----:वेद और उपनिषद:---(4)--
(७) -------: तैत्तिरीय उपनिषद:-----
यह उपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत आता है। यह ज्ञानयोग द्वैत अद्वैत सिद्धान्त पर आधारित है। यह तीन खण्डों में विभक्त है। (१) शिक्षा
वल्ली (२) ब्रह्मानन्द वल्ली (३) भृगु वल्ली। शिक्षा वल्ली में २५ मंत्र, ब्रह्मा
नंद वल्ली में १३ मंत्र और भृगु वल्ली में
१५ मंत्र हैं। इस तरह इसमें कुल ५३ मंत्र हैं। इसमें ४० अनुवाक(अध्याय) हैं। शिक्षावल्ली में १२ अनुवाक, ब्रह्मानन्द
वल्ली में ९ अनुवाक तथा भृगुवल्ली में १९ अनुवाक हैं। शिक्षावल्ली में कर्मानुष्ठान की शिक्षा की प्रधानता है।जब कि ब्रह्मानन्द और भृगुवल्लियों का
आरम्भ ब्रह्म विद्या के ब्रह्माप्नोति परम मंत्र से होता है।
तैत्तिरीय उपनिषद के प्रमुख श्लोक_
(१) तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः। आकाशाद् वायुः। वायोः अग्निः। अग्नेः आपः। अदभ्यः पृथ्वी
पृथिव्या औषधयः। औषधीभ्योऽन्नम्।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भावार्थ:- ईश्वर से आकाश बन गया।
आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से
जल इस प्रकार जल से पृथ्वी, पृथ्वी से औषधियाँ, औषधियों से अन्न बना।
(२) ब्रह्म विदाप्नोति परम्।
तैत्तिरीय उपनिषद------२/१
भावार्थ:-जो ब्रह्म को जानता है, वही
परमानन्द को पाता है। ब्रह्म का लक्षण सत्य, ज्ञान और अनन्त स्वरूप बतलाकर उसे मन वाणी से परे अचिन्त्य कहा गया है।
इस निर्गुण ब्रह्म का बोध उसके अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द इत्यादि
सगुण प्रतीकों के क्रमशः चिन्तन द्वारा
पिता वरुण ने पुत्र भृगु को कराया है।
भृगु ने अपने पिता वरुण से पूछा, पिता जी यह बताइए कि ब्रह्म क्या है ? वरुण ने कहा, जिससे यह संसार उत्पन्न हुआ है, जिस से यह संसार पोषित है और जिसमें यह संसार लय हो जाता है, वह ब्रह्म है। भृगु ने पूछा, किससे ? वरुण ने कहा, जाओ साधना करो। भृगु ने साधना की, और लौट कर पिता से
कहा,
(३) अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात।अन्नाद्धयेव
खल्विमानि भूतानि जायन्ते। अन्नेन जातानि जीवन्ति।अन्नं प्रयन्त्यभि
संविशन्तीति।
तैत्तिरीय उपनिषद --३/२
भावार्थ:--उन्होंने जाना कि अन्न ही ब्रह्म है। क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि अन्न से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं तथा उत्पन्न होकर ये अन्नके ही द्वारा जीवित रहते हैं तथा अन्न में ही पुनः लौटकर
समाविष्ट हो जाते हैं।
पिता ने कहा, जाओ और साधना करो। भृगु जंगल में लौट आए और तपस्या (साधना) करने लगे। कुछ काल उपरांत
लौट कर आए और पिता से बोले, पिता जी मैने जान लिया।
(४) प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात। प्राणाद्धयेव खल्विमानिभूतानि जायन्ते। प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणं प्रयन्त्यभि संविशन्तीति।
तैत्तिरीय उपनिषद- -३/३ भावार्थ:- उन्होंने जाना कि प्राण ही ब्रह्म है। क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि प्राण से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं। प्राण से उत्पन्न होकर प्राण में ही जीते हैं तथा प्राण में ही पुनः लौटकर समाविष्ट हो जाते हैं। पिता वरुण ने कहा, जाओ तपस्या करो। भृगु जंगल लौट आए और फिर तपस्या करने लगे। भृगु लौटकर पिता के पास आए और कहा ,
(५) मनो ब्रह्मेति व्यजानात। मनसोह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।मनसा जातानि जीवन्ति। मनः प्रयन्त्यभि संविशन्तीति।
तैत्तिरीय उपनिषद-- ३/४ भावार्थ:-उन्होंने जाना कि मन ही ब्रह्म है। क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि मन से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं तथा उत्पन्न होकर ये मन के द्वारा ही जीवित रहते हैं और मन में ही ये पुनः लौटकर
समाविष्ट हो जाते हैं। वरुण बोले, जाओ तपस्या करो। भृगु जंगल में आए और पुऩः तपस्या करने लगे। कुछ समय बाद फिर भृगु लौटे और कहा, विज्ञानं ब्रह्मेति (आत्मा) व्यजानात।
(६) विज्ञानाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। विज्ञानेन जातानि जीवन्ति।
विज्ञानं प्रयन्त्यभि संविशन्तीति।
तैत्तिरीय उपनिषद--३/५
भावार्थ:-उन्होंने जाना कि विज्ञान (आत्मा) ही ब्रह्म है क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि विज्ञान से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं तथा उत्पन्न होकर ये आत्मा के द्वारा ही जीवित रहते हैं, तथा विज्ञान में ही पुनः लौटकर समाविष्ट हो जाते हैं।
पिता फिर बोले, जाओ तपस्या करो। भृगु पुनः जंगल लौट आए और तपस्या करने लगे। इस बार भृगु आश्वस्त थे कि उन्होंने जो अनुभव किया है, वह निश्चित ही ब्रह्म है।
आकर अपने पिता वरुण से बोले,
(७) आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात। आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।आनन्देन जातानि जीवन्ति।
आनन्दं प्रयन्त्यभि संविशंतीति।
तैत्तिरीय उपनिषद--३/६
अर्थ:- उन्होंने जाना कि आनन्द ही ब्रह्म है। क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि आनन्द से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं तथा उत्पन्न होकर ये आनन्द के ही द्वारा जीवित रहते हैं तथा आनन्द में ही ये पुनः लौटकर समाविष्ट हो जाते हैं। वरुण ने कहा, निश्चित ही आनंद ब्रह्म है और इसीलिए संसार का हर प्राणी आनन्द (सुख)की खोज में है।ब्रह्म से ही सृष्टि की उत्पत्ति हुयी है और अंत में यह सृष्टि ब्रह्म में ही विलीन हो जाती है
गुरुकुल छोड़ते समय आचार्य ने विद्यार्थियों को सांसारिक जीवन का निर्वाह कैसे करना चाहिए ? इसके बारे में शिक्षा दी है:-
(८) सत्यं वद्। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। आचार्याय प्रियं
धनमाहृत्य प्रजातन्तु मा व्यवच्छेत्सी।
सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्। स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्। देव पितृ
कार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्।
तैत्तिरीय उपनिषद --१/११/१
भावार्थ--सत्य बोलना। धर्म करना। स्वाध्याय में प्रमाद मत करना। आचार्य के प्रिय धन से उसको (पत्नी) तृप्त करके प्रजा के धागे (संतानोत्पत्ति की परम्परा) को मत तोड़ना। सत्य से कभी मत डिगना। धर्म से कभी मत डिगना। भौतिक उन्नति से मत डिगना। स्वाध्याय और प्रवचन से मत डिगना। देव (ज्ञानी) और परिवार के वृद्धों की सेवा से न डिगना।
(९) मातृ देवो भव। पितृ देवो भव।आचार्य देवो भव। अतिथि देवो भव।
तैत्तिरीय उपनिषद्----१/११/२ भावार्थ --माता को देव तुल्य मानना। परिवार के वृद्धों को देव तुल्य मानना।आचार्य को देव तुल्य मानना। अतिथि को देव तुल्य मानना।
(१०) श्रद्धया देयम्। अश्रद्धया देयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। संविदा देयम्। तैत्तिरीय उपनिषद-- १/११/३ भावार्थ-- दान श्रद्धा से देना। श्रद्धा न रखने वाले को भी दान देना। दान अपनी स्थिति के अनुसार देना। दान अहंकार रहित होकर देना। दान सद् पात्र को देना।
(११) अद्यतेअत्ति च भूतानि। तस्मादन्नं तदुच्चयते। -
तैत्तिरीय उपनिषद--२/२
भावार्थ--यह सभी प्राणियों द्वारा खाया जाता है और यह भी खाता है सभी प्राणियों को, इसलिए इसे अन्न कहा जाता है।
(१२) अन्नं न निन्द्यात्। तद्व्रतम्।
तैत्तिरीय उपनिषद--३/७
भावार्थ--अन्न की निंदा मत करना। यह तुम्हारा व्रत हो।
(१३) सत्यं ज्ञानंन्तम् ब्रह्म।
तैत्तिरीय उपनिषद-----२/१
भावार्थ-- ब्रह्म सत्य स्वरूप, ज्ञान स्वरूप और अनंत है।
सुखों की मात्रा के सम्बन्ध में जिस प्रकार की मीमांसा महर्षि याज्ञवल्क्य
ने सुखों की तुलना करते हुए इस उपनिषद में किया है, वह अद्वितीय है।
(१४) सैषाऽऽनन्दस्य मीमांसा भवति। युवा स्यात्साधुयुवाध्यायक आशिष्ठो द्रढिष्ठो बलिष्ठस्तस्येयं पृथ्वी सर्वा वित्त सम पूर्णा स्यात। स एको मानुष आनन्दः
तैत्तिरीय उपनिषद--२/८
भावार्थ:-कोई व्यक्ति सम्पूर्ण पृथ्वी का
एक मात्र शासक हो, युवा हो, स्वस्थ हो,
हो, बुद्धिमान हो, प्रजा अनुगत हो, सर्व
सांसारिक सुख सम्पन्न हो तो वह मानव
लोक का सबसे सुखी व्यक्ति है।
(१५) ते ये शतं मानुषा आनन्दः। स एको मनुष्य गन्धर्वाणामानन्दः।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों राजाओं का सुख मिलकर एक मानव गन्धर्व के सुख के बराबर होता है।
(१६) ते ये शतं मनुष्य गन्धर्वाणामानन्दः। स एको देव गन्थर्वाणामानन्दः।--२/८
भावार्थ:- ऐसे सैकड़ों मानव गन्धर्व के
सुख मिलकर एक देव गन्धर्व के सुख के बराबर होता है।
(१७) ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दः। स एकः पितृणां चिरलोकलोकानामानन्दः। तैत्तिरीय उपनिषद -२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों देव गन्धर्व के सुख मिलकर एक पितृ लोक के सुख के बराबर होता है।
(१८) ते ये शतं पितृणां चिरलोक लोकानामानन्दः। स एक आजानजानां देवानामानन्दः।
तैत्तिरीय उपनिषद-----२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों पितृ लोक के सुख मिलकर एक आजानज देव के सुख के बराबर होता है।
(१९) ते ये शतं आजानजानां देवानामानन्दः।
स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः।
तैत्तिरीय उपनिषद-२/८
भावार्थ:---ऐसे सैकड़ों आजानज देव के सुख मिलकर एक कर्म देव के सुख के बराबर होता है।
(२०) ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दः। स एको देवानामानन्दः।
तैत्रीय उपनिषद---२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों कर्म देव के सुख मिलकर एक देव के आनन्द के सुख के बराबर होता है।
(२१)ते ये शतं देवानामानन्दः। स एक इन्द्रस्यानन्दः।
तैत्तिरीय उपनिषद ----२/८
भावार्थ:-- ऐसे सैकड़ों देव के सुख मिलकर एक इंद्र के सुख के बराबर होता है।
(२२) ते ये शतं इन्द्रस्यानन्दः। स एको बृहस्पतेःआनन्दः।
तैत्तिरीय उपनिषद ----२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों इंद्र के सुख मिलकर एक बृहस्पति के सुख के बराबर होता है।
(२३) ते ये शतं बृहस्पतेः आनन्दः। स एकः प्रजापतेः आनन्दः।
तैत्तिरीय उपनिषद ---२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों बृहस्पति के सुख मिलकर एक प्रजापति के सुख के बराबर होता है।
(२४) ते ये शतं प्रजापतेः आनन्द। स एको ब्रह्मण आनन्दः।
तैत्तिरीय उपनिषद----२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों प्रजापति के सुख मिलकर एक ब्रह्मा के सुख के बराबर होता है।
(२५) यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सही
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान न बिभेति कुतश्चनेति।
तैत्तिरीय उपनिषद-२/९
भावार्थ:- ब्रह्म का वह आनन्द जहाँ से कुछ भी प्राप्त किए बिना वाणी लौट आती है तथा मन भी जहाँ पहुँच कर
वापस लौट आता है, ब्रह्म के उस आनंद
को कौन जानता है ?
(२६) ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।
तैत्तिरीय उपनिषद--शान्ति पाठ
भावार्थ--परमात्मा हम दोनों(गुरु शिष्यों) का साथ-साथ पालन करे। हमारी रक्षा करे। हम साथ-साथ अपने विद्या बल का वर्धन करें। हमारा अध्ययन किया हुआ ज्ञान तेजस्वी हो। हम दोनो कभी परस्पर द्वैष न करें। हमारे आधिभौतिक,आधिदैविक तथा आध्यात्मिक तापों (दुखों) की शान्ति हो।
तैत्तिरीय उपनिषद की सूक्तियाँ--
(१) सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भाव--ब्रह्म वह है जो सत्य है, ज्ञान स्वरूप है और अनन्त है।
(२) तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भाव--इस आत्मा (ब्रह्म) से ही आकाश
की उत्पत्ति हुयी।
(३) आकाशाद् वायुः।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भाव--आकाश से वायु की उत्पत्ति हुयी।
(४) वायोः अग्निः।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भाव--वायु से अग्नि की उत्पत्ति हुयी।
(५) अग्नेः आपः।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भाव- अग्नि से जल की उत्पत्ति हुयी।
(६) अदभ्यः पृथ्वी।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भाव--जल से पृथ्वी की उत्पत्ति हुयी।
(७) पृथिव्या औषधयः।
तैत्तिरीय उपनिंषद--२/१
भाव--पृथ्वी से औषधियों की उत्पत्ति हुयी।
(८) औषधीभ्योऽन्नम्।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/१
भाव-औषधियों से अन्न की उत्पत्ति हुयी।
(९) ब्रह्म विदाप्नोति परम्।
तैत्तिरीय उपनिषद-
भाव-- ब्रह्म को जानने वाला परम को प्राप्त कर लेता है।
(१०) आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात।
तैत्तिरीय उपनिषद--३/६
भाव--उसने(भृगु) ने जाना कि आनन्द ही ब्रह्म है।
(११) आनन्दाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते।
तैत्तिरीय उपनिषद-३/६
भाव--आनन्द से ही समस्त प्राणी उतंपन्न होते हैं।
(१२) आनन्देन जातानि जीवन्ति।
तैत्तिरीय उपनिषद--३/६
भाव--आनन्द के द्वारा ही समस्त प्राणी जीवित रहते हैं।
(१३) आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशंतीति।-
तैत्तिरीय उपनिषद-३/६
भाव--आनन्द में ही ये (समस्त प्राणी)
पुनः लौटकर समाविष्ट हो जाते हैं।
(१४) सत्यं वद्।
तैत्तिरीय उपनिषद--१/११
भाव- सत्य बोलो।
(१५) धर्मं चर।
तैत्तिरीय उपनिषद--१/११
भाव--धर्म करो।
(१६) स्वाध्यायान्मा प्रमदः।
तैत्तिरीय उपनिषद--१/११
भाव-- स्वाध्याय में प्रमाद पत करो।
(१७) सत्यान्न प्रमदितव्यम्।
तैत्तिरीय उपनिषद,--१/११
भाव--सत्य से कभी मत डिगना।
(१८) धर्मान्न प्रमदितव्यम्।
तैत्तिरीय उपनिषद--१/११
भाव--धर्म से कभी मत डिगना।
(१९) कुशलान्न प्रमदितव्यम्।
तैत्तिरीय उपनिषद--१/११
भाव-कल्याणकारी कार्यों से कभी मत डिगना।
(२०) भूत्यै न प्रमदितव्यम्।
तैत्तिरीय उपनिषद--१/११
भाव-सेवकों के प्रति पंरमाद मत करना।
(२१) स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्।
तैत्रीय उपनिषद--१/११
भाव--स्वाध्याय और प्रवचन के प्रति प्रमाद मत करना।
(२२) देव पितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्। तैत्तिरीय उपनिषद--१/११
भाव--ज्ञानियों और परिवार के वृद्धों की सेवा से न डिगना।
(२३) मातृ देवो भव।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/११
भाव--माता को देव तुल्य मानो।
(२४) पितृ देवो भव।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/११
भाव--पिता को देव तुल्य माव़नो।
(२५) आचार्य देवो भव।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/११
भाव--आचार्य (गुरू) को देव तुल्य मानो।
(२६) अतिथि देवो भव। ----२/११
भाव--अतिथि को देव तुल्य मानो।
(२७) श्रद्धया देयम्।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/११
भाव--दान श्रद्धा से देना।
(२८) अश्रद्धया देयम्।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/११
भाव-श्रद्धा न रखने वाले को भी दान देन्।
(२९) श्रिया देयम्।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/११
भाव--दान अपनी स्थिति के अनुसार देना।
(३०) ह्रिया देयम्।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/११
भाव+-दान अहंकार रहित होकर देना।
(३१)संविदा देयम्।
तैत्तिरीय उपनिषद -२/११.
भाव--दान सद्पात्र के देना।
(३२)अद्यतेअत्ति च भूतानि। तस्मादन्नं तदुच्चयते।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/३
भाव--खाया जाता है और खाता है प्राणियों को, इसलिए इसे अन्न कहा जाताहै।
(३३) अन्नं न निन्द्यात्। तद्व्रतम्।
तैत्तरीय उपनिषद---३/७
भाव--अन्न की निंदा मत करना। यह तुम्हारा व्रत हो।
(३४) सत्यं ज्ञानंन्तम् ब्रह्म।-
तैत्तिरीय उपनिषद------२/१
भाव--ब्रह्म सत्य स्वरूप, ज्ञान स्वरूप और अनंत है।
(३५) सर्वा वित्त सम पूर्णा स्यात। स एको मानुष आनन्दः।
तैत्तिरीय उपनिषद -२/८
भाव- सर्व सांसारिक सुख सम्पन्न हो तो वह मानव लोक का सबसे सुखी व्यक्ति है।
(३६) ते ये शतं मानुषा आनन्दः। स एको म गन्धर्वाणामानन्दः।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/८
भाव--ऐसे सैकड़ों मनुष्यों (राजाओं) का सुख मिलकर एक मानव गन्धर्व के सुख के बराबर होता है।
(३७) ते ये शतं मनुष्य गन्धर्वाणामानन्दः। स एको देव गन्थर्वाणामानन्दः।
तैत्तिरीय उपनििषद--२/८
भाव--ऐसे सैकड़ों मानव गन्धर्व के
सुख मिलकर एक देव गन्धर्व के सुख के बराबर होता है।
(३८) ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दः। स एकः पितृणां चिरलोकलोकानामानन्दः।-
तैत्तिरीय उपनिषद-२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों देव गन्धर्व के सुख मिलकर एक पितृ लोक के सुख के बराबर होता है।
(३९) ते ये शतं पितृणां चिरलोक लोकानामानन्दः। स एक आजानजानां देवानामानन्दः।
तैत्तिरीय उपनिषद----२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों पितृ लोक के सुख मिलकर एक आजानज देव के सुख के बराबर होता है।
(४०) ते ये शतं आजानजानां देवानामानन्दः। स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः।-२/८
भावार्थ:---ऐसे सैकड़ों आजानज देव के सुख मिलकर एक कर्म देव के सुख के बराबर होता है।
(४१) ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दः। स एको देवानामानन्दः।---२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों कर्म देव के सुख मिलकर एक देव के आनन्द के सुख के बराबर होता है।
(४२) ते ये शतं देवानामानन्दः। स एक इन्द्रस्यानन्दः।
तैत्तिरीय उपनिषद----२/८
भावार्थ:-- ऐसे सैकड़ों देव के सुख मिलकर एक इंद्र के सुख के बराबर होता है।
(४३) ते ये शतं इन्द्रस्यानन्दः। स एको बृहस्पतेःआनन्दः। -
तैतिरीय उपनिषद---२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों इंद्र के सुख मिलकर एक बृहस्पति के सुख के बराबर होता है।
(४४) ते ये शतं बृहस्पतेः आनन्दः। स एकः प्रजापतेः आनन्दः।
तैत्तिरीय उपनिषद ---२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों बृहस्पति के सुख मिलकर एक प्रजापति के सुख के बराबर होता है।
(४५) ते ये शतं प्रजापतेः आनन्द। स एको ब्रह्मण आनन्दः।
तैत्तिरीय उपनिषद--२/८
भावार्थ:--ऐसे सैकड़ों प्रजापति के सुख मिलकर एक ब्रह्मा के सुख के बराबर होता है।
(४६) यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सही आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान न बिभेति कुतश्चनेति।
तैत्तिरीय उपनिषद-२/९
भावार्थ:- ब्रह्म का वह आनन्द जहाँ से कुछ भी प्राप्त किए बिना वाणी लौट आती है तथा मन भी जहाँ पहुँच कर जब वापस लौट आता है उस आनन्द को भला कौन जानता है ?
(८) ----:छान्दोग्य उपनिषद:----
यह उपनिषद सामवेद के अंतर्गत आता है। यह बृहदाकार है। इसमें अनेक कथाएँ हैं। "सर्वं खल्विदं ब्रह्म " ३/१४/१ इसका भाव है कि सब ब्रह्म है। एक कथा है:- उद्दालक अपने बेटे श्वेतकेतु को उपदेश दे रहे हैं। पुत्र के
पूछने पर कि मैं कौन हूँ ? "तत्त्वमसि। "
तू वही है, अर्थात् तू ही ब्रह्म है। "एतदात्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा
तत्त्वमसि श्वेतुकेतो। --६/८/७
इसका भाव है:- यह सब उस आत्मा से व्याप्त है। वह सत्य है। वह आत्मा तुम हो श्वेतुकेतु। इसे समझाने के लिए अगले वाक्य में एक उदाहरण देते हैं:-
"जिस प्रकार मधुमक्खियाँ अनेकों वृक्ष के फूलों से रस ग्रहण करके उनको मधु में एक कर देती हैं, उन रसों को यह ज्ञात नहीं रहता कि वह किस वृक्ष के फूल का है। इसी तरह यह सारी प्रजाएँ
एक सत् को प्राप्त होती हैं और फिर यह नहीं जानतीं कि हम सत् को प्राप्त हो गए हैं।"---:६/९/१-४
इस संसार में वे कूकर-शूकर, कीट-पतंग
जो जो बनते हैं वे(तत् आभवति) वह ही होते हैं। एक अगली भी उपमा देते हैं:-
उद्दालक कहते हैं :-"समुद्र में नदियाँ इस प्रकार जाकर मिलती हैं कि वे यह नहीं कह सकतीं कि अमुक नदी है। इसी प्रकार सारी प्रजाएँ सत् से आकर यह नहीं कह पातीं कि हम सत् से आए हैं।"--६/१०/१-३
उद्दालक आगे कहते हैं :-वृक्ष पृथ्वी से
पानी पीता हुआ हर्षित खड़ा रहता है।जब वृक्ष की शाखाएँ सूख जाती हैं तो पेड़ मर जाता है। जीवायेतं वाव किलेदं
म्रियते, न जीवो म्रियते।--:६/११/३
जीव से अलग हो जाने पर शाखा (शरीर) मर जाता है, परन्तु जीव नहीं मरता। वही यह आत्मा है, जिसमें सब व्याप्त है, जो सत्य है। तत्त्वमसि। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि शरीर में जीवन आत्मा के कारण है।
शरीर का एक अंग कट जाने पर भी आत्मा नहीं मरता। इसी तरह पूरा शरीर
नष्ट होने पर भी आत्मा नहीं मरता, और वह आत्मा तुम हो।-६/१२/१-३
आगे कहते हैं कि वट वृक्ष में फल अलग -अलग लगते हैं परन्तु फल के बीज को तोड़ने पर कुछ भी नहीं दिखता। यही वह आत्मा है। बीज के इसी आणुविक भाग से वट वृक्ष बनता है।--6/12/1-3
आगे एक उदाहरण और देते हैं :- नमक का ढेला पानी में डाल देने पर नमक पानी में मिल जाता है, नमक नहीं दिखता परन्तु पानी के हर बूँद में नमक समाया हुआ है, इसे हम जानते हैं, इसी तरह आणुविक आत्मा भी सब में विद्यमान है।---६/१३/१-३
आँख में पट्टी बाँधकर किसी कोलखनऊ से लाया जाए और उसकी पट्टी खोल दी जाए तो वह चिल्ला कर कहेगा ! लखनऊ किधर है, मुझे रास्ता बताओ। फिर वह पूछते -पूछते लखनऊ पहुँच जाएगा। --६/१४/१-३
छान्दोग्य उपनिषद में १० अध्याय हैं:-
अंतिम ८ अध्याय ही छान्दोग्य उपनिषद के हैं। पहले अध्याय में साम के सार रूप ॐकार की व्याख्या की गयी है।
पहले अध्याय में १३ खण्ड है। प्रथम खण्ड में:--ॐ अक्षर ही उद्गीथ है। इसकी ही उपासना करनी चाहिए। ॐ ऐसा ही उद्गान करता है। उसकी ही व्याख्या की जाती है। -----१/१/१
सब भूतों का रस पृथ्वी है। पृथ्वी का रस जल है। जल का रस औषधियाँ हैं। औषधियों का रस पुरुष है। पुरुष का रस वाक् है। वाक का रस ऋक है।ऋक का रस साम है। साम का रस उद्गीथ है।
-----१/१/२
द्वितीय खण्ड में:--देवताओं ने असुरों से
विजय पाने हेतु उद्गीथ का अनुष्ठान किया। नासिका में रहने वाले प्राण के रूप में उद्गीथ की उपासना की। किन्तु असुरों ने उसे पाप से युक्त कर दिया। इसी से लोक सुगन्ध और दुर्गन्ध दोनों को सूँघता है। वाणी, आँख, कान, स्पर्श और मन सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह का अनुभव करते हैं। मुख्य
प्राण के रूप में जब उद्गीथ की उपासना की तब ढेला जैसे पाषाण से टकराए, उसी तरह असुर टकरा कर विध्वंस हो गए। अंगिरा ऋषि ने प्राण के रूप में
उद्गीथ की उपासना की थी, इसलिए इस प्राण को ही आँगिरस मानते हैं।
बृहस्पति, आपास्य और दल्भ के पुत्र बक ने भी इसीतरह उद्गीथ की उपासना की थी। तृतीय खण्ड में:--सूर्य के रूप में ॐ (उद्गीथ) की ही उपासना करना चाहिए।
यह अन्धकार और भय का नाश करने वाला है।
चतुर्थ खण्ड में:--मृत्यु से भय मानते हुए
देवताओं ने त्रयी विद्या में प्रवेश किया।
उन्होंने अपने को छन्दों से आच्छादित कर लिया। देवताओं का त्रयी विद्या (ऋक,साम और यजु) द्वारा अपने को आच्छादित करना ही छन्दों का छन्दपन है, इसी से देव अमर हो गए।
पंचम खण्ड में:--उद्गीथ ही प्रणव है और
प्रणव ही उद्गीथ है। हृदय की १०१ नाड़ियों में से एक नाड़ी ऊपर(मस्तक) की ओर जाती है, उसके द्वारा ऊपर की ओर जाने वाला जीव अमरत्व को प्राप्त होता है। शेष इधर-उधर जाने वाली
नाड़ियाँ केवल उत्क्रमण का कारण होती हैं। मथे हुए दूध का जो सूक्ष्म भाग होता है, वह ऊपर इकट्ठा हो जाता है, वह घृत होता है, इसी प्रकार जो खाए हुए अन्न का सूक्ष्म भाग होता है, वह मन है। पिए हुए जल का सूक्ष्म भाग प्राण है।भक्षण किए हुए तेज का सूक्ष्म भाग वाणी है।
आगे के खण्डों में ॐकार के संबंध में स्पष्ट चर्चा नहीं कि गयी है।
द्वितीय अध्याय:--इसमें २४ खण्ड हैं। पंच विधि साम की उपासना से ऊर्ध्व और अधो लोकों के भोग सहज ही
प्राप्त होते हैं।
तृतीय अध्याय :--इसमें १९ खण्ड हैं।
आदित्य को पारब्रह्म मानकर विविध प्रकार से उनके स्वरूप का वर्णन किया गया है।
चौथा अध्याय:--इसमें १७ खण्ड हैं। पहले से तीन खण्ड तक राजा जनश्रुति और गाड़ीवान रैक्व का संवाद। चार से नौ तक जाबाल पुत्र सत्यकाम की कथा, जिसमें ब्रह्म का उपदेश दिया है। दस से सत्रह खण्ड तक सत्यकाम द्वारा जाबाल पुत्र उपकोशल को ब्रह्म का उपदेश दिया गया है।
पाँचवा अध्याय:--इसमें २४ खण्ड हैं। सत्यकाम और जाबाल तथा श्वेतकेतु और प्रवाहण का संवाद दिया है। इसमें प्राण की श्रेष्ठता पर गहन विचार किया गया है। इस संदर्भ में एक कथा है:--एक बार इन्द्रियों में श्रेष्ठता पर बहस छिड़ गयी। कौन श्रेष्ठ है ? सबकी श्रेष्ठता की परीक्षा ली गयी। आँख न रहने पर आदमी अन्धा हो गया। कान न रहने पर बहरा हो गया। नाक न रहने पर गन्ध का
विचार न कर सका। जिह्वा न रहने पर गूँगा हो गया। त्वचा का स्पर्श न रहने पर
शून्यता आ गयी। मन के चले जाने पर
बालकों जैसा व्यवहार करने लगा। परन्तु जब प्राण जाने लगा तब शरीर शिथिल होने लगा। इस तरह प्राण की
श्रेष्ठता सिद्ध हुयी।
छठा अध्याय:--इसमें १६ खण्ड हैं। उद्दालक ने श्वेतकेतु को ब्रह्म के बारे में समझाया है। जगत की उत्पत्ति के बारे में समझाते हुए कहा, " सत् पहले अकेला था। इसने अपने आपको अनेक रूपों में विभक्त होने का संकल्प किया।
संकल्प करते ही तेज प्रकट हुआ। तेज से जल और जल के सूक्ष्म कणों के प्रवाह के कारण पृथ्वी बनी। पृथ्वी से अन्न वा सूर्य की उत्पत्ति हुयी।
सप्तम अध्याय:-- इसमें २६ खण्ड हैं।
एक से पन्द्रह तक ब्रह्म का विवेचन किया गया है जिसमें सनत्कुमारों ने नारद को प्राण तत्व का ज्ञान दिया है।
नारद को इस बात का गर्व था कि वे सब
विषयों के ज्ञाता हैं। उन्होंने सनत्कुमारों से पूछा कि ब्रह्म क्या है ? सनत्कुमारों ने नारद से कहा, जितना आप ब्रह्म के बारे में जानते हैं, वह बहुत थोड़ा है, वह तो ब्रह्म के नाम भर है। नाम के ऊपर वाणी है, वाणी के ऊपर संकल्प, संकल्प के ऊपर मन, मन के ऊपर चित्त, चित्त के ऊपर ध्यान, ध्यान के ऊपर विज्ञान, विज्ञान से ऊपर बल और बल से अन्न।
यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति
भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिासितव्ज्ञयः
---------७/२३/१
भावार्थ:---सनत्कुमार ने नारद को बताया कि जो भूमा (अनंतमात्रा का सुख) है वही सुख है, अल्प में सुख नहीं है, भूमा ही सुख है और भूमा को ही जानने की चेष्टा करनी चाहिए।
आठवाँ अध्याय:-- इसमें १५ खण्ड हैं।
एक से छः तक शरीर में आत्मा की स्थिति का विवेचन किया गया है। "स वा
एष आत्माहृदि"(८/३/३) वह आत्मा हृदय में स्थित है। इस हृदय में आत्मा सूक्ष्म रूप से निवास करता है। शरीर वृद्ध होने पर
आत्मा शरीर को छोड़ देता है। आत्मा
अजर-अमर है। केवल आठ अध्याय ही
छान्दोग्य उपनिषद के हैं।
छान्दोग्य उपनिषद के प्रमुख (१) श्लोक --८/१२/१
भावार्थ--प्रजापति बोले,'हे इन्द्र !
यह शरीर मरणशील ही है। यह मृत्यु से ग्रस्त है। यह इस अमृत अशरीरी आत्मा का अधिष्ठान से। सशरीर आत्मा निश्चय ही प्रिय और अप्रिय से ग्रस्त है। सशरीर रहते हुए इसके प्रिय और अप्रिय का नाश नहीं हो ऊेसकता है और अशरीर होने
पर इसे प्रिय और अप्रिय छू नहीं सकते।
(२) श्लोक--
Comments
Post a Comment