट
होते हैं उसीप्रकार हे मेरे प्राण ! तुम भी
भय मुक्त रहो।
(२) मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन, मास्वसारमुत स्वसा। सम्यञ्चः सवृता भूत्वा वाचं वदत भद्रया।--१३/३०/३
भावार्थ:--भाई-भाई से द्वेष न करें। बहन -बहन से द्वेष न करें। समान भाव से एक दूसरे का सम्मान करते हुए परस्पर
मिलजुल कर भद्रभाव से बोलें।
(३) यां त्वा गन्धर्वो अखनद् वरुणाय
मृतभ्रजे। तां त्वावयं खनामस्योषधि
शेपहर्षणीम्। ------४/४/१
भावार्थ:-- हे औषधि ! वरुण के लिए
आपको गंधर्व ने खोदा था। हम भी
इंद्रियशक्ति बढ़ाने के लिए आपको खोदते हैं।
(४) अद्याग्ने अद्य सवितःअद्य देवि सरस्वति। अद्यास्य ब्रह्मणस्पते धनुरिव
तानया पसः। --------४/४/६
भावार्थ:--हे अग्निदेव ! हे सविता ! हे देवी सरस्वती ! हे ब्रह्मणस्पते ! इस आदमी को (मुझे) बल प्रदान करके
धनुष की डोरी के समान तान दे।
(५) अश्वस्याश्वतरस्याजस्य पेत्वस्य च।
अथऋषभस्य ये वाजास्तानस्मिन्धेहि तनु वशिन्।-------४/४/८
भावार्थ:--आप घोड़ा, बैल, मेढ़ा आदि को वश में करने वाला जो ओजस
है, उसे मेरे शरीर में स्थापित करें।
(६) आहं तनोमि ते पसोअधि ज्यामिव
धन्वनि। क्रमस्वऋषइव रोहितमन
वग्लायता सदा।------६/१०१/३
भावार्थ:---मैं उन्हें धनुष की डोरी के समान तानता हूँ। जिससे वे ग्लानि त्यागकर स्वछंद विहार करें।
(७) तां पूषाइव तमामेरयस्व यस्याबीजं
मनुष्यावपन्ति। या ऊरुउशतीविश्रयाति।
यस्मामुशन्तः प्रहरेम शेपः।--१४/२/३८
भावार्थ:--हे पूषा ! तू सन्तान प्राप्ति के लिए पत्नी को प्रेरित कर कि वह अपने
को तैयार करे, जिससे पुरुष अपना अंश देकर संतान की प्राप्ति करे।
(८) ए यमगन्पति कामा जनिका मोऽहमागमम्। अश्वःकनिक्रदद्या भगेनाहं सहागमम्।----२/३०/५
भावार्थ:--पति की कामना वाली पत्नी और पत्नी की कामना वाला पति अपनी
रुचि से एक दूसरे का चयन करे। जिससे जिस प्रकार घोड़ा हिनहिनाते हुए आता है उसीप्रकार ऐश्वर्यशाली, बलशाली पति अपने पत्नी के निकट आए।
(९) उत्तानायै शयानयै तिष्ठंती वावं गूहसि। नवै कुमारि तत्तथा यथा कुमारि
मन्यसे। -----२०/१३३/४
भावार्थ:--तू आलस्य में शयन करने वाली चित्तवृत्ति की शिकार न हो जाए।
हे कुमारि ! तू ध्यान रखना ! यह संसार
वैसा नहीं है जैसा तू सोचती है।
अथर्ववेद की प्रमुख सूक्तियाँ--
(१) कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः।
अथर्ववेद--७/५०/८
भाव--मेरे दाहिने हाथ में कर्म है और बाएँ हाथ पर सफलता रखी है।
(२) सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु।
अथर्ववेद--१९/१५/६
भाव--सभी दिशाएँ हमारे लिए मित्र हों।
(३) ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति।
अथर्ववेद--१९/५/१७
भाव-- ब्रह्मचर्य और तप से ही राजा विविध प्रकार से राष्ट्र की रक्षा करता है।
(४) शतहस्त समाहर सहस्रहस्त सं किर।
अथर्ववेद--३/२४/५
भाव--सौ हाथों से संग्रह करो तथा हज़ार हाथों से दान दो।
(५) तस्य ते भक्तवांसः स्याम।
अथर्ववेद--६/७९/३
भाव--हे प्रभु ! हम तुम्हारे भक्त हों।
(६) एक एव नमस्यः।
अथर्ववेद--२/२/२
भाव- एक ही नमस्करणीय है।
(७) स नः पर्षद् अतिद्विषः।
अथर्ववेद--६/३४/१
भाव--ईश्वर हमें द्वेषों से अलग कर दे।
(८) यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम्।
अथर्ववेद--७/१८/२
भाव--जहाँ परमेश्वर है, वहाँ कल्याण ही कल्याण है।
(९) स एष एक वृदेक एव।
अथर्ववेद--१३/४/२०
भाव--वह ईश्वर एक और केवल एक ही
है।
(१०) तमेव विद्वान न बिभाय मृत्योः।
अथर्ववेद--१०/८/४४
भाव--आत्मा को जानने पर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता।
(११) स्वस्ति गोभ्यो जगते पुरुषेभ्यः।
अथर्ववेद--१/३१/४
भाव--सब पशु-पक्षी और प्राणि मात्र का भला हो।
(१२) स्वस्ति मात्र उत पित्रे नो अस्तु।
अथर्ववेद--१/३१/४
भाव-- हमारे माता और पिता सुखी रहें।
(१३) रमन्तां पुण्या लक्ष्मीर्याः पापीस्ता अनीनशम्।
अथर्ववेद--७/११५/४
भाव--पुण्य की कमाई मेरे घर की शोभा बढ़ाए और पाप की कमाई को मैं नष्ट कर देता हूँ।
(१४) मा जीवेभ्यः प्रमदः।
अथर्ववेद--८/१/७
भाव--प्राणियो की ओर से बेपरवाह मत हो।
(१५) मा प्रगाम पथो वयम्।
अथर्ववेद--१३/१/५९
भाव--सन्मार्ग से हम विचलित न हों।
(१६) प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये।
अथर्ववेद--१९/६२/१
भाव--सबका कल्याण सोचो चाहे शूद्र हो चाहे आर्य।
(१७) अनागोहत्या वै भीमा।
अथरंववेद--१०/१/२९
भाव--निरअपराध की हिंसा करना भयंकर है।
(१८) मा श्रुतेन वि राधिषि।
अथर्ववेद--१/१/४
भाव--हम सुने हुए वेदोपदेश के विरुद्ध आचरण न करें।
(१९) मात्र तिष्ठः परांमनाः।
अथर्ववेद---८/१/९
भाव--इस संसार में उदासीन मन से मत रहो।
(२०) अघमस्त्वघकृते।
अथर्ववेद--१०/१/५
भाव--पापी को दुख ही मिलता है।
(२१) नस्तेयमद्मि।
अथर्ववेद--१४/१/५७
भाव--मै चोरी का माल न खाऊँ।
(२२) असन्तापं में हृदयम्।
अथर्ववेद--१६/३/६
भाव-- मेरा हृदय सन्ताप से रहित हो।
(२३) ततः परं नाति पश्यामि किंचन।
अथर्ववेद--१८/२/३२
भाव--प्रभु से बढ़कर मुझे कुछ नहीं दिखता।
(२४) इन्द्रस्य कर्म सुकृता पुरुणि।
अथर्ववेद--२०/११/६
भाव--प्रभु के सब कर्म शोभा के होते हैं।
(२५) हत्वी दस्यून् प्रार्यं वर्णमावत्।
अथर्ववेद--२०/११/९
भाव-- प्रभु दुष्टों का विनाश करके आर्यों की रक्षा करता है।
(२६) प्रत्यं नः सुमना भव।
अथर्ववेद--३/२०/२
भाव--हे प्रभु ! हमारे प्रति शुभ मन रखें।
(२७) मा नो हिंसीः पितरं मातरं च।
अथर्ववेद--११/२/२९
भाव--हे प्रभु ! हमारे माता पिता को कष्ट मत दे।
(२८) वि द्विषो वि मृधो जहि।
अथर्ववेद--१९/१५/१
भाव--हे प्रभु ! हमारी द्वेषवृत्तियों और हिंसकवृत्तियों को नष्ट कर दे।
(२९) अग्नि सख्ये मा रिषामा वयं तव।
अथर्ववेद--२०/१३/३
भाव--हे प्रभु ! तेरी मैत्री पाकर हम विनाश से बच जाएँ।
(३०) मा त्वायतो जरितुः काममूनयोः।
अथर्ववेद--२०/२१/३
भाव--हे प्रभु! अपनी चाह वाले मुझ भक्त की चाहत को अपूर्ण मत रख।
(३१) न स्तोतारं निदे करः।
अथर्ववेद--२०/२३/६
भाव--मुझ स्तुति करने वाले को निन्दा का पात्र मत कर।
(३२) मा ते रिषन्नुपसत्तारोअग्ने।
अथर्ववेद--२/६/२
भाव--हे प्रभु ! आपके उपासक दुखी न हों।
(३३) मा त्वचा वोचन्नत्रराधसं जनासः।
अथर्ववेद-५/११/७
भाव--हे प्रभु ! लोग मुझे कंजूस न कहें।
(३४) यस्तन्नवेद किमृचा करिष्यति।
अथर्ववेद--९/१०/१८
भाव--जो उस प्रभु को नहीं जानता, उसका वेद क्या करेगा।
(३५) दस्यूनव धूनुष्व।
अथर्ववेद--१९/४६/२
भाव--दस्युओं को धुन डालो।
(३६) आ वीरो अत्र जायताम।
अथर्ववेद--३/२३/२
भाव--वीर सन्तान उत्पन्न कर।
(३७) सखा सखिभ्यो वरीयः कृणोतु।
अथर्ववेद--७/५१/१
भाव--मित्र को मित्र की भलाई करनी चाहिए।
(३८) दूर ऊनेन हीयते।
अथर्ववेद--१०/८/१५
भाव--बुरी संगत से मनुष्य गिरता है।
(३९) विश्वम्भर विश्वेन मा भरसा पाहि।
अथर्ववेद--२/१६/५
भाव--हे प्रभु ! अपनी शक्ति से मेरी रक्षा करो।
(४०) मिथो विघ्नाना उपयन्तु मृत्युम्।
अथर्ववेद ६/३२/३
भाव--परस्पर लड़ने वाले मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।
(४१) मा पुरा जरसो मृथाः।
अथर्ववेद---५/३०/१७
भाव-- हे मनुष्य ! तू बुढ़ापे से पहले मत मर।
(४२) भीमा इन्द्रस्य हेतयः।
अथर्ववेद--४/३७/८
महत्व--यह वेद मानव जीवन के सभी पहलुओं को छूता है इसलिए इसे
लोकवेद भी कहा जाता है। इसमें वैदिक कर्मकाण्डों के साथ-साथ जड़ी- बूटी चिकित्सा और मानसिक उपचार का भी उल्लेख है। इसमें श्राप और आशीर्वाद से सम्बन्धित कई मंत्र मिलते हैं।
निष्कर्ष-- अथर्ववेद हमें स्वास्थ्य, सुरक्षा, समाज व्यवस्था, राजनीति और आध्यात्मिक उन्नति से जुड़े गहरे ज्ञान से परिचित कराता है। यह वेद विशेष रूप से मानव कल्याण और सुख शान्ति को ध्यान में रखकर रचा गया है
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