{36} अनमोल रत्न : श्री गुरु ग्रन्थ साहिब(भाग--2)

(10) संत सधना जी-:------
संत सधना एक उत्तर भारतीय कवि, सूफी संत थे। आपको सधना कसाई अथवा सदन कसाई के नाम से भी जाना जाता है। आपका जन्म सन् 1180 में सिन्ध के हैदराबाद के सोमरा राज्य के सेहवान शरीफ में हुआ था। आप मुस्लिम परिवार के थे। आपके पूर्वज पेशे से कसाई थे। आप
माँस बेचकर अपनी जीविका चलाते थे। आप ईमानदारी से अपना व्यवसाय करते थे और ईश्वर का भजन करते थे। पहले तौलने का काम अक्सर पत्थर से लिया ‌जाता था। आप जिस पत्थर से माँस तौलते थे, वह शालीग्राम पत्थर था। यह खबर दूर दूर तक फैल
गयी थी कि सधना कसाई शालीग्राम का
बाँट बनाकर माँस तौलता है। संत सधना शालीग्राम से बहुत प्यार करता‌ था, उसे लगता था कि उसका व्यवसाय इसी की वजह से अच्छा चलता है। एक दिन एक
संत आए, उन्होंने कहा, यह शालीग्राम
भगवान हैं, इनसे माँस तौलना उचित नहीं है, इन्हें आप मुझे दे दीजिए, हम इनकी पूजा करेंगे, भोग लगाएँगे। सधना
ने शालीग्राम को दे दिया। संत जाति के
ब्राह्मण थे। शालीग्राम को पाकर बहुत
खुश हुए, उन्हें इस बात का गर्व महसूस
हो रहा था कि मैंने भगवान को एक कसाई के हाथ से मुक्त कराया है। संत जी ने पहले शालीग्राम को गंगा जल से नहलाया, तुलसी पत्र चढ़ाया, भोग लगाया और
आसन पर सुला दिया,‌ फिर खुद भोजन करके सो गए। रात में स्वप्न देखा कि
शालीग्राम जी कह रहे ‌हैं कि मैं पूजा, सत्कार का भूखा नहीं हूँ,‌ मैं प्रेम का भूखा हूँ। मुझे सधना प्रिय है, वह सदा मुझे याद करता है, मुझे उसी के यहाँ पहुँचा ‌दो। मैं वहीं ठीक हूँ। प्रातः उठकर पंडित जी सधना कसाई के घर पहुँच गए और‌ उन्हें शालीग्राम को देकर स्वप्न का बयान किया। इस घटना से भक्त सधना का 
ईश्वर से जुड़ाव और पक्का हो गया। इस घटना के कुछ दिन बाद एक‌ दिन
रात को राजा का रसोइया सधना के घर
माँस खरीदने आया, दुकान बढ़ चुकी थी
माँस खत्म हो चुका था। सधना ने रसोइया को लौटा दिया। वह दुबारा आया और सधना से कहा, राजा का हुक्म है, तुम्हें माँस देना होगा। सधना ने सोचा कि अगर बकरा हलाल करते हैं तो माँस बेकार जाएगा इसलिए इसका अंडकोश काटकर दे ‌देते हैं, बकरा कल तक ज़िंदा रहेगा। ज्यों ही सधना बकरा के करीब पहुँचे, बकरा हँसा, और कहने लगा सधना! यह क्या करने जा रहे हो ? सधना उसकी
आवाज़ सुनकर हैरान थे। उसने कहा, 
"कभी हम कसाई बनते हैं, तुम बकरा
बनते हो, कभी हम बकरा बनते हैं, तुम
कसाई बनते हो, ऐसा ही बहुत बार हुआ है। सधना ने छुरी फेंक दी और तय किया
कि अब माँस का कारोबार नहीं करूँगा।
एक दिन सधना जगन्नाथपुरी के‌ लिए चले। पुरी के निकट पहुँचकर सोचा रात यहीं कहीं  गुज़ारनी होगी। गाँव में चलकर कुछ खाने के लिए माँग लेंगे और वहीं कहीं
सो जाएँगे। गाँव में पहुँचकर एक घर के
सामने आवाज़ लगायी। घर से एक 
तरुणी, उम्र वही बीस के आस- पास रही होगी, बाहर निकली और कहा धन्य भाग्य हमारे ! आप आए। आइए अंदर आइए। सधना घर के अंदर आँगन में पड़ी हुयी चारपाई पर जाकर बैठ गए। बीस साल
की तरुणी, गोरा रंग, छरहरा बदन, खूबसूरत चेहरा और कोयल सी मीठी आवाज़
थी। घर में और कौन कौन हैं ? सधना ने
पूछा, तरुणी ने कहा,  "मैं और  मेरा खूसट पति जो रोगी है और मेरे काम का भी नहीं है। उसने प्यार से खाना खिलाया और सोने के लिए अच्छा विस्तर लगा दिया। सधना थके थे, सो गए। आधी रात में वह तरुणी अर्ध नग्न अवस्था में आयी, वह कामान्ध थी, सधना के बिस्तर पर बैठ गयी और कहने लगी," ईश्वर ने आपको
मेरे लिए ही बनाया है, आप जहाँ-जहाँ
जाएँगे, हम वहाँ-वहाँ आपके साथ चलेंगे"
सधना ने कहा 'बहन' ! यह कैसे हो सकता है ?  वह कमरे से बाहर गयी, और अपने पति के सिर को काटकर ले आयी। आप इसी को तो अड़चन मान रह थे, लो मैने इस अड़चन को भी दूर कर दिया। सधनाज़ोर से चिल्लाए," यह क्या किया तूने, तू डाइन है, तू चाण्डालिन ‌है, तूने अपने पति
की हत्या ‌कर‌ दी। काम बनता न देखकर
वह बाहर आयी और जोर जोर से चिल्लाना शुरू किया। यह मेरी इज्ज़त लूटना
चाहता था, इसने मेरे पति की हत्या कर
दी। सधना क़ैद कर लिए गए। राजा ने
सधना के दोनो हाथ काटने का हुक्म दे दिया। इनके दोनों हाथ काट दिए गए। इसी हालत में आप पुरी के लिए चल पड़े। जगन्नाथ जी ने पुजारी को हुक्म
दिया कि मेरा भक्त सधना आ रहा है, उसके दोनो हाथ कटे हुए ‌हैं, पालकी भेज कर उसे बुलवा लो , पुजारी ने उस
खबर देने वाले को गौर से देखना चाहा,
मगर वह खबर देने के बाद अन्तर्धान हो
चुका था। पुजारी ने पालकी भेजी और सधना को बुलवा लिया। सधना जगन्नाथ
जी के सामने ज्यों ही हाथ उठाना चाहा,
दोनो हाथ फिर से ठीक हो गए। प्रभो !
यह आपकी कैसी लीला है? पहले दोनों हाथ आपने ले लिए, फिर आपने दोनों
दे भी दिए। जगन्नाथ जी ने सधना से 
बताया कि एक कसाई की गाय ने रस्सी
तोड़कर भागना चाहा, आपने उसे इन दोनो हाथों से पकड़कर उसे फिर कसाई के हवाले कर दिया। दूसरे जन्म में गाय वह स्त्री बनी, कसाई स्त्री का पति बना और  आप वह हैं, जिसने गाय को पकड़ कर कसाई के हवाले किया था। सबको
अपने-अपने कर्मों का फल भोगना होता
है। सधना ने अपने दोनों हाथ देखे, ठीक पहले जैसे थे। सधना का सारा समय अब प्रभु आराधना में ही बीतने लगा। आपकी मज़ार सर बन्द हैदराबाद में बनी हुयी है। आपके
तीन पद श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में लिए गए हैं। पन्ना(858) पर आपका
पद अंकित है।-----"सिंघ सरन कत जाइए, जउ जंबुकु ग्रासै। एक बूंद जल
कारने चात्रिकु दुख पावे। प्राप गये सागरु मिलै, फुनि काम न आवे। प्रानु जो थाके थिरु नहीं कैसे बिरमावउ। बूडि मुए नउका मिलै कहु काहि चढावउ। इसका भाव यह है-शेर की शरण में जाने
से क्या लाभ ? जब गीदड़ ही खा जाए।
पपीहा पानी की एक बूंद के लिए मर जाए तो पूरा सागर भी मिल जाए तो क्या लाभ ? डूब जाने के बाद यदि कस्ती मिले तो क्या लाभ ? 
 (11) संत वेणी जी:-----
  बिहार के असिनी गाँव‌‌ के‌ निवासी पं०
वेणी जी बहुत निर्धन थे। कमाई का कोई साधन आपने नहीं बना रखा था। बस मज़दूरी करके परिवार का पोषण करते थे। मज़दूरी न लगने पर आपके घर का चूल्हा नहीं जलता था, बच्चे भूखे ही सो जाते‌ थे। एक बार तो कई दिन हो‌ गया था,
घर का चूल्हा नहीं जला था। ब‌‌च्चे भूख से तड़प रहे थे, वेणी से देखा न गया। आप घर से बाहर निकल लिए, और सोचा मेरा जीना व्यर्थ है, जब मैं बच्चों
के लिए भोजन की भी व्यवस्था नहीं‌ कर सकता, तो मुझे मर जाना चाहिए। अब मेरे सामने केवल आत्महत्या करने  का ही विकल्प बचा है। इसतरह   आपका अवसाद चरम पर पहुँच चुका था। आप आगे बढ़ते जा रहे थे। रास्ते में कुछ संत सत्संग कर रहे थे। मन में विचार आया कुछ देर वहाँ बैठते हैं, फिर आगे चलेंगे।आप वहीं जाकर बैठ गये और संतों की वाणी में खो गये। सत्संग समाप्त हुआ, तो एक संत ने आपका परिचय पूछा और यह भी पूछा कि आप कहीँ जा रहे थे। आपने अपना परिचय दिया और कहा
कि संतों से क्या झूठ बोलना। हम आत्म
हत्या करने‌ जा रहे थे। उस संत ने फिर पूछा, " क्यों बेटा ! आत्महत्या करने का फैसला क्यों लिया ? वेणी बोले, "आज दो दिन‌ हो‌ गया, घर का चूल्हा नहीं‌‌ जला। बच्चे भूख से तड़प रहे‌ हैं। काम कहीं मिला‌ नहीं। दो दिन काम‌ मिलता‌ है, तो चार दिन बैठना पड़ता है, थोड़ा खेत है, उसमें दिन-रात मेहनत  करते हैं, पर उससे गुज़ारा होता नहीं। संत ने कहा, "बेटा थोड़ा परिश्रम भगवान का नाम लेने में करते, तो भगवान जरूर मदद कऱते, वह बड़ा दयालु है। उसका
नाम अमृत है। आत्महत्या का विचार छोड़ो, भगवान को‌ पुकारो। वह ज़रूर सुनेगा। कहते हैं- "जिसने किया भरोसा प्रभु पर, कार्य सिद्ध हो जाते हैं। बनकर दास स्वयं वे आते, जन  का बोझ उठाते हैं।" जिस दिन मन से तुम भगवान के काम‌ में लग जाओगे, भगवान उसी  दिन से तुम्हारे काम में लग जाएगा। वेणी पर
संत की बातों का प्रभाव पड़ा। वह संत
के चरणों में लोट गया, लगा उसे भगवान मिल गए हों। उसने कहा, " मैं आत्म- हत्या नहीं करूँगा, मैं भगवान का भजन करूँगा। वह जंगल में गया और जोर - जोर से भगवान को पुकारने लगा। फिर एक पेड़ के नीचे बैठकर भगवान का नाम जपता रहा। शाम हुयी घर चले आये। संत ने जो प्रसाद दिया था, लाकर बच्चों को खिला दिये और खुद भगवान का नाम लेते-लेते भूखे पेट सो गये। सुबह
हुयी फिर जंगल की ओर चलने लगे।
पत्नी भूखी थी, कई दिन बीत गए थे, खाने को कुछ नहीं मिला था। उसने पूछा कहाँ जा रहे हो ? संत ने कहा,"अपने राजा को कथा सुनाने।" पत्नी बोली, अपने राजा से कह देना !मेरे बच्चे और मेरी पत्नी कई दिनों से भूखे हैं, कुछ सीधा-राशन भेज देंगे।" अगर वह ऐसा न करें तो तुम भी वापस मत लौटना। वेणी घर को ‌प्रणाम‌ किए, बच्चों से मन ही मन छमा माँगा। और जंगल की ओर चल दिए। क़दम आगे नहीं बढ़ रहे थे। भोजन कई दिनों से‌ नहीं मिला था, बदन में चलने की शक्ति नहीं थी। भगवान का नाम जपते हुए किसी तरह जंगल में पहुँचे। वहाँ पहुँचकर बेहोश हो गए। वेणी
तो भगवान की ओर कदम बढ़ा चुके थे,
अब बारी भगवान की थी। भगवान ने
राजा के मंत्री की पोशाक पहनी, एक बैलगाड़ी लिया, उस पर सीधा-राशन की
बोरियाँ लादीं, बच्चों के कपड़े रखे और वेणीं के घर पर पहुँच गए। पूछा, " क्या वेणी का घर यही है?" वेणी की पत्नी बाहर आयी और कहा,"मैं वेणी की पत्नी
हूँ।"भगवन् बोले "जिस राजा को तुम्हारे
पति कथा सुनाने जाते हैं, उसी राजा
ने यह सामान और ये सोने की अशर्फियाँ भेजी हैं। सब कुछ वेणी की पत्नी को देकर जब भगवान वापस होने लगे, तब उसको याद आया कि मैने अपने पति को न लौटने की बात कही थी। वह भगवान से बोली, " सुनो जी ! वहाँ मेरे पति होंगे, उनसे कह देना,"राजा ने सारा सामान भेज दिया है, अब वह घर आ जाएँ।
भगवान वेणी के पास पहुँचे और बोले,
वेणी उठो ! शाम होने वाली है, तुम्हारे
राजा ने खाने और रहने का सारा सामान तुम्हारे घर पहुँचा दिया है, अपने घर जाओ, तुम्हारी पत्नी ने तुम्हें बुलाया है। वेणी उठे, तब तक भगवान वहाँ से ओझल हो चुके थे। वेणी के बदन में ‌‌ ताकत आ ‌चुकी थी। वे  खबर देने वाले
को तलाशने लगे, वहाँ‌ कोई नहीं था। वे बड़े-बड़े डग भरते हुए घर की तरफ चल पड़े। घर पहुँच कर सब सामान को जब
देखा तब उनको विश्वास नहीं हो रहा था
कि भगवान ने स्वयं आकर मेरी मदद की है।
वेणी को  संत की बात याद आ गयी--
" जिसने किया भरोसा प्रभु पर, कार्य
सिद्ध हो जाते हैं। बनकर दास स्वयं वे
आते, जन का बोझ उठाते हैं।" मेरे प्रभु !दास ही बन कर तो आए,‌ घर के पोषण
का जो दायित्व  मेरा था, उस घर के बोझ को प्रभु ने उठा लिया। वाह प्रभु ! तू कितना दयालु है ? वेणी को पूरा विश्वास हो गया था कि जो ईश्वरीय काम में लगता है ईश्वर उसके काम को स्वयं करने लग जाता है। वेणी अब भजन लिखते, भजन गाते। प्रभु की दयालुता की यह घटना हर एक को सुनाते। वेणी की उच्च कोटि के कवियों में और उच्च कोटि के भक्तों में अब चर्चा होने लगी थी। श्री गुरु ग्रन्थसाहिब में आपके तीन पद लिए गए हैं। पन्ना  (1351) पर अंकित पद--"तनि चन्दनु‌ मस्तकि पाती। रिद अंतरि करतल काती।
 इसका भाव यह है -- संत वेणी कहते हैं कि हे मनुष्य ! तू अपने शरीर पर चन्दन
लगाता है और अपने माथे पर तुलसी के
पत्र रखता है परन्तु हृदय के एक छोर से
तूने छूरी पकड़ रखी है। तू कितना धोखे
बाज है।
(12) संत सैण जी:------
संत सैण जी बिदर के राजा राजवीर सिंह के नाई थे। प्रातः आप महल में
पहुँचकर राजा को जागरण करवाते,
शरीर की मालिश करते, नहलवाते और दरबार में जाने के लिए तैयार करते।
आप शाही नाई थे, राजा का आप पर 
बड़ा विश्वास था। आप आध्यात्मिक 
व्यक्ति थे। शाही घराना  आपकी  बड़ी इज्जत करता था। आपको राज घराने
से जब वक्त मिलता, तब आप भगवान
का कीर्तन भजन करते। आपका नित्य
का यही काम था। एक दिन कुछ संत- गण आ गए। रात्रि भर भजन कीर्तन चलता रहा और प्रातः देर तक संत गण
ईश्वरीय चर्चा करते रहे। आप संतों के
मध्य इस तरह व्यस्त रहे कि आपको
यह ध्यान ही न रहा कि राजा के महल
में पहुँचने का समय हो चुका है। संत गण
जब चले गए, तब आपको राजमहल की
याद आयी। आप लम्बे लम्बे डग भरते
हुए राजमहल की ओर चले। रास्ते में
दरबारी मिलते तो कहते, भाई सैण जी, 
क्या महल में कुछ भूल आए हो क्या ?
सैण जी अनसुना करते रहे और महल
की ओर निरंतर बढ़ते रहे। राजा दरबार
में पहुच चुके थे। सैण जी भी सीधे दरबार में गए और मन ही मन सोच रहे थे कि देखो आज क्या दण्ड मिलता है ? राजा ने कहा, "सैण ! तुम्हारी अनुपस्थिति में मैं दरबार को बता रहा था कि आज सैण ने बहुत अच्छी मालिश की। मैने प्रसन्न
होकर अपना हीरे का हार इनके गले में
पहना दिया। देखो इन पर यह हार कितना अच्छा लगता है ? सैण ने भी अपने गले की ओर देखा। हार गले में था। यह हार गले में कैसे आया ? खुद मैं भी नहीं जानता। अब तो सैण का दिमाग घूमने लगा। मैं आया नहीं, आखिर वह कौन था?
जो सैण बनकर आया, जिसे राजा भी नहीं पहचान सके। क्या भगवान स्वयं
सैण बनकर आए। संत गण कह रहे थे 
कि जब इन्सान ईश्वरीय काम में लगता है, तो ईश्वर उसका काम स्वयं करते हैं।
हे भगवन् ! आपने स्वयं मेरी जगह राजा  की मालिश की। यह कहकर सैण रो पड़े। राजा ने सैण से पूछा, "कहो क्या कहना
चाहते हो ?"सैण ने कहा, राजन् ! आज मैं आपके पास आया नहीं। मेरे घर पर कुछ संत गण आए थे। भजन कीर्तन चल रहा था, मैं भूल ही गया था  कि मुझे महल में जाना है, जब संत गण चले गए, तब मुझे याद आया कि मुझे महल पहुँचने मैं देर हो चुकी है। मैं तो छमा माँगने आया था। राजा ने पूछा," फिर यह तुम्हारे गले में हार कैसे पहुँचा?सैण बोले,
यह तो मैने यहाँ आकर तब देखा, जब आपने इसकी चर्चा की। राजा ने फिर पूछा,"जो तुम कह रहे हो, क्या वह सच है ?" सैण ने कहा, "हाँ ! राजन् ! आप घर भेजकर यह पता लगवा सकते हैं ।
मुहल्ले के तमाम लोग कीर्तन में शामिल थे। उनको बुलाकर पूछ सकते हैं।"राजा ने भक्त सैण के पड़ोसियों को बुलवाया, और अलग- अलग लोगों से पूछा। सबनेएक ही उत्तर दिया, सैण कीर्तन के कारणआज महल में नहीं आ पाए थे। राजा सिंहासन से उठे और दरबार में सबके सामने सैण जी के पैर छुए और कहा, आपकी वजह से आज मुझे भगवान के दर्शन मिले। आप मेरे गुरु हैं। मैं धन्य हो गया, प्रभु के दर्शन पाकर। मैं धन्य हो गया, आप जैसा सेवक पाकर। राजा राजवीर सिंह बहुत भावुक हो उठे। यह छण ही ऐसा था। आज भी राजघराना भक्त सैण के परिवार को गुरू मानता है।
श्री गुरु ग्रन्थ साहिब मे आपका एक पद
पन्ना (695) पर अंकित है।
इसका भाव यह है कि हे कमला पति !
आपका स्मरण करना, धूप, दीप,और घी से सजाकर आ‌रती करने के सदृश है। आपके स्मरण मात्र से मंगल ही मंगल होता है। हे कमलापति ! तू ही निरंजन है, तेरा स्मरण ही उत्तम दीपक है और 
निर्मल बाती है। रामानंदी राम को जाने,
और जो परम पिता को मानने वाले हैं, वे सदा आनंदित रहते हैं। हे गोविंद !सैण आपको भजकर आनंदित है। "धूप दीप घृत साजि आरती। वारने जाए कमला पाति। मंगला हर मंगला। नित मंगलु राजा राम राइ के। उत्तमु दियरा निर्मल बाती। तुही निरंजनु कमला पाति। रामा भगतु रामानंद जानै ।पूरनु परमानंद बखानै। मदन मुरति भै तारि गोविंदे।सैण भणै भजु परमानंदे।
(13) संत जयदेव जी:------
'गीत गोविंद' और 'रति मजरी'  के  
रचनाकार संत जयदेव जी वैष्णव भक्त थे। श्री मद्भागवत  के बाद 'गीत गोविंद' का ही स्थान है। जयदेव
जी को भगवान वेदव्यास का अवतार माना जाता है। आप संस्कृत के अंतिम
कवि हैं। आपका जन्म उड़ीसा में पुरी के निकट केंडुली सासन नाम को गाँव में सन् 1202 में हुआ था।
आपका भगवान जगन्नाथ से
बहुत लगाव था। निरंजन नाम के एक व्यक्ति ने कुछ मुद्रा आपके पिता को कर्ज दिया था। उसकी नियत खराब हुयी, वह जयदेव जी के‌ पास आया और  कहने लगा,‌आपके पिता ने मुझसे कर्ज
लिया था, या‌ तो वह कर्ज आज चुका
दीजिए अथवा आप हमारे इस कागज
पर दस्तखत कर दीजिए, हम आपका घर ‌उस कर्ज के बदले में ले लेते हैं। जयदेव ने कागज पर दस्तखत कर दिए।‌ निरंजन  ने जयदेव जी के घर पर कब्जा कर लिया। कुछ ही पल बाद निरंजन की लड़की दौड़ती हुयी आयी, कहा पिता जी
चलिए, अपने घर में आग लग गयी है।दीदी और भइया‌ ‌‌‌‌‌घर के अंदर हैं, अभी
जलकर मर जाएँगे। निरंजन घर की ओर भगे। पीछे-पीछे जयदेव जी भी गए। जय देव ने हाथ उठाया, अग्नि शान्त हो गयी। निरंजन जयदेव के चरणों में लोट गया।  निरंजन ने कहा, आप न होते तो सब कुछ जलकर खाक हो गया होता। मेरी नियत खराब हो गयी थी, मैने आपके घर को हथियाना चाहा था। मैं बुरा आदमी हूँ। आप मुझे छमा करें, यह ‌कहकर उसने उस कागज को फाड़ दिया और कहा, "आपका घर आप ही के पास रहेगा। एक  ब्राह्मण के कोई संतान नहीं थी। उसने भगवान जगन्नाथ से विनती  की थी, कि यदि भगवान संतान का लाभ देते है, तो पहली संतान जवान होने पर लाकर भगवान को समर्पित करेंगे। उसकी पहली संतान बालिका थी, जो अब जवान हो गयी थी। ब्राह्मण देवता अपनी बालिका को लेकर भगवान 
जग न्नाथ के पास आए। भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में आपसे कहा कि अपनी बालिका  को जयदेव जी को सौंप दो। जयदेव जी वहीं एक पेड़ के तले  बैठकर ध्यान कर रहे थे । आप वहीं  बालिका को लेकर पहुँच गए और संत जयदेव जी से स्वप्न की बात दोहरायी। तथा बालिका को छोड़कर अपने घर चले आए। संत जी ने उससे विवाह कर लिया। उसका नाम पद्मावती था। पद्मावती संतजी के काम में बराबर सहयोग करती थीं। संत जी जब गीत गोविंद लिख रहे थे, तब एक छंद की अंतिम पंक्ति नहीं बन पा  रही थी जिसका भाव था कि राधारानी अपना चरणकमल भगवान कृष्ण के मस्तक पर रख देती हैं। इस भाव को किस तरह लिखा जाए जिससे मर्यादा का उलंघन भी न हो और भाव भी बना रह जाए। पद्मावती ने कहा, भोजन तैयार है, आप पहले स्नान कर आएँ, भोजन कर लें
फिर लिखने बैठें। पद्मावती के बार-बार
आग्रह करने पर कलम, दवात और पोथी को रख कर संत जी स्नान करने चले गए। लीला धारी भगवान श्री कृष्ण ने जयदेव का रूप रखा और जयदेव के‌ घर पहुँच गए। पद्मावती ने पूछा आप स्नान
करने नहीं गए ? भगवान कृष्ण ने कहा,
छंद की वह पंक्ति बन गयी थी, सोचा
लिख दूँ, फिर स्नान करूँ। पोथी, कलम
दवात ले आओ उस छंद को पूरा कर दूँ।
पद्मावती ने पोथी, कलम तथा दवात को
लाकर रख दिया। प्रभो ने पंक्ति को पूरा किया। पद्मावती ने कहा, " विलम्ब हो
गया है, आप यहीं स्नान कर लें, मैं पानी
लाकर रख देती हूँ। पद्मावती ने पानी रखा,भगवान ने स्नान किया, फिर भोजन किया और पलंग पर लेटकर आराम करने‌ लगे। पद्मावती से कहा, "तुम भी भोजन कर‌ लो। उसी थाल में पद्मावती ने भोजन
निकाला और भोजन करने लगी। तभी
जयदेव ने घर में प्रवेश किया। पत्नी को
भोजन करते देखा, तो आपने कहा, सब
कुशल तो है, कभी पहले मुझे खिलाने
के पूर्व भोजन नहीं करती थीं, परन्तु आज आप भोजन पहले कर रही हैं।
पद्मावती ने भोजन करना बंद कर दिया
और हाथ धोकर अंदर पलंग पर देखने
गयीं, पलंग खाली था। पद्मावती बोली,
"वह कौन था ?"आगे कहा, " आप आए थे, मुझसे कलम, दवात और पोथी माँगी
थी, उस पंक्ति को पूरा किया, स्नान किया, भोजन किया और पलंग पर आराम करने
हेतु लेट गए। मगर पलंग पर तो कोई नहीं है। जयदेव ने पोथी उठायी, देखा वह पंक्ति पूरी हो चुकी थी।सोचा, भगवान को
यह पंक्ति पूरी करने के लिए मेरे घर आना पड़ा। उस थाल में जिसमें पद्मावती खा रही थीं, जयदेव उसी में खाना प्रारंभ कर दिए। पद्मावती ने रोका, मगर जयदेव ने कहा, इसमें मेरे प्रभो ने भोजन किया
है। हम इसी में भोजन करेंगे। पद्मावती
तुम बड़ी भाग्यशालिनी हो, तुम्हें प्रभो ने
दर्शन दिए, तुमने उनके स्नान के लिए
पानी दिया,उन्हें भोजन बनाकर खिलाया,
तुम धन्य हो ! धन्य हो ! जयदेव जी का
भगवान के प्रति श्रद्धा और पद्मावती के
प्रति प्रेम  प्रगाढ़ हो चुका था। 
कहते हैं,
एक बार किसी शिष्य ने आपको कुछ
धन दिया, आप उस धन को लेकर आ
रहे थे, रास्ते में चार चोर मिले, उन्होंने
आपका धन छीन लिया और हाथ काट  कर एक सूखे कुएँ में आपको डाल‌ दिया
उधर से राजा लक्ष्मण सेन अपनी एक
फौज की टुकड़ी लिए जा रहे थे। फौज
का एक सैनिक कुएँ में पानी देखने‌ गया।
आपको कुएँ में देखा तो राजा ‌को खबर
दी। राजा ने आपको कुएँ से निकलवाया
और अपने साथ ले आए। राजा के कहने पर आप दरबार में नित्य ईश्वरीय ज्ञान की चर्चा करते थे। सभी दरबारी आपको ‌गुरू मानते थे। संत जयदेव के कहने पर राजा ने संतों का सम्मेलन किया। सबको
भोजन कराया और दछिणा दी। संत वेश में वे चारो चोर भी आए थे। संत जयदेव‌
ने देखा तो पहचान लिया। उन चोरों ने भी
पहचाना। संत जयदेव ने  राजा से कहा,
इनको अधिक धन चाहिए। गुरुदेव‌ के कहने पर राजा ने इन चारों को अधिक मात्रा में सोना और चाँदी दिया और फौज की एक टुकड़ी साथ में कर दी जिससे
यह धन सही सलामत इनके घर तक
पहुँच जाए। रास्ते में एक सैनिक ने इनसे पूछा कि गुरुदेव ने आप संतों को बहुत धन दिलवाया। वे बोले, हम पाँचो
एक साथ रहते थे, एक बार हम एक राजा के महल में ठहरे थे। रात में इसने चोरी
की। राजा ने इसके हाथ और पैर काट देने कि हुक्म दिया। मेरे कहने पर इसके
हाथ काटकर छोड़ दिया‌ गया। इसलिए
यह हमको पहचानता है, तभी 
आकाशवाणी हुयी, ये चारो चोर हैं, ये धन के लालच में राजा के यहाँ गए थे, इन्होंने
ही गुरुदेव के दोनो हाथ काटकर कुएँ में
डाल दिया था, जिस दिन इन चारों‌ को फाँसी दी जाएगी, गुरुदेव‌ के ‌दोनों‌ हाथ
फिर से उग आएँगे। इन्होंने लूट मार करके कई हत्याएँ की हैं। ये चारो चोर
भागना चाहे मगर सैनिकों ने इनको पकड़
लिया। ये राजा के सामने पेश किए‌ गए,
इन्होंने लूटमार की कई घटनाओं और
हत्याओं को कुबूल ‌किया। इनको फाँसी
दे दी गयी। संत जयदेव जी‌ के हाथ फिर
पहले जैसे हो गए। राजा ने गुरु जयदेव
जी से पूछा, कि आप इनको‌ क्यों बचाते
रहे ? जयदेव जी ने कहा, कि संत बदला लेने की बात नहीं करता है। संत की ओर
से बदला ईश्वर लेता है। आपके दो छंद
श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के पन्ना(526) पर अंकित है। " परमादि पुरख ‌मनोपिमं सति आदि भाव रतं। " इसका भाव यह
है कि जो परम पिता परमेश्वर को हृदय
से स्मरण करता है, वह जन्ममरण, बुढ़ापा और बीमारी के भय से मुक्त हो जाता है"
 (14) संत कबीर दास जी:------
कबीर दास का जन्म सन् 1398 में वाराणसी, काशी में हुआ था। कहते हैं कि आपका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था। वह लोक-लाज के डर से आपको निर्जन स्थान पर छोड़ आयी थी। नीमा और नीरू नाम के जुलाहे ने आपका पालन-पोषण किया। कबीरदास जी ने औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी, परन्तु वे अत्यंत ज्ञानी और समाज सुधारक थे। कबीर दास जी निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। वे मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। आपके भजन, पद और दोहे सरल भाषा में लिखे गए हैं, जिनमें गूढ़ सत्य छिपे हैं। आपके दोहे जीवन को नयी दृष्टि और प्रेरणा प्रदान करते हैं। बीजक कबीरदास जी की प्रमुख रचना है। दोहे, साखी और रमैनी अन्य महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं। कबीरदास जी का देहावसान सन् 1518 में मगहर में हुआ था। आपकी मृत्यु के बाद आपके अनुयायियों ने 'कबीर पन्थ' की स्थापना की। लगभग आज से 600 साल पहले संत कबीर
दास जी इस पृथ्वी पर आए और समाज
में फैले हुए अंधविश्वास को एक गहरी
चोट देकर चले गए। आप केवल समाज
सुधारक ही नहीं बल्कि एक रहस्यवादी
कवि भी थे। आप बहुत पढ़े लिखे नहीं
थे, मगर आपकी रहस्यवादी पंक्तियों का अर्थ निकालना बहुत कठिन है। आप
ईश्वर के कितने निकट थे, इसका अनुमान आपकी चमत्कारिक घटनाओं से लगाया जा सकता है। 
चमत्कारिक घटनाएँ--
आपकी चमत्कारिक घटनाओं का उल्लेख कबीर सागर में किया
 गया है। एक बार कबीरदास जी अपने
एक शिष्य सम्मन के यहाँ जा रहे थे।आपके साथ शिष्य कमाल और फरीद
भी थे। सम्मन बहुत गरीब थे, उनके घर
में आँटा तक नहीं था। सम्मन की पत्नी ने अपने लड़के सेऊ से कहा, यदि कमा
नहीं सकते तो जाओ कहीं चोरी करो।सेऊ चोरी करने गया और पकड़ा गया,
जिससे सम्मन की बहुत बदनामी हुयी।
सम्मन गुस्से में आकर अपने लड़के को
मार डाला और लाश को पीछे की 
कोठरी में छिपा दिया, तभी कबीरदास जी पहुँच गए। सम्मन की पत्नी ने  पड़ोसन
से सीधा माँग लायी और कबीर जी के लिए भोजन तैयार किया कबीरजी कमाल और फरीद के साथ भोजन करने बैठे।
कबीर ने कहा, " आओ सेऊ जीम लो,
यहाँ प्रसादी प्रेम। शीश कटत हैं चोरों के,
साधू के नित छेम।" सेऊ दौड़ता हुआ आ गया। सेऊ को सम्मन और नेकी ने
गले लगा ‌लिया। कहते हैं सिकन्दर लोदी ने गुरू  रामानंद की हत्या कर दी  थी।कबीर जी को खबर मिली तो तुरन्त वहाँ
पहुँच गये। कबीर जी से सिकन्दर लोदी
डरता था।  कबीर जी के‌ पहुँचते ही वह
एक तरफ हट गया। कबीर जी ने गुरू
को आवाज़ दी। गुरु जी का सिर धड़
से जुड़ गया और कबीर जी के साथ उठ कर चल दिए। सिकन्दर लोदी इस दृश्य
को देखकर स्तब्ध रह गया। सिकंदर
लोदी ने इस बात की चर्चा अपने गुरु
पीर तकी से की, पीर तकी ने कहा, मैं
नहीं मानता कि कबीर मुर्दे को ज़िंदा कर
सकता है। नदी के किनारे, पीर तकी और कबीर को बुलाया गया। एक लड़के का शव बह रहा था। शव को बाहर निकाला
गया, और कबीर जी से कहा,‌ इसे ज़िंदा
करो। कबीर जी ने उससे कहा ,उठ बेटा
अभी तुम्हारे जाने का समय नहीं हुआ है। लड़का उठ बैठा और कबीर के पैर
छुए। तमाशबीनों ने कहा, कमाल हो गया। इस लड़के का नाम कमाल पड़ गया।
शेख तकी ने कहा, यह लड़का पहले से‌ ज़िंदा रहा होगा, इसलिए कबीर जी ‌के कहने पर उठ बैठा। कबीर जी अगर कब्र से मेरी बेटी को‌ निकलवा कर ज़िंदा कर दें, तो मैं उनको करामाती मानूँगा।
कब्र से शेख तकी की बेटी ‌को ‌
निकलवाया गया। कबीर जी को‌ बुलाया गया।
कबीर ने कहा उठ बेटी कमाली। और
कमाली ज़िंदा हो गयी। अब शेख तकी कबीर जी से ईर्ष्या करने लगा, इसने
बनारस के पंडों से मिलकर कबीर को
अपमानित करने की एक साजिश रची।
इसने अट्ठारह लाख लोगों को कबीर जी
की तरफ से भण्डारे में आने का आग्रह
किया,और यह भी कहा‌ गया था कि हर एक को सोने का एक-एक सिक्का भी दिया जाएगा। इस भण्डारे में बादशाह  सिकंदर लोदी को भी आमंत्रित किया। कबीर जी को‌ इसकी खबर तक नहीं
दी। आखिरी समय में जब कबीर को
इसकी खबर मिली, तब आपने वह स्थान
निश्चित किया, जहाँ पर लाखों लोग भोजन के लिए एक साथ बैठ सकें। यह भण्डारा
कई दिनों तक चला। पत्तल और पानी सहित भोजन तथा एक सोने का सिक्का ऊपर के किसी और लोक से आता था।
यह भण्डारा कबीर साहिब का ईश्वर तक
पहुँच का एक अनूठा प्रमाण था। यह भी कहते हैं कि एक बार तोताद्रि नामक स्थान पर सत्संग हुआ, इसके बाद भण्डारा भी हुआ। सत्संग में वक्ताओं ने
और विद्वानों ने छुआछूत का विरोध किया था, इसलिए कबीर जी भी भण्डारे में गये थे। कबीर एवं इनके शिष्य मण्डल को
देखकर पंडितों ने एक चाल चली कि
भण्डारे में वही भोजन में शामिल ‌हो सकता है जो वेद के चार मंत्रों को पढ़ेगा
कबीर जी ने, पास में एक भैंसा चर रहा
था, उसे हाँक कर लाने को कहा। कबीर
जी ने उस भैंसा से कहा, तू वहाँ क्या कर
रहा था ? तुझे इस भण्डारे में इन पंडितों
के साथ भोजन करना है। बस तुझे चार
के स्थान पर छः वेद मंत्रों को सुनाना होगा।
कबीर जी ने उस भैंसा के कमर पर हाथ
रखा और कहा सुना। उस भैंसा ने छः
वेद मंत्रो को सुनाया। पंडितों ने कबीर जी से छमा माँगी। कहते हैं एक बार कबीर जी के एक शिष्य दामोदर सेठ
पानी के जहाज से व्यापार हेतु यात्रा पर
थे। तूफान आ गया। जहाज डूबने लगा।सेठ ने कबीर साहब को याद किया।तूफान थम गया और जहाज डूबने से बच गया। कहते हैं कि एक बार भगवान कृष्ण ने उड़ीसा के राजा इन्द्र दमन सिंह को स्वप्न में मदिर बनवाने के लिए कहा,
राजा मंदिर बनवाते थे, मगर समंदर उसे बहा ले जाता था। ऐसा पाँच बार हुआ, 
तब राजा ने कबीर जी ‌से‌ कहा, कबीर
जी ने लहरों को आने से रोक दिया और
कहा, समंदर की लहरें अब कभी मंदिर को नुकसान नहीं पहुँचा पाएँगी। ऐसा
भी कहा जाता ‌है कि एक बार बनारस में कबीर ‌जी‌, वीर सिंह बघेल और सिकंदर लोदी बैठे हुए थे। अचानक कबीर जी
अपने पैरों पर कमंडल का जल डालने लगे। वीर सिंह बघेल ने पूछा, "आप यह क्या‌ कर‌ रहे‌ हैं ?" कबीर जी ने कहा, राम सहाय पंडा के पैर पर जलती खिचड़ी
गिर गयी है, उसने मुझे मदद के लिए पुकारा‌ है। मैं उसी के पैर पर पानी डाल
रहा हूँ। जब जगन्नाथपुरी में सैनिक भेजकर पता लगाया गया, तब बात सही निकली। कहते हैं कि जीवादत्त नाम के
एक जिज्ञासु भक्त रहते थे। उन्होंने एक
गमले में वट के पेड़ की एक सूखी टहनी गाड़ दी और तय किया कि जब कोई
तत्वदर्शी मिलेगा और जिसके चरण धोने
से यह टहनी हरी हो जाएगी, हम उसी से
दीछा लेंगे। एक बार कबीर जी‌ ‌जीवादत्त
के घर पहुँचे,कबीर जी के चरण धोए, वह
टहनी हरी हो गयी।आपने कबीर जी से
दीछा देने हेतु आग्रह किया। गुजरात के
भरुच शहर में आज भी कबीर वट लगा
हुआ है। कहते हैं कि पुण्डरपुर गाँव मे एक रंका नाम का कबीर जी ‌का शिष्य
रहता था, उसकी पत्नी का नाम बंका
तथा उसकी बेटी का नाम अबंका था।
रंका और बंका जंगल में लकड़ियाँ काटते
फिर इसे बाज़ार में बेचते और जो पैसे
मिलते उससे घर चलता धा। एक बार
सोने का आभूषण और सोने के सिक्के
उनके मार्ग में कबीर जी ने डाल दिए।जब दोनों लकड़ी का ‌गट्ठर लिए आ रहे थे , तब रंका की दृष्टि उस आभूषण और
सोने के सिक्कों पर पड़ी। रंका ने सोचा
औरतों को आभूषण बहुत प्रिय होते हैं, ऐसा न हो कि बंका की नीयत खराब हो
जाए, रंका पैर से मिट्टी उलझा कर आभूषण पर डालने लगे। रंका ने कहा,
क्यों मिट्टी  पर मिट्टी डाल रहे हो ? कुछ दिन बाद गाँव में सत्संग चल रहा था, रंका- बंका की झोपड़ी में आग लग गयी
बेटी अबंका दौड़ती हुयी आई और 
अपनी माँ से कहा, घर में आग लग गयी है, 
माँ ने पूछा, क्या कुछ बचा है ? अबंका ने कहा, एक चारपाई ,जो बाहर थी। माँ बोली,"उसको भी उसी में डाल दो और
यहाँ आकर सत्संग सुनो।" सत्संग के बाद जब रंका और बंका अपने घर गए तो देखा एक आलीशान मकान वहांँ खड़ा
था, और हर प्रकार के घरेलू सामान उसमें
रखा हुआ था। वहीं कबीर जी खड़े थे।
कबीर जी ने कहा, यह तुम्हारा ही घर है। तुम्हारी परीछा पूरी हुई, तुम सफल हुए। यह उसी का पुरस्कार है। रंका -बंका
कबीर जी के चरणों पर गिर पड़े। यहाँ
कबीर जी के चमत्कारों का उल्लेख करना इसलिए आवश्यक था, क्योंकि
दिल्ली के बादशाह केवल चमत्कार की
भाषा समझते थे। दिल्ली के बादशाहों के मुस्लिम धर्म के प्रचार से हिन्दू जनता त्राहि -त्राहि कर रही थी दूसरी ओर पंडित
और मुल्ला ने आडम्बरों के मकड़जाल में सम्पूर्ण देश को फँसा रखा था। आपके आविर्भाव से जनता को एक नई रौशनी
मिली। अगर आपने चमत्कार का सहारा न लिया होता तो ये पंडित और मुल्ला आपको भी अपने जाल में क़ैद कर लेते। कबीर निरछर थे, मगर आपकी कविता का एक-एक शब्द पाखण्ड और
ढोंग को रचाने वाले मुल्ला और पंडितों को ललकारता हुआ आया तथा असत्य 
और अन्याय की धज्जियाँ उड़ाता हुआ चला गया। आपका अनभूत सत्य 
अंधविश्वासों पर एक बारूदी पलीता था।
आपके 224 शब्द श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में अंकित है। पन्ना(1377). पर अंकित
एक शब्द जिसका भाव है कि एक घड़ी, आधी घड़ी, अथवा आधी की भी आधी घड़ी अर्थात् जितना भी समय मिले,संतों
के सत्संग में समय बिताइए, इससे लाभ ही लाभ है। "एक घड़ी आधी घड़ी,आधी
हूँ ते आधि। भगतन सेती गोसटे,जो कीने सो लाभ।
(15) संत भीखण जी-:---------
आपका जन्म सन् 1480 में उत्तर प्रदेश में लखनऊ के पास काकोरी ग्राम में हुआ था। आपके गुरु का नाम सैयद मीर इब्राहीम था। जो एक सूफी संत थे। आपके दो शब्द श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में पन्ना (659) परअंकित है। " नैनन नीर बहे तनु खीना, केस दुध  वानी। रुधा कण्ठ सबदु नहिं उचरै अब कीआ करहि प्रानी। रामराय होहि वैद बनवारी। अपने संतह लेहु उबारी। " इसका भाव है कि बुढ़ापा आयाआँखों से पानी बह रहा है,शरीरकमजोरहो गया है, बाल दूध जैसे सफेद होगए हैं,और जब बूढ़ा बोलने लगता है तो गला अवरुद्ध हो जाता है, प्रभु का नाम लेना
चाहता है, परन्तु नहीं ले पाता है। संत
भीखण जी आगे कहते हैं कि हे प्रभु।
आप ही वैद्य बनो । मेरा रोग दूर करो।
----_--------_-------------------_-----_---

 






Comments

Popular posts from this blog

उपनिषद की‌ सूक्तियाँ--

ऋगुवेद सूक्ति--(56) की व्याख्या

(2) Second Guru Angad Dev Ji Maharaj-- When Emperor Humayun pulled out his sword and try to attack on the neck of Guru Angad Dev Ji, his hand was paralyzed--Read more--