१५०+बुद्ध वाणी : धम्मपद से(३)
(१०१)श्रेष्ठ पुरुषों का दर्शन अच्छा होता
है, संतों के साथ निवास सदा सुख कर होता है। मूढ़ पुरुषों के अदर्शन से सदा
सुखी बने रहो। -----१५/२०६
(१०२) मूढ़ पुरुषों के साथ संगत करने वाला दीर्घकाल तक शोक ग्रस्त रहता है। ------१५/२०७
(१०३) मूढ़ों का सहवास शत्रु के समान सदा दुखदायी होता है। ---१५/२०७
(१०४) बंधुओं के समागम की भाँति ज्ञानियों का सहवास सुखदायी होता है।
-----१५/२०७
(१६)------पिय वग्ग(प्रिय वर्ग)------
(१०५)प्रियों का अदर्शन दुखदायी होता है और अप्रियों का दर्शन भी दुखदायी होता है। -------१६/२१०
(१०६) किसी को प्रिय न बनाएँ क्योंकि
प्रिय कि वियोग बुरा लगता है, जिनके प्रिय- अप्रिय नहीं होते, उनके कोई बन्धन नहीं होता। ----१६/२११
(१०७) प्रेम करने से शोक उत्पन्न होता है। शोक से भय उत्पन्न होता है। प्रेम के
बन्धन से मुक्त व्यक्ति को शोक नहीं होता फिर भय कहाँ से होगा।-१६/२१३
(१०८)पुण्य कर्मा पुरुष के इस लोक से
परलोक में जाने पर उसके पुण्य वैसे ही
उसका स्वागत करते हैं जैसे अपने प्रिय
के लौटने पर उसके संबंधी उसका स्वा- गत करते हैं। ------१६/२१६
(१७) -----:-कोध(क्रोध) वग्ग:-----
(१०९) जो भड़के हुए क्रोध को बड़े वेग से घूमते हुए रथ के समान रोक ले, उसे मैं सारथी कहता हूँ। दूसरे लोग मात्र लगाम पकड़ने वाले होते हैं।--१७/२२२
(११०) जो सदा जागरूक रहते हैं, रात दिन सीखने में लगे रहते हैं,जिनका ध्येय
निर्वाण प्राप्त करना है, उनके आश्रव नष्ट हो जाते हैं। ----१७/२२६
(१११) ऐसा पुरुष जिसकी निंदा ही निंदा होती हो अथवा प्रशंसा ही प्रशंसा, न कभी था, न कभी होगा और न इस समय है। -------१७/२२८. (११२) मानसिक चंचलता से बचें। मन से संयत रहें। मानसिक दुराचार को त्याग कर सदाचरण करें। ----१७/२३३
(१८). ------:मल वग्ग:----------
जो धीर पुरुष काया से संयत है,वाणी से संयत है, मन से संयत है, वही पूर्णतयः
संयत है। ------१८/३)
(११३) पीले पत्ते के समान इस समय तू है, यमदूत तेरे पास खड़े हैं, तू प्रयाण के
लिए तैयार है और कुशल कर्मों का पाथेय तेरे पास कुछ नहीं है।--१८/२३५
(११४) समझदार व्यक्ति को चाहिए कि
वह अपने मैल को क्रमशः थोड़ा-थोड़ा
छण-प्रतिछण वैसे ही दूर करें जैसे कि
सुनार चाँदी के मैल को दूर करता है ।
---------१८/२३९
(११५) जैसे लोहे पर उठा मल(जंग) उसी पर उठकर उसी को खाता है वैसे हीमर्यादा का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति
के अपने ही कर्म उसे दुर्गति की ओर ले
जाते हैं। ------१८/२४०
(११६) राग के समान अग्नि नहीं है, न द्वेष के समान जकड़न, मोह के समान फन्दा नहीं है, न तृष्णा के समान नदी
---------१८/२५१
(११७) आकाश में कोई पद चिन्ह नहीं
होता, बुद्ध शासन के बाहर कोई श्रमण नहीं होता, लोग भाँति - भाँति के प्रपंचों
में पड़े रहते हैं किन्तु तधागत निष्प्रपंच
होते हैं। -----------१८/२५४
(१९) ------:धमट्ठ(धर्मार्थ) वग्ग-:--
(११८) जो व्यक्ति सहसा किसी बात का
निश्चय कर ले, वह धर्मिष्ठ नहीं कहा जाता, जो अर्थ और अनर्थ दोनो का चिन्तन कर निश्चय करे, वह पंडित कह-
लाता है। ----१९/२५६
(११९) जो व्यक्ति धीरज के साथ धम्म-
पूर्वक निष्पक्ष होकर दूसरों का मार्ग दर्शन करता है, वह धम्म रछक, मेधावी
धम्मिष्ठ कहा जाता है। ---१९/२५७
(१२०) जिसमें सत्य, अहिंसा,संयम और
दम है, वह वगतमल,धृति सम्पन्न, स्थविर
कहा जाता है। -------१९/२६१
(१२१) जो छोटे-बड़े पापों का सर्वशः शमन कर लेता है, पापों के शमित होने के कारण वह श्रमण कहा जाता है।
--------१९/२६५
(२०)-----:मग्ग(मार्ग) वग्ग:---
(१२२) मार्गों में आष्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ है,
सच्चाइयों में चार सत्य। धम्मों में वीत- रागता श्रेष्ठ है, देव मनुष्यादि द्विपदों में
चछुमान बुद्ध। ----२०/२७३
(१२३)तपना तो तुम्हें ही पड़ेगा, तथागत
तो मार्ग आख्यात करते हैं, इस ,, पर
आरूढ़ होकर ध्यान करने वाले मार्ग के
बन्धन से सर्वथा मुक्त हो जाते हैं। --------२०/२७६
(१२४) सारे संस्कार दुखमय हैं,यानी जो उत्पन्न हुआ है, वह नाश होने के कारण
दुखी है। इस सच्चाई को जब कोई विपश्यना प्रज्ञा से देख जान लेता है, तब
उसको सभी दुखों से निर्वेद प्राप्त होता है,ऐसा है यह विशुद्धि विमुक्ति का मार्ग।
-------२०/
(१२५) वाणी को संयत रखें, मन को संयत रखें और शरीर से कोई अकुशल
काम न करें। इन तीनों कर्म पंथों का
विशोधन करें। बुद्ध के बताए मार्ग का
अनुशरण करें। ------२०/२८१
(१२६) योग के अभ्यास से प्रज्ञा उत्पन्न होती है, उसके अभाव से उसका छय,
होता है। उत्पत्ति और विनाश के योग तथा अयोग, इन दो प्रकार के मार्गों को
जानकर अपने आपको इस प्रकार विनियोजित करे, जिससे प्रज्ञा की भर- पूर वृद्धि हो। ---२०/२८२
(१२७) पुत्र रक्षा नहीं कर सकते,न पिता
न बन्धु जन, जब मृत्यु पकड़ लेती है,तब
जाति वाले रक्षा नहीं कर सकते। -------२०/२८८
(२१).---:पकीण्णक(पकीर्णक)वग्ग:-(१२८) जो करणीय से हाथ खींच ले किन्तु अकरणीय को करे, ऐसे घमण्डी
प्रमादियों के आश्रव(चित्त मल) बढ़ते हैं। ------२१/२९२
(१२९) जिनकी दिन-रात हर समय बुद्ध
विषयक स्मृति बनी रहती है, वे गौतम
(भगवान बुद्ध) के श्रावक सदैव भली-
भाँति प्रबुद्ध बने रहते हैं।--२१/२९६
(१३०) जिनका मन दिन-रात अहिंसा
में रमा रहता है , वे भगवान बुद्ध के श्रावक सदैव भली-भाँति प्रबुद्ध बने रहते हैं। ----------२१/२९९
(१३१) संत लोग हिमालय पर्वत के समान दूर से ही प्रकाशमान होते हैं। किन्तु असंत (दुर्जन) यहीं पास में होने पर भी रात में फेंके गए बाण की तरह
दिखायी नहीं देते। ----२१/३०४
(२२). ----:निरय वग्ग:------
(१३२) असंयमी दुराचारी होकर राष्ट्र का
अन्न खाने से अग्निशिखा के समान तप्त
लोहे के गोले को खाना अधिक अच्छा है। --------२२/३०८
(१करो, जैसे ठीक से न पकड़ा गया कुश
हाथ को ही छेद देता है वैसे ही गलत प्रकार से ग्रहण किया गयाश्रामण्य नरक
की ओर खींच ले जाता है।--२२/३११
(१३४)जो कोई कर्म शिथिलता से किया
जाए, जो व्रत मलिन हैै, जो ब्रह्मचर्य अशुद्ध हैै, वह बड़ा फल देने वाला नहीं
होता।--------२२/३१२
(१३५) जो अलज्जा के काम में लज्जा करते हैं और लज्जा के काम में लज्जा नहीं करते हैं । मिथ्या दृष्टि से ग्रस्त असत्व प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं।
---------२२/३१६
(१३६) दोष को दोष और अदोष को
अदोष जानकर सम्यक दृष्टि सम्पन्न सत्व प्राणी सुगति को प्राप्त करते हैं।
-------२२/३१९
(२३). ------:नाग वग्ग:-------
(१३७)जैसे किसी संग्राम में हाथी धनुष
से छोड़े गए बाण को सहन करता है, वैसे ही मैं दूसरों के कटु वचन को सहन
करूँगा, क्योंकि संसार में दुःशील व्यक्ति
अधिक हैं। -----२३/३२०
(१३८) जो पुरुष आलसी, पेटू, निद्रालु,
करवट बदल-बदल कर सोने वालाऔर दाना खाकर पुष्ट हुए मोटे सुअर के समान होता है, वह मंद बुद्धि बार-बार
गर्भ में पड़ता है। ----२३/३२५
(१३९) अप्रमाद में जुटो, अपने चित्त की
रक्षा करो, कीचड़ में धँसे हाथी के समान
अपने आपको कठिन मार्ग से बाहर निकालो और निर्वाण के धरातल पर प्रतिस्थापित करो। ---२३/३२७
(१४०) अकेला विचरना उत्तम है किन्तु
मूढ़ की मित्रता अच्छी नहीं। हस्तिवन में
हाथी के समान अनासक्त होकर अकेला
विचरण करें और पाप न करें।-२३/३३०
(१४१)बुढ़ापे तक शीलका पालन करना
सुखकर होता है, अचल श्रद्धा सुख कर होती है, प्रज्ञा का लाभ सुख कर होता है
और पाप कर्मों को न करना सुखकर होता है। -----२३/३३३
(२४) ----:तण्हा(तृष्णा)वग्ग:------
(१४२) जैसे जड़ के बिल्कुल नष्ट न होने
और उसके दृढ़ बने रहने पर कटा हुआ
वृक्ष फिर उग जाता है,वैसे ही तृष्णारूपी
अनुशय के जड़ से उछिन्न न होने पर यह दुख बार-बार होता है।----२४/३३८
(१४३) जो तृष्णा से छूटकर तृष्णा मुक्त
हो गया हो,और फिर तृष्णा की ओर दौड़ता हो,उस व्यक्ति को वैसे ही जानो जैसे कोई बन्धन से मुक्त हुआ पुरुष फिर बन्धन की ओर भागने लगे।
------२४/३४४
(१४४) संसार को पार करने का प्रयत्न न करने वाले दुर्बुद्धि को भोग नष्ट कर देते हैं। भोगों की तृष्णा में पड़कर वह
दुर्बुद्धि पराये के समान अपना ही हनन
कर लेता है। ----२४/३५५
(२५). -----:भिक्खु वग्ग:------
(१४५) जो हाथ-पैर और वाणी से संयत है, जो उत्तम संयमी है और भीतर की सच्चाइयों को जानने में लगा है, समाधियुक्त ,एकाकी और संतुष्ट है, उसे भिक्खु कहते हैं।
------२५/३६२
(१४६) धम्म में रमण करने वाला, धम्म
में रत, धम्म का चिन्तन करते हुए, धम्म
का पालन करते हुए भिक्खु धम्म से च्युत नहीं होता। ----२५/३६४
(१४७) अपने लाभ की अवहेलना नहीं करना चाहिए, दूसरों के लाभ की स्पृहा
नहीं करना चाहिए। दूसरों के लाभ की
स्पृहा करने वाला भिक्खु चित्त की एका ग्रता को नहीं प्राप्त कर पाता।-२५/३६५
(१४८) प्रज्ञाहीन पुरुष का ध्यान नहीं लग पाता, ध्यान न करने वाले को प्रज्ञा
नहीं होती, जिसके पास ध्यान और प्रज्ञा दोनो है, वही निर्वाण के समीप होता है।
------२५/३७२
(१४९) जैसे जूही अपने कुम्हलाए हुए
फूलों को छोड़ देती है वैसे ही भिक्खुओं,
तुम राग और द्वेष को छोड़ दो।२५/३७७
(२६). -----:ब्राह्मण वग्ग:------
(१५०) जो शरीर से, वाणी से और मन से दुष्कर्म नहीं करता, जो इन तीनों क्षेत्रों में संयम युक्त है, उसे ही मैं ब्राह्मण कहता हूँ। ----२६/३९१
(१५१) जो मानुषिक बन्धन और दैवी
बन्धन से परे चला गया हो, जो सब प्रकार के बन्धनों से मुक्त हो, उसे मैं
ब्राह्मण कहता हूँ।
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