१५०+बुद्ध वाणी; धम्म पद से(१)
(१) --:यमक वग्ग:-- (१)जब कोई व्यक्ति अपने मन को मैला करके कोई वाणी बोलता है, अथवा शरीर से कोई कर्म करता है, तो दुख उसके पीछे ऐसे हो लेता है, जैसे गाड़ी के चक्के बैल के पीछे हो लेते हैं।--१/१ (२) जब कोई व्यक्ति अपने मन को उजला रखकर कोई वाणी बोलता है,
अथवा शरीर से कोई कर्म करता है, तो
सुख उसके पीछे ऐसे हो लेता है, जैसे
कभी संग न छोड़ने वाली उसकी छाया,
उसके पीछे-पीछे चलती है।-- १/२
(३) मुझे कोसा, मुझे मारा, मुझे हराया,
मुझे लूटा,जो मन में ऐसी गाँठें बाँधे रह- ता है,उसका वैर शान्त नहीं होता।--१/३
(४) मुझे कोसा, मुझे मारा, मुझे हराया,
मुझे लूटा, जो मन में ऐसी गाँठें नहीं बाँधे रहता है,उसका वैर शान्त हो जाता है। ---------१/४
(५) अनाड़ी लोग नहीं जानते हैं कि हम
यहाँ से (संसार से) जाने वाले हैं, जो इसे जान लेते हैं, उनके झगड़े शान्त हो जाते हैं। -----१/६
(६) जैसे बुरी तरह छेद हुए घर में वर्षा का पानी घुस जाता है, वैसे ही अभावित
चित्त में रोग घुस जाते हैं।---१/१३
(७)जैसे अच्छी तरह ढके हुए घरमें वर्षा
का पानी नहीं घुस पाता है, वैसे ही अच्छी तरह भावित चित्त में (शमथ अथवा विपश्यना से) राग नहीं घुस पाता
है। -----१/१४
(८) अपने कर्मों की मलिनता देखकर
व्यक्ति इस लोक में भी और परलोक में भी संतापित होता है। ----१/१५
(९)अपने कर्मों की शुद्धता देखकर व्य- इस लोक में भी और परलोक में भी
प्रमुदित होता है। ------१/१६
(१०) मैने पाप किया है, इस चिन्तन से
व्यक्ति दुर्गति को प्राप्त होकर अधिक
संतप्त होता है। -----१/१७
(११) मैने पुण्य किया है इस चिन्तन से
व्यक्ति सुगति को प्राप्त होकर अधिक
आनंदित होता है।-----१/१८
(२)-: अप्पमाद वग्ग(अप्रमादी वर्ग) :--
(१२) प्रमाद न करने वाले(अमृत अथवा निर्वाण का पद) कभी मरते नहीं, और
प्रमाद करने वाले (मृत्यु का पद) मरे के
समान होते हैं।------२/२१
(१३) प्रमाद मत करो न ही काम भोगों में लिप्त होओ क्योंकि अप्रमादी ध्यान
करते हुए महान सुख (निर्वाण)को प्राप्त
कर लेता है। -------२/२७
(१४) अप्रमादी शोक रहित होकर, शोक
ग्रस्त जनों को ऐसे देखता है जैसे पर्वत
पर खड़ा हुआ कोई व्यक्ति धरती पर खड़े हुए लोगों को देखे।----२/२८
(१५)अप्रमादी,प्रमादी को छोड़कर बहुत
आगे निकल जाता है, जैसे बलिष्ठ अश्व
दुर्बल अश्व को। -----२/२९
(१६) जो भिक्खु अप्रमाद में रत रहता है, वह अपने छोटे बड़े सभी बन्धनों को आग की भाँति जलाता हुआ चलता है।
------२/३१
(१७) जो अप्रमादी है उसका पतन नहीं
नहीं होता है। ------ २/३२
(३) ---: चित्त वग्ग :--
(१८) चंचल चित्त को मेधावी वैसे ही सीधा करती है, जैसे बाण बनाने वाले
बाण को। ------३/३३
(१९) जल से निकाल कर फेकी गयी
मछली जैसे तड़फड़ाती है वैसे ही मार के फंदे निकलने के लिए चित्त।--३/३४
(२०) चित्त का दमन करना सरल है,वश
में करना कठिन है। दमन किया हुआ चित्त सुखदायी होता है।---३/३५
(२१) चित्त बड़ा चालाक है,जहाँ चाहता है वहीं पहुँच जाता है, समझदार व्यक्ति
चित्त की रछा करता है, सुरछित चित्त बड़ा सुखदायी होता है। ---३/३६
(२२) जिसका चित्त अस्थिर है, उसकी
प्रज्ञा पूर्ण नहीं हो सकती।---३/३८
(२३) जिसके चित्त में राग नहीं, जिसका
चित्त द्वेष रहित है, उसे कोई भय नहीं
होता। -----३/३९
(२४) शरीर घड़े के समान भंगुर है, और
चित्त गढ़ के समान दृढ़।--३/४०
(२५) प्रज्ञा रूपी शस्त्र से मार से युद्ध करो। ---३/४०
(२६) यह शरीर शीघ्र ही चेतन रहित होकर निरर्थक काठ के टुकड़े की भाँति
पड़ा रहेगा। ---३/४१
(२७) शत्रु ,शत्रु की जितनी हानि करता है, उससे कहीं अधिक कुमार्ग पर लगा
हुआ चित्त। --३/४२
(२८) उतनी भलाई न माता-पिता कर
सकते हैं और न भाई बन्धु , जितना सन्मार्ग पर लगा हुआ चित्त।--३/४३
(४)----:-पुफ्फ वग्ग(पुष्प वर्ग) :----
(२९) इस शरीर को फेन के समान या
मरीचिका के समान निःसार जानकर ,
मार के फंदों को काटकर मृत्यु राज की
दृष्टि में ओझल रहे। ----४/४६
(३०) अतृप्त कामनाओं से घिरे हुए व्यक्ति को शीघ्र ही यमराज अपने वश में कर लेता है। ----४/४८
(३१) दूसरों के कठोर वचनों पर ध्यान न दें और न दूसरों के कृत-अकृत को देखें। खुद के कृत-अकृत को देखना चाहिए। -----४/५०
(३२) तगर, चन्दन की गन्ध अल्प होती है, परन्तु शीलवानो की गन्ध देवलोक तक जाती है। -----४/५५
(५). -----:बाल वग्ग:-------
(३३) जागने वालों की रात, थके हुए का भोजन लम्बा हो जाता है, उसी तरह मूर्ख के लिए संसार(चक्र)।---५/६०
(३४)अपने से श्रेष्ठ अथवा अपने सहचर
न मिलें तो अकेला चलना ठीक होता है,
मूर्खों से कभी मदद नहीं मिलती।-५/६१
(३५) मेरा धन, मेरा पुत्र, इस मिथ्या चिन्तन में मूढ़ व्यक्ति व्याकुल रहता है,
जब अपना शरीर और चिन्तन नहीं तो
कैसा धन ? और कैसा पुत्र ? --५/६२
(३६) जो मूढ़ होकर मूढ़ता स्वीकार करता है, वह ज्ञानी है,परन्तु जो नहीं
स्वीकारता है, वह मूढ़ ही बना रहता है।
-------५/६३
(३७) मूढ़ जीवन भर पंडित की सेवा में रहे, वह धर्म को नहीं जान पाता है, जैसे
कलुछी सूप के रस को।----५/६४
(३८) विज्ञ पुरुष मुहूर्त भर ही पंडित की
सेवा में रहे, वह धर्म को जान लेता है, जैसे जीभ सूप के रस को।-----५/६५
(३९) बाल बुद्धि, बाल मूर्ख जन अपने
लिए ही शत्रु बनकर आचरण करते हैं,
ऐसे पाप करते हैं जिसका फल कड़ुआ होता है। -----५/६६
(४०) वह किया हुआ कर्म ठीक नहीं,
जिसको करके पछताना पड़ेऔरजिसके फल को रोते हुए भोगना पड़े।--५/६७
(४१) जब तक पाप का फल नहीं आता
तब तक मूढ़ उसे मधु मानता है, फल आते ही मूढ़ दुखी हो जाता है।--५/६९
(४२) जैसे ताजा दूध शीघ्र नहीं जमता,
उसी तरह किया गया पाप कर्म शीघ्र फल नहीं लाता,परन्तु राख से ढकी आग की तरह पीछा नहीं छोड़ता।
------५/७१
(४३) मूढ़ का जितना भी ज्ञान है, वह उसके अनिष्ट के लिए होता है, वह
उसकी प्रज्ञा को गिराकर उसके कुशल
कर्मों की नाश कर डालता है।-५/७२
(६) ----:पंडित वग्ग:----
(४४) जो उपदेश दे, अनुशासन करे, अनुचित कार्य से रोके, वह सत्पुरुषों
का प्रिय होता है,असत्पुरुषों का अप्रिय।
------६/७७
(४५) जैसे सघन शैल पर्वत वायु से
प्रकंपित नहीं होता, वैसे ही समझदार लोग निंदा और प्रशंसा से विचलित नहीं
होते। ------६/८१
(४६) धम्म को सुनकर पंडित गहरे स्वच्छ निर्मल सरोवर के समान अत्यंत
संतुष्ट(प्रसन्न) होते हैं। ------६/८२
(४७) पंडित काम भोगों के लिए बात नहीं चलाते चाहे दुख मिले या सुख, और अपने मन का उतार चढ़ाव प्रदर्शित
नहीं करते। ------६/८३
(४८) मनुष्यों में पार जाने वाले लोग विरले ही होते हैं, बाकी तो तट पर ही दौड़ने वाले होते हैं। ----६/८५
(४९) पंडित कृष्ण धम्म(पाप कर्म) को त्याग कर शुक्ल धम्म(पुण्य कर्म) की
भावना करे। वह घर से बेघर होकर
आकर्षण रहित एकांत का सेवन करे।
--------६/८७
(५०) जिनका चित्त सम्यक प्रकार से
भावित हो गया है ,जो परिग्रह का त्याग
कर अपरिग्रह में रत हैं, ऐसे पुरुष लोक में निर्वाण प्राप्त हैं। ----६/८९
Comments
Post a Comment