----:वेद -(१)

वेद परमेश्वर के मुख से निकला हुआ
"परावाक" है। वह अनादि, नित्य और
अपौरुषेय है। इसलिए वेद को अपने इस मायिक मन, बुद्धि से समझना मेरे लिए कठिन ही नहीं असम्भव है। इसमें लिखा कुछ है,‌ अर्थ कुछ और है। इसे वही समझ सकता है, जिस पर प्रभु की कृपा होगी। मै न तो विद्वान हूँ और न ही वेद को समझने का दावा कर सकता हूँ, फिर भी मैं हिन्दू हूँ और हिन्दू धर्म ‌का वेद ही सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्म ग्रन्थ है, इसलिए इसके अध्ययन का एक छोटा सा प्रयास करता हूँ, आप भी मेरे इस अकिंचन प्रयास‌ के साथ जुड़िए
और इस पवित्र ग्रन्थ को समझने का  प्रयत्न कीजिए। वेद पहले एक ही ग्रन्थ था, कृष्ण द्वैपायन ने इसके चार भाग कर दिए इसलिए‌ आपको कृष्ण द्वैपायन न कहकर वेदव्यास कहा जाने लगा।
 -----:चार वेद एवं हर वेद का उपवेद:---पहला:--ऋगुवेद, इसका उपवेद है---
आयुर्वेद। दूसरा:--यजुर्वेद,इसका उपवेद
है--धनुर्वेद। तीसरा:--सामवेद, इसका उपवेद है--गंधर्ववेद। चौथा--अथर्ववेद, इसका उपवेद है--शिल्पवेद।
      -----:हर वेद के चार भाग:----
(१) संहिता- वेद के मंत्र वाला भाग (प्रथम) जिसमें यज्ञ के लिए देवताओं की काव्य में स्तुति की गयी है। हर एक
वेद की एक संहिता। इस तरह चार संहिताएँ हैं।
(२) ब्राह्मण--वेद में गद्य का वह भाग
जिसमें देवताओं और यज्ञ के बारे में
उल्लेख है। ऋगुवेद के दो ब्राह्मण ग्रन्थ,
यजुर्वेद के दो, साम वेद के आठ और
अथर्ववेद का मात्र एक ब्राह्मण ग्रन्थ है।
इस प्रकार कुल तेरह ब्राह्मण ग्रन्थ हैं।
(३) आरण्यक-ब्राह्मण ग्रन्थों का अंतिम 
भाग आरण्यक कहलाता है।  इस समय सात आरण्यक ग्रन्थ उपलब्ध हैं--(क) 
ऋगुवेद के दो आरण्यक - ऐतरेय 
और कौषीतकि। यजुर्वेद के तीन आरण्यक-बृहत्, तैत्तिरीयऔर मैत्रायणी।सामवेद के दो आरण्यक- जैमनीय और छान्दोग्य।अथर्ववेद का कोई आरण्यक 
नहीं।
(४) उपनिषद(वेदान्त)--वेद के आध्या- त्मिक चिन्तन का भाग(जीव,माया,ब्रह्म)
उपनिषद कहलाता है। इनकी संख्या एक सौ आठ है--(१)ईश(२)केन(३)कठ
(४)प्रश्न(५)मुण्डक(६)मांडूक्य(७)तैत्तिरीय(८)ऐतरेय(९)छान्दोग्य(१०)बृहदारण्यक(११)ब्रह्म(१२)कैवल्य(१३)जाबाल (१४)श्वैताश्वतर(१५)हंस(१६)आरुणेव
(१७)गर्भ(१८)नारायण(१९)परमहंस
(२०)अमृतबिंदु(२१)अमृतनाद(२२)अथर्वशिर(२३)अथर्वशिख(२४) मैत्रायणि    (२५)बृहज्जाबाल(२६)नृसिंहतापिनी  (२७)कालाग्निरुद्र(२८)मैत्रेयी(२९)सुबाल(३०)छुरिक(३१)मंत्रिक(३२)सर्वसार
(३३)निरालम्ब(३४)शुकरहस्य(३५)वज्र
सूचि(३६)तेजोबिन्दु(३७)नादबिंदु(३८)
ध्यान बिंदु(३९)ब्रह्मविद्या(४०)योग तत्व
(४१)आत्मबोध(४२)परिव्रात(४३)त्रिशिषि(४४)सीता(४५)योग चूड़ामणि(४६)
निर्वाण(४७)मण्डल ब्राह्मण(४८)दक्षिणा
मूर्ति(४९)प्राणाग्निहोत्र(५०)गोफलतपणि(५१)कृष्ण(५२)याज्ञवल्क्य(५३)बह
वृचि(५४)शरभ(५५)स्कंद(५६)महानारा
यण(५७)अद्वयतारक(५८)रामरहस्य
(५९) रामतापणि(६०)वासुदेव(६१)मुद्-
गल(६२)शांडिल्य(६३)पैंगल(६४)भिक्षुक (६५)महत्(६६)शारीरक(६७)योगशि
खा(६८)तुरीयातीत(६९)सन्यास(७०)
परमहंसपरिव्राजक(७१)अक्षमालिक
(७२)अव्यक्त(७३)एकाक्षर(७४)अन्नपूर्ण
(७५)सूर्य(७६)अक्षि(७७)अध्यात्म(७८)
वराह(७९)शात्यायनि(८०)हयग्रीव(८१)
दत्तात्रेय(८२)मुक्ति(८३)कुणिक(८४)सा-
वित्रि(८५)आत्मा(८६)पाशुपत(८७)पर-
ब्रह्म(८८)अवधूत(८९)त्रिपुरात्पनि(९०)
देवि(९१)त्रिपुर(९२)कठरुद्र(९३)भावन
(९४)रुद्रहृदय(९५)योगकुण्डलिनि(९६)
भस्म(९७)रुद्राक्ष(९८)गणपति(९९)दर्शन(१००)तारसार(१०१)महावाक्य१०२)
(१०३)पंचबह्म(१०४)गारुड़(१०५)कलि
संतारण(१०६)जाबाल(१०७)सौभाग्य
(१०८)सरस्वतीरहस्य।
इन उपनिषदों को सरलता हेतु तीन खण्डों में विभक्त किया गया है--
(१) ब्रह्म विद्या खण्ड (२) ज्ञान खण्ड (३) साधना खण्ड
(१) अथर्वशिर (२) अध्यात्म (३) अवधूत (४) आत्मपूजा (५) आत्मबोध
(६) कौषीतकिब्राह्मण (७) नारदपरिव्राजक (८) आत्म (९) आरुण्य (१०) आश्रम (११) कठरुद्र (१२) कुण्डिक (१३) कैवल्य (१४) क्षुरिक (१५) जाबालदर्शन (१६) जाबाल (१६) जाबाल्य (१७) तुरीयातीत (१८) द्वय (१९) निर्वाण
 इनमें से ग्यारह उपनिषद प्रमुख हैं--
ऋग्वेद -(१) बृहदारण्यक(२)कौषीतकि। शुक्ल यजु र्वेद--(१) ईश वास्य। कृष्ण यजुर्वेद--(१) तैत्तिरीय (२) कठ (३) श्वैताश्वतर। सामवेद-- (१) छान्दोग्य (२) केन।अथर्ववेद--(१) माण्डूक्य (२) प्रश्न (३) मुण्डक। आदि शंकराचार्य ने ११उपनिषदों पर टीका लिखी है। (१) ईश (२) केन (३) कठ (४) प्रश्न (५) मुण्डक (६) माण्डूक्य (७) तैत्तिरीय (८)
ऐतरेय (९) छान्दोग्य (१०) वृहदारण्यक
(११) श्वेताश्वतर । अब आगे चार वेद,  ११ प्रमुख उपनिषद तथा सात अन्य उपनिषद:--(१२) हंस (१३) पैंगल्य (१४) रुद्र (१५) जाबाल (१६) गर्भ (१७) क्षुरिक (१८) शुक रहस्य, का
सारांश प्रस्तुत करने का एक छोटा प्रयास यहाँ किया गया‌ है।
  (१).     ----:ऋगु वेद:-------
ऋच्यन्ते स्तूयन्ते देवाअनया इति ॠकः।
(जिससे देवताओं की स्तुति हो वह ऋक
है।) ऋगुवेद की ॠचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियाँ और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है। ऋगुवेद का
उपवेद आयुर्वेद है। ऋगुवेद में जल,वायु,
सौर, मन, एवं हवन द्वारा चिकित्सा का
वर्णन किया गया है। इसमें च्यवन ऋषि
को पुनः युवा करने की कथा मिलती है।
यह पद्य में है। इस वेद में यातुधानो 
(राक्षसों) को यज्ञ में बाधा डालने वाला
तथा पवित्र आत्माओं को कष्ट पहुँचाने
वाला बताया गया है।यह वेद दसमण्डल
(अध्याय) में विभक्त है जिसमें पचासी
अनुवाक तथा एक हज़ार सत्रह सूक्त हैं।
इसके अतिरिक्त ग्यारह सूक्त बालखिल्य
नाम से जाने जाते‌ हैं,इस तरह कुल सूक्त
एक हज़ार अट्ठाइस हैं। वेद में मिलावट न हो इसके लिए कात्यायन ऋषि ने वेद 
की ऋचाओंऔर शब्दों की गणना करके
लिख दिया है। ऋचाओं की संख्या दस
हज़ार पाँच सौ अस्सी, शब्दों की संख्या
एक लाख तिरपन हज़ार पाँचसौछब्बीस
तथा अक्षरों की संख्या चार लाखबत्तीस
हज़ार है। इसमें विभिन्न छन्दों में लगभग
चार सौ स्तुतियाँ अग्नि,‌वायु, वरुण, इन्द्र,
मरुत,प्रजापति,सूर्य,उषा,पूषा,रुद्र,सविता
आदि देवताओं की दी हुयी है। इस वेद में(७/५९/१२)पर महामृत्युंजय मंत्र अंकित है--
     ----:जागृत महामृत्युंजय मंत्र:----
ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ
त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम्।
उर्वा रुक मिव बन्धनान्मृत्यौर्मुछीय मा
मृतात्। ॐ स्वः भुवः भूः। ॐ सः जूं ह्रौं।
इसका भाव यह है कि हे त्रिनेत्रधारी भगवान शिव ! हम आपका यजन (पूजन) करते हैं। आप सुगन्धि(कीर्ति)
को पुष्टता प्रदान करके फैलाएँ।जैसे ककड़ी पक जाने पर अपनी लता से अलग हो‌ जाती है वैसे ही मुझे संसार
के बन्धन से मुक्त कर दें जिससे मुझे फिर इस संसार में आना न पड़े। महर्षि वशिष्ठ के अनुसार-------                    ८ वसु +११ रुद्र +१२ आदित्य+
१प्रजापति+१इंद्र=३३ इन३३ देवों की शक्ति, इस ३३अछर वाले महामृत्युंजय
मंत्र में समायी हुयी है।यह जागृत महा- मृत्युंजय ‌मंत्र मृतप्राय व्यक्ति में प्राण का  संचार करने वाला है। इसीलिए इस मंत्र को मृत संजीवनी मंत्र भी कहा  जाता है। ऋगुवेद में ३/६२/१० पर   
गायत्री मंत्र अंकित है--ंॐ भूःभुवःस्वः   तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो ऩः प्रचोदयात्। इसका भाव है-
उस प्राणस्वरूप,दुखनाशक,सुखस्वरूप,
श्रेष्ठ,तेजस्वी,पापनाशक,देवस्वरूप,पर-मात्मा को हम अंतःकरण में धारण करें।
पवमान मंत्र इसी वेद से लिया गया है--
असतो मासद्गमय।तमसोमाज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मामृतंगमय।इसका भाव यह है--
असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंध कार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु सेअमरता‌ की ओर ले चलो। इसके अति रिक्त रोग निवारक सूक्त१०/१३७/१-७ ‌  पर, नासदीय सूक्त १०/१२९/१-७ पर,‌ विवाह आदि के सूक्त१०/८५/१-४७ पर,  हिरण्य गर्भ सूक्त१/१२१/१-१०   पर अंकित है। नासदीय सूक्त में निर्गुण   ब्रह्म का वर्णन किया गया है। पहला सूक्त यहाँ प्रस्तुत है--  न और असद् से  
प्रारम्भ होने के कारण इसे नासदीय सूक्त कहा गया है। इस सूक्त में सृष्टि के
पूर्व की स्थिति का वर्णन किया गया है--
ना सदासीन्नो सदासात्तदानीं, नासीद्र जो
नो व्योमा परोयत्।किमावरीवःकुहकस्य
शर्मन्नंभःकिमासीद् गहनंगभीरम्।१।
इसका भाव यह है--उस समय सृष्टि की
उत्पत्ति के पहले सत् और असत् का तत्व नहीं था। रजःअर्थात् स्वर्ग, पाताल
और मृत्युलोक भी नहीं थे। अंतरिक्ष नहीं था, अंतरिक्ष के परे जो कुछ भी है,
वह भी नहीं था। आवरण करने वाला तत्व भी  नहीं था। उस समय गहरायी भी नहीं थी, अर्थात् कुछ भी नहीं था।
इसमें कुछ अनार्यों का भी वर्णन किया गया है ‌जो अस्पष्ट वाणी बोलने वाले और चपटी नाक वाले होते थे।इस‌ वेद में २५ नदियों  का उल्लेख है जिसमें‌ सिंधु का वर्णन सबसे  अधिक है। पवित्र नदियों में सरस्वती ‌को अधिक महत्व दिया गया है। गंगा का एक बार तथा यमुना का नाम तीन बार आया है। ऋगुवेद के अनुसार उस समय राजा का पद वंशानुगत था। इसमें सूत, रथकार तथा कर्मार आदि१२ की संख्या राजा के साथ रहती थी।
जुलाहा (वाय) तथा करघा (ततर) का अमाजूभी उल्लेख है। इसके ९वें मण्डल में सोमरस की चर्चा की गयी ‌है। इसमें  का उल्लेख है जिसका आशय
उन कन्याओं से है जो या ‌तो आजीवन अविवाहित रहती थीं अथवा विलम्ब से
विवाह करती थीं।इस वेद के ७वें मण्डल में सुदास और दाशराज्य(दस राज्य के राजाओं) से युद्ध की चर्चा की गयी है।
इसमें राजा सुदास की विजय हुयी थी।
यहयुद्धपरूष्णी(रावी)केतटपर हुआथा।
इस वेद में ग्राम, जन और विश का उल्लेख मिलता है। कई ग्रामों के समूह को विश तथा कई विश के समूह‌ को जन कहा जाता था। प्रशासनिक छेत्र
को जनपद कहा जाता था। इस वेद में
जन शब्द का प्रयोग २७५ बार, विश
शब्द का प्रयोग १७०बार तथा जनपद का प्रयोग केवल एक बार हुआ है। विदथ काआशय संस्था से है। विदथ शब्द का प्रयोग १२२ बार,समिति शब्द का प्रयोग ९ बार तथा सभा शब्द का प्रयोग ८ बार आया है। कृषि शब्द का
प्रयोग२४ बार हुआ है। इस वेद मे‌ पंच जन्य शब्द का प्रयोग आया है जिसका 
आशय आर्यों के पाँच कबीलों से था--
पुरु,यदु,अनु,तुर्वशु, द्रहयु।कपड़े के लिए
वस्त्र,वास अथवा वसन शब्द का प्रयोग
किया गया है। भिषक शब्द का प्रयोग
देवताओं ‌के चिकित्सक के लिए आया है। हिमालय पर्वत तथा इसकी चोटी
मुजवंत का भी उल्लेख है। विवाह, पुत्र
रत्न की प्राप्ति के लिए किया जाता था।
लेन-देन के लिए वस्तु विनिमय प्रणाली
लागू थी, साथ में मुद्रा भी चलन में थी,
जिसे  "निष्क " कहते थे।इस वेद में‌ कुछ
संवाद सूक्तों ‌की भी व्याख्या है--
पहला- पुरूरवा-उर्वशी संवाद(१०/९५)। दूसरा-‌यम-यमी संवाद(१०/१०)।
तीसरा-सरमा-पणि संवाद(१०/१०८)। चौथा- विश्वामित्र नदी संवाद(३/३३)। पाँचवा-वशिष्ठ-सुदास संवाद(७/८३)। छठा-अगस्त्य-लोपमुद्रा संवाद(१/१७९)।
सातवाँ--इंद्र-इंद्राणी-वृषाकपि संवाद
(१०/८६)।
संवाद का सारांश प्रस्तुत है--
पहला--   --:पुरूरवा-उर्वशी संवाद:----
 एक बार स्वर्ग लोक की अप्सरा उर्वशी
पृथ्वी लोक पर भ्रमण करने आयी थी।
उसे एक राक्षस ने अपहरण कर लिया।
वह मदद के लिए चिल्लायी। नारी का करुण स्वर सुनकर मदद के लिए चंद्रवंशी राजा पुरूरवा राक्षस के पीछे दौड़े और‌ राक्षस को मारकर उर्वशी को बचा लिया। उर्वशी का सौंदर्य देखकर राजा पुरूरवा उर्वशी पर मोहित हो गए और विवाह का प्रस्ताव रखा। उर्वशी भी पुरूरवा पर मोहित थी परन्तु वह‌ स्वर्ग
लोक के नियमों में बँधी थी, इसलिए वह
विवाह के बाद कुछ दिन पुरूरवा के साथ रही, और फिर वापस चली गयी।  स्वर्ग लोक में एक‌ प्रहसन आयोजित हुआ ‌‌जिसमें लक्ष्मी का अभिनय उर्वशी   को करना था। उर्वशी ने पति के स्थान
पर विष्णु का नाम न लेकर पुरूरवा का नाम ले लिया। भरत मुनि इस प्रहसन के
आयोजक थे, उन्होंने उर्वशी को पृथ्वी पर रहने का शाप दे दिया। उर्वशी ने इन्द्र
की स्तुति की और अपने अपराध के लिए क्षमा माँगी। इंद्र ने एक युक्ति बत लायी। उर्वशी पृथ्वी लोक पर आकर 
अपने पति पुरूरवा के साथ इस शर्त पर
रहने लगी कि जिस दिन पुरूरवा निर्वस्त्र
दिख जाएँगे, उस दिन उर्वशी पुनः स्वर्ग
लोक चली जाएगी। समय बीतता गया।
उर्वशी की अनुपस्थिति गंधर्वों को अच्छी
नहीं लग रही थी। गंधर्वों ने एक योजना बनायी।उर्वशी ने दो मेमने‌ पाल रखाथा।
गंधर्वों ने रात में मेमने की चोरी कर ली।
उर्वशी ने सोते हुए राजा को जगाया। राजा रात के अँधेरे में अपना वस्त्र छोड़ कर गंधर्व के पीछे दौड़े। अवसर पाकर
गंधर्वों ने आकाशीय बिजली पैदा की,
जिसके प्रकाश में राजा को उर्वशी ने
निर्वस्त्र देखा और वह शर्त के अनुसार पति पुरूरवा को‌ छोड़कर स्वर्ग लोक चली गयी।
  दूसरा --    ----:यम-यमी संवाद:----
यम और यमी दोनो भाई-बहन हैं।यमी
अपने भाई यम से कामपूर्ति के लिए आग्रह करती है। यम यह कहकर मना 
कर देता है कि यह सम्भव नहीं है‌‌ क्योंकि तुम मेरी बहन हो और मैं तेरा
भाई हूँ। भाई-बहन का रिश्ता,पति-पत्नी का नहीं हो सकता। यमी कहती है, तुम 
मेरे काम की पूर्ति करो,इसे कौनदेखेगा?
यम कहता है, यह तुम क्या कहती हो ?
देव गण विचरण किया करते हैं। मनुष्य
कोई भी कार्य उनसे छिपा कर नहीं कर सकता। यमी कहती है, तुम मेरे भाई हो,
तुम्हें मेरी हर‌ इच्छा की पूर्ति करनी चाहिए। तुम दूसरी नारी की इच्छा की पूर्ति करते हो, परन्तु तुम मेरी इच्छा की 
पूर्ति नहीं करते। यम ने कहा, समय आएगा जब भाई,बहन का रिश्ता पति-
पत्नी का होगा,परन्तु अभी ऐसा नहीं है। इसलिए यदि तुम चाहो, तो अपने काम की पूर्ति दूसरे पुरुष से कर सकती‌ हो।
 तीसरा-- ----:सरमा-पणि संवाद:---
पणि एक ऐसे जनसमुदाय का ‌सदस्य है,
जो व्यापारिक कार्य करता ‌है, एक बार
इस समुदाय ने इन्द्र की गाय चुरा ली।
गाय चुराते हुए गुरु वृहष्पति ने देख लिया। इन्द्र ने देवशुनि सरमा (कुतिया) को पणियों के पास भेजा। सरमा एक
रसा नाम के जलाशय को पार करके
पणियों के पास पहुँची। पणि ने पूछा,
"हे सरमा ! तुम यहाँ‌ क्यों आयी हो?यहाँ
आने में तुम्हारा क्या स्वार्थ है ? तुमने बहुत कष्ट झेले होंगे। क्या तुम यहाँ मेरे शरण में आयी हो ?" सरमा बोली," हे पणि ! मैं इन्द्र की दूत हूँ।तुमने क्याक्या  छिपाया है ? मैं जानना चाहती हूँ। यह सही है कि मैने बहुत कष्ट उठाए हैं। पर
मैं अब कष्ट झेलने के लिए अभ्यस्त हो
चुकी हूँ।" पणि ने कहा, "हे सरमा ! हम
जानते हैं कि तुम्हारा स्वामी बहुत शक्ति शाली और सम्पन्न है। हम उनसे मित्रता
चाहते हैं। वे स्वयं भी हमारे व्यापार में
शामिल‌ होकर धन कमा सकतेहैं।"सरमा
बोली,  "इन्द्र जिसकी मैं दूत हूँ, उस तक
कोई पहुँच नहीं सकता। वह तुम्हारा मुकाबला करने में सक्षम है।" पणि ने कहा, हे सरमा ! तुम जो चाहो हम से ले सकती हो। हम धनी हैं, शक्तिशाली भी हैं, फिर बिना लड़े कौन ऐसे ही अपने धन पर से अधिकार छोड़ देता है ?सरमा बोली, हे पणि ! मैं अपने स्वामी की ईमानदार सेविका हूँ।तुम्हारा स्वभाव
ठीक नहीं है। तुम इंद्र ‌के कोप से अपने को‌ बचाओ।यदि तुम आत्मसमर्पण नहीं
करोगे तो तुम मुश्किल में पड़ोगे। पणि ने कहा, हे सरमा ! हम तुम्हारे स्वामी से
नहीं डरते। हम तुमको पसन्द करते हैं
तुम जितने दिन चाहो यहाँ रह सकती हो।सरमा बोली, हे पणि ! तुम अपने को बदल लो, तुम्हारे कारण जनता दुखी है।
शासन तुम्हें पहचान गया है। अब तुम
पहले जैसा काम नहीं कर सकते।
 चौथा   --- : विश्वामित्र-नदी  संवाद:-----
दो नदियाँ सतलज और विपाशा दो उज्ज्वल गायों की भाँति रँभाती हुयी अपने बछड़ों को चाटने हेतु पहाड़ से नीचे इस तरह आ रही हैं जैसे रास ढीली
कर देने से घोड़ियाँ भागती हैं। विश्वामित्र
 निकट पहुँचते हुए नदियों से बोले, "इंद्र ने तुम दोनों को बहने के लिए छोड़ दिया है। तुम इस तरह आ रही हो जैसे गाय अपने बछड़े की ओर चली आ रही हो।" नदियों ने सोचा, " जब इंद्रदेव ने खोल दी है मेरी रास। हम ‌दोनों आगे बढ़ते जा
रहे हैं, फिर यह ऋषि क्यों खड़ा है मेरे
मार्ग में ? विश्वामित्र नदियों से बोले," हे माँ ! मैं तुम्हारा एक बालक हूँ, मैं तुम दोनों के आगे झुकता हूँ। माँ ! मैं तुम दोनों से मार्ग चाहता हूँ। हे माँ ! क्षण भर
के लिए तुम स्थिर हो जाओ। नदियों ने कहा, "इंद्रदेव ने वृत्तासुर को मारकर हम
दोनों के बंधन बहने के लिए खोल दिया है। हम बिना रोक-टोकके आगे बढ़ते जा रहे हैं।" विश्वामित्र बोले, " ऐ सतलज
और विपाशा ! मैं इन्द्रदेव की प्रशंसा करता हूँ। मैं प्रशंसा करता हूँ उनके वज्र की, जिसके द्वारा वृत्तासुर को मारकर इंद्रदेव ने पानी के द्वार खोल दिए हैं।पानी से धरती आप्लावित है।" नदियों ने
कहा, हे ऋषिवर ! हमारा नमन स्वीकार करो। युग-युग तक गूँजे आपका यह स्तोत्र जो आज आपने यहाँ देवों की स्तुति नें कहा है, साथ में मेरी भी कथा
कहते रहना और हमें कभी मत सताना।
विश्वामित्र बोले, "ऐ नदियों ! हम दूर ‌से‌ इस रथ पर बैठे हुए आ रहे हैं, तुम ज़रा
नीचे झुक जाओ। अपनी लहरें रोक लो।
जिससे मेरे रथ के पहिए तुम्हारे तल पर होकर उस पार चले जाएँ। नदियों ने कहा, " ऐ स्तुति‌ गायक ॠषिवर ! हमने
तुम्हारे वचन सुने। तुम बहुत दूर से आ रहे हो। हम तुम्हारे लिए झुकते हैं जैसे माँ अपने शिशु के आगे झुकती है।" विश्वामित्र बोले, " ऐ नदियों ! कितनी
सुगम है तुम्हारी बुद्धि। तुमने रोक ली
अपनी लहरें, ऐसे ही रोक लिया करना
अपनी लहरें,जब हम तुम्हारे पास आएँ।
यगों-युगों तक पार होती रहें माँ भारती की सन्तानें। सींचती रहो मेरे खेत।
ऋगुवेद की प्रमुख सूक्तियाँ--
(१) न स सखा यो न ददाति‌ सख्ये।
         ऋगुवेद--१०/११७/४
भाव-- जो मित्र‌ सहायता नहीं करता, वह मित्र नहीं है।
(२) केवलाघो भवति केवलादी।
    ऋगुवेद---१०/११७/६
भाव--जो मनुष्य अकेले  खाता है, वह
अकेले पाप का भागी होता है।)
(३) न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवा:।
    ऋगुवेद--४/३/३/११
भाव--देवता श्रम करने वाले  के अतिरिक्त किसी और से मित्रता नहीं करते।
(४) सं गच्छध्वम् सं वद्ध्वम्। सं वो मनांसि जानिताम।
         ऋगुवेद----१०/१८१/२
भाव :- साथ चलें, साथ बोलें। तुम्हारा मन एक सा समझे।
(५) यो जागार तमृच: कामयन्ते।
    ऋगुवेद--५/४४/१४
भाव--जो जागृत रहता है, उसे ऋचाएँ चाहती हैं।
(६) अग्ने नय सुपथा राए अस्मान्।
      ऋगुवेद--१/१८९/१
भाव-- हे अग्निदेव ! हमें धन के लिए सन्मार्ग से ले चले।
(७) न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन।
      ऋगुवेद--१०/१५२/१
भाव-- ईश्वर के भक्त को न कोई नष्ट कर सकता है, न जीत सकता है।
(८) न विन्धेस्य सुष्टितम्।
      ऋगुवेद--१/७/७
भाव--मैं परमात्मा की स्तुति का पार नहीं पाता।
(९) महे च न त्वामद्रिवः परा शुक्लाय देयाम्।
           ऋगुवेद-८/१/५
भाव--हे ईश्वर ! मैं तुझे किसी कीमत पर भी न छोड़ूँ।
(१०) न रिष्यते त्वावतः सखा।
              ऋगुवेद--१/९१/८
भाव--हे ईश्वर ! आपका मित्र कभी नष्ट नहीं होता।
(११) एको विश्वस्य भुवनस्य राजा।
       ऋगुवेद--६/३६/४
भाव--वह सब लोकों का एक ही स्वामी है।
(१२)  त्वमस्माकं तव स्मसि।
        ऋगुवेद--८/९२/३२
भाव-- प्रभु ! तू हमारा है, हम तेरे हैं।
(१३) अधा म इन्द्र श्रणवो हवेमा।
    ऋगुवेद--७/२९/३
भाव--हे प्रभु ! अब तो मेरी इन प्रार्थनाओं  को सुन लो।
(१४) यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति।
       ऋगुवेद--१/१६४/३९
भाव--जो उस ब्रह्म को नहीं जानता, वह वेद से क्या करेगा।
(१५) तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्।
         ऋगुवेद--१/१५/५
भाव--प्रभो ! तेरी ही मैत्री सच्ची है। (१६) मान्तः स्थुर्नो अरातयः।
      ऋगुवेद--१०/५७/१
भाव--हमारे अन्दर कंजूसी न हो।
(१७) उतो रयिः पृणतो नोपदस्यति।
     ‌‌ ‌        ऋगुवेद--१०.११७/१
भाव-- दानी का दान घटता नहीं।
(१८) अक्षैर्मा दीव्यः।
              ऋगुवेद-- ‌‌‌‌‌ ‌‌‌‌१०/३४/१३
भाव-- जुआ मत खेलों
(१९) जाया तप्यते कितवस्य हीना।
             ऋगुवेद--१०/३४/१०
भाव--जुएबाज की स्त्री दीन-हीन होकर दुख पाती है।
(२०) न स सखा यो व ददाति‌ सख्ये।
        ऋगुवेद--१०/११७/४
भाव--वह मित्र ही क्या जो अपने मित्र को सहायता नहीं देता।
(२१) क्रत्वा चेतिष्ठो विषामुषर्भुत।
           ऋगुवेद--१/६५/५
भाव--प्रातः जागनेवाला प्रबुद्ध होता है,
    उसे सब स्नेह करते हैं।,
(२२) न ऋष्यत्त्वावतः सखा।
           ऋगुवेद--१/११/८
भाव-- हे प्रभु ! आपका सखा कभी दुखी नहीं होता।
(२२) त्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ।                          ‌‌          ऋगुवेद-- १/११/२२
भाव-- हे प्रभु ! अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो।
(२३) पितेव नः श्रृणुहि हूयमानः।
         ऋगुवेद--१/१०४/९
पिता की भाँति मेरी पुकार सुनो।
(२४) अघृणे न ते सख्यम पह्युवे।
          ऋगुवेद--१/१३८/४
भाव--हे प्रभु ! तेरी मित्रता से इनकार नहीं करता।
(२५) दिप्सन्त इद्रिपवो नाहदेभुः।
          ऋगुवेद--१/१४७/३
भाव-- हे प्रभु ! शत्रु आपके दास को नहीं दबा सकते।
(२६) अपृणन्तमभि सं यन्तु  शोकाः।
          ऋगुवेद--१/१२५/७
भाव--,उपकार हीन कृपण को शोक घेर लेता है।
(२७) मा प्रगाम पथोवयम्।
    ऋगुवेद--१०/५७/१
भाव-- हम वैदिक मार्ग से पृथक न हों।
(२८) उतदेवा अवहित देवा उन्नयथा पुन:।
       ऋगुवेद--१०/१३७/१
भाव--हे विद्वानों ! गिरे हुओं को पुनः उठाओ।
(२९) बहुप्रजा निऋर्तिमा विवेश।
      ऋगुवेद--१/१६४/३२
भाव-- बहुत सन्तान वाले बहुत कष्ट उठाते हैं।
(३०) कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मतर्यो दधर्षति।
        ऋगुवेद--७/३२/१४
भाव--ईश्वर भक्त का तिरस्कार कोई नहीं कर सकता।
(३१) इमं नः श्रणवद्धवम्।
        ऋगुवेद--१०/२६/९
भाव-- वह ईश्वर मेरी प्रार्थना को सुने।
(३२) स्तोतुर्मघवनकाममा पृण।
       ऋगुवेद--१/५७/५
भाव--हे प्रभु ! भक्त की कामनाओं को पूर्ण करो।
(३३) विश्वेषा मिज्जनिता ब्रह्मणामसि।
      ऋगुवेद---२/२३/२
भाव--हे प्रभु ! सम्पूर्ण विद्याओं का आदि मूल तू ही है।
(३४) देवो देवनामसि।
         ऋगुवेद--१/१४/१३
भाव-- हे प्रभु ! तू देवों का देव है।
(३५) स नः पर्षदति द्विषः।
           ऋगुवेद--१०/१८७/५
भाव-- वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार‌ करे।
(३६) मा नः प्रजा रीरिषः।
       ऋगुवेद--१०/१८/१
 भाव--हे प्रभु ! तू हमारी सन्तान को नष्ट न कर ।
(३७) सत्या मनसो मेअस्तु।
       ऋगुवेद--१०/१२८/४
भाव--मेरे मन के भाव सच्चे हों।
(३८) भियं दधाना हृदयेषु शत्रुनः।
         ऋगुवेद--१०/८४/७
भाव-- शत्रु के हृदय में भय उत्पन्न कर दो।
(३९) निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु।
            ऋगुवेद--५/२/६
भाव--निन्दक सबसे निन्दित होते हैं।
(४०) न त्वदन्यो मघवन्नस्य मर्डिता।
          ऋगुवेद--१/८४/१९
भाव-- हे प्रभो ! आपके सिवा सुख देने वाला दूसरा कोई नहीं है।
(४१) आर्य ज्योतिरग्राः।
            ऋगुवेद-- ७/३३/७
भाव--आर्य ज्योति (ज्ञान) को प्राप्त करने वाला होता है।
(४२) करो यत्र वरिवो बाधिताय।
           ऋगुवेद--६/१८/१४
भाव--पीड़ितों की सहायता करने वाले हाथ ही उत्तम हैं।
(४३) प्राता रत्नं प्रातरिश्वा दधाति।
          ऋगुवेद--१/१२५/१
भाव--प्रातः जागनेवाला प्रात काल में ऐश्वर्य पाता है।
(४४) अधः पश्यस्व मोपरि। 
       ऋगुवेद--८/३३/१९
भाव--हे नारि ! नीचे देख, ऊपर मत देखा।
(४५) एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।
          ऋगुवेद--१/१६४/४६
भाव--एक ही परमेश्वर को विप्रजन अनेक नामों से पुकारते हैं।
(४६) द्यावाभूमी जनयन देव एकः।
           ऋगुवेद--१/१६४/३३
भाव--आकाश-भूमि को पैदा करने वाला देव एक ही है।
 (४७) सखा नो असि परमं च बन्धुः।
           ऋगुवेद--५/११/११
भाव-- तू हमारा सखा और परम बन्धु है।
(४८) सद्यः सर्वान् परिपश्यसि।
          ऋगुवेद--८/२५/१७
भाव--तुरन्त तू सबको देख लेता है।
(४९) विष्णोः कर्माणि पश्यतः।
          ऋगुवेद--१/२२/१९
भाव--प्रभु के महान कर्मों को देखो।
(५०) न वा उ सोमो वृजिनं हिनोति।
           ऋगुवेद--७/१०४/१३
भाव-- प्रभु पापी को कभी नहीं बढ़ाते।
ऋगुवेद का महत्व--
यह केवल धार्मिक ग्रन्थ नहीं है बल्कि
इसमें तत्कालीन समाज, संस्कृति, विज्ञान, खगोलशास्त्र और जीवन शैली की झलक मिलती है। यह भारतीय दर्शन और आध्यात्मिकता की नींव रखता है। वैदिक मंत्रों का प्रयोग आज भी पूजा-पाठ, यज्ञ और ध्यान में किया जाता है।
निष्कर्ष--ऋगुवेद केवल एक धार्मिक ग्रन्थ नहीं है, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और मानव सभ्यता का एक अद्भुत संकलन है। इसमें  देवताओं की स्तुति के साथ-साथ जीवन जीने की कला और ब्रह्माण्ड के रहस्यों का गहन ज्ञान 
समाहित है।
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