{36} अनमोल रत्न; श्री गुरु ग्रन्थ साहिब (भाग-3)

सिक्ख इतिहास में भट्ट कवियों का विशेष महत्व है, क्योंकि उन्होंने सिक्ख गुरुओं के गुणों, उनकी शिक्षाओं और दिव्यता को अपनी कविताओं में वर्णन किया है। इन भट्टों  की रचनाएँ श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में संकलित हैं, जिन्हें भट्ट वाणी के नाम से जाना जाता है। भट्ट ब्राह्मण कुल के कवि थे, जो प्राचीन समय में वेदों और शास्त्रों में पारंगत होते थे। वे सिक्ख धर्म के गुरुओं के सम्पर्क में आए और उनकी शिक्षाओं से प्रेरित होकर उनकी स्तुति में कविताएँ रचीं।
भट्ट वाणी में इनकी कुल 123 रचनाएँ संकलित हैं।
भट्टों की वंशावली भट्ट भागीरथ से शुरू होती है, आपकी की नवीं पीढ़ी में भट्ट
रइया हुए। रइया के छः पुत्र हुए। भीखा,
सेखा, तोखा, गोखा, चोखा और टोडा।भीखा के पुत्र मथुरा, जालप और कीरत
हुए, इस तरह मथुरा, जालप और कीरत
सगे भाई थे। सेखा के पुत्र भल्य और सल्य हुए, इस तरह भल्य और सल्य सगे भाई थे। तोखा के पुत्र बल्य हुए।
गोखा के पुत्र हरिवंश हुए। चोखा के पुत्र
कलसहार और गयंद हुए। इस तरह कलसहार और गयंद सगे भाई थे। टोडा के पुत्र नल्य हुए। ये पंजाब के भट्ट, सारस्वत ब्राह्मण थे और अपनी उत्पत्ति कौशिक ॠषि से मानते हैं। 
(1) भट्ट मथुरा-:------
मथुरा के 14 पद श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में
अंकित है। आपने गुरु अर्जुन देव की प्रशंसा मैं पद लिखे हैं। पन्ना(1409)
पर अंकित पद यहाँ प्रस्तुत है---------     "जप्यउ जिन्ह अर्जुन देव गुरु फिरि संकट जोनि गरभ न आयउ।" इसका
भाव यह है कि जिन्होंने गुरु अर्जुन देव
की आराधना की है वह गर्भ योनि के
दुखों से मुक्त हो गया ‌है अर्थात् 
आवा- गमन को चक्र से मुक्त हो गया है।
(2) भट्ट जालप: -----  
 भट्ट जालप के 5पदश्री गुरुग्रन्थ साहिब
मैं अंकित है। पन्ना(1395) पर अंकित  
पद आपने गुरु अमरदास की प्रशंसा में
लिखा है। "गुरु अमरदास तारण‌ तरण
जन्म- जन्म पा शरण तुअ।" इसका
भाव यह है --भट्ट जालप कहते ‌हैं-- हे
गुरु अमरदास जी, हे संसार‌‌ के‌ तारण
हार ! मैं हर जन्म में आपकी शरण ‌में
रहूँ, यही मेरी कामना है।
(3) भट्ट कीरत--:-
भट्ट कीरत के 8 पद श्री गुरु ग्रन्थ 
साहिब में अंकित है।आपने गुरु रामदास  जी की प्रशंसा में अपने पद लिखे हैं।  पन्ना(1406) पर अंकित पद यहाँ प्रस्तुत है- "इकु उत्तम पंथ सुनियो गुरु  संगति, तिह मिलंत जम त्रास मिटाई। इक अरदास भाट कीरत की, गुर राम दास राखहु शरणाई।" इसका भाव यह है-- कीरत जी कहते‌ हैं कि हे गुरु रामदास जी ! आपकी संगत में रहने के लिए हमने उस मार्ग को अपना लिया है, जिसके मिलते ही यमराज के कठिन दण्ड से आदमी मुक्त हो जाता है।इसलिए
हे गुरु देव ! भाट कीरत की यह आपसे
अरदास है कि आप हमें अपनी शरण में लेकर हम पर कृपा करें।
(4) भट्ट भल्य-,:---
भट्ट भल्य का एक पद श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के पन्ना(1396) पर अंकित है।
आपने गुरु अमरदास की प्रशंसा में अपने पद लिखे हैं। हम उसका कुछ अंश
यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।"घनहर बूँद बसुअ
रोमावलि कुसुम बसंत गनंत न आवै।
रवि ससि किरण उदरु सागर ‌को, गंग
तरंग अंतु‌ को पावै। रुद्र घिआन गिआ
सतिगुर के, कवि जन भल्य उनहि जो गावै। भले अमरदास गुण‌ तेरे, तेरी उपमा
तोहि बनि आवै।"इसका भाव यह है--
बादल की बूँदें, पृथ्वी की वनस्पतियाँ
और बसंत के फूलों को नहीं गिना जा
सकता है, सूर्य- चन्द्र की किरणों का,
समन्दर के पेट का तथा गंगा की तरंगों का अंत कौन पा सकता है ?भाट भल्य
कहते हैं कि कोई शिव जी की तरह ज्ञान
ध्यान करके ऊपर की चीजों की गणना कर भी सकता है मगर गुरुअमरदास जी के गुणों की गणना कोईनहीं कर सकता है। गुरु जी जैसे तो गुरु जी हैं।
 (5) भट्ट सल्य:----
भट्ट सल्य के 3 पद श्री गुरु ग्रन्थ साहिब
में अंकित‌ है। पन्ना(1396) पर अंकित पद आपने गुरु अमरदास जी की प्रशंसा में लिखा है। " पहिरि समाधि सनाहु
गिआनि है आसणि चढ़िअउ। धर्म धनुष कर गहेउ भगत सीलह सरि लड़िअउ।
भै निरभउ हरि अटलु मनि सबदि गुर 
नेजा ‌गडिओ। काम,क्रोध,लोभ,मोह,
अपतु पंच दूत विखंडियो।भलउ भूआलु
ते जो तना नृपति नाथु नानक वरि।गुर
अमरदास सचु ‌सल्य भणि तै दल जितउ
इव युद्ध करि।" इसका भाव यह है--भट्ट
सल्य कहते हैं कि हे गुरु अमरदास जी !
आप समाधि रूपी संजोआ पहन कर,
ज्ञान रूपी घोड़े पर चढ़कर, हाथ में धर्म
का धनुष, भक्ति की ढाल, शील का  वाण
लेकर काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहं- कार को नष्ट कर दिया है। ऐ तेज भान के सुपुत्र गुरु अमरदास जी ! आप भलों के शिरोमणि हैं और गुरु नानक देव जी महाराज के वर से राजाओं के राजा हैं।
आप विकारों से युद्ध करके इन सब 
शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लिया है।
 (6) भट्ट बल्य:------
भट्ट बल्य के 5 पद श्री गुरु ग्रन्थ साहिब
में अंकित है। पन्ना (1405) पर अंकित पद गुरु रामदास जी की प्रशंसा में लिखा हैं। आपका वह पद यहाँ प्रस्तुत किया
जा रहा है--" जिह सतिगुर सिमरत नयन के तिमिर मिटहि छिनु। जिह सतिगुर सिमरत रिदै हरि नामु दिना दिनु। जिह
सतिगुर सिमरत जिअ की तपसि मिटावै
जिह सतिगुर सिमरत रिधि सिधि नव
निधि पावै। सोई रामदासु गुरु बल्य भणि
 मिलि संगति धनि-धनि करहु। जिह 
सतिगुर लगि पाइए सो सतिगुर सिमरहु नरहु।"इसका भाव यह है कि जिस गुरु
के स्मरण करने से पल भर में आँख का
अँधेरा मिट जाता है, जिस गुरु के स्मरण
करने से प्रभु से निकटता प्राप्त होती है, जिस गुरु के स्मरण करने से जीव की‌ तपिश मिट जाती‌ है,जिस गुरु के स्मरण
करने से रिद्धि, सिद्धि और नव निधियाँ
प्राप्त होती हैं। भट्ट बल्य कहते हैं किउन गुरु रामदास की सेवा में रहकर प्रभु से निकटता प्राप्त होती है, इसलिए हे  
मनुष्यों ! गुरु रामदास जी का स्मरण करो और उनकी संगत में बैठकरउनको 
कहो, " तुम धन्य हो ! तुम धन्य हो !"
  (7) भट्ट हरिवंश-:-------
भट्ट हरिवंश के 2 पद श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में अंकित है। पन्ना(1409) पर अंकित पद आपके सामने प्रस्तुत है। आपने गुरु अर्जुन देव जी और गुरु 
रामदास जी की प्रशंसा में पद लिखे हैं।   गुरु अर्जुन सिर छत्रु आप परमेश्वर दीअउ। मिलि नानक अंगद अमर गुरु गुरु रामदासु हरि पहि गयउ। हरिवंश
जगति जसु संचरेउ सो कवणु कहै श्री
गुरु गयउ।"इसका भाव यह है कि गुरु अर्जुन देव जी महाराज के मस्तक पर प्रभु का दिया हुआ छत्र शोभायमान है। गुरु नानक, गुरु अंगद और गुरु अमरदास जी से मिलकर गुरु रामदास जी हरि में लीन हो गए।भट्ट हरिवंश कहते हैं  कि कौन कहता है कि गुरु रामदास जी अब नहीं रहे, वह तो  प्रभु के लोक में गए हुए हैं।
 (8) भट्ट कलसहार-:-----
भट्ट कलसहार के 54 पद श्री गुरु ग्रन्थ
साहिब में अंकित है। आपने गुरु नानक देव जी, गुरु अंगद देव जी,गुरु अमरदास
जी गुरु रामदास जी और गुरु अर्जुन देव जी की प्रशंसा में पद लिखे हैं। पन्ना (1389) पर अंकित पद को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।"इकमनि पुरखु धिआइ
वर जाता। संत सहारु सदा विखिआता।
तासु चरन ले रिदै बसावउ। तव परम गुरु नानक गुन गावउ। कलसहार कहते ‌हैं 
कि अकाल पुरुष का एकाग्र मन से स्म-
रण करता हुआ, गुरु नानक जी के गुणो का गान करते हैंजो विकारों को‌ दूरकरने
वाला है।
(9) भट्ट गयंद -:------
भट्ट गयंद के13 पद श्री गुरु ग्रन्थसाहिब
में अंकित है। आपने गुरु रामदास जी की
प्रशंसा में पद लिखे हैं। पन्ना(1403) पर अंकित पद को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। " सेवक कै भरपूर जुग जुग
वाह गुरु तेरा प्रभु सदका। निरंकारु प्रभु सदा सलामत कहि न सकै कोउ तू कद का। ब्रह्मा, विशुन सिरे तै अगनत
तिन कउ मोह भया मन मद का।चौरासी
लख जोनि उपाई  रिजकु दिया सब‌हु‌ कउ तद का। भट्ट गयंद कहते हैं--हे गुरु!
 तू सबके हृदय में सदा विद्यमान रहता है। तू निरंकार है। तू सदा सलामत रहने वाला है। तेरे क़द का कोई नहीं है। तूने ही चौरासी लाख योनियाँ पैदा की हैं,और   तू ही सभी को भोजन देने की व्यवस्था करता है।
(10) भट्ट नल्य-:--------
भट्ट नल्य के16 पद श्री गुरु ग्रन्थ साहिब
में अंकित है। आपने गुरु रामदास जी की प्रशंसा में पद लिखे हैं। पन्ना (1399) पर अंकित पद को यहाँ पर प्रस्तुत किया जा रहा है।-- गुर बिन घोरु अंधारु,गुर बिन समझ न आवै। गुर बिन सुरत न सिद्ध, गुर बिन मुकति न पावै। "इसका भाव यह है कि गुरु के बिना संसार में अँधेरा ही अँधेरा है, गुरु के बिना ज्ञान नहीं प्राप्त किया जा सकता है।गुरु के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती है। 
(11) भट्ट भीखा:------
भट्ट भीखा, भट्ट मथुरा,भट्ट जालप और भट्ट कीरत के पिता थे। भट्ट भीखा के  2 पद श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में अंकित‌ है।
आपने गुरु अमरदास की प्रशंसा में पद
लिखे हैं। पन्ना(1395) पर अंकित पद
यहाँ पर प्रस्तुत है--" रेहोओ संत हउ टोलि साथ बहुतेरे डिठे।सनिआसी
तपसीअह मुखहु ए पंडित मिठे। बरसु
एकु हउ फिरओ किनै नहिपरचउलायउ।कहतिअह कहती सुणी रहत को खुसी न आयउ। हरि नाम छोड़ि दूजे लगे तिन्ह
के गुण हउ किया कहउ। गुर दे मिलायउ
भिखिया जिव तू रखहितिव‌रहउ।"भीखा
भट्ट कहते ‌हैं  कि मैं एक साल लगातार
फिरता रहा, संतों को ढूँढता रहा, मैने
कई साधू देखे, कई सन्यासी देखे, कई
तपस्वी भी देखे,ये मुँह के मीठे हैं। हमें
उन लोगों के लिए क्या कहना ? जो प्रभो
के नाम को छोड़कर मोह माया के बंधन
में पड़े हुए हैं। हे गुरु (अमरदास जी) आपसे मिलकर मुझे बहुत संतुष्टि हुयी है,आप जैसा रखेंगे हम वैसे ही रहना पसंद करेंगे।
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