१५०+बुद्ध वाणी: धम्म पद से(२)

        (७)    -----:अरहन्त वग्ग:-----
(५१) अरहन्त वह है-- जिसकी यात्रा
पूरी हो गयी ‌है, जो शोक रहित है,सर्वथा
विमुक्त है, जिसकी सभी ग्रन्थियाँ कट गयी हैं, उसके लिए संताप नाम की कोई
चीज नहीं।-------७/९०
(५२)सम्यक ज्ञान द्वारा मुक्त हुए अरहंत
का मन शान्त हो जाता है और वाणी तथा कर्म भी शान्त हो जाते हैं।--७/९६
(५३) गाँव हो या जंगल,भूमि नीची हो या ऊँची, जहाँ अरहन्त विहार करते हैं, 
वह भूमि रमणीय होती है।--७/९८
       (८)   --:सहस्स वग्ग:---
(५४) निरर्थक पदों से युक्त हज़ार वचनों की अपेक्षा अकेला सार्थक पद श्रेयस्कर होता ‌है, जिसे सुनकर कोई व्यक्ति शान्त हो जाता है।     ----८/१००
(५५) कोई निरर्थक पदों से युक्त सौ गाथाएँ बोले, उसकी अपेक्षा अकेला सार्थक धम्मपद श्रेयस्कर होता है, जिसे
सुनकर कोई व्यक्ति शान्त हो जाता है।
                    --------८/१०२
(५६) हज़ारों मनुष्यों को संग्राम में जीतने वाले से भी एक अपने आपको
जीतने वाला कहीं उत्तम संग्राम विजेता
होता है।       ----८/१०३
(५७) अन्य लोगों को जीतने की अपेक्षा
अपने आपको जीतना श्रेयस्कर है।                     ----८/१०४
(५८) जो कोई सौ वर्षों‌ तक महीने-महीनेहज़ार रूपए से यज्ञ करे और कोई
भावितात्म मुहूर्त भर ही पूजा करे, तो
सौ वर्षों के यज्ञ की अपेक्षा वह मुहूर्त
भर पूजा ही श्रेयस्कर है।--८/१०५
(५९) जो कोई सौ वर्षों तक वन में अग्निहोत्र करे और कोई भावितात्म
मुहूर्त भर ही पूजा‌ कर‌ ले तो सौ वर्षों के
हवन से मुहूर्त भर की पूजा श्रेयस्कर होती है।      -----८/१०७
(६०) पुण्य की इच्छा से जो कोई संसार
में वर्ष भर यज्ञ-हवन करे तो भी वह सरल चित्त व्यक्तियों को किए जाने वाले
अभिवादन के चतुर्थाँश के बराबर भी नहीं होता।       ------८/१०८
(६१) जो अभिवादन शील हैऔर ‌नित्य
बड़े बूढ़ों की सेवा करता है,उसकी ये चार बातें बढ़ती हैं-आयु, वर्ण, सुख और 
बल।       --------८/१०९
(६२) दुःशीलऔर चित्त की एकाग्रता से
रहित व्यक्ति के सौ वर्षों के जीवन से शीलवान और ध्यानी का एक दिन का जीवन श्रेयस्कर होता है।-----८/११०
(६३)आलसी और उद्योग रहित व्यक्ति के सौ वर्ष के जीवन से दृढ़ उद्योग करने वाले का एक दिन का जीवन श्रेयस्कर होता है।        ------८/११२
(६४) अमृतपद (निर्वाण) को न देखने वाले व्यक्ति के सौ वर्ष के जीवन से अमृतपद को देखने वाले व्यक्ति का एक
दिन का जीवन श्रेयस्कर होता है।
(६५) उत्तम धम्म(चार मार्ग, चार फल
और निर्वाण, ये नव विधि लोकोत्तर धम्म
अथवा उत्तम धम्म कहलाते हैं) को न देखने वाले व्यक्ति के सौ वर्षों के जीवन से उत्तम धम्म को देखने वाले का एक दिन का जीवन श्रेयस्कर होता है ।
                  ---------८/११५
      (९)      ---:पाप वग्ग :--
(६६)पुण्य कर्म करने में ज़ल्दी‌‌ करें, पाप
कर्म से चित्त हटाएँ क्योंकि धीमी गति से
पुण्य कर्म करने वाले का मन पाप कर्म मैं लीन होने लगता है।  ----९/११६
(६७) यदि पुरुष पाप कर्म कर डाले, तो इसे बार-बार न करे, वह उसमें रुचि न ले, क्योंकि पाप कर्म का संचय दुख का
कारण होता है।------९/११७
(६८) यदि पुरुष पुण्य कर्म करे, तो उसे बार-बार करे, वह उसके प्रति उत्साह जाए। पुण्य कर्मों का संचय सुख का कारण होता है।-----९/११८
(६९) पापी भी पाप को तब तक अच्छा समझता है, जब तक पाप का विपाक
नहीं होता,और जब पाप का विपाक होता है, तो पापी पाप को देखने लगता है।                 -----९/११९
(७०) भद्र व्यक्ति(पुण्य करने वाला व्यक्ति) भी तब तक पुण्य को देखता है, जब तक पुण्य का विपाक नहीं होता,
और जब पुण्य का विपाक होता है, तब
भद्र व्यक्ति पुण्य को देखने लगता है।
     ‌             ------९/१२०
(७१) वह(पाप) मेरे पास नहीं आएगा, ऐसा सोचकर पाप कीअवहेलना न करें।
बूँद-बूँद पानी से घड़ा भरता है। इसी तरह थोड़ा-थोड़ा संचय करता हुआ मूढ़
व्यक्ति पाप से भर जाता ‌है।--९/१२१
(७२) वह(पुण्य) मेरे पास नहीं आएगा, ऐसा सोचकर पुण्य कीअवहेलना न करें
बूँद-बूँद पानी से घड़ा भरता है।इसीतरह
थोड़ा-थोड़ा संचय करता हुआ धीर व्यक्ति पुण्य से भर जाता है।--९/१२२
(७३) जैसे विपुल धन वाला व्यापारी भय मुक्त मार्ग को अथवा जीवित रहने वाला व्यक्ति विष को छोड़ देता है, वैसे ही मनुष्य पापों को छोड़ दे।--९/१२३
(७४) यदि हाथ में व्रण(घाव)न हो तो
हाथ से विष को ले सकता है, क्योंकि
घाव रहित शरीर में विष नहीं चढ़ता,ऐसे ही पाप कर्म न करने वाले को पाप नहीं लगता।        ---------९/१२४
(७५) जो निर्अपराध ,निर्मल, दोष रहित
व्यक्ति पर दोषारोपण करता है, तो उस 
दोष लगाने वाले मूर्ख को ही पाप लगता है, जैसे पवन की उल्टी दशा में फेंकी गयी सूक्ष्म रज फेंकने वाले पर ही आ 
गिरती है।           ----९/१२५
(७६) न अनंत आकाश में, न समुद्र की गहराई में और न पर्वत की कन्दराओं में
प्रवेश करके इस जगत में,  कहीं भी तो ऐसा स्थान नहीं है,जहाँ ठहरा हुआ कोई अपने पाप कर्मों को भोगने से बच सके।                        ---९/१२७
(७७) न अनंत आकाश में, न समुद्र की
गहराई में और न पर्वत की कन्दराओं में
प्रवेश करके इस जगत में, कहीं भी तो ऐसा स्थान नहीं है, जहाँ ठहरे हुए को
मृत्यु न पकड़ ले, न दबोच से।
     (१०)     ----: दण्ड वग्ग:-----
(७८) सभी को मृत्यु से भय लगता है, अतः अपने जैसा समझकर न किसी की हत्या करें और न हत्या करने के लिए किसी को प्रेरित करें।   ----१०/१२९
(७९) अपने सुख की चाह‌ से, जो दूसरों को कष्ट पहुँचाता है वह मरने के बाद भी
सुख नहीं पाता।      ----१०/१३२
(८०) जैसे ग्वाला लाठी से गायों को चरागाह ‌से हाँक कर ले जाता है, वैसे ही
बुढ़ापा और मृत्यु प्राणियों की आयु को
हाँक कर ले जाते हैं।   -----१०/१३५
(८१) वस्त्र आभूषण आदि से अलंकृत रहते हुए भी यदि कोई शान्त, स्थिर ब्रह्मचारी है तथा सारे प्राणियों के प्रति
दण्ड त्यागकर समता काआचरण करता है, तो वह ब्राह्मण है, श्रमण है, भिक्खु है।             -------१०/१४२
(८२) संसार में कोई पुरुष ऐसा भी होता है, जो लज्जा के मारे निषिद्ध कर्म नहीं 
करता, वह निन्दा को नहीं सह‌ सकता जैसे सधा हुआ घोड़ा चाबुक को नहीं सह सकता। ----१०/१४३
        (११). -----: जरा वग्ग:-----
(८३)यह शरीर जीर्ण, शीर्ण, रोग का घर और नितान्त भंगुर है। सड़ायंध से भरी हुयी ‌यह देह टुकड़े आ टुकड़े हो जाती है, जीवन मरणांतक जो ठहरा।                      --------११/१४८
(८४) रंग-बिरंगे सुचित्रित राज रथ जीर्ण
हो जाते हैं और यह शरीर भी जीर्णता 
को प्राप्त हो जाता है, किन्तु बुद्धों(संतों)
कि धम्म जीर्ण नहीं होता, तरो ताजा बना रहता है,संत जन ऐसा‌ ही ‌कहते हैं।
                  ---------११/१५१
(८५) अज्ञानी पुरुष बैल के समान जीर्ण
होता है,उसका मांस बढ़ता है,प्रज्ञा नहीं।
          ‌      ------------११/१५२
(८६) ब्रह्मचर्य का पालन किए बिना ,
यौवन में धन कमाए बिना, लोग वृद्धा- वस्था में मत्स्यहीन जलाशय में बूढ़े 
क्रौंच पंछी के समान घुट-घुट कर मरते हैं।              ------११/१५६                  (१२)-:अत्त वग्ग:---(आत्म वर्ग)
(८७) पहले अपने आपको ही उचित कार्य में लगाएँ, फिर दूसरे को उपदेश करें, तो वह पंडित क्लेश को प्राप्त नहीं होता।    -----१२/१५८
(८८) व्यक्ति अपना स्वामी स्वयं है, भला
दूसरा कौन स्वामी हो सकता है ? अपने
आपको भलीभाँति वश में करके प्रज्ञा
द्वारा यह दुर्लभ स्वामित्व प्राप्त होता है।
           -------१२/१६०
(८९) अपने द्वारा किया गया पाप कर्म
दुर्बुद्धि को उसी तरह पीड़ित करता है,
जिस प्रकार पाषाणमय मणि को बज्र।
                 ------१२/१६१
(९०) बुरे और अपने लिए अहितकारी
काम करना सहज है, किन्तु भला और
हितकारी काम करना बड़ा दुष्कर है।
                  ------१२/१६३.    
       (१३) -----:लोक वग्ग:----
(९१) सुचरित धम्म का आचरण करें।
दुराचरण से बचें। धम्मचारि इस लोक
और परलोक(दोनो जगह) सुख पूर्वक
विहार करता है।    -------१३/१६९
(९२)जो इस लोक को‌बुलबुले के समान
और मृगमरीचिका के समान‌ देखे। उस
देखने वाले की ओर मृत्युराज आँख उठाकर नहीं देखता।    -----१३/१७०
(९३) आओ चित्रित राज रथ के समान
इस लोक को देखो, जहाँ मूढ़ जन आसक्त होते हैं, ज्ञानी जन आसक्त नहीं होते।           ------१३/१७१
(९४) जो पहले प्रमाद करके भी पीछे
प्रमाद नहीं‌ करता, वह मेघ युक्त चन्द्रमा
के समान इस लोक को प्रकाशित करता है।               १३/१७२
(९५)जो अपने पहले किए हुए पाप कर्म को वर्तमान के कुशल कर्म से ढक लेता है, वह मेघ युक्त चन्द्रमा की भाँति इस लोक को खूब प्रकाशित करता है।
                ------१३/१७३
        (१४)-------:बुद्ध वग्ग:-------
(९६) जिसकी जाल फैलाने वाली विषाक्त तृष्णा कहीं ले जाने में समर्थ नहीं रही,उस अनंत गोचर बुद्ध को किस
उपाय से मोहित कर सकोगे ?-१४/१८०
(९७) जो पंडित ध्यान में लगे रहते हैं, त्याग और उपशमन लगे रहते हैं, उन
स्मृति वान संबुद्धों की ‌देवता भी प्रशंसा
करते हैं।     ------१४/१८१
(९८) मनुष्य योनि प्राप्त होना कठिन है,
मनुष्यों का जीवित रहना कठिन है, सद्धम्म का श्रवण कर पाना कठिन है और बुद्धों कि उत्पन्न होना कठिन है।
        ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌          --------१४/१८२
     (१५).     -----:-सुख वग्ग-:-----
(९९) तृष्णा सबसे बड़ा रोग है, तृष्णा संसार सबसे बड़ा दुख है, तृष्णा और इससे बनते संस्कारों को अपने भीतर
विपश्यना साधना द्वारा यथाभूतजानकर
जो निर्वाण प्राप्त करता है, वह सबसे बड़ा सुख है।     -----१५/२०३
(१००) आरोग्य परम लाभ है। संतुष्टि
परम धन है। विश्वास परम् बंधु है।
                   -------१५/२०४





(१००)





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