{36} अनमोल रत्न: श्री गुरु ग्रन्थ साहिब (भाग-1)


------------------------------------------- आगिया भई अकाल की, तबै चलाइयो पंथ। सभ सिक्खन को हुकम‌ है गुरू मानियो ग्रंथ। गुरू ग्रंथ जी मानियो, प्रगट गुराँ की देह । जो प्रभु को मिलबो चहै खोज शब्द मा लेह।
अबचल नगर, नाँदेड साहिब,महाराष्ट्र में
दिन बुधवार,पाँच अक्टूबर सन् 1708 को दशम पातशाह श्री गोविंद सिंह जी महाराज ने,भाई दया सिंह जी से गुरु ग्रंथ साहिब को मँगवा कर प्रकाश किया। गुरु ग्रन्थ साहिब के‌ आगे पाँच पैसे और एक नारियल रखकर माथा टेका और संगत से कहा "मेरा हुकम है
मेरी जगह गुरु 'श्री ग्रन्थ जी' को मानना।
तभी से श्री गुरु ग्रन्थ साहिब को सिक्ख
समाज अपना ग्यारहवाँ गुरु मानता है।
श्री गुरु ग्रन्थ साहिब का पहला प्रकाश हरमिन्दर साहिब अमृतसर में पाँचवे पातशाह गुरु अर्जुनदेव जी महाराज ने तीस अगस्त सन् 1604 ई० में करवाया था। इसमें दशम पातशाह गुरु गोविंद सिंह जी महाराज ने सन् 1705 ई० में दमदमा  साहिब (तलवंडी,साबो) में नवें गुरु तेग बहादुर जी महाराज के 116 शब्द जोड़  कर इसे पूरा किया। इसमें 1430 पन्ने हैं।
महापुरुषों की वाणी का संकलन --------
श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में 6 गुरु साहिबान-
गुरु नानक देव जी महाराज, गुरु अंगद देव जी महाराज, गुरु अमरदास जी महा राज, गुरु राम दास जी महाराज, गुरु अर्जुन देव जी महाराज, गुरु तेग बहादुर जी महाराज की वाणी एवं अन्य गुरुओं की ‌संक्षेप में चर्चा, 4 गुरु सिक्खों
--भाई सत्ता जी,भाई बलबंड जी, भाई
सुन्दर जी, भाई मरदाना जी की वाणी
15 भक्तों -बाबा फरीद शकर गंज,भगत
जयदेव जी, भगत त्रिलोचन जी, भगत
नामदेव जी, भगत रामानन्द जी, भगत
कबीर जी,भगत रविदास जी, भगत सैण जी,भगत धन्ना जी,भगत पीपा जी,भगत
परमानन्द जी, भगत सूरदास जी,भगत
भीखन जी,भगत साधना जी,भगत वेणी
जी की वाणी तथा 11 भटों--भट कल
सहार,भट नलू,भट कीरत,भट मथुरा,भट
गयंद,भट भीखा, भट जालप, भट सलू,
भट भल,भट बल, भट हरिवंश की वाणी
समाहित की गयी है। गुरु अर्जुन देव‌ जी
महाराज के हृदय की गहराई और 
विशालता देखिए श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के सम्पादन में गुरु साहिबान के साथ गुरु सेवकों की वाणी, दूसरे भक्तों की वाणी, बाबा फरीद शकरगंज जैसे मुसलमान‌ भक्त की  वाणी को वही स्थान दिया है जो गुरुओं की वाणी को दिया गया है।जब एक सिक्ख गुरुद्वारा में जाकर श्री गुरुग्रन्थ साहिब को माथा टेकता है तो वह केवल अपने गुरु के शब्दों को ही माथा नहीं टेकता है, बल्कि वह बाबा फरीद के शब्दे इलाही को भी माथा टेकता है। गुरु अर्जुन देव जी महाराज ने धर्म निरपेक्षता के इतिहास में जो मिसाल कायम की,  वह युगों युगों तक सराहा जाएगा। श्री गुरुग्रन्थ साहिब
में लिखी वाणी किसी एक विशेष जाति,
किसी एक समुदाय अथवा किसी एक धर्म के लिए नहीं बल्कि सम्पूर्ण मानव  जाति के लिए ईश्वर तक पहुँचने की एक साँझी डगर दिखाती है। यह श्री ग्रन्थ 
मनुष्य को मनुष्य से जोड़ता है और संसार भर को एक विराट संदेश देता है कि ईश्वर एक है, हम सब उसकी संतान हैं, उसकी नज़र में हम सब बराबर हैं मगर अफसोस ! हम फिर भी जाति, धर्म के नाम पर आपस में झगड़ते हैं। इसके पहले कि उन महपुरुषों की वाणी जो श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में संकलित है,आप तक पहुँचाएँ, उन‌ परिस्थितियों की भी चर्चा कर लेते हैं जिन परिस्थितियों केे कारण हिन्दू धर्म से अलग एक नए धर्म की नींव गुरू नानक देव जी महाराज ने रखी और जिसे अन्य गुरुओं ने इसे आगे बढाया। यहाँ हम उन छत्तीस महापुरुषों के जीवन परिचय को देते हुए उनके जीवन की कुछ घटनाओं का भी उल्लेख करेंगे जिनकी वाणी से  श्री गुरु ग्रन्थ साहिब को सजाया गया है।
 हिन्दू धर्म का अवसान:--  
महमूद ने मथुरा को बीस दिन तक लूटा। इसने हिन्दुओं के‌ लाखो पुरुषों और स्त्रियों की हत्या की। लाखों सुन्दर लड़कियों को क़ैद करके गजनी ले गया और वहाँ के बाज़ारों में  दो-दो
दीनारों में बेंच‌ दिया। मुहम्मद बिन कासिम ने सिन्ध के राजा दाहर की दो
पुत्रियों परमाल देवी और सूरज देवी को
क़ैद करके बगदाद के खलीफा के हरम
में पहुँचाया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने मेरठ के सारे मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनवायीं। जिसने भी इस्लाम कुबूल करने से इनकार किया उसका क़त्ल‌ कर‌ दिया। कुत्ब के लाठ के पास दिल्ली में जो मस्जिद है, पहले मन्दिर था जिसे
कुतुबुद्दीन ऐबक ने मस्जिद का रूप दिया। फिरोजशाह ने दक्षिण में विजय‌‌ के समय अनगिनत मूर्तियाँ वहाँ से लाकर अपने किले के मुख्य द्वार पर फेंकवा दिया जिसे बहुत समय तक प्रति दिन एक हज़ार हिन्दुओं के रक्त से नहलाता ‌रहा। अलाउद्दीन खिलजी 
कमबात के चारो ओर के हिन्दुओं  का 
क़त्ल करवा दिया। इसने बीस हज़ार‌ हिन्दू कन्याओं को‌ क़ैद ‌करके अपने देश भेजा। इसने चौदह हज़ार साधुओं के सिर‌  काटकर किले की दीवारों पर रखवाया जिसे बाद में यमुना में फेंकवा दिया। मुबारक शाह ने देवगढ़ के राजा
की खाल उतरवा ली। तैमूर ने दयालपुर में पाँच हज़ार, अयोध्या में चौदह हजार,
बनारस में बीस हजार ब्राह्मणों की हत्या
की। पटना नगर में बीस हजार हिन्दुओं को एक साथ आग के हवाले कर दिया।
इस्लामी विजेताओं का यह आदेश था कि कोई हिन्दू अच्छा कपड़ा न पहने, अच्छा खाना न खाए, घोड़े‌ की सवारी न करे, दो मंज़िला मकान न‌ बनाए, सुन्दर बेटा-बेटी न रखे, यदि हों ‌तो मुसलमानों
को दे दिए जाएँ। बाबर की सेना ने लाहौर को जलाकर राख कर दिया और
हिन्दुओं को घेर कर कत्ल‌ कर दिया ।
अकबर ने बहारा म‌ल्ल जयपुर की बेटी के साथ निकाह किया। इसने चित्तौड़ नष्ट किया जहाँ हज़ारों राजपूत मारे गए। प्रत्येक हिन्दू के लिए दो दण्ड थे--
इस्लाम स्वीकार करो अथवा अपने प्राण गवाँओ। हिन्दू शंख और घड़ियाल नहीं बजा सकते थे। हिन्दू बने रहने के लिए
इस काल खण्ड में जज़ीया कर देना पड़ता था। जो कर नहीं दे पाता था, उसे
इस्लाम स्वीकार करना पड़ता था। इस तरह लाखों हिन्दू मुसलमान बने। धीरे-धीरे सब हिन्दू राजा हार गए। राजपूत तो अपनी बहन-बेटियों को इन्हें उपहार में देने की परम्परा बना ली थी। इससे इनका ओहदा बढ़ जाता था। ऐसे राजपूत तो दूसरे राजपूतों पर भी ज़ुल्म
ढाने लग गए। मुसलमान हिन्दुओं को 
नीच‌ समझने लगा। मुसलमानों ने हिन्दुओं के उलट अपनी सामाजिक व्यवस्था बनायी। हिन्दू अपनी पोशाक का गला खुलने का रास्ता दायीं‌ ओर रखते थे, ये बायीं ओर रखने लगे। इसी
तरह नहाना-धोना, खाना-पीना और अपनी पसन्द को भी हिन्दुओं से उलट
अपनी पसन्द बना ली। आश्चर्य तो यह है
कि जो हिन्दू मुसलमान बन जाता था, वह हिन्दुओं के लिए और भी क्रूर हो जाता था। जो ब्राह्मण मुसलमान बने, वह सैयद कहे जाते थे। जो क्षत्रिय मुसलमान बने वह मुगल कहलाए। ये
क्षत्रिय मुगल शासन में सहयोग देते थे और अपने ही भाइयों को मुसलमान बनाने के यत्न में लगे रहते थे। जो भाई
मुसलमान नहीं बनते थे उनका ये क़त्ल कर देते थे। हिन्दू तबाह होता रहा, बरबाद होता रहा, नष्ट होता रहा। लाखों-लाख के क़त्ल होते रहे, लाखों-लाख मुसलमान बनते रहे। अब हिन्दुओं के पास कुछ भी नहीं बचा। हिन्दू बहुत निर्बल, उत्साह रहित, अत्यन्त निरीह हो
चुका था। वैदिक धर्म सदा के लिए इस संसार से विदा हो जाता, यदि ऐसे समय में गुरू नानक देव जी महाराज का अवतार न ‌हुआ होता। गुरू नानक देव जी महाराज ने देखा कि जिन कारणों से
मुसलमान हिन्दुओं को काफिर कहता है और हिन्दुओं पर अत्याचार करना जायज़ समझता है, उस कारण को समाप्त किया जाना आवश्यक है। गुरु
नानक देव जी महाराज ने हिन्दुओं को समझाया कि ईश्वर एक है, इसके अतिरिक्त और किसी की पूजा करना श्रेयस्कर नहीं है। ईश्वर का कोई शरीर नहीं वह अशरीरी है, वह अकाल है। उसकी कोई मूर्ति नहीं। उसका जैसा
कोई नहीं। वह अपने जैसा अकेला है।
हमारे पूर्वज भी ईश्वर को अकाल मानते थे। शरीर रहित मानते थे। जिस ढंग से
गुरु नानक देव जी महाराज ने ईश्वर की उपासना पर बल दिया वह अनूठा था।
यही कारण था कि मुसलमान भी इनके
खिलाफ नहीं हुआ। गुरू जी का विचार
भक्ति भाव ‌का था। गुरू जी ने जाति-पाँति, छुआ-छूत को बहुत करीने से धर्म
 से अलग किया। जितने भी मुसलमान
बादशाह हिन्दुस्तान में हुए, वे सब हिन्दुओं के विरोधी थे। परन्तु औरंगजेब
ज़्यादा बदनाम है। टाड साहब ने राजस्थान के इतिहास में औरंगजेब के
मेवाड़ के क्षेत्र में हमले के विषय में लिखा है कि वहाँ हिन्दुओं का क़त्ल करवाकर उनके ‌जनेऊ उतरवाए और साढ़े चौहत्तर मन जनेऊ के साथ विजय उत्सव मनाया। औरंगजेब अपनी जीत का माप-तौल इसी जनेऊ से करता था।
हिन्दू धर्म पराधीन था, निर्बल था, बेसहारा था, लगता था कि हिन्दू धर्म अब बचने वाला ‌नहीं। ऐसे समय में गुरू
गोविंद सिंह जी महाराज का अवतार‌ हुआ। जिस पौधे को गुरू नानक देव जी महाराज ने लगाया था। गुरू अर्जुन देव जी महाराज‌ और गुरू हरिगोविंद जी महाराज ने अपने रक्त से सींचा था। गुरू
तेगबहादुर जी ने अपना शीश दान करके पाला-पोषा था। उसकी जड़ों को
गुरू गोविन्द सिंह जी महाराज ने अपनी
माता, चार पुत्र, पंच प्यारे (भाई दया ‌सिंह, भाई धर्म सिंह,  भाई हिम्मत सिंह, भाई मोहकम सिंह, भाई साहिब सिंह)
और हजारों सिक्खों का रक्त देकर हरा-भरा‌ किया।
(१) पहले पातशाह गुरु नानक देव जी
महाराज:--
सर्वप्रथम पहले पातशाह आदि गुरु, गुरु नानक देव जी महाराज की चर्चा
करते हैं। गुरु नानक देव जी महाराज के बारे में मेंहदी नज़ामी ने कहा है-"आदमीयत जाग उठी, उसकी तालिमात से। नूर की रौ फूट निकली,परदा-ए-ज़ुलमात से"।
गुरुद्वारे मात्र पूजा के स्थान नहीं हैं, अपितु ‌ये आत्मिक शान्ति के स्रोत, क्षुधावन्तों के लिए अन्नपूर्णा, राहगीर के लिए रैन बसेरा, रोगी के लिए आरोग्य निकेतन और विद्यार्थियों के लिए पाठशाला भी हैं। 
नानक जी का जीवन परिचय एवं शिक्षा:- 
गणेश तिवारी 'नैश' अर्थात मेरी पुस्तक 'नैश सिक्ख गुरु गाथा' से उद्धृत-(लावणी छन्द में) प्रस्तुत--
पञ्जाब प्रान्त के तलवण्डी में, प्रभु ने आकर दरश दिया। तृप्ता-कालू मेहता के घर, नानक बन‌ अवतार लिया। कालू ने गुरु को बुलवाकर, इन्हें मुनीमी सिखलायी। हुए गुरू गोपाल चकित जब, पाती इनसे लिखवायी। लिखा पत्र में नानक जी ने, जिसने सृष्टि बनायी है। पाती जिसने उसे ‌लिखी, बस उसकी ही बन आयी है। नानक से गुरु बोले कैसे, पाती उस‌ तक पहुँचाएँ ? लिखें पत्र किस तरह उसे हम,  क्या पाती में लिखवाएँ ? नानक बोले बुद्धि पत्र पर, मोह त्याग की स्याही से। लिखें नाम मन, प्रेम कलम से, स्वर के आवाजाही से। सुनकर नानक जी की बातें, इनको गुरु ने नमन किया। फिर‌ कालू से आकर बोले, बालक ने सब सीख लिया। यह नर नहीं साहिबे कुदरत, प्रभु की बातें करता है। अल्प समय में सीख लिया सब, समझ बहुत ‌यह रखता है।
जीवन की कुछ रोचक घटनाएँ:-- 
(१) भैंसों की चरवाही-- ज़मींदार का खेत एक‌ दिन, भैंसों ने सब चर डाला। रहे साधना रत नानक तब, नष्ट खेत‌ को कर डाला। ज़मींदार ने नृप बुलार से, आकर बात बतायी है। और न्याय के लिए तुरत ही,‌ अपनी रपट लिखायी है। पूछा नानक से बुलार ने, ध्यान भैंस पर नहीं दिया। ज़मींदार का खेत समूचा, निज भैंसों से चरा लिया। नानक बोले भैंस हमारी, फसलें नष्ट नहीं करतीं। ज़मींदार हैं झूठे भैंसे,उचित जगह पर ही चरतीं। इक‌ हाकिम को भेजा नृप ने, कहा खेत पर जाओ तुम। क्या है सच्ची ‌बात‌ देखकर, तत्क्षण मुझे बताओ तुम। खेत देखकर लौटा हाकिम, बोला खेती 
हरी-भरी। नानक की भैंसों ने निश्चित,  इनकी खेती नहीं चरी। नरपति बोले ज़मींदार से, शीघ्र यहाँ से घर जाओ। ठीक नहीं तेरा दिमाग, तुम किसी वैद्य को दिखलाओ। चरवाही में नानक ‌इकदिन, तरु छाया में‌ सोये थे। बहुत तेज थी धूप मगर वे, स्वप्न लोक में खोए थे। सूर्य बढ़ा तो छाया खिसकी, मुख पर धूप चमकती थी। एक सर्प ने फन फैलाया, छाया मुख पर पड़ती थी। नृप बुलार उधर से निकले, देखा नानक सोये थे। सर्प किए था छाया फन की, गुरू स्वप्न में खोये थे। नृप ने कहा साहिबे कुदरत, की महिमा यह रखता है। इसीलिए सर्प भी आकर, सेवा इनकी करता है।
(२) मुसलमान है नहीं मुसलमाँ:-----
दौलत खाँ नवाब से मोदी, काम गुरू को
दिलवाया। जीजा थे दीवान खान के, अस्तु कार्य यह  मिल पाया। इस‌ दुकान पर बहुत वस्तुएँ, नित्य शहर से आती थीं। शाही लंगर हेतु वस्तुएँ, नित्य यहाँ से जाती थीं। तेरा तेरा कहकर  नानक,
राशन तौल कराते थे। कहते चौदह नहीं
कभी, पर राशन देते जाते थे। शुभ चिन्तक जब कहते गुरु से, तौल ठीक से करवाओ। तेरा तेरा कहकर यूँ मत , मोदी घर को लुटवाओ। गुरु कहते वह 
अक्षय पूँजी, सदा बराबर‌ ही रहती। चाहे
जितना‌ खर्च करो, पर नहीं कभी कम हो सकती। हुयी शिकायत तौल हुयी, सब
ठीक ‌वहाँ पर बाना था। और सात सौ साठ रूपए, नानक जी को पाना था।
नानक जी चल दिए वहाँ से, निकट‌ नदी
पर आए हैं। रोका खाँ ने बहुत इन्हें, पर नहीं वहाँ रुक पाए हैं। हिन्दू कोई नहीं
यहाँ पर, कहा नाम हैं सब लेते। मुसलमान है नहीं मुसलमाँ, रब को सब धोखा देते। मुसलमान ने सुनी बात यह, 
नहीं सहन वह कर पाया। पहुँच गया वह
निकट खान के, बहु विधि उनको उकसाया। क्रोधित होकर तब दौलत खाँ, बोला काजी तुम जाओ। वहाँ पहुँचकर बद दिमाग़ ‌को, तुरत पकड़ कर ले आओ। काजी पहुँचे तुरत घाट पर, आरक्षी द्वय साथ लिए। बोले साथ चलो तुम नानक, खान तुम्हें हैं तलब किए। गुरु से बोले खान व्यर्थ में, गाली तुम क्यों देते हो ? मुसलमान है नहीं मुसलमाँ, यह‌ कैसे कह सकते हो ?
डगर दिखायी जो रसूल‌ ने,  मुस्लिम उस पर चलता है। रखता है ईमान दीन पर,
हरगिज़ नहीं भटकता है। होने लगा अजान हुआ चुप, बोला मस्जिद चलना है। चलकर वहाँ नमाज़ हमारे, साथ तुम्हें भी पढ़ना है। मस्जिद पहुँचे और यहाँ पर, पंगति आकर खड़ी हुयी। गुरू खड़े थे शान्त भाव से, जब नमाज़ थी पढ़ी गयी। काजी बोले नानक तुमने, हम सबका प्रतिकार किया। खड़े रहे लेकिन नमाज़ में, नहीं हमारा साथ दिया। नानक बोले हम आए थे, बस नमाज़ के हेतु यहाँ। किन्तु नहीं थे आप यहाँ पर,
साथ निभाते कहाँ-कहाँ। घोड़ी ब्यायी
आज भोर में, मन उस पर था लगा हुआ। कहीं कुएँ में गिरे नहीं शिशु, जो
आँगन में खुदा हुआ। काजी बोले छोड़ो मुझको, साथ खान का तुम देते। मेरा मन था नहीं यहाँ तो, साथ खान के पढ़ लेते। कैसे पढ़ता साथ खान के, वे काबुल थे गये हुये। घोड़ा एक खरीदा उसके, चिक-चिक में थे लगे हुये। सुनी
खान ने गुरु की वाणी, सिर‌ को अपने झुका दिया। मुसलमान है नहीं मुसलमाँ,
लगता उसने मान लिया।
 (३) भोजन खूँ में पका हुआ:---
नानक लालो घर से बाहर, ध्यान प्रभो का करते थे। पर लालो घर भोजन करने
प्रायः आया करते थे। एक दिवस दीवान
मलिक ने, भण्डारा इक ‌करवाया। भोजन हेतु गुरू को उसने, भण्डारे में बुलवाया। भोजन करने हेतु गुरू जी, भण्डारे में गए नहीं। इन्हें बुलाकर पूछा उसने, तुम क्यों भोजन किए नहीं ? सोचा गुरु ने अन्यायी यह, सदा अहम् में रहता है। भले बुरे में अन्तर इसको, नहीं दिखायी पड़ता‌ है। कहा मलिक भागो से गुरु ने, भोजन खूँ में पका हुआ। नहीं उसे मैं खा सकता, जो त्याज्य वस्तु से बना हुआ। क्रोधित होकर बोला भागो, ढीठ बहुत तुम दिखते हो। हलुआ पूड़ी और खीर को, त्याज्य वस्तु तुम कहते हो। गुरु बोले मँगवाओ भोजन, परख तुम्हें करवायेंगे। अच्छा क्या है और बुरा क्या ? भेद तुम्हें बतलाएँगे। भोजन लाने हेतु मलिक ने, नौकर को आदेश दिया।लालो घर से रोटी को भी, ततक्षण गुरु ने
मँगा लिया। गुरु बोले पूड़ी से देखो, खूँ
 ‌का धार निकलता है। किन्तु दबाने से रोटी को, धार दुग्ध का बहता है। नेक कमायी लालो की है, इससे रोटी बनी हुयी। निर्धन का खूँ तूने चूसा, पूड़ी इससे ‌तली हुयी। कहा मलिक भागो ने गुरु से, अन्दर का पट खोल दिया। ज़ुल्म
नहीं कर सकता अब मैं, मैने यह संकल्प ‌लिया।
(4) पहुँचा वहाँ सिकन्दर लोदी---------
हरिद्वार से दिल्ली आकर, यमुना तट पर बैठ गए। गुरू यहीं से सत्यनाम को, फैलाना आरम्भ किए। दिल्ली शाह सिकन्दर लोदी, बहुत ज़ुल्म था करवाता। चुन-चुन करके हिन्दू के सिर,
सेना से वह कटवाता। सुना शाह ने यमुना तट पर, हिन्दू ‌साधू आया है। और
सभी के दिल-दिमाक़ पर, इसका ही मत
छाया है। कहा शाह ने काज़ी से,‌ अब 
शीघ्र वहाँ पर जाओ तुम। कैसा है वह साधू जाकर, तत्क्षण पता लगाओ तुम ?
पता लगाकर लौटा‌ काज़ी, बोला साधू
वह लगता। वाणी में गाम्भीर्य बहुत है, लेकिन भोला वह लगता। लोदी ने  सुनकर सब बातें, जाकर गुरु से मिलन किया। गुरु के और प्रभव में आकर, 
लोदी ने यह वचन दिया। लोदी बोला हे
नानक ! हम वचन तुम्हें यह ‌‌देते‌ हैं। जो
माँगोगे वह हम देंगे, वादा हम यह लेते हैं। कहा गुरू ने शहंशाह, अब ज़ुल्म नहीं तुम ढाओगे। नहीं मरेगा‌ हिन्दू कोई,
तुम यह ‌वचन निभाओगे। कहते हैं जो वचन दिया था, शह ने खूब निभाया है।नहीं कभी भी हिन्दू खूँ को, इसके बाद बहाया‌ है।
(५) गुरु कामरूप आसाम गए----गुरु आए ‌बंगाल और फिर,  कामरूप आसाम गए। और यहीं गोहाटी में ही, शहर मध्य विश्राम लिए। मरदाना को भेजा गुरु ने, कहा हाट में जाओ तुम।
खाने हेतु वस्तु कुछ लेकर, लौट ‌तुरत 
ही आओ तुम। एक वहाँ थी जादूगरनी,
नूरशाह उसको कहते। भेड़ बना लेती
पुरुषों को, उससे सब बचकर रहते। दिन में भेड़ बनाए रखती, शब में पुरुष बनाती थी। जादूगरनी उन पुरुषों से,
दिल अपना बहलाती थी। मरदाना थे सुन्दर अतैव, नूरशाह ने चयन किया।और‌ तुरत ही भेड़ बनाकर, अपने घर का मार्ग लिया। मरदाना को देर हुयी, तो
नानक जी हैरान हुए। दिव्य चक्षु से ‌देखा
उनको, भेद तुरत ही भाँप‌ लिए। नानक‌ जी चल दिए वहाँ से, नूरशाह के घर आए। मेअ, मेअ आवाज़ सुनी तो, मन ही मन वह मुस्काए। नूरशाह ने देखा अन्दर, एक अजनबी आया है। साधु वेश में है यह लेकिन, सुन्दर इसकी काया है। नूरशाह ने सोचा दिल में, इसको भेड़ बनाएँगे। रातकाल में पुरुष बनाकर, दिल अपना बहलाएँगे। नूरशाह ने अपना जादू, गुरु पर‌ तुरत चलाया है।
किन्तु रहे गुरु शान्त तनिक भी, नहीं असर कर पाया है। जादू करते-करते
गुरु पर, नूरशाह बेहोश हुयी। लगता‌ ‌है
जादू की ताकत, गुरु के सन्मुख व्यर्थ गयी। होश हुआ तो बोली हे प्रभु ,
तत्क्षण मुझको क्षमा करें। जादू मेरा छीन लिया प्रभु, इसको ‌देकर कष्ट हरें।
कहा गुरू ने नूरशाह‌ तुम, जादू-टोना बन्द करो। डरना सीखो प्रभु से अब तुम,
और उसी का नाम भजो।‌ शिष्या वह बन गयी गुरू की, गुरु ने उसको मंत्र दिया। और वहाँ से चले गुरू अब, मरदाना को साथ लिया।
(६) मियाँ मिठा था बहुत घमण्डी---
स्याल कोट से चले और गुरु गाँव कोटला आए हैं। मियाँ मिठा था बहुत घमण्डी, उसको सबक सिखाए हैं।
वह कहता था मुसलमान सब, स्वर्ग लोक को जाएँगे। नरक अग्नि में जलकर हिन्दू, रोयेंगे चिल्लाएँगे। सजा रहेगा दरबारे रब, यहाँ ‌सभी को आना है। नबी भरेंगे हामी जन्नत, मुस्लिम को पा जाना है। कहा गुरू ने दरबारे रब, पेश किए सब जाएँगे। नबी भरेंगे हामी उसकी, नेकी जो अपनाएँगे। हिन्दू हो या मुस्लिम हो, वे सब पर रहमत करते हैं।
नेक नियत हैं जो भी रखते, उनकी हामी भरते हैं। वह तो है दरबार इलाही, हिन्दू
मुस्लिम नहीं वहाँ। सभी बराबर एक ‌जात हैं, भेदभाव है नहीं वहाँ। नेकी और बदी का अंतर, सर्फ वहाँ पर चलता है।
करने वाला बदी नरक में, धू-धू करके जलता है। नेक और भल मनुज हेतु दर, 
जन्नत का है खुला हुआ। सरकारे दो आलम का रुख, इसी तरफ है मुड़ा हुआ। कहा मिठा ने गुरू आपने अन्दर
का पट खोल दिया। हिन्दू-मुस्लिम सभी बराबर, एक जात से जन्म ‌लिया। 
(७) गुरु मक्का में विश्राम लिए----
चलते-रुकते, चलते-रुकते, मक्का में गुरु
पहुँच गए। मरदाना थे साथ गुरू के, आकर यहाँ कयाम‌ किए। दूर देश से काजी मुल्ला, हज‌ करने सब आए थे।
एक भेष में सभी यहाँ, सब कफन  साथ
में लाए थे। गुरू और मरदाना दोनो, हाजी के थे भेष लिए। जहाँ रुके थे काजी मुल्ला, वहीं गुरू थे रुके हुए।
रात बहुत अब गुजर‌ चुकी थी,  कुछ हाजी‌ तो सोये थे। किन्तु वहीं  कुछ हाजी लेटे, रब सुमिरन में खोए थे।
जीवन आया देखा गुरु को, पद काबा
की ओर किए। बोला पैर हटा लो मूरख,
इसे खुदा की ओर किए। काजी-मुल्ला सभी जगे, पर गुरू अभी तक‌‌ जगे नहीं।
उसी ओर था पैर अभी तक, पैर उधर से हटे‌ नहीं। कहा डाटकर जीवन ने, क्यों नहीं खुदा से डरता है ? इधर खुदा का घर है पर तू , पैर इधर ही करता है।
गुरु  जब जागे बोले रक्षक ! लेटे हैं हम थके हुए। तू कहता उस ओर खुदा है, जिधर पैर हम किए हुए। हमें ज्ञात हर‌ ओर खुदा है, कण-कण में वह बसता है।
नहीं जगह है ऐसी ‌कोई, जहाँ नहीं वह रहता है। एक मौलवी उठा क्रोध में, बोला पैर हटाओ अब। तेरी बक-बक बहुत हो चुकी, बातें नहीं बनाओ अब।
कहा गुरू ने पैर हटाना, मेरे वश की बात नहीं। हर दिशि रब है यह समझाना, मेरे वश की बात नहीं। कहा मौलवी ने जीवन से, इसका पैर घुमाओ तुम। तू
रक्षक है इस आँगन का, इसको सबक सिखाओ तुम। जीवन ने गुरु पद को
पकड़ा, उत्तर दिशि में घुमा दिया। किन्तु
सभी ने देखा काबा, उत्तर दिशि में घूम गया। ‌जीवन तत्क्षण गुरु पैरों को, पूरब में ले आया है। देखा‌ काबा ने अपना रुख, पद की ओर घुमाया है। जीवन ने
गुरु पद को तत्क्षण,‌ दक्षिण दिशि में 
मोड़ दिया। काबा ने अपना रुख मोड़ा, ‌दक्षिण दिशि की ओर‌ किया। जीवन हुआ अचेत वहीं पर, गुरुवर का पद मुक्त हुआ। किन्तु मौलवी ने पद पकड़ा, और घुमाना शुरु किया। काबा दिखता उसी ओर, जिस ओर गुरू का पद आता। जैसे-जैसे पैर घूमता, उसी ओर वह हट जाता। देखा सबने दृश्य अलौकिक, सभी गुरू पर मुग्ध हुए। बहुत भीड़ थी सभी गुरू ‌को, मन ही मन में नमन किए। जीवन हुआ सचेत कहा
गुरु, आप साहिबे कुदरत हैं। सबको दर्शन लाभ मिला, हम सभी बहुत‌ खुश‌ किस्मत हैं। आप निशानी कुछ दें हमको, याद सदा ही आएँगे। आने वाले
हर हाजी को ,‌सनद वही दिखलाएँगे। गुरु का लिया खड़ाऊँ‌ तत्क्षण, इसको
आसन तुरत दिया। याद करें नानक को हाजी, अतैव यह पहचान लिया।
(८) बाबर ‌चलकर खुद आया-------
स्यालकोट‌ से चलकर ‌गुरु अब, सैयद पुर में आए हैं। और ऐमनाबाद पहुँचकर
लालो से मिल पाए हैं। कष्ट यहाँ था आने वाला, अस्तु गुरू रुक गये वहीं।
मरदाना थे साथ गुरू के, लालू के घर रुके वहीं। लिए पाप की जंज शाह ने,
सैयदपुर को लूट‌ लिया। जिसने तनिक
विरोध किया, सर ‌धड़ से उसका जुदा 
किया। नर-नारी को क़ैद किया, फिर गठरी इन्हें लदाया‌ है। और चला लाहौर‌ तरफ, बस थोड़ा ही बढ़ पाया‌‌ है। चले‌‌ काफिला के‌ संग गुरुवर, सिर पर गठरी लिए हुए। गुरु की इस लीला में भाई‌ मरदाना भी साथ दिए। दो फकीर हैं 
खड़े किन्तु भू , लगती आगे बढ़ती है।   ‌ सरदारों ने‌ दे‌खा इनकी, गठरी ऊपर चलती है। ‌सरदारों‌‌ ने जो देखा था, बाबर तक वह पहुँचाया। बाबर चलकर इन‌ संतो ‌तक, दृश्य देखने खुद आया। गुरु‌ की नूरी आभा देखी, बाबर ने सिर झुका ‌दिया। बोला माफी मुझे चाहिए, मैने यह अपराध‌ किया।‌ कहा ‌गुरू से आज्ञा दें, हम तुरत यहीं वह‌ दे‌ देंगे। पर रहमत‌ की
भीख ‌चाहिए, उसे‌ आपसे ले लेंगे। गुरु बोले इन‌ सब‌ क़ैदी को, मुक्त यहीं कर देना है। बदले में आशीष आपको,‌ इन सबसे‌ ले लेना है। कहते ‌हैं बाबर‌ ने‌‌ सबको, तुरत वहीं पर मुक्त किया। लश्कर को लाहौर मार्ग पर, फिर बढ़ने का हुक़्म ‌दिया।
गुरु नानक देव जी महाराज के  समय में झूठ ही प्रधान था,‌ सदाचार तो मानो पंख लगाकर उड़ ही गया था। गुरु नानक देव जी महाराज ने स्वयं अपनी वाणी‌ में भी उस समय के हालात का वर्णन किया है। उन्होंने बताया है कि काजी, ब्राह्मण और योगी का समाज पर अंकुश था और ये लोगों को भ्रम जाल में फँसाकर उनका जीवन बर्बाद कर रहे थे; "कादी कूड़ु बोलि मलु‌ खाय। ब्राहमणु ना वे जी आघाय।‌ जोगी जुगति न जाणेेै अंधु। तीनों वो जाड़े का बंधु।" पन्ना‌--662(गुरु ग्रन्थ साहिब)। आपने जाति -पाँति का खण्डन किया और बताया कि सभी जीवों का आश्रय एक परमात्मा ही है।
"फकड़ जाती फकड़ु नाव। सभना जीआ इका छाव।"पन्ना-83(गुरु ग्रन्थ साहिब)
आखिरी समय--
पैसे पाँच नारियल देकर, लहना को गुरु बना दिया। अपनी गद्दी इनको देकर, इस दुनिया से कूच किया।
(२) दूसरे पातशाह‌ गुरू अंगद‌देव जी‌ महाराज------------
जीवन परिचय एवं नानक जी का ‌दर्शन---गणेश तिवारी ' नैश ' अर्थात मेरी   पुस्तक 'नैश सिक्ख गुरु गाथा' से ‌उद्धृत‌(लावणी छन्द) में प्रस्तुत--
फेरूमल थे पिता महाशय, दयाकौर थीं माँ इनकी। जन्म लिया मत्ते‌सराय में, खीवी पत्नी थीं उनकी। देवीचन्द श्वसुर थे इनके, जो ‌खडूर में ‌रहते थे। इसी गाँव में पत्नी के सँग, गुज़र आपजी करते थे।
बाबर ने मत्ते सराय को ज़मीदोज़ कर डाला था। अस्तु यहाँ लहना ने आकर,‌ डेरा अपना डाला था। दासू, दातू पुत्र
आपके, इसी ‌गाँव में ‌जन्म लिए। खीवी माँ भी‌ मुदित हुयीं, जब इनके सुत प्रकट हुए। हृष्च-पुष्ट गुरु थे‌ शरीर‌ से, शान्त भाव था ‌पर इनमें। सुन्दर थे, आकर्षक तन था, द्वेष नहीं था‌ पर दिल में। जोधा से इक ‌बार आपने,  गुरु नानक का भजन सुना। निकट पहुँचने हेतु गुरू‌ के‌ अन्तर्मन को गुना धुना। इनको गुरु की चाहत थी, ये गुरु दर्शन के हेतु चले।
लिया मशविरा खीवी से, ये मित्रों से भी मिले जुले। कर्तापुर था निकट किन्तु डग, नहीं उठाए उठता था। लगता था ‌ज्वर का‌ प्रभाव है, इसीलिए तन दुखता था। लहना जी अब वहीं मार्ग में, घनी घास पर ‌लेट गए। सोचा अब है मिलन असम्भव, यही सोचकर दुखी हुए। दर्द
बहुत‌‌ था इनके‌‌ तन में, नानक ‌जी का नाम लिया। बरबस ‌आँखें बन्द हुयीं,‌ पर
मन ही मन में नमन‌‌ किया। एक व्यक्ति ने आकर पूछा, भले पुरुष तुम दिखते 
‌हो। जाना है किस‌ ओर बटोही, मुझे अजनबी लगते हो। आँख‌ खोलकर बोले
लहना, कर्तापुर तक चलना है। नानक हैं इक‌‌ सन्त उन्हीं‌ का, दर्शन मुझको करना है। वह बोला ‌यह घोड़ा मेरा, तुम्हें वहाँ ले जाएगा। वहीं मुझे भी जाना है, यह तुम्हें वहीं पहुँचाएगा। तुम हो ज्वर‌ से पीड़ित अतैव, घोड़े पर तुम आ जाओ। 
मंज़िल तक ले जाएगा यह, वहाँ पहुँच कर सुख पाओ। लहना थे अस्वस्थ अस्तु वे, घोड़े पर असवार हुए। व्यक्ति चला वह पैदल आगे, उस घोड़े की रास लिए। लहना उतरे घोड़े से, कुछ स्वस्थ दिखायी थे पड़ते‌। पहुँचे मंज़िल पर ‌तब
लहना,‌ धन्यवाद उनको कहते। लहना ने जब जाना नानक, पैदल-पैदल आए हैं।
मुझे अश्व पर स्वयं बिठाकर,  निज घर तक वह लाए हैं। लहना जी ने कुछ सोचा, फिर नानक जी के चरण छुए।
सिक्ख बने फिर गुरु नानक की, सेवा का संकल्प लिए।
आपके ‌जीवन की रोचक घटनाएँ------
(१) मूस तख्त पर पड़ा हुआ----
एक दिवस गुरु आसन‌ ‌पर ही, मूस‌ ‌एक था पड़ा हुआ। बदबू फैल रही थी लगता, यह बिल्कुल था‌ सड़ा ‌हुआ। यह ‌था पूजा आसन जिस पर‌, पूजा ‌गुरुवर
करते थे। और इसी पर नित्य बैठकर
ओमकार को भजते थे। दोनो पुत्र गुरू के आए, किन्तु देखकर चले गए। उबकाई आ रही इन्हें थी, इसीलिए वे
खिसक लिए। इसे फेंकने हेतु गुरू ने, बुड्ढा जी ‌से कहलाया। पर बुड्ढा ने इसे देखकर लहना जी को बुलवाया। लहना
जी ने पूँछ पकड़कर, इसे वहाँ से हटा‌ दिया। और उठाकर उस आसन को,‌ दूजा आसन‌ ‌बिछा ‌दिया। नद पर ‌जाकर
इस आसन‌ को, ठीक तरह से साफ किया। और वहाँ से आकर उसको, उलट-पलट कर सुखा‌ लिया।
(२) गुरू परीक्षा हुयी कठिन-----
एक दिवस गुरु नानक जी ने अद्भुत भेष
बनाया है।‌ लिए हाथ में‌ मोटा‌ सोंटा, चहुँदिशि इसे घुमाया है। चले विपिन की ओर गुरू जी,‌ बड़े-बड़े डग भरते थे। बात व्यर्थ की करते थे, ये झूम-झूम कर
चलते थे। जो भी ‌निकट पहुँचता था, वह ‌‌मार ‌लट्ठ का खाता था। लगता गुरू हुए ‌हैं पागल, भाव उभर यह आता था। आगे-आगे‌ गुरुवर बढ़ते, लहना पीछे‌ थे‌ चलते। बुड्ढा भी थे‌ साथ किन्तु वे, चन्द क़दम पीछे रहते। जंगल‌ में ‌जब पहुँचे
गुरुवर, एक लाश ‌थी‌ पड़ी‌‌ हुयी। लहना ने भी‌‌ देखा ‌इसको, धवल वस्त्र से ढकी हुयी। कहा गुरू ने बुड्ढा जी‌ से, लाश तुम्हें ‌यह‍ खाना है। भूख लगी अब होगी
इसको, खाकर भूख मिटाना है। बुड्ढा जी ‌ने कहा गुरू‌ ‌से, यह क्या भेष‌ बनाया ‌
है ?‌ क्या करते ?‌ क्या कहते ? मुझको नहीं समझ कुछ ‌आया ‌है। गुरु लहना के‌ निकट पहुँचकर, बोले शव को‌ खा‌ जाओ। गुरु ‌का‌ यह‌ आदेश समझकर , खाकर इसको ‌सुख‌ पाओ। लहना बोले मुझे बताएँ, कैसे‌ खाकर सुख पाऊँ ? पैताने से ‌खाऊँ‌ अथवा सिरहाने से‌ खा‌ जाऊँ। नानक बोले हे लहना ! तुम पैताने से खाओगे। इसे चबाकर खाओगे, तो अंत समय सुख पाओगे। पैताने में‌ पहुँचे‌ लहना, चादर शव से ‌हटा दिया। देखा लाश नहीं थी गुरु‌ के, चरणों में‌ सिर टिका ‌दिया। लहना ‌को निज शुभ हाथों ‌से, गुरु ‌ने तुरत उठाया है। और खुशी से‌ विह्वल होकर सीने से चिपकाया‌ है। इनको अंक ‌मिला नानक ‌का, अंगद गुरु ‌ये कहलाए। सेवा का फल मेवा मिलता, उचित‌ कथन ये ‌ठहराए। घर पर आकर गुरु नानक ने, निकट सभी को बुला लिया। पैसे पाँच नारियल देकर लहना को गुरु बना दिया। गुरू परीक्षा हुई कठिन, पर लहना जी उत्तीर्ण हुए। गुरु नानक जी लहना जी को, सतगुरु अंगद बना दिए। श्री चन्द थे पुत्र गुरू के, पितु निर्णय से रुष्ट हुए। उदासीन इक पन्थ चलाकर अंगद से प्रतिशोध लिए।
(४) शहंशाह सिर झुका लिए----
शेरशाह सूरी से लड़कर ,शाह हुमायूँ‌ हारा था। उसे फकीरों के आशिष का, केवल बचा सहारा था। सब कुछ वहीं छोड़कर‌ तत्क्षण वह काबुल की ओर चला। मन में किन्तु सोचता मेरा, कर सकता है कौन भला। गोइंदवाल निकट जब पहुँचा, सोचा नानक रहते थे। पूरा होता था वह सब कुछ, जो भी नानक कहते थे। उनकी गद्दी यहीं निकट है, चलकर गुरु से मिलते हैं। आशिष देने हेतु गुरू से, तुरत याचना करते हैं। शाह गुरू के निकट पहुँचकर, हाथ जोड़कर नमन किए। गुरु थे ध्यान लगाए अतैैव नहीं गुरू पर ध्यान दिए। शहंशाह ने खड्ग निकाली, और गुरू पर वार किया। किन्तु किसी ने हाथ शाह का, नीचे आने नहीं दिया। हाथ रोकने वाला इनको, कोई चहुँदिश दिखा नहीं। विस्मित होकर चिल्लाया, पर गुरु से कुछ भी कहा नहीं। कहा गुरू ने खड्ग तुम्हारी, सूरी सम्मुख चली नहीं। जान बचाकर भगा हुआ है, दाल वहाँ पर गली नहीं। वह गुस्सा तुम लिए साथ में, पास हमारे आए हो। शौर्य दिखाने हेतु सन्त पर, क्यों तुम खड्ग चलाए हो ? गुरु की आभा देखी तत्क्षण, शहंशाह सिर झुका लिए। कहा गुरू से क्षमा करें,  हम शरण आपका ग्रहण किए। गुरु बोले हे शाह हुमायूँ , पुनः तख्त तुम पाओगे। जीत   तुम्हारी होगी जब तुम, फिर संग्राम रचाओगे। गुरु आशीष प्राप्त कर शह ने, तुरत वहाँ से कूच किया। और लौटकर आया वह जब, तख्त शत्रु से छीन लिया। गुरू नागरी लिपि से हटकर, लिपि गुरुमुखी बनाए हैं। गुरु नानक के वचनों को भी, मोखे से लिखवाए हैं।
(५) गुरु ने तिरसठ शबद लिखे------
गुरु ने तिरसठ शबद लिखे, सब मनुज हेतु शुभकारी हैं। मिलता है उपदेश मनुज को, शबद सभी अविकारी हैं। जो भी मानव देता जग को, वही प्राप्त कर सकता है। लेनी-देनी का क्रम जग में, अविरत चलता रहता है। अच्छे कर्मों के द्वारा नर, स्वर्ग प्राप्त कर लेता है। पर मिलता है नरक ध्यान जब, नहीं कर्म पर देता है। तुम्हें बनाया है ईश्वर ने, वही तुम्हारा रख वाला। अच्छे बुरे समय में तेरा, चिन्ता वह करने वाला। रहता है इस जग में मानव, कर्म नित्य वह करता है। पर नकेल मानव की ईश्वर, स्वयं हाथ में रखता है। शुभ कर्मों के द्वारा मानव,
निज स्थान बनाता है। करता ईश्वर मदद अनवरत, वह ऊपर उठ जाता है। प्रेम भक्ति के द्वारा मानव, श्रेष्ठ परम पद पा लेता। द्वेष जलन के कारण अपनी, ऊँचाई भी खो देता। गुरु कहते हैं हे मानव, तू उदर भरण में क्यूँ पड़ता। जलचर, थलचर, नभचर की, प्रभु चिन्ता
हरपल है करता। 
जे सउ चंदा उगवहि सूरज चढ़इ हज़ार।
एते चानड़ होदिआ गुरु बिन घोर अंधारु
     -----आसा ‌की वार(अंक--४६३)
उग आएँ सौ चाँद, उजाला‌ सहस‌ सूर्य का आ‌ सकता। किन्तु ‌गुरू के बिना हृदय से नहीं‌ अँधेरा जा‌ ‌सकता। राग- मोह में फँसा हुआ जन, माया में ही रमण करे। गुरु मिलता है प्रभो ‌कृपा से, जो‌ जन मन से मोह हरे।
 गुरु कुञ्जी पाहू निवलु, मन कोठा तनु छति। मन का ताकु न उघड़ै, अव रन कुञ्जी हथि।--सारंग वार(अंक-१२३७)।
गुरु कुञ्जी जो मार्ग खोलकर, जन को प्रभु तक ले जाए। कुञ्जी नहीं दूसरी कोई, जो ईश्वर तक पहुँचाए।
हउमे दीरघ‌ रोगु है, दारू भी इसु माहि।
किरपा करे जे आपणी, ता गुर का शबद कमाहि।- आसा की वार(अंक-४६६)।
गुरु अंगद देव जी महाराज के आध्यात्मिक सद्विचार:---
अहंकार जब होता जन को, नहीं कभी
यह हटता है। गुरु मिलता जब प्रभो कृपा से, अहंकार तब मिटता है। मनुज वही है जिसके मन में, प्रभु का सदा निवास रहे। मन को रखता सदैव निर्मल,
जिसमें प्रभु का वास रहे। सुमिरन करता
जो भी प्रभु का, वह ऊँचे उठ जाता है।
जाति-पाँति में जो फँसता, वह नहीं कभी उठ पाता है। जीव अंश है परमेश्वर का, साथ‌ उसी से निभ‌ सकता।‌‌ किन्तु
जगत के राग-द्वेष में, सदा भटकता ‌यह‌ ‌रहता। पंच भूत से बना देह यह, निर्मल‌ ‌तब तक ‌रहता ‌है। जब तक पञ्च विकारों‌ से, यह दूर स्वयं को रखता है।
आवश्यक है मनुज हेतु यह, निज कमजोरी को जाने। इसका करे इलाज,
इसे फिर ठीक तरह से पहचाने।
 मन के पीछे चलने वाला, नहीं लक्ष्य तक जा पाता। मन की आदत ठीक नहीं, यह पथ से तुरत भटक जाता। मन का स्वामी बनकर इसको, प्रभो मार्ग पर ले जाएँ। प्रभु सुमिरन में इसे लगाकर,
जगती का सब सुख पाएँ। अति चतुरायी
से जब मानव, अपना कार्य बनाता‌ है। तो समझो इस जगती में, वह अपनी कीर्ति गँवाता ‌है। कहता‌‌ है जो बुरा अन्य को, मान स्वयं का खो देता। किन्तु 
बड़ाई करने वाला, सुख वैभव सब पा लेता। प्रभु का सुमिरन करने वाला, शान्त चित्त हो जाता है। इसको पीड़ा-कष्ट प्रभावित, कभी नहीं कर पाता है।
नाम सुमिरने वाले का दिल, खिला‌ सदा‌ ही रहता ‌है। खुश रहता है अन्दर से वह,
नहीं तनिक भय रखता है। सुमिरन करके जीव प्रभो से, एक रूप हो जाता है। मिल जाता आनन्द, चैन की वंशी
मधुर बजाता है। भूल गया जो परमेश्वर को, सब विकार आ जाते हैं। ये जन इनसे घिर जाते, सब अंदर पैठ जमाते हैं। जिस नर में प्रभु भक्ति नहीं, वह अन्धा बनकर रहता है। चलता रहता अविरल लेकिन, ठोकर खाया करता है।
सुमिरन भक्ति मार्ग की निन्दा, जो जन करते रहते हैं। अहंकार आ जाता उनमें,
केवल अपनी धुनते हैं। निंदा दूजे के तन-धन से, भला दूर ही रहता है। प्रभु का दिल में प्रेम, याद, डर सदा हमेशा रखता है। ईश मार्ग का पथिक जानता, सुख-दुख आता ही रहता । विचलित कभी नहीं होता, वह रज़ा इसे प्रभु का कहता। जैसा चिन्तन रखता मानव, बाहर वही झलकता है। अन्दर-बाहर दो
मुख अन्तर, बहुत दूर से दिखता है।
सुख-दुख, लाभ-हानि को सदैव, भक्त प्रभो को दे देते। इसके बदले में वह प्रभु से, अमन-शान्ति को ले लेते। तृष्णा के वश में जो मानव, नहीं ठीक से जी पाता। सदा जोड़ने में मन रहता, अंत समय में पछताता। जुड़ी सम्पदा में से थोड़ी, धर्म हेतु जो व्यय करते। चाहत धन की रहती अतएव, लाभ नहीं ये पा सकते। धन की तृष्णा, प्रेम प्रभो का,
नहीं साथ में रह पाएँ। दोनों हैं विपरीत साथ में कैसे दोनो आ जाएँ ? तृष्णा में जो जीता उसका, जीवन व्यर्थ चला जाता। आता खाली हाथ यहाँ पर, खाली हाथ चला जाता। धनी व्यक्ति
सम्मानित जग में, निर्धन इनसे डरते हैं।
धनी व्यक्ति को खास समझकर, खुद को हीन समझते हैं। निर्धन और धनी दोनों से, गुरु अंगद का कहना है। जग में कोई नहीं खास, बस प्रभु को खास समझना है। एक दिवस गुरु अंगद जी ने, संगतियों को बुलवाया। जाने का आ गया समय यह, भेद सभी को बतलाया।
पैसे पाँच नारियल देकर, माथा अपना टेक दिए। अमरदास को गुरू बनाकर, इस दुनिया‌ से कूच किए।
(३) तीसरे पातशाह गुरु अमरदास‌ जी महाराज---
मंजी परम्परा के नियामक, छुआछूत,  जातिगत भेदभाव, स्त्रियों के प्रति अत्याचार,सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध  मुहिम चलाने वाले, विभिन्न आयोजनों में फिजूल खर्ची पर रोक के लिए अनंदु साहिब की रचना करने वाले तीसरे पातशाह गुरु अमर दास जी महाराज ने 'सती प्रथा' का घोर विरोध किया। आपने सती शब्द की परिभाषा ही बदल दी।आपके अनुसार सती वह नहीं है जो  अपने पति के शव के साथ जल जाती है बल्कि सती वह है जो अकाल पुरुष के प्रेम में रत रहती है।"सती आ एहि न आखी अनि जो  मिड़आ लगि जलहिं। नानक सती  आ जाणीअन्हि जि बिरहे चोट मरहिं।"पन्ना--787(गुरु ग्रन्थ साहिब) गुर अमरदास जी महाराज ने बताया कि मन को वश में  करना  सरल नहीं है। मन के शान्त रहने पर ही इंद्रियाँ शान्त रह सकती हैं और ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। मन को वश में करने की विधि कोई कोई जानता है।  संसार मैं बहुत से लोग ज्ञान की  बातें करते हैं,मगर अंदर से खोखले हैं। "मनु मरै धातु मर जाइ। बिन मन मूए कैसे हरि पाइ। इहु मन मरे दाऱू जाणै कोइ मनु शबदि मरे बूझै सोइ। " पन्ना-665 (श्री गुरु ग्रन्थ साहिब)।
आगे की गाथा गणेश तिवारी 'नैश' अर्थात् मेरी पुस्तक 'नैश सिक्ख गुरु गाथा' से उद्धृत लावणी छन्द में प्रस्तुत की गयी है:--
जीवन परिचय-------
तेजभान थे पिता आपके, माता लखमी
थीं इनकी। मूल गाँव था बासर इनका, 
मनसा पत्नी थीं इन की। दानी, भानी सुता आपकी, मोहन और मोहरी सुत।
परचन की दूकान चलाते, खेती में था काम बहुत। गुरु अंगद की पुत्री अमरो, 
अनुज पुत्र को ब्याही थी। यह थी बहुत सुशीला इसकी, घर में आवाजाही थी।प्रात समय यह उठकर नित ही, परमेश्वर को भजती थी। नानक के शब्दों का 
किरतन सात सुरों में करती थी। इक दिन किरतन सुना आपने, बोले अब हम जाएँगे। गुरु अंगद से मिलकर अपनी,
व्यथा शीघ्र बतलाएँगे। अमरदास चल दिए यहाँ‌ से, ये खडूर में पहुँच गए। गुरु
का दर्शन मिला इन्हें, तब रुकने का संकल्प लिए। 
गुरु गद्दी की प्राप्ति---
अमरदास थे समधी गुरु के, उम्र अधिक पच्चीस साल। पर की बारह साल इन्होंने, सेवा एवं देखभाल। लंगर में जल जितना लगता, आप नदी से ले आते। गुरू प्रसादी पा लेते तब, आप प्रसादी थे पाते। आयी हुयी संगतों
को भी, भोजन आप कराते थे। गर्मी के मौसम में उन पर, पंखा आप डुलाते थे।
एक दिवस गोंदा मरवाहा, निकट गुरू के आया था। इसे सताते भूत-प्रेत, यह विषय साथ में लाया था। बोला गुरु से,
व्यास पुलिन पर, गोइँदवाल बसाऊँगा।
गुरु गद्दी के लिए वहाँ इक, सुन्दर भवन बनाऊँगा। आप किसी को भेज दीजिए, 
गाँव वहाँ बस जाएगा। शान्त रहेंगे भूत,
गाँव फिर नहीं उजड़ने पाएगा। दासू-दातूको बुलवाकर, कहा गुरू ने जाओ तुम। रहने हेतु मिलेगा इक घर, सुख से समय बिताओ तुम। दासू-दातू दोनो ने ही, वचन गुरू के टाल दिए। कहा नहीं हम जा सकते, यह कहकर दोनो मना किए। गोंदा के संग अमरदास को, गुरु अंगद ने भेज दिया। इनके रहने हेतु भवन इक, गोंदा ने निर्माण किया। पैदल चलकर पाँच मील ये, नित खडूर में आते थे। गुरु की सेवा करके सायं, पुनः लौट ये जाते थे। एक दिवस गुरु अंगद जी ने, संगतियों को बुलवाया। समय आ गया जाने का यह, भेद सभी को बतलाया। पैसे पाँच नारियल देकर, माथा अपना टेक दिए। गद्दी देकर अमरदास को, इस धरती से कूच किए।
कुछ रोचक घटनाएँ---------
(१) दातू बोला तख्त हमारा---
दातू सुत थे गुरु अंगद के, द्वेष गुरू से रखते थे। संगतियों से गुरुवर की ये, निंदा करते रहते थे। इक दिन गोइँदवाल
पहुँचकर, निकट गुरू के आया है। लात मारकर अमर गुरू को, अपना धौंस जमाया है। गुरु गद्दी से गिरे ज़मीं पर, नाक और सिर फूट गया। कुछ पल पड़े रहे औंधे मुँह, लगता घुटना टूट गया। यह घटना उस समय हुयी, जब गुरु दीवान सजाए थे। हुयी अचानक थी यह घटना, नहीं समझ गुरु पाए थे। दातू बोला तख्त हमारा, तूने इसको हड़प लिया। इस आसन पर हम बैठेंगे, हमने तुझको हटा दिया। अमर दास जी उठकर बोले, हम अधिकार नहीं रखते।
इस पर है अधिकार तुम्हारा, इसे तुरत तुम ले सकते। चोट लगी थी गुरु को ज्यादा, अधिक नहीं चल सकते थे।
घुटने पर थी चोट अधिक, ये नहीं अधिक हिल सकते थे। रात हुयी पर किसी तरह गुरु, निज गृह बासर पहुँच गए। और अँधेरे इक कमरे में, आसन अपना जमा लिए। दातू गद्दी पर बैठा पर, नहीं वहाँ वह टिक पाया। संगत आयी पास नहीं,‌ वह कुछ दिन बाद चला आया। बुड्ढा जी ने बासर आकर, 
अमरदास को समझाया। आप गुरू हैं इस गद्दी के, संगत ने है बुलवाया। नानक जी की गद्दी है वे, खुद रखवाली करते हैं। यह गद्दी है मिली आपको, आप नहीं भग सकते हैं। गोइँदवाल पहुँचकर गुरु फिर, गद्दी पर आसीन हुए। जैसे थी दिनचर्या वैसी, पुनः गुरू जी ढाल लिए। दातू अपने नीच कर्म में,
नहीं सफल हो पाया था। सत्य बात को
समझ गया,  फिर नहीं लौटकर आया था।
(२)अकबर ने लंगर में खाया---
था आशीष गुरू अंगद का, पुनः हुमायूँ आया है। जीत लिया सूरी को उसने, 
अपना हुक्म चलाया है। वह लाहौर नहीं
आया पर,  अकबर को ही भेज दिया। दिल्ली में खुद रुककर उसने, कामकाज को ठीक किया। एक दिवस सीढ़ी से गिरकर, उसने प्राण गँवाया है। अकबर था लाहौर शहर में, नहीं यहाँ आ पाया है। अकबर की अनुपस्थिति में ही, शह अकबर को बना दिया। तेरह साल उम्र   में उसने, तख्त शाह का प्राप्त किया। गुरु लंगर में एक साथ सब, एक पंक्ति में
आते थे। जाति-पाँति का भेद नहीं था, सभी साथ में खाते थे। इस कारण कुछ ब्राह्मण-क्षत्रिय, गुरु से नफरत करते थे।
और खिलाफत दातू से भी, गुरु की करते रहते थे। गोंदा मरवाहा भी गुरु की, सदा खिलाफत करता था। गुरु अंगद सुत दातू को भी, उकसाता वह
रहता था। अकबर था लाहौर शहर में,
दातू संग सब पहुँच गए। अकबर से सब
मिले यहाँ फिर, गुरु का सभी विरोध किए। सुनी शिकायत अकबर ने, गुरु अमरदास को बुला लिया। गुरु ने अपना
पक्ष बताने, रामदास को भेज दिया। राम
दास ने वहाँ पहुँचकर अपनी बात बतायी ‌है। हुए शत्रु  शर्मिंदा इनकी, दाल नहीं गल पायी है। रामदास से बोले अकबर, एक दिवस हम आएँगे। आँखों से हम देखेंगे, तब निर्णय वहीं सुनाएँगे।
कहते हैं नृप अकबर इक दिन, गुरु लंगर में था आया। वहीं सभी के साथ पंक्ति में, उसने भी लंगर खाया। गुरु से खुश होकर वह बोला, आप चाह जो‌ रखते ‌हैं। माँगोगे वह जो कुछ मुझसे, आज आप पा सकते हैं। हिन्दू तीरथ जो भी जाते, कर उन पर क्यों रखते हैं ? कहा गुरू ने इसे माफकर, पुण्य आप ले सकते हैं। चलते समय शाह ने गुरु को, सौ एकड़ का खेत दिया। और कहा अकबर ने गुरु से, तीरथ कर भी माफ किया।
(३) गुरु की वाणी है अनन्दु में---
नानक, अंगद जी की वाणी, रामराय से लिखवायी। अपनी एवं अन्य भक्त की, वाणी इसमें जुड़़वायी। गुरु की वाणी है अनन्दु में,  सीख इसी में अंकित है। रामराय ने लिखा इसे, जो सिक्ख धर्म में वंदित है। कंत चिता में जलने वाली, नहीं सती कहलाती है। पति वियोग में मरने वाली स्वयं सती हो जाती है। गुरु के सिक्ख सिपाही जाकर घर-घर यह बतलाते थे। सती प्रथा है कोढ़ घिनौना, लोगों को समझाते थे। बड़ा बवाण नहीं कुछ सच है, तेरही वरसी मत करना। किरिया, दिया, पिण्ड सब फर्ज़ी,  ध्यान प्रभो पर है रखना।
(४) मंजी और बावड़ी का निर्माण--
गुरु बाइस मंजी नियत किए, अरु धर्मगृहों को बनवाया। सिक्खी के फैलाव हेतु, संकल्प दूर तक तक पहुँचाया। चौरासी सीढ़ी की गुरु ने, एक बावड़ी बनवायी। पानी की किल्लत थी सबकी, प्यास इसी से बुझवायी। अंतिम समय जान कर गुरु ने, रामदास को बुला लिया। पैसे पाँच नारियल देकर, इस धरती को छोड़ दिया।     
 (४) चौथे पातशाह गुरु रामदास जी महाराज----------------
घुँघनियाँ बेचकर परिवार का गुज़ारा करने वाले, विनम्रता और सहिष्णुता के
प्रतीक, सदा सुहानी नगरी श्री अमृतसर
को बसाने वाले चौथे पातशाह गुरु राम दास जी महाराज गुरु की पहचान बताते
हुए कहते हैं कि जिसके पास बैठने से मन आनंदित होता है, मन का भ्रम 
निवारण होता है, वह व्यक्ति परमात्मा का स्वरूप होता है, गुरु शिष्य को मायाजाल से मुक्त कराता है, अतः गुरु की शरण में जाना चाहिए। " जिसु मिलिए मन होइ अनंदु सो सतिगुरु कहीएै। मन की दु विधा बिनसि जाइ हर परम पदु लहीए। मेरा सतिगुर पियारा कितु बिधि मिलै। हउ  खिन खिन करी मेरा गुरु पूरा किउ मिलै।" पन्ना--168( श्री गुरु ग्रन्थ साहिब)। गुरु ने एक स्थान पर लिखा है कि विनम्रता,‌ सेवा, सद्भावना से ही प्रभु को पाया जा सकता है, जब तक मनुष्य अहंकार का त्याग नहीं करता है, वह प्रभु को नहीं पहचान सकता। एकाग्रचित होकर उस का स्मरण करने वाले अहंकार से बच जाते हैं, बाकी जप, तप, संयम, व्रत  सब बेकार है।"जपु, तप संयम, वरत करे, पूजा मन मुख रोग न जाई। अंतरि रोगु महा अभिमाना, दूजै भाई खुआई। बाहरि भेख बहुत चतुराई, मनूआ जेहि दिसि धावै। हउमें बिआपिया सबदु न चीन्है, फिर फिर जूनी आवै। पन्ना-732 
(श्री गुरु ग्रन्थ साहिब)
जीवन परिचय-----
गणेश तिवारी 'नैश' अर्थात् मेरी  लिखी हुयी पुस्तक ' नैश सिक्ख गुरु गाथा' से उद्धृत (लावणी छन्द) में प्रस्तुत---
पितु हरिदास मल्ल थे एवं, दयाकौर थीं मां गुरु की। जन्मभूमि लाहौर प्रान्त में,
चूनामण्डी थी इनकी। सब भाई में बड़े
गुरू जी, जेठा इनको कहते थे। रामदास था नाम आपका, मिल-जुल कर सब रहते थे। पहले पितु ने, मातु बाद में, साथ गुरू का छोड़ दिए। हुए अनाथ गुरू जब दोनो, जगत छोड़ कर चले गए। चूनामण्डी से नानी माँ, गुरु को बासर ले आयीं। चाचा ताऊ सब थे लेकिन, नहीं तनिक भी सकुचायीं। नहीं रहे जब पिता गुरू के, चाचा भी मुख मोड़ लिए। लावारिस हो गए गुरू पर, नहीं तनिक वे ध्यान दिए।
जीवन की रोचक घटनाएँ--------
(१) घुँघनी हमें बना दो मैया----
आठ साल‌ की उम्र गुरू की, नानी के घर
आए हैं। अनु दयाल, अनुजा रमदासी
साथ यहाँ पर आए हैं। नानी माँ थीं अतिशय निर्धन, नहीं गुज़ारा हो पाता।
नानी माँ के साथ गुरू का, फाका अक्सर हो जाता। इक दिन गुरुवर बोले नानी ! तुम भूखी सो जाती हो। हमें खिला देती हो लेकिन, स्वयं नहीं तुम खाती हो। हम हैं छोटे किन्तु नहीं, यह
दर्द सहन कर पाते हैं। मैया भूखी रहे और हम, यूँ ही समय बिताते हैं। घुँघनी 
हमें बना दो मैया, इसे बेचने जाएँगे। जो भी लाभ मिलेगा, उससे रोटी मिलकर खाएँगे। सायं चना भिगोती नानी, घुँघनी सुबह बनाती थी। इसे बेचने जाते नित गुरु, सायं तक बिक जाती थी। बासर में
गुरु अमरदास जी, आते-जाते रहते थे। 
रामदास ‌है बहुत कुशल, गुरु अच्छा इसे
समझते थे।
(२) बासर से गुरु ले आए-----
सत्रह साल उम्र में इनको , बासर से गुरु ले आए। गोइंदवाल पहुँचकर जेठा, दिनचर्या इक दुहराए। प्रात काल में‌ उठकर जेठा, गुरु की सेवा करते थे।लंगर के सब बर्तन धुल कर,  गुरु के कपड़े धुलते थे। आज्ञा गुरु की लेकर जेठा, घुँघनी नित ले जाते थे। इसे बेचकर पैसे को, ये नानी को पहुँचाते थे।
छोटी पुत्री भानी को गुरु, जेठा ‌जी को ब्याह दिए। पर खुद को दामाद समझ कर, नहीं कभी ये कार्य‌ किए।
(२) गुरु की सेवा करते थे-----
गुरु के जगने के पहले ही, रामदास जी
उठ जाते। शौच क्रिया के बाद गुरू
 को, ताजे जल से नहलाते। लंगर छकने के पहले ये, गुरु के कपड़े धुलते थे। रात्रि समय ये पैर दबाकर, गुरु की सेवा करते थे। बेटी भानी वृद्ध पिता‌ की, अतिशय सेवा करती थीं। सेवा से जब फुर्सत मिलती, नित्य प्रभो को भजती थीं। लंगर हेतु भूमि का पट्टा, अकबर ने जो इन्हें दिया। सेवा से खुश होकर गुरुवर, यह भानी के नाम‌‌ किया। काम बावड़ी खुदने का जब, गुरुवर ने आदेश किया। रामदास ने तुरत पहुँच कर, डलवा सर पर उठा लिया।
(३) तू तो है दामाद गुरू का----
चूनामण्डी से इक दिन कुछ लोग यहाँ पर आए हैं। मिले यहाँ जब जेठा से, तो
अपना रौब जमाए हैं। उससे बोले जेठा भाई ! मजदूरी क्यों ‌करता है ? तू तो है दामाद गुरू का, फिर क्यों इनसे डरता है ? तुम हो बिल्कुल भोले-भाले, तुम‌ कुछ नहीं समझते हो। तूने नाक कटाई कुल की, डलवा सिर पर रखते हो। क्रोध नहीं
कम हुआ तनिक भी, ये सभी गुरू के पास गए। अभिवादन भी नहीं हुआ, ये 
रौब दिखाना शुरू किए। तू बनता है धर्म गुरू, पर यह क्यूँ नहीं समझता है ? जेठा है दामाद कुली का, काम यहाँ पर करता है। तुझे नहीं है तनिक शर्म तू ,
सेवा इससे लेता है। दिन भर काम कराता इससे, तब रोटी तू देता ‌है। रामदास गिर गए चरण पर, बोले गुरुवर
कृपा करें। इन्हें आप नादान समझकर, 
कृपया इनको क्षमा करें। इन्हें नहीं है ज्ञान तनिक ये, सभी यहाँ क्या कहते हैं ?  प्रभो आपकी महिमा को, ये बिल्कुल
नहीं समझते हैं। अज्ञानी हैं इस घर को ये, ससुराली घर कहते हैं। ये है मेरे लिए मुक्ति दर,इसको नहीं समझते हैं। अस्सी
साल उम्र थी गुरु की, अचल भाँति गुरु अडिग रहे। जेठा थे पच्चीस साल के,
रोकर गुरु से वचन कहे। विनयी भाव देखकर इनका, गुरुवर भाव विभोर हुए।
 इस घटना के बाद गुरू अब, नेह और भी बढ़ा दिए। जेठा को हर तरह परखकर, तख्त गुरू ने थमा दिया। पैसे
पाँच नारियल देकर, इस धरती से कूच किया। रामदास ने कहा गुरू मैं, कहाँ भटकता रहता था ? घुँघनी ले लो, घुँघनी लो, हर वक्त यही मैं रटता था। इस कीड़े को शरण लगाकर, चरणों में आवास दिया। और इसे फिर गले लगाकर, बगल तख्त पर बिठा लिया। एक गुलाम कभी मालिक की, जगह नहीं पा सकता ‌है। किन्तु कृपा मालिक की होती, ऐसा ही तब घटता है।
(४) अमृतसर है नाम इसी‌ का-------
गुरु गद्दी जब मिली गुरू को, कुछ दिन गोइंदवाल रहे। गुरूचक्क में आए गुरु, फिर गर्मी-सर्दी यहीं सहे। गुरु ने निज प्रयास के द्वारा, यहाँ नगर इक बसा दिया। सुविधा देकर इसे गुरू ने, 
रामदास पुर बना दिया। यहीं निकट में एक सरोवर, और गुरू ने खुदवाया। अमृतसर है नाम इसी का, सुन्दर इसको बनवाया। अवसर पाकर स्वयं गुरू ने, डलवा फिर से उठा लिया। स्वयं कार सेवा में लगकर, गौरव इसका बढ़ा दिया। दर्शन करने हेतु दूर से, अमृतसर जो आते हैं। करते हैं स्नान यहाँ सब, रोग दूर हो जाते हैं। गुरु लाहौर नगर में इक, धर्म केन्द्र है बनवाया। गुरु वाणी की रचना करके सिक्ख धर्म को फैलाया।  अमरदास ने बाइस मंजी, जगह-जगह थे नियत किए। राम दास ने और जगह भी, केन्द्र धर्म के बना दिए। सिक्खों की पावन गाथा में, ये मसंद कहलाते थे। जगह-जगह पर खुद गुरु बनकर, अपना तख्त लगाते थे।
(५) गुरु धरती से कूच किए------
रामदास ने सिख-संगत को, यह अद्भुत संदेश दिया। वही संत बन सकता जिसने, अहं भाव का त्याग किया। भला-बुरा जो मिलता जग में, प्रभु प्रसाद
ही मिलता है। वही व्यक्ति है सुखी ‌जगत में, जो यह मर्म समझता है। पञ्च विकारों से यह मानव, चहुँदिशि से है घिरा हुआ। किन्तु सुमिरने वाला प्रभु को, इन सबसे है बचा हुआ। करो कमाई दोनो कर से, सुख कि रोटी पाओगे। स्वस्थ रहोगे भूखों को, जब इसे खिलाकर खाओगे। अर्जुनदेव पुत्र थे
छोटे, गुरुवर गद्दी इन्हें दिए। पैसे पाँच नारियल देकर, गुरु जगती से कूच
 किए।  
(५) पाँचवे गुरू अर्जुनदेव जी महाराज-
श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के प्रथम प्रकाशक, सुखमनि साहिब के रचयिता पाँचवे पातशाह गुरु अर्जुन देव जी महाराज प्रभु के नाम की महिमा का वर्णन करते
हुए कहते हैं कि ऐ मनुृ्ष्य ! इस बात को
अच्छी तरह समझ लो कि जहाँ कहीं
माता,पिता,मित्र तथा भाई सहायता के
लिए नहीं पहुँच सकते, वहाँ प्रभु का नाम तुम्हारी सहायता के लिए पहुँच 
जाता है,जहाँ महा भयानक यम दूत जीवों को कुचलते हैं, वहाँ केवल प्रभु का नाम ही तेरे साथ जाएगा। जहाँ कहीं भी तुझे भारी कठिनाई का सामना करना पड़े, वहाँ भी हरि का नाम एक छण में तुझे बचा लेगा। 
जब मात- पिता सुत मीत न भाई। मन ऊहा नामु तेरै संगि सहाई।
जहा महा भइआन दूत जम दलै। तह केवल नामु संगि तेरै चले। जब मुसकल
 होवै अति भारी। हरि को नामु खिन माहि उघारी। पन्ना -264 (श्री गुरु ग्रन्थ साहिब) श्री गुरु अर्जुनदेव जी महाराज अहंकार के बारे में वर्णन करते हुए कहते हैं कि जिस मनुष्य के अंदर राज का अभिमान हो, वह नरकों में पड़ने वाले कुत्तों के समान है, जो अपने
को बहुत यौवन वाला समझता है, वह
विष्टा का कीड़ा होता है, जो स्वयं को बड़ा भाग्यवान समझता है वह जन्म-मरण के चक्कर में भटकता रहता है। जो धन और भूमि का गर्व करता है,वह मूर्ख है तथा अज्ञानी है।  प्रभु की कृपा से जिसके हृदय में गरीबी बस जाती है, वह इस   संसार से मुक्त होकर आगे सुख पाता है।  " जिस कै अंतरि राज अभिमानु। सो नरकपाती होवतु सुआनु । जो जानै मैं जोबनवंतु सो होवतु बिसटा का जंतु। आपस कउ करमवंतु कहावै। जनमि मरै बहु जोनि भ्रमावै।  न भूमि का जो करैै गुमानु। सो मूरखु अंधा अगिआनु। करि किरपा जिस कै हिरदै गरीबी बसावै।नानक ईहा मुकतु आगे सुख पावै।---पन्ना--278(श्री गुरु ग्रन्थ साहिब) शरीयत,तरीकत,मारफत,हक़ीकत की
भी चर्चा श्री गुरु अर्जुन देव जी महाराज  ने अपनी रचना में की है  जो श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में अंकित है। शरीयत का अर्थ है-- शरा या ज्ञान प्राप्त करना। तरीकत का अर्थ है--इंद्रियों से मन को हटाना और खुदा की ओर मन को मोड़ना। मारफत का अर्थ है --उपासना के द्वारा खुदा से निकटता महसूस करना, इसके लिए अहं भाव  का त्याग करना होता है जिससे परम ज्ञान (ब्रह्म ज्ञान) का अनुभव होता है अर्थात आरिफ होने का एहसास होता है और मन खुदा में‌ लगने लगता है। मारफत की सीढ़ी पर पहुँचने के पहले मुरीद या साधक को (a) तौबा (प्रायश्चित) गलत कामों के लिए करना होता है अर्थात हृदय (कल्ब) को निर्मल करना होता है (b) जहद (जान बूझकर इनकार करना) अर्थात रब पर 
विश्वास न करना। ( c) सब्र (संतोष) (d) शुक्र (कृतज्ञता) (e) रियाज़ (अभ्यास से इंद्रियों को संसार से हटाना) (f) तवक्कुल ( खुदा पर विश्वास ऐसा कि सारा काम  खुदा की मर्जी से  हो रहा है न कि सांसारिक साधनों ‌से अथवा स्वयं के प्रयास से) (g) रज़ा (खुदा की मर्ज़ी पर निर्भर हो‌ जाना अर्थात खुदा से‌ दिव्य प्यार होना) (h) अब्दाला का अर्थ है --अब्दी होना अर्थात् ईश्वर के प्रति दासत्व का भाव ‌होना (4) हक़ीकत--यह साधन नहीं है बल्कि साधक की वह परम स्थिति है, वह परम अनुभूति है जिसकी प्राप्ति शरीयत एवं तरीकत के सम्यक प्रयास से मारफत द्वारा होती है। साधना के सात वादियों की भी चर्चा होती है--(1) तलब या तलाश--साधक
खुदा की तलाश में अथवा खुदा से मिल ने की तलब में भटकता है। (2) इश्क--खुदा से मिलने की तलब इतनी बढ़ जाती है कि पतंगे की तरह खुदा पर मर 
मिटने को तैयार रहता है (3) मारफत--संसार नश्वर है और ईश्वर शाश्वत है 
अर्थात सदा रहने वाला है इस पर यक़ीन होना। (4) इस्तग़ना--संसार से लगाव खत्म हो जाना। (5) तौहीद--सारा जहाँ खुदा में ही है इस पर‌ यक़ीन हो जाना (6) हैरत--अपने होने और न होने का एहसास खत्म हो जाना (7) फना--
खुदी का मिटना और खुदा में मिल जाना।
शरा शरीयत ले कमावहु, तरीकत तर्क
खोजि टोलावहु। मारफत मन मारहु
अबदाला, मिलहु हक़ीकत जतु फिर न
मरा। पन्ना--1083 (श्री गुरु ग्रंथ साहिब)
जीवन परिचय------
गणेश तिवारी 'नैश' अर्थात मेरी लिखी हुयी पुस्तक ' नैश सिक्ख गुरु गाथा' से उद्धृत (लावणी छन्द) में प्रस्तुत--     रामदास गुरु पिता आपके, माता इनकी भानी थीं। अमरदास गुरु नाना इनके, मनसा इनकी नानी थीं। तीन पुत्र गुरु
रामदास के, अर्जुन सबसे छोटे थे। 
पृथीचन्द थे बड़े पुत्र, पर ये स्वभाव से खोटे थे। बाबा महादेव थे माझिल, उदासीन चित रहते थे। लेकिन‌ अर्जुन देव पिता का, ध्यान सदा‌ ही रखते थे। अमरदास गोइंदवाल में, गुरु आज्ञा से आए थे। जन्में यहीं और नाना का, आप परवरिश पांए थे। पत्नी गंगा कौर आपकी, भली और मनभावन थीं। रखती ध्यान सदा ही पति का, हर पल कष्ट नशावन थीं। हरगोविन्द पुत्र इक जन्मा, जिसने माँ का नाम किया। दुष्ट शत्रु से बदला लेकर. कर्ज़ पिता का चुका दिया।
जीवन से जुड़ी रोचक घटनाएँ------
(१) जाकर रस्म निभाओ  तुम----------
भ्रात सहारीमल के सुत की,  शादी होने
वाली थी। रहते थे लाहौर शहर में, खबर गुुरू को आयी थी। रामदास ने बड़े पुत्र को, सबसे पहले बुलवाया। जाने हेतु ब्याह में इनको, सबसे पहले बतलाया।
जाने से जब मना किया, तो महादेव को बुला लिया। और भतीजे की शादी में, जाने का आदेश दिया। महादेव पितु के वचनों पर, नहीं तनिक भी ध्यान दिए।
कहा नहीं मैं जाऊँगा, यह कहकर वे खिसक लिए। अर्जुन को बुलवाकर गुरु ने, कहा तुरत ही जाओ तुम। तेरे भाई की शादी है, जाकर रस्म निभाओ तुम।
(२) पृथीचन्द ने द्वेष किया--
पितु आदेश मानकर अर्जुन, तुरत यहाँ से कूच किए। ताऊ के घर पर ये जाकर, ब्याह रस्म में भाग लिए। जाने हेतु मिली थी अनुमति, इसीलिए वे जा पाए। नहीं वापसी की अनुमति थी, अस्तु नहीं वे आ पाए। पत्र लिखे दो पितु को लेकिन, 
उत्तर इनको मिला नहीं। इम्तिहान था अस्तु गुरू ने, सुत को उत्तर दिया नहीं।
पत्र तीसरा मिला गुरू ने, पढ़कर आँसू
गिरा दिया। बोले सबके सन्मुख सुत ने
इम्तिहान को पास किया। लेने हेतु पुत्र को गुरुवर, बुड्ढा जी को भेज दिए। गद्दी
देने हेतु इन्हीं को, गुरू हृदय में ठान लिए। बाबा बुड्ढा जी अर्जुन को, शीघ्र यहाँ ले आए हैं। पैसे पाँच नारियल देकर
गद्दी इन्हें दिलाए हैं। रामदास जी गद्दी देकर, इस जगती से कूच किए। होनहार
को गुरू बनाकर, जगत कार्य से मुक्त हुए। रामदास के इस निर्णय से, 
पृथीचन्द ने द्वेष किया। और अनुज अर्जुन को इसने, अंत समय तक कष्ट दिया।
यह अर्जुन का भाई था, पर भाव शत्रु का रखता था। अर्जुन मरण हेतु यह
प्रायः, दाँव ढूँढता रहता था।
(३) सत्ता अरु बलवंड का विरोध------सत्ता वा बलवंड रबाबी, गुरुवर के प्रिय सेवक थे। इन पर था अनुराग गुरू का,  स्वर इतने मनमोहक थे। पृथीचन्द ने बहकाया तो,  दोनो भाई बहक गए। और गुरू से क्रोध दिखाकर, गुरुद्वारा को छोड़ दिए। गुरू मनाने गए इन्हें तो, बहुत बुरा व्यवहार किया। उलटी बात
सुनाकर दोनों, वापस गुरु को भेज दिया। गुरु से बोले मरदाना जी, हम दोनो के दादा थे। बना दिया नानक को नानक, वह मेरे ही बाबा थे। कौन जानता था नानक को, परिचय दादा से पाए। मरदाना ने उन्हें घुमाया, तभी गुरू वे कहलाए। वापस आकर कहा गुरू ने,
किरतन अपने आप करो। वे दोनो ही बहक गए हैं, सुमिरन अपने आप करो।
कुछ दिन बीते दोनो आकर, गुरु से माफी माँग लिए। गुरु ने क्षमा किया तब दोनो, फिर से किरतन शुरू किए।
(४) हरमिन्दर साहिब का निर्माण---
कष्टभंजनी बेरी वाले, सर को पूरा खुदवाया। रामदास अमृतसर कहकर, पक्का इसको करवाया। एक वहीं संतोष सरोवर, अर्जुन गुरु ने खुदवाया।
स्वच्छ रहे जल इसका सदैव, चहुँदिशि ईंटा लगवाया। रामदास सरि के अन्दर ही, जगह एक गुरु ने परखी। और यहीं पर हरिमंदिर‌ की, गुरु अर्जुन ने नींव रखी। एक बार सिक्खों से मिलने, गुरु जी खारे गाँव गए। रखकर नाम तरनतारन इक, सरि खुदवाना शुरू किए। ईंट लगाने हेतु गुरू ने, ईंटा भट्ठा
लगा दिया। हाकिम अमरदीन ने लेकिन, ईंट गुरू का हड़प लिया। काम अधूरा यहाँ छोड़कर, गुरू खानपुर आए हैं। भाई हेमा के घर रुककर, इक दिन समय बिताए हैं। चले खानपुर से अब गुरुवर, मैनी में विश्राम लिए। इक वृद्धा घर रुककर गुरुवर, चूरा खाकर तृप्त हुए।‌ चोल्हा नाम गाँव का रखकर, नाना के घर आए हैं। मोहन मामा के घर रुककर, कुछ दिन यहाँ बिताए हैं। मिले मोहरी मामा से भी, और यहाँ से कूच किए। डल्ले गाँव पहुँचकर गुरुवर, एक शिष्य घर ठहर गए। जालंधर का हाकिम आया, और गुरू को नमन किया। चलने हेतु साथ में अपने, विनय भाव में कथन किया। मान लिया जब कथन गुरू ने, साथ गुरू के आया है। गुरु के रहने हेतु यहाँ पर, भवन एक बनवाया है। नगर एक बस गया यहाँ पर, करतापुर यह कहलाया। मातु नाम पर यहाँ गुरू ने, गंग कुआँ इक खुदवाया। पहुँचे गुरुलाहौर नगर में, कुआँ यहाँ भी खुदवाए। डिब्बीहाट नगर में गुरुवर, धर्मकेन्द्र इक बनवाए। बाबा श्री चन्द से मिलने, गुरुवर बारठ गाँव गए। कुछ दिन रुककर यहाँ गुरू जी, अमृतसर को कूच किए। अमृतसर में पहुँचे गुरुवर, मंदिर रचना शुरू हुयी। लेकिन भाई पृथीचन्द के, लिए बात थी अशुभ नयी। पृथीचन्द ने खबर भेजकर, सुल्ही खाँ को बुलवाया। दस हज़ार की फौज लिए वह, अमृतसर पर चढ़ आया। पृथीचन्द के निज निवास पर, सुल्ही खाँ जब आया था। कहते हैं भट्ठे में गिरकर, उसने प्राण गँवाया था। सुल्ही खाँ के मर जाने पर, फौज यहाँ से लौट गयी। पुनः कभी भी अमृतसर में, ऐसी घटना नहीं हुयी। सुल्ही खाँ की आमद सुनकर, गुरू बडाली चले गए। यहीं रुके दो वर्ष गुरू, फिर अमृतसर को कूच किए। यहीं आपके वीर पुत्र ने, आकर घर मे जन्म लिया। एक छः रहटा कुआँ याद में, गुरुवर ने निर्माण किया। कहा गुरू ने पुत्र प्राप्ति के, हेतु यहाँ जो आएगा। मनोकामना पूरी होगी, सुन्दर सुत वह‌ पाएगा। गुरू बडाली से चलकर फिर, अमृतसर में आए हैं। हरमंदिर निर्माण कार्य में, पूरा समय लगाए हैं।
(५) गुरु ग्रन्थ साहिब का पहला प्रकाश-
मंदिर बनकर पूर्ण हुआ, तब बुड्ढा जी ने प्रश्न किया। मूर्ति यहाँ पर‌‌ किसकी होगी, किसके सम्मुख जले दिया। गुरु बोले निर्गुण अकाल पर, ध्यान सदा हम करते हैं। वही एक है ईश हमारा, निशि दिन उसको भजते हैं। गुरु वाणी को रखकर इसमें, प्राण प्रतिष्ठा की जाए। अस्तु संकलन हेतु इसे, अब शीघ्र व्यवस्था की जाए। सब सिक्खों के पास तुरत यह, हुक्म हमारा भिजवाएँ। गुरु वाणी हो पास अगर, तो अमृतसर वह ले आएँ।
भाई बख्ता गुजरा वाले, पोथी लेकर आए हैं। चारो गुरु की वाणी इसमें, लिखवा करके लाए हैं। अमरदास ने दो
गुरुओं की, वाणी खुद लिखवायी थी।
और स्वयं की वाणी इसमें, शामिल तभी
करायी थी। नानक जी भक्तों की वाणी,
जो एकत्र कराये थे। उसको आप पौत्र से अपने, अलग-अलग लिखवाए थे।
नंगे पैर स्वयं गुरु जाकर, इसे पालकी में लाए। बाजा-गाजा लिए साथ में, प्रेम पूर्वक ले आए। रामदास सर के अन्दर ही, तम्बू इक है लगवाया। आप सहित सब गुरु की वाणी, रागवार है करवाया।
पंद्रह भक्त चार गुरु सेवक, ग्यारह भट्टों की वाणी। गुरु बोले यह पोथी साहिब, 
इसमें गुरुओं की वाणी। बाबा बुड्ढा ग्रन्थी बनकर, सिर पर इसे उठाए हैं। पीछे-पीछे चलकर गुरुवर, इस पर चवँर डुलाए हैं। मियाँ मीर के हाथों पोथी, गद्दी पर आसीन किया। इस प्रकार से गुरू ग्रन्थ का, गुरु ने प्रथम प्रकाश किया।
(६) शाह दासपुर आए हैं------
 कुछ मुस्लिम कुछ ब्राह्मण मिलकर, गुरु अर्जुन पर रोष किए। अकबर बादशाह से जाकर, चुगली गुरु की पेश किए।
पण्डित बोले मानवता का, पक्ष गुरू ने
नहीं लिया। मुल्ला बोले नूरे रब की, निन्दा करके बुरा किया। बादशाह ने कहा स्वयं हम, इस प्रकरण को देखेंगे।
गलत किया है अगर गुरू ने, दण्ड उन्हें हम खुद देंगे। दिल्ली से लाहौर सफर में,
शाह दासपुर आए हैं। अवलोकन के लिए गुरू से, पोथी वहीं मँगाए हैं। बुड्ढा अरु गुरुदास साथ में, पोथी लेकर गमन किए। और शाह के सन्मुख आकर, अगले दिन ही पेश हुए। अकबर बोले गुरू ग्रन्थ का, यूँ ही पन्ना खोलो तुम। क्या है लिखा मुझे समझाकर, बिना झिझक के बोलो तुम। पृष्ठ सात सौ तेईस सन्मुख, बुड्ढा जी ने खोल लिया।
जो भी लिखा हुआ था इसमें, पढ़कर शह को सुना दिया। लिखा हुआ‌ क्या   इसमें शह ने, एक पृष्ठ से परख लिया।
बख्शिश में सोने की मुहरें, देकर इनको
विदा किया। कहा गुरू से कह देना, हम
अमृतसर खुद आएँगे। कुछ पल रुककर
गुरुवर के संग, अपना समय बिताएँगे।
जाने लगे शाह जब दिल्ली, अमृतसर में आए हैं। यहाँ साथ में लंगर छककर,  बहुत अधिक सुख पाए हैं। कहा शाह ने
लंगर के हित, कुछ धन हम दे देते हैं।
इसके बदले मिलने वाला, पुण्य‌ लिए हम लेते ‌हैं। गुरु बोले इस वर्षा ऋतु में,
तनिक नहीं बरसात हुयी। बहुत दुखी है प्रजा आपकी, कई भूख से जान गयी।
यह मेरा अनुरोध आपसे, जनता का कर माफ करें। पुण्य मिलेगा बहुत आपको, यह जनता का कष्ट हरें। अकबर बोला
माफ किया, कर नहीं वसूले जाएँगे। इतना कहकर चला वहाँ से, बोला हम फिर आएँगे।
(७) चन्दू था ईर्ष्यालु बहुत-----
अकबर था आगरा शहर में, मौत यहीं वह पाया‌ है। नाखुश था यह सुत सलीम से, अस्तु नहीं वह आया है। सुत सलीम‌ था शहंशाह का, वह दिल्ली में रहता था।
खुसरो पौत्र साथ में रहकर, शह‌ ‌की सेवा करता था। गद्दी खुसरो को दी जाए, अकबर यही चाहता था। अच्छा
राज चलाएगा यह, अकबर यही मानता था। सुत सलीम ने दिल्ली में ही, खुद को  शाह बनाया है। और बदलकर नाम स्वयं का, जहाँगीर रखवाया है। सेना लेकर जहाँगीर ने, तुरत आगरा कूच किया। और निकट लाहौर घेरकर, सुत खुसरो को  मार दिया। खुसरो ने जब सुना पिता खुद,  हत्या का संकल्प किए। वह काबुल की ओर भगा, कुछ सैनिक अपने साथ लिए। गुरु अर्जुन से मिलने खुसरो, अमृतसर भी आया था।
और मार्ग के लिए गुरू से, राशन भी वह लाया था। चन्दू था ईर्ष्यालु बहुत, था सूबे का दीवान यहाँ। गुरु की निन्दा करने से ही, पाता था सम्मान यहाँ। फिर भी आया सुता हेतु वह,‌ गुरु सुत का
प्रस्ताव लिए। चुगलखोर था इसीलिए, गुरु इस रिश्ते को मना किए। अच्छा मौका पाकर इसने, गुरु से बदला आज लिया। जहाँगीर से चुगली करके, प्राणदण्ड है दिला दिया। जहाँगीर लाहौर किले में, रुककर यह आदेश किए। गुरु ने दिया सहारा सुत को, प्राणदण्ड इसलिए दिए। बुलवाकर लाहौर किले में, गुरु को बन्दी बना लिया। इन्हें मुर्तजा खाँ सूबे ने, चन्दू को
ही सौंप दिया। चन्दू ने अब गुरु अर्जुन पर, तेल उबलता डाला है। भूखा- प्यासा रखकर इनको, जल में खूब उबाला है।
छलनी-छलनी किया देह को, रोम-रोम खूँ रिसता था। फिर भी गुरु थे शान्त भाव में, मुख पर ओज झलकता
था। पूरा नंगा करके गुरु पर, गर्म रेत है
डाल दिया। गर्म तवे पर वहीं बिठाकर, गुरु का काम तमाम किया।
(६) नवे गुरु तेगबहादुरजी महाराज:--  -धार्मिक स्वतंत्रता और मानवीय अधि-‌ कारों  की रक्षा के लिए अपना शीश कटाने वाले नवे पातशाह  गुरु तेग बहादुर जी  महाराज ने अपने घोर चिन्तन, देशव्यापी पर्यटन तथा नाम साधना से जीवन में जो कुछ अनुभव किया उसी की अभिव्यक्ति अपनी वाणी में की है। वैराग्य और त्याग के संदर्भ में आपने कहा है----
जग रचना सभ झूठ है,जानि लेहु रे मीत
कह नानकथिरु न रहै,जिउबालू कीभीति
---पन्ना--1429 (श्री गुरु ग्रन्थ साहिब)
संसार से विरक्ति और ईश्वर से अनुराग
रखने पर ही मुक्ति संभव है---
हरखु  सोगु जाकै नहीं बैरी मीत समान।
कहुनानकसुन रे मनामुकुतिताहितैजानि
--पन्ना--1427 ( श्री गुरु ग्रन्थ साहिब)
चाहे राम हों या रावण हों, मृत्यु के 
भयानक और प्रलयंकारी हाथों से न बच सके-
राम गइयोरावनगइयो,जाकउबहु परुवारु।कहु नानक थिरु कछु नहीं, सुपने जिउ संसारु।
---पन्ना-1429 (श्री गुरु ग्रन्थ साहिब)
जीवन परिचय:---
गणेश तिवारी 'नैश' की लिखी हुयी पुस्तक 'नैश सिक्ख गुरु गाथा' से उद्धृत
(लावणी) छन्द में प्रस्तुत--
तेगबहादुर नाम गुरू का, हरिगोविन्द
पिता गुरु के। सन् इक्कीस नानकी माँ घर, अमृतसर में थे प्रकटे। गुरुदत्ता के अनुज गुरू जी, हरीकृष्ण के बाबा थे।
रहते गाँव बकाला में, गुरु हरीराय के चाचा थे। लालचन्द की पुत्री गुजरी, से
गुरुवर ने ब्याह किया। दसवें गुरु गोविन्दराय ने, इनके घर में जन्म लिया।
तीस मार्च सन् चौसठ में, गुरु हरीकृष्ण ने तख्त दिया। बीस मार्च पैसठ में गुरु को, मक्खन ने फिर ढूँढ लिया।
जीवन से जुड़ी रोचक घटनाएँ---
(१) संगत इक उम्मीद लिए जब, गाँव बकाला आती थी। बाबे कई देखकर संगत, मन ही मन पछताती थी। करतापुर में गुरुदत्ता सुत, चतुर धीरमल रहता था। हरीकृष्ण का सच्चा वारिस, सबसे खुद को कहता था।  वही धीरमल था यह जिसने, गुरुदत्ता का रोध किया। जालंधर के सूबा को, निज माफी नामा भेज दिया। बाहर से जो आती संगत, निकट बुला वह लेता था। कार भेंट वह ले लेता हर, साक्ष्य गुरू का देता था। कौल पुत्र  हरमिन्दर में ही, हर जी तख्त लगाए थे। पृथीचन्द के पोता थे,  ये अपनी धाक जमाए थे। सौदागर था, नाम सिक्ख का, मक्खन शाह लुबाणा था। सौदा लाने हेतु देश से, बाहर आना-जाना था। एक बार उसकी जहाज के, 
इंजन में जब आग लगी। अभी दूर थी
मञ्ज़िल उसकी, पर नौका थी डूब रही।
इस जहाज को पार करो, वह बोला शीश झुकाएँगे। मुहर पाँच सौ गुरु चरणों में, आकर शीघ्र चढ़ाएँगे। गुरु की कृपा हुयी इंजन की, आग ‌तुरत ही शान्त हुयी। डूब रही थी यह जहाज, पर गुरू कृपा से निकल गयी। लेकर मुहर
पाँच सौ मक्खन, गाँव बकाला आया था। अर्पित करे किसे ये मुहरें, नहीं समझ वह पाया था। एक यहाँ, दो वहाँ गद्दियाँ, बाइस चहुँदिशि सजी हुयीं। हर गद्दी का नाम स्वयं का, असल नाम पर रखी हुयीं। हर गद्दी पर आकर उसने दो- दो मुहरें, चढ़ा दिए। तेगबहादुर के दर पर भी, दो मुहरें ही पेश किए। तेगबहादुर बोले उससे, तुमने रुपया छिपा लिया। वचन पाँच सौ देने का था, फिर क्यों दो ही पेश किया। जब जहाज में आग लगी, तब तुमने मुझे बुलाया था। तेरी नौका डूब रही थी, मैने काँध लगाया था। देखो मेरा दायाँ कन्धा, पूर्ण रूप से जला हुआ। इंजन आग बुझाने में, तुम देखो छाला पड़ा हुआ।
मक्खन शाह देखकर छाले, अन्दर से अभिभूत हुए। और गुरू के श्री  चरणों में, अपना माथा टिका दिए। लाधो रे, गुरु लाधो रे यह, कह वे कोठे पर आए। कहा गुरू को हमने खोजा, इन्हें ढूँढकर हम लाए। मक्खन ने सब मुहरें देकर, अपने सिर को झुका दिया। संगतियों को वहीं बुलाकर, भेद गुरू का बता दिया। संगत जितनी आती थीं, सब सीधे गुरु तक जाती थीं। लोग बुलाते थे लेकिन वे नहीं वहाँ तक जाती थीं। लिया धीरमल ने गुण्डों को, गुरू तख्त पर पहुँच गया। अपमानित कर गुरु को उसने, कार भेंट सब उठा लिया। शीहा इक मसंद था जिसने, वार गुरू पर किया वहीं। जदपि निशाना सीधा था, पर गोली गुरु को लगी नहीं। 
(२) अपनो से मन दुखी बहुत था--
अपनो से मन दुखी बहुत था, दूर कहीं अब जाना था। इन लोगों के मध्य गुरू का, बिल्कुल नहीं ठिकाना था। मातु नानकी से बोले गुरु, चलो दूर हम चलते हैं। द्वेष-जलन से दूर कहीं, हम तीरथ यात्रा करते हैं। मातु नानकी, पत्नी गुजरी, गुरु ने सेवक पाँच लिए। साले थे किरपाल चन्द जी, आनंदपुर से गमन किए। संगतियों के घर पर रुककर, गुरुवर समय बिताते थे। अच्छी राह दिखाकर उनको, आगे गुरु बढ़ जाते थे।
मथुरा और आगरा होकर, गुरु प्रयाग में पहुँच गए। षष्ठ मास गुरु रुके यहाँ पर, फिर काशी को गमन किए। इक दिन काशी में गुरु रुककर, शहर गया में आए हैं। और यहाँ से चलकर गुरुवर,  पटना में फिर आए हैं। एक सिक्ख जैता ने गुरु को, आलमगंज में ठहराया। सुन्दर यहाँ हवेली इसकी, जिसमें गुरु को पहुँचाया।
ढाका की सब संगत मिलकर, गुरुवर को स्मरण किए। मातु नानकी के कहने पर, 
गुरु ढाका का मार्ग लिए। गुरुवर थे जब
ढाका में, तब एक पुत्र ने जन्म लिया।
पाँच वर्ष के बाद लौटकर, गुरु ने सुत का  दरश किया। कुछ दिन पटना में रहकर गुरु, आनँदपुर की ओर चले।
आकर फिर लखनौर गाँव में, जेठा जी से गुरू मिले। चले गुरू लखनौर गाँव से, कीरतपुर में आए है। देखा-भाला, मिले-जुले फिर आनँदपुर में आए हैं। देखा वातावरण गुरू ने,  बुला लिया परिवार वहीं। गुरु ने सोचा ठीक तरह से, पोषण सुत का हुआ नहीं। रहने लगे यहीं पर गुरुवर, नित दीवान सजाते थे। संगत आने लगी यहीं पर, कार-भेंट दे जाते थे।
लगभग ढाई वर्ष शान्ति से, आनंदपुर में गुरू रहे। गुरु गद्दी के बाद अभी तक, गर्मी सर्दी बहुत सहे।
(३) हिन्दू मारा जाएगा--
एक दिवस कश्मीरी पंडित, गुरु से मिलने आए हैं। त्राहि माम गुरु त्राहि माम, यह कहकर शीश झुकाए हैं।
औरंगजेब क्रूर निज पितु को, सख्त क़ैद
में डाल‌ दिया। भ्राताओं की हत्या कर दी, तनिक नहीं संकोच किया। इसका है
फरमान मुल्क का, हिन्दू मारा जाएगा।
ग्रहण करे इस्लाम तभी यह, हिन्दू अब
बच जाएगा। हुक्म दिया इसने सूबों को,
हिन्दू का बध करना है। मुस्लिम जो बन
जाए, उसको इस धरती पर रहना है।
काश्मीर का सूबा हमसे, बोला मारे‌ जाओगे। बने नहीं यदि मुस्लिम, अपना
निश्चित प्राण गँवाओगे। हुक्म सुना जब मैने इसका, अमरनाथ की शरण गए।
यज्ञ होमवर्नी हम करके, भगवन् शिव का ध्यान किए। भगवन शिव का मिला
इशारा, इसीलिए हम आए हैं। यह कलि
की अवतारी गद्दी, इससे आस लगाए हैं।
पंडित कृपादत्त जी बोले, गुरुवर आप बचा सकते। इफ्तिखार खाँ सूबा उससे, 
राहत आप दिला सकते। एक धर्म इस्लाम रहेगा, इफ्तिखार खाँ कहता है।
नहीं बनोगे मुस्लिम फिर तो, कत्ल कभी हो सकता है। गुरू पुत्र गोविन्द खड़े थे, नहीं समझ ये पाए हैं। पूछा गुरु से क्या
कहते हैं ? किस कारण ये आए हैं ? कहा गुरू ने काश्मीर से, ये पंडित गण आए हैं। इफ्तिखार खाँ के ज़ुल्मो का, 
 समाचार ‌ये लाए हैं। इफ्तिखार खाँ कहता हिन्दू, नहीं यहाँ रह पाएगा। हिन्दू
मुस्लिम बना नहीं तो, निश्चित मारा जाएगा। एक धर्म इस्लाम रहेगा, अन्य धर्म मिट जाएँगे। अन्य धर्म के लोग यहाँ पर, अपना प्राण गवाँएँगे। यह शाही फरमान हुआ है, वही यहाँ रह पाएगा। 
अपना धर्म छोड़कर तत्क्षण, जो मुस्लिम
बन जाएगा। सुत गोविंद राय ने पूछा, ईश धर्म है क्या कहता ? हिन्दू धर्म बचेगा कैसे ? कैसे हिन्दू बच सकता ?
गुरु बोले है ईश एक, फिर हम सब उसकी सन्ताने। सत्यमार्ग है एक, उसे हम माने अथवा ना माने। हम हिन्दू हैं हमें गर्व है, ध्येय एक हम लिए हुए। इसी
ध्येय से जीते हैं हम, ईश्वर का वरदान लिए। हिन्दू धर्म तभी बच सकता, हिन्दू जन बलिदान करें। महापुरुष जन आगे आएँ, और शीश का दान करें। गुरु सुत बोले नहीं  जगत में, आप सरीखा महापुरुष। दे दे जो बलिदान शीश का, आप सरीखा बड़ा पुरुष। रक्षा इनकी करनी है , ये शरण आपके आए हैं। दान शीश का देना है, यह अनुमति शिव का लाए हैं। सुत केवल था नवम् साल में,
गुरु ने इसका कथन सुना। सोचा यह तो समझदार है, लगता मुझसे कई गुना।
तख्त सम्हालेगा यह बालक, मुझको चिन्ता नहीं रही। घर से भी मैं मुक्त हुआ अब, जो होगा बस वही सही। कहा पंडितों से गुरुवर ने, जाकर सूबा से कहना। हम सब मुस्लिम बन जाएँगे, पहले गुरु को है बनना। यही वचन विप्रों ने आकर, सूबा से बतलाया है। सूबा ने यह शह को लिखकर, समाचार पहुँचाया है।
(4) गुरु को दिल्ली बुला लिया---
सूबा का खत मिला शाह को, गुरु को दिल्ली बुला लिया। सोचा ‌सूबा काश्मीर ने,  काम हमारा सरल‌ किया। यह अद्भुत‌ है मुल्क यहाँ पर, बहुत शिष्य गुरु‌ रखते हैं। जैसा‌ करता‌ गुरू उसी का, शिष्य 
अनुसरण करते हैं। गुरु आएगा दिल्ली उसको, मुस्लिम तुरत बना लेंगे। गुरु के कहने पर शिष्यों को, कल्मा शीघ्र पढ़ा
देंगे। समाचार जब मिला शाह का, गुरु दिल्ली को कूच किए। छोड़ दिए परिवार यहीं पर, पाँच सिक्ख को साथ लिए।
मिला हुआ था हुक्म शाह का, गुरु‌ को कै़द किया‌ जाए। और शीघ्र ही लेकर इनको, दिल्ली कूच किया जाए। निकट आगरा एक शिष्य जब,  गुरुवर से मिलने आया। आनँदपुर है जाना तुमको, गुरु ने इसको समझाया। पैसे पाँच नारियल देकर, गुरू सिक्ख को भेज दिए। अपने सुत‌ को गद्दी देकर, गुरु गद्दी से मुक्त हुए। गुरु के साथ‌ ‌दियाला को भी, रक्षक दल ने कै़द किया। सतीदास अरु मती दास ने गुरू प्रवर का साथ दिया। ऊदा-जैता किन्तु वहाँ‌ से, गुरु आज्ञा से खिसक लिए। छुपते और छुपाते खुद को, ये भी दिल्ली पहुँच गए।
उन तीनो के साथ गुरू को, रक्षक दिल्ली
ले आए। तहखाने में डाल दिया, वे नहीं तनिक भी सकुचाए। 
(५) नहीं बनेंगे मुसलमान हम-----
गुरू मुसलमाँ बन जाएँ, इस हेतु शाह बहु यत्न किए। बहुत यातना दी गुरुवर को, और बहुत से लोभ दिए। चमत्कार दिखलाना होगा, अथवा मुस्लिम बनना‌ है । वर्ना बध होगा शह बोले, एक इसी में चुनना है। कहा गुरू ने चमत्कार हम, नहीं कभी दिखला सकते। नहीं बनेंगे मुसलमान हम, निश्चित प्राण गवाँ सकते। 
(६) मती‌दास को आरा से चीरा गया-- -
गुरु को लोहे के पिंजरे में, तुरत शाह ने डाल दिया। गुरू बहुत अभिमानी कहकर, भोजन-पानी बन्द किया। तीन दिनो के बाद शाह ने, इन पिंजरों  को मँगवाया। मतीदास को दो खम्भों में, गुरु के सम्मुख बँधवाया। जल्लादों ने आरा लेकर, मतीदास को फाड़ दिया। देख रहे थे गुरू दृश्य यह, जब उनके दो खण्ड किया। गुरु ने भाई मतीदास को, शीश झुकाकर विदा किया। खुद अडोल थे, भाव शून्य थे, आँसू आने नहीं दिया।
(७) दियाला को उबलते जल में डाला---
सिक्ख दियाला के ऊपर, ये बहुत तरह से ज़ुल्म‌ किए। और उबलते जल में इनको डुबो-डुबो कर प्राण लिए। सिक्ख दियाला को गुरुवर ने, शीश झुकाकर नमन किया। श्रद्धा सुमन चढ़ाकर दिल से, माफी इनसे माँग लिया। 
(८) सतीदास को रुई में लपेटकर आग लगायी----
सतीदास को लाए सन्मुख, तन में रुई लपेट दिए। और तुरत ही आग लगाकर
सतीदास के प्राण लिए। गुरु ने सोचा सतीदास भी, हम से पहले चला गया ।
धन्य इसे है इस प्रयाण में, इसने बाजी मार लिया। 
(९) गुरु के टुकड़े चार किया:---
काजी ने फिर कहा गुरू से, बोलो अब क्या कहते हो ? प्राण गवाँओगे तुम अपना अथवा मुस्लिम बनते हो। गुरु बोले यह ज़ुल्म ‌तुम्हारा, तुम्हें एक दिन खाएगा। तू भी नहीं रहेगा उस दिन, शाह नहीं बच जाएगा। नहीं मुसलमाँ बन सकते हम, हिन्दू में हैं  जन्म लिए। युग- युग तक ये रहे क़ौम, इसलिए सिक्ख ये प्राण दिए। काजी बोला शीश गुरू का, पृथक वदन से करना है। शह का है आदेश गुरू को, नहीं और अब रहना है। दिल्ली के चाँदनी चौक में, गुरु पिंजरे को लाए ‌हैं। बहुत भीड़ थी सबके सन्मुख, गुरु को वहीं घुमाए हैं। काजी बोला जल्लादों से, धड़ से शीश उतारो तुम। धड़ के तीन भाग फिर फौरन, अलग-अलग कर डालो तुम। अजमेरी, लाहौरी, दिल्ली तीन गेट पर ले जाओ। शीश भाग कश्मीर गेट पर , ले जाकर तुम टँगवाओ। गुरु के टुकड़े चार देखकर, हिन्दू सब डर जाएगा। बन जाएगा मुस्लिम हिन्दू, एक नहीं बच पाएगा। तुरत जलालुद्दीन म्यान से, अपनी खड्ग निकाली है। एक बार में अलग किया सिर, गुरु ने राहत पा ली है। 
(१०) ऊदा, जैता और लक्खी का साहस---
इसी भीड़ में घुसकर जैता, शीश गुरू का उठा लिए। इसे छिपाकर कुर्ता में वे, तुरत वहाँ से गमन किए। ऊदा भी थे छिपे वहाँ पर, धड़ पर नज़र टिकाए थे। कैसे धड़ को ले जाएँगे ? नहीं सोच वे पाए थे। लक्खी पहुँचा गाड़ी लेकर, बड़े बैल थे जुते हुए। ऊदा तत्क्षण धड़ को लेकर, इस गाड़ी पर बैठ लिए। धूल भरी
इक आँधी आयी, नहीं किसी ने ध्यान दिया। लक्खी था गुरु प्रेमी इसने, झटपट गाड़ी भगा लिया। कूट भरा था गाड़ी में, धड़ इसके नीचे छिपा दिए। ऊदा भी था साथ वहीं पर, गोदी में धड़ लिए हुए। लक्खी पहुँचा जब अपने घर,
 ऊदा ने धड़ उठा लिया। लक्खी ने गुरु धड़ को अन्दर, पूजा घर में रखा दिया।
लक्खी ने अब अपने घर में, फौरन आग लगायी है। शोर किया, लुट गए हाय फिर, बोला शामत आयी है।
(११) जैता-ऊदा आनन्दपुर में---
रक्षक दल के साथ-साथ इक, कोतवाल था साथ वहीं। गुरु का सिर- धड़ ढूँढा लेकिन, कहीं वहाँ पर‌ मिला नहीं। कोतवाल ने कहा उस समय, गाड़ी तो इक आयी थी। धूल भरी आँधी के कारण, नहीं यहाँ रुक पायी थी। उस गाड़ी को देखो फिर भी, कहाँ तुरत यह चली गयी। नहीं दिखायी देती कैसे,  तुरत यहाँ से लुप्त हुयी ? तुरत 
रकाबगंज ये पहुँचे, लक्खी का घर जलता था। हाय-हाय लुट गया हाय, यह शोर सुनायी पड़ता था। रक्षक दल ने देखा भाला, बिन पूछे कुछ चले गए। नहीं हुआ सन्देह तनिक भी, अस्तु यहाँ से खिसक लिए। जैता जी जब कीरतपुर से, आनंदपुर की ओर चले। धड़ का अंतिम कारज करके, ऊदा इनसे यहीं मिले। शीश छुपाए जैता- ऊदा, आनंदपुर पुर में आए हैं। इसे गुरू को अर्पित करके,  खुद का कर्ज़ चुकाए हैं। गुरु गोविन्द राय जी सिर को, सजल नेत्र से नमन किए। रहा काम जो शेष पिता का, करने का संकल्प लिए।
 -------चार गुरु सेवकों की वाणी-----
(१) भाई मरदाना जी--
जीवन परिचय--मरदाना जी का जन्म  राय भोईं के तलवंडी के चौभड़ में हुआ था। आपके पिता का‌ नाम मीर बादरे तथा माता का नाम माखो था। आप 
 मुस्लिम के मिरासी बिरादरी से थे। आप अपनी माता-पिता की सातवीं‌ सन्तान थे। इसके पहले की छः सन्ताने 
मर चुकी थीं। इसलिए आपका नाम
आपके माता- पिता ने मरजाणा       (मर जाना) रखा अर्थात् मर जाने वाला। नानक ने आपका नाम मरदाना
रख दिया। उम्र में नानक से आप दस साल बड़े थे। आप दोनो पड़ोसी थे। आप दोनो की मित्रता बचपन में हुयी और अन्तिम साँस तक निभी। आप उच्च कोटि के संगीतकार थे और गुरु नानकदेव के प्रचारक भी थे। आपने
गुरु नानक देव जी के साथ में चालीस हज़ार किलोमीटर की यात्रा पैदल तय की। गुरु नानक देव जी महाराज में जब वाणी उदित होती थी तो आपसे कहते थे--मरदानियाँ ! रबाब उठा ! वाणी आयी है। और आप नानक जी की वाणी को राग बद्ध करते थे। आपने गुरुनानक देव जी महाराज की वाणी को उन्नीस रागों में बाँधा है। चौथी उदासी के समय जब नानक अफगानिस्तान के एक नदी कुरम के निकट पहुँचे तब आपकी तबियत बिगड़ी। आपने गुरू जी से कहा, लगता है मेरा अंतिम समय आने वाला है। नानक देव जी ने कहा, मरदाना ! यह तो बता कर जाना कि तुम्हारे न रहने के बाद तुम्हारी देह को ब्राह्मण की तरह पानी में फेंक दूँगा, खत्रिय (क्षत्रिय) की तरह आग नें जला दूँगा, वैश्य की तरह हवा में उड़ा दूँगा अथवा मुस्लिम की तरह धरती में गाड़ दूँगा। आपने जवाब में कहा, वाह गुरू ! अभी भी आप शरीरों के चक्कर में हमें डाल रहे हैं। नानक जी ने फिर पूछा,  अच्छा यह बताओ ! आपकी समाधि बनवा दूँगा ? आपने जवाब दिया, मित्र ! यह‌ क्या पूछ रहे हो ? किसी ‌तरह मैं इस शरीर रूपी समाधि को छोड़ रहा हूँ। आप पत्थरों की समाधि में मुझे कै़द कर
देना चाहते हैं ? अच्छा ! अब आप मुझे जाने की इज़ाज़त दें। इतना कह कर आपने इस दुनिया  को छोड़ दिया। गुरु नानक देव जी ने अपने हाथ से आपको सुपुर्दे खाक किया। आज भी पाकिस्तान में आपकी समाधि बनी हुयी है।
भाई मरदाना की वाणी---
आपकी वाणी गुरु ग्रन्थ साहिब के पन्ना--५५३ पर अंकित है। जिसका भाव है-- कलियुगी स्वभाव शराब निकालने वाली भट्ठी की तरह है। काम शराब है। इसको पीने वाला मनुष्य का मन है। क्रोध की कटोरी मोह से भरी हुयी है। अहंकार शराब पिलाने वाला है। झुठ की मजलिस है। जिसमें बैठकर मन काम की शराब को पी-पी कर मस्त हो रहा है। " कलिकल वाली काम मदु, मनुआ पीवणहारु। क्रोध कटोरी मोहि भरी, पीलावा अहंकारु। मजलस कूड़े लव की पी पी होइ खुआरु।
 (२&३)--भाई सत्ता और भाई बलबंड--
भाई सत्ता और भाई बलबंड दोनो भाई थे, और जाति के मुस्लिम थे। आप मरदाना जी के पौत्र थे। 
भाई सत्ता और भाई बलबंड की वाणी-
 गुरु अंगद देव जी महराज खडूर के कुछ किसानो के कहने पर खडूर साहिब से बाहर से चले गए थे, जिससे वहाँ बैठा हुआ योगी वर्षा करवा दे। वह गुरु साहिब से ईर्ष्या करता था। वर्षा नहीं हुयी। तब गुरु अमरदास जी ने किसानों को समझाया, गाँव वाले शर्मिन्दा हुए और आदर के साथ गुरु जी को खडूर साहिब वापस ले आए। इस प्रकरण को भाई सत्ता जी और भाई बलबंड जी ने बहुत सुन्दर ढंग से वर्णन किया है जो श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के पन्ना--९६७ परअंकित है। फेरि वसाइ आफेरु,आणि सतिगुरि खाडूरु। नवनिधि नामु निधानु है, तुधु बिचि भरपूरु।
(४) भाई सुन्दर जी -----
भाई सुन्दर जी गुरू अमर दास‌जी महाराज के पुत्र मोहरी के भाई अनन्द जी के पुत्र थे।  
भाई सुन्दर जी की वाणी-----
 भाई सुन्दर जी कहते हैं कि गुरु 
अमरदास जी महाराज ने संगत को उपदेश दिया कि उनके इस संसार से जाने के बाद रोना नहीं, पंडित केशव गोपाल से हरि की कथा सुनना। भाई सुन्दर जी की यह वाणी श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के पन्ना -९६७ पर अंकित है।
अंते सतिगुरु बोलिआ,  मैं पिछे किरतनु-
करिअहु निरबाणु जीउ। कैसो गोपाल
पंडित सदिअहु  हरि कथा पढ़हि 
पुराणु जीउ।
पन्द्रह भक्तों की वाणी------------
(१) भक्त सूरदास------
 सूर सागर, सूर सारावली, साहित्य लहरी, नल दयमंती, ब्यालो आदि पुस्तकों के रचयिता, भक्तिकाल कृष्ण शाखा के श्रेष्ठ कवि, हिन्दी साहित्य के सूर्य,भक्त सूरदास जी के बारे में किसी कवि ने कहा
है--साहित्य लहरी, सूर सागर सूर की
सारावली। श्री कृष्ण की बाल छवि पर
लेखनी अनुपम चली। श्री गुरुग्रन्थ साहिब के पन्ना --१२५३ पर आपके पदों में से एक पद को चयनित करके अंकित किया गया है  "छाड़ि हरि विमुखन के संग। जाते संग कुबुद्धि उपजै, परत भजन में भंग।" इसका भाव यह है कि मनुष्य को ऐसे मनुष्य का साथ छोड़ देना चाहिए जो ईश्वर पर विश्वास नहीं रखते हैं। ऐसे
लोगों के साथ रहने पर बुद्धि भटकती है और भजन में बाधा उत्पन्न होती है।
--------(2)------भक्त पीपा जी------------
फिरोजशाह तुगलक और लल्लन पठान को युद्ध में मात देने वाले पराक्रमी योद्धा, स्वर्ण द्वारका में सात दिन भगवान कृष्ण के सानिध्य में निवास करने वाले, राजस्थान के नागौर जिले के महाराजा,सन्त रामानंद एवं संत रविदास जी के शिष्य भक्त पीपा जी की वाणी श्री गुरु ग्रन्थ
साहिब के पन्ना--६८५ पर अंकित है।
आपके शिष्य बनने की कथा बड़ी रोचक है। एक बार आपने संत रविदास को अपना गुरु बनाने की योजना बनायी। एक दिन राज परिवार एक मेले में गया हुआ था।आप छुपते-छुपाते सायंकाल पैदल ही संत रविदास की कुटिया में आए और नाम दीच्छा के लिए आग्रह किया। संत रविदास जी राजा की विनम्रता से प्रभावित होकर सीधे सतलोक की भक्ति प्रदान करने की ठानी। जिस समय राजा वहाँ पर पहुँचे थे, संत रविदास जी कठौता में चमड़ा भिगो रहे थे, क्योंकि संत रविदास जी जाति के चमार थे, और जूता बनाने का काम करते थे। संत जी ने उसी कठौते से जल निकाला औ
राजा के चुल्लू में पीने के लिए डाल दिया।
अंधेरा था ही, राजा ने चमड़े का पानी 
समझकर आँख बचाकर उसेअपनी बाँह
में डाल लिया और अपने महल में वापस
आ गए।आकर अपनी पोशाक को निकाला और धोबी को बुलाकर इस हिदायत के साथ, धुलने को दे दिया कि यह दाग छुड़ा कर लाना। धोबी के धुलने पर दाग नहीं छूटा तो धोबी ने उसे अपनी लड़की को मुँह से चूस कर दाग हटाने के लिए कहा--ज्यों ही लड़की ने उसे मुँह में डाला, लड़की में ईश्वरीय ज्ञान स्वतः उभर आया। इस ईश्वरीय ज्ञान के चमत्कार को देखने और परखने के लिए दूर-दूर से लोग आने लगे। एक दिन राजा भी हाथ जोड़कर लड़की के सामने उपस्थित हुए, लड़की ने राजा से कहा, "राजन् आप हाथ जोड़कर मुझे शर्मिंदा मत कीजिए,‌ यह सब कुछ मुझे आपकी बदौलत मिला है।" राजा ने कहा," वह कैसे?" लड़की ने पूरी घटना का बयान किया। राजा‌ को अपनी गलती का एहसास हुआ ‌ और दुखी मन से महल में वापस आ गये। दूसरे दिन राजा फिर संत रविदास की कुटी पर आये और अपना मुकुट संत  रविदास के चरणों में रखना चाहा मगर रविदास जी ने रोक दिया, तब मुकुट को राजा ने रविदास के सिर पर लगा दिया, और अपनी गलती के लिए छमा माँगा। संत रविदास ने कहा, ‌ हे नागौर नरेश ! वह अमृत था जिसे आपने चमड़े का पानी समझकर बाहर ‌जाने दिया, अब हम आपको अपना शिष्य नहीं बना सकते।
 गुरु‌ रामा‌ नन्द जी आपको अपना शिष्य बना‌ सकते हैं, इसके लिए आपको  उनकी परीछा से होकर गुज़रना होगा।
अपने सिर से मुकुट को उतार कर देते हुए राजा से बोले,"राजन ! संत उदार तो होते हैं परन्तु बिना पात्रता सिद्ध हुए वे भी शिष्य नहीं बना सकते। और एक दिन अपनी फौज -फक्कड़ के साथ राजा पीपा सन्त रामानंद जी से मिलने काशी आए। मंत्री को भेजकर मिलने का समय माँगा, परन्तु एक शिष्य ने मंत्री को यह कहकर लौटा दिया कि एक संत को एक राजा से क्या मतलब ? राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ, उन्होंने सबको वहीं रोक दिया और पैदल नंगे पैर आकर 
गुरु रामानंद मिले। गुरु ने समझाया, आप राजा हैं राज्य कीजिए, परन्तु राजा
नहीं माने, तब गुरु ने पूछा, आप दछिणा
में क्या देंगे ? राजा ने कहा, " जो आप आदेश देंगे। " गुरु बोले क्या आप अपना  प्राण दे सकते ‌हैं ? राजा ने कहा, "जी हाँ। " गुरु इशारा करके बोले, "वह कुआँ देख रहे हो, उसमें छलाँग लगा दो। राजा कुएँ की तरफ दौड़े और छलाँग लगा दी।
गुरु ने राजा को ‌बचा लिया,और बोले, "
तुम्हारी परीछा पूरी हुयी। तुममें शिष्य बनने की पात्रता है। एक वर्ष बाद हम
स्वयं आपके पास आएँगे और 
औपचारिक ढंग से हम शिष्य बनाकर अपने साथ ले आएँगे, एक वर्ष तक आप राज-काज को ईश्वरीय  कार्य समझकर कीजिए। एक वर्ष के बाद गुरु रामानंद नागौर पहुँचे।  पीपा जी राज्य को अपने भतीजे कल्याण राव को देकर गुरु रामानंद के साथ चल दिए, साथ में इनकी बारह रानियाँ भी चलीं। गुरु बोले, जो अपने पति के साथ चलना चाहती हैं, वे सब नंगी होकर आ जाएँ। केवल छोटी रानी सीता नंगी होकर चलने को ‌तैयार हुयीं। राजा सीता को साथ लिए और अगली यात्रा के लिए चल पड़े।काशी दूर थी। सीता बहुत सुन्दर और कोमल शरीर की थीं। चार गुंडे भी सीता पर नज़र गड़ाए हुए थे और लोगों की नज़र बचाकर पीछे पीछे चल रहे थे।अवसर पाकर गुंडों ने सीता का अपहरण कर लिया और जंगल
में गलत नीयत से घसीट कर‌ ले गए।
इज़्जत बचाना तो अब ईश्वर का दायित्व था। एक ‌सिंह आया और उन चारो गुण्डों को फाड़ डाला, तभी एक संत
आए और सीता ‌से बोले, चलो हम तुम्हें
तुम्हारे गुरु तक पहुँचा देते हैं। सीता से
मिलकर सभी प्रसन्न हुए। आश्रम पर रहते हुए अभी थोड़े ही दिन हुए थे। गुरु पंद्रह दिन के लिए बाहर गए हुए थे,पीपा
और सीता टहलते हुए दूर निकल गए, पास में द्वारका आश्रम था। दोनों चर्चा कर रहे थे कि एक वह द्वारका नगरी थी
जो समुद्र में डूब गयी थी। सामने एक पेड़ के नीचे एक पाली बैठा था, उससे
पीपा ने द्वारका के बारे में पूछा, उसने
बताया "यहीं सौ फिट नीचे द्वारका है।" दोनो ने सलाह किया, फिर दोनों ने वहीं छलाँग लगा दी। पास के खेतों में जो किसान काम कर रहे थे उन्होंने छलाँग
लगाते हुए देखा, दौड़ कर वहाँ आए भी,
सोचा आत्म हत्या कर ली। वहीं पर  भगवान कृष्ण ने द्वारका की रचना कर दी। पीपा और सीता द्वारका में सात दिन तक भगवान कृष्ण के साथ रहे, जब वहाँ से चलने लगे तो कृष्ण ने अपनी अँगूठी निकाल कर पहना दी, जिस पर कृष्ण लिखा हुआ था। दोनो नदी के ऊपर आए, दोनो के कपड़े सूखे थे, भीड़ इकट्ठा हो गयी। एक चमत्कार हुआ था। सात दिन बाद दोनों नदी से बाहर आए थे। साथ में भगवान कृष्ण की अँगूठी भी लाए थे, जिस पर कृष्ण की मुद्रा छपी थी। दोनों आश्रम पर आए। इनके दर्शन के लिए दिन प्रति दिन भीड़ बढ़ती जा रही थी। गुरु जब वापस आए तो अँगूठी को देखा जो इस लोक की बनी हुयी नहीं लगती थी। आपका एक शबद श्री गुरु ग्रन्थ
साहिब में पन्ना -६८५ पर अंकित है।
जिसका भाव है जो ब्रह्माण्ड में है, वही
परमात्मा मनुष्य के अंदर है जो खोजता
है उसे मिलता है। उस परम तत्व ‌को पीपा प्रणाम करता है जिसकी‌ गुरु ने
पहचान करवायी है। जो ब्रह्मण्डे सोई पिण्डे जो खोजै सो पावै। पीपा प्रणवै परम ततु है सतिगुरु होइ लखावै।--------
(३) संत रविदास जी---------------
आप चर्मकार थे, जूता बनाकर आप अपनी जीविका चलाते थे। ईश्वर भक्त थे। हिन्दू चर्मकार होने का आपको गर्व
था। सदना पीर आपको मुसलमान बनाने आया था, खुद हिन्दू बन गया।
सिकन्दर लोदी ने आपको मुसलमान
बनाना चाहा, आपको जे‌ल में‌ डाल दिया।‌ ईश्वरीय कृपा हुयी, सिकन्दर लोदी ने माफी माँगकर आपको छोड़ दिया। कहते हैं, एक बार आपके मिलने वाले गंगाराम पंडित गंगा स्नान के लिए जा रहे थे, आपको एक जूता बनाकर समय पर ग्राहक को देना था, इसलिए स्नान के लिए स्वयं नहीं जा सके, मगर एक मुद्रा पंडित जी को दी कि इसे मेरी ओर से गंगा जी को दे आना और जो प्रसाद देंगी ले आना। पंडित जी जब स्नान कर चुके, तब याद आया।  गंगा जी से कहा, यह मुद्रा रविदास की ओर से। गंगा जी बाहर निकलीं, मुद्रा
को ग्रहण किया और प्रसाद में एक कंगन दिया। पंडित जी घर आए,अपनी पत्नी को कंगन देते हुए सारी बातें बतायीं। कुछ दिन बाद पंडित जी इसे बेचने बाज़ार में गए। कंगन बहुत कीमती था। कोई जौहरी इसकी कीमत दे न सका। यह खबर राजा
के पास पहुँची। राजा ने पंडित को बुलवाया। जौहरी ने जो कीमत बताई, उसे देकर राजा ने कंगन ले लिया और अपनी रानी को दिया। खूबसूरत कंगन को देखकर रानी ने दूसरे कंगन की माँग की। राजा ने पंडित को बुलवाकर दूसरा कंगन लाने के लिए आदेश दिया और न ला पाने पर तुम्हें दण्ड भी मिलेगा यह भी कहा। पंडित जी ने पूरी बात आकर रविदास जी से बताई। रविदास ने राजा से बताया कि माता गंगा ने एक कंगन दिया था, वह आपके पास है। राजा ने कहा मुझे दूसरा कंगन चाहिए। रविदास जी‌ ‌ने अपनी कठौती मँगवायी। भीगा हुआ चमड़ा बाहर निकाल दिया,और कहा, " मन चंगा तो‌ कठौती में गंगा।" ऐसा कहकर कठौती में हाथ डाला और दूसरा कंगन निकाल कर राजा‌ को दे दिया। राजा ने उसकी कीमत देना चाहा मगर रविदास जी ‌ने मना कर दिया। यह थी रविदास जी की ईश्वरीय पहुँच, और यह था उनका त्याग।
कहते हैं कि एक बार भगवान स्वयं पारस लेकर आपके पास आए और कहा हम मुसाफिर हैं, रास्ते में हमें यह पारस मिला। सोचा, इसे आपको देते चलें। रविदास ने कहा, जो मेरे प्रभु हैं, उनकी सेवा में स्वयं लक्ष्मी जी रहती हैं, मुझे धन की क्या कमी ? मुसाफिर ने कहा ठीक है, हम तीर्थ यात्रा को निकले हैं, तीन महीने बाद वापस आएँगे, तब ले लेंगे। भगवान चले गए, तीन महीने‌ बाद वापस आए, जहाँ रख गए थे, वहीं रखा हुआ पाया। यह था रविदास जी का लोभ के प्रति विकर्षण। मीरा और राणा सांगा की पत्नी झाली रानी आपकी शिष्या थीं।
आपकी कविता पर आपकी ईश्वरीय पहुँच की छाप है, इसीलिए आपके जीवन की कुछ घटनाओं की चर्चा यहाँ की गयी है। कुछ घटनाओं का वर्णन तो आपने ज्यों का त्यों आपने अपने काव्य में‌ किया है--श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में आपके चालीस शबद लिए गए हैं।पन्ना--१३०६ पर अंकित एक शबद---------
ऐसा लाल तुझ बिन कउन करै।
गरीब निवाजु गुसईया, मेरा माथे छत्र धरै। जाकी छोत जगत कोउ लागै, तापर तूही ढरै। नीच हों ऊँच करे मेरा गोविंद, काहू ते न डरै।
इसका भाव यह है --संत रविदास जी कहते हैं कि हे मेरे गोविंद ! तेरे बिना इस
प्रकार का प्यार मुझसे कौन करने वाला है। तू गरीबों का स्वामी है। तूने मेरे सिर 
पर इतने बड़े राज्य का मुकुट रखवा दिया (राजा पीपा ने अपना मुकुट आपके सिर पर रख दिया था) जिसका इस जगत में कोई नहीं है तू उस पर कृपा करने वाला है। तू नीचा को भी ऊँचा बना देता है, मेरा स्वामी किसी से भी नहीं डरता है।
(४) संत रामानंद--------------
संत रामानंद को भगवान राम का 
अवतार माना जाता है। राम नंदः स्वयं रामः प्रादुर्भूतो महीतले। इनके बारह शिष्यों को जिन्हें द्वादश महाभागवत कहते हैं, ये भी अवतारी कहे जाते हैं------शिष्य
(1)अनंतानंद-ब्रह्मा केअवतार, (2) सुखानंद-शंकर के अवतार (3) सुरसुरानंद--नारद के अवतार (4) योगानंद-कपिलदेव के अवतार (5) गालवानंद- शुकदेव के अवतार (6) नरिहरानंद- सनत्कुमार के
अवतार (7) भावानंद- जनक के अवतार (8) कबीर- प्रहलाद केअवतार (9) पीपा- मनु के अवतार (10) रविदास- धर्मराज के अवतार(11) धन्ना-राजा बलि के अवतार (12) सैंण-भीष्म के अवतार। आपका चलाया गया सम्प्रदाय, वैरागी सम्प्रदाय अथवा रामानंदी सम्प्रदाय कहलाता है।
भक्तिकाल के कवियों में आपकी रचना
एक अपना अलग स्थान रखती है।आपके शिष्यों में सगुण एवं निर्गुण दोनों‌‌ शाखाओं‌ के उत्कृष्ट कवि हुए हैं जिन्होंने अपनी पहुँच ईश्वर तक बना ली थी। 'द्रविड़ भक्ति उपजौ लायो रामानंद।' उत्तर भारत में भक्ति प्रचार का श्रेय स्वामी रामानंद को ही जाता है।   अयोध्या के राजा हरिसिंह के नेतृत्व में चौंतीस हज़ार राजपूतों को स्वधर्म में लौटने की घोषणा आपने केवल
एक मंच से की थी। जिन्हें सिकन्दर लोदी ने हिन्दू से मुसलमान बना दिया था। आपने जाति- पाँति और छुआ-छूत
का बंधन तोड़ दिया था। आपका नारा
था--" जाति-पाँति पूछहि न कोई। हरि का भजहि सो हरि का होई। आपका एक शबद गुरु ग्रन्थ साहिब में पन्ना (1195) पर अंकित है---
कत जाइए रे घर लागो रंगु। मेरा चित न
चलै मन भइयो पंगु। सतिगुर मैं बलि- हारी तोर। जिनि सकल बिकल भ्रम काटे मोर। इसका भाव यह है कि मै   अपने घर (ईश्वर के धाम) कैसे जाऊँ ? मुझ पर तो संसार का ‌रंग चढ़ा हुआ है। मेरा मन, मेरा चित्त लाचार है क्योंकि यह इंद्रियों के भोग में लगा हुआ है। हे सतगुरु ! मैं आपके बलिहार जाऊँ, आपने मेरे सारे संसार के बंधन काट दिए।
(5) बाबा फरीद शकरगंज--------
(1173--1266) एक प्रसिद्ध सूफी संत, कवि थे। इनका पूरा नाम शेख फरीदुद्दीन मसूद गंज ए‌ शकर था। ये भारत में चिश्ती सूफी सिलसिले के प्रमुख संतों में से एक थे।  आपका जन्म 1173 में मुल्तान के पास काठीवाल नामक स्थान पर हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। आपके पिता का नाम जमालुद्दीन सुल्तान और माता का नाम मरियम था। उन्होंने सूफी संत ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी से आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की, जो इनके गुरू थे। इनकी काव्य रचनाएँ पंजाबी भाषा में है। बाबा फरीद की दरगाह पाकपट्टन में स्थित है। जो लाखों श्रद्धालुओं के लिए एक पवित्र स्थल है।
बाबा फरीद के बालपन की एक घटना है-आपकी माँ ने कहा, बेटा अब बड़े हो गए हो, नमाज़ पढा़ करो। बाबा फरीदा ने पूछा, इससे क्या होगा ? माँ बोली "बेटा शकर तुम्हें पसंद है, अल्लाह तुम्हें शकर देगा।" बाबा फरीद नमाज़ पढ़ते, चटाई के नीचे माँ, कागज की पुड़िया में शकर छुपाकर रख देती,नमाज़ के बाद बाबा पुड़िया निकालते और शकर खा लेते।‌ एक दिन माँ शकर की पुड़िया रखना भूल गयी। नमाज़ के बाद आपने चटाई के नीचे से पुड़िया निकाली और शकर खाने लगे। माँ ने पूछा क्या खा रहे हो ? वही शकर जो अल्लाह ने भेजा है। माँ हैरान थी, घर में शकर थी नहीं, आज शकर की पुड़िया मैने रखी नहीं, फिर यह आई कहाँ से ? यह तो चमत्कार है।और तभी से माँ ने आपका नाम रख दिया 'शकरगंज' बाद में आपको' गंज‌ शकर' भी कहा जाने लगा। आपके चार शबद श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में पन्ना (1381और(1382) पर अंकित है। प्रारंभ में आपने हठ योग करना शुरू किया। भूखे प्यासे रहकर बारह साल आपने अपने पैर एक पेड़ की डाल से बाँधकर उल्टे कुएँ में लटके रहे, मगर खुदा का दीदार नहीं हो पाया
आप बहुत कमजोर हो गए थे। कौए आकर आपके पैर में टोंट मारने लगे।आपने उस समय जो पद पढ़ा उसका भाव यह था कि "ऐ कागा ! तुम शरीर
का सारा मांस खा जाना, मगर मेरी इन
दोनों आँखों को मत छूना। इन आँखों से
मुझे अपने पीर (खुदा) को देखने की इच्छा अभी बाकी है:----
कागा करंग ढढोलिया, सँगला खाइयो मांस। ई दुइ नैना मत छुवहु, पीर दिखन की आस।
(6) संत नामदेव जी----
(1270--1350)
संत नामदेव जी का जन्म सन् 1270 में महाराष्ट्र के निगरी गाँव, सतीपुर साँगली जिले में हुआ था। इनके पिता का नाम दामाशेट और माता का नाम गोणाई था। नामदेव जी भगवान विट्ठल के अनन्य भक्त थे। वारकरी सम्प्रदाय के प्रमुख संत नामदेव जी जब दो साल के थे, तब आपके मुख से एक दिन विट्ठल विट्ठल की आवाज़ आयी जिसे सुनकर आपकी माँ अचम्भित हो गयीं। अभी उसके लाल ने बोलना सीखा भी नहीं था, फिर यह आवाज़ कहाँ से आयी? और फिर एक बार उसके लाल ने विट्ठल- विट्ठल कहा। वहीं निकट में‌ पढ़रपुर में विट्ठल का मंदिर था। आपकी ख्याति से जलन रखने वाले कुछ पंडित लोग दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद तुगलक के पास आपकी शिकायत लेकर पहुँचे।
मुहम्मद तुगलक उस समय अपनी राजधानी दौलताबाद बना रखी थी, आप को गिरफ्तार करके दौलताबाद लाया गया। सभा में इनको बैठने के लिए आसन दिया गया। एक गाय मँगवायी गयी। उस गाय का‌ सिर काट दिया गया। और दिल्ली के सुल्तान ने आपसे कहा, आप इस गाय को जीवित कीजिए अथवा मुसलमान बन जाइए, वर्ना आपको हाथी से कुचल दिया जाएगा। आप चुप रहे, केवल विट्ठल विट्ठल कहते रहे। पागल हाथी के सामने आपको डाल दिया गया। हाथी ने आपको प्रणाम किया, और वहाँ
से हट गया। तभी उस गाय का सिर जुड़
गया और जीवित होकर सभा से बाहर
चली गयी। दिल्ली का सुल्तान यह देख- कर नामदेव से छमा माँगी और शाही
सवारी से आपको आपके घर पहुँचा दिया। 
एक बार आपने भगवान विट्ठल
के सामने कुछ रोटियाँ भोग लगाने के
लिए रखीं।आपने आँखें बंद कीं। तभी
एक कुत्ता आया, उसने चार रोटियाँ एक
साथ अपने मुँह में दबाई और वहाँ से भगा। जब आपने आँखें खोलीं और भागते हुए कुत्ते‌ को देखा तब आपको याद आया कि रोटियों में घी नहीं लगाया
गया है। आप घी का पात्र लेकर कुत्ते‌ के‌ पीछे-पीछे दौड़े और कहने लगे "विट्ठल
रुक जाइए, सूखी रोटी मत खाइए, मैं आ रहा हूँ,  प्रभो रुकिए-रुकिए।"आप गश खाकर गिर पड़े। आपने देखा कि भगवान विट्ठल शंख,चक्र,गदा और पद्म लिए वहीं खड़े हैं। प्रभु को सामने देखकर चरणों में लोट गए।
एक बार आप नागनाथ मंदिर
के सामने बैठकर कीर्तन कर रहे थे, 
पुजारी ने आपत्ति की । आप मंदिर के
पीछे चले गए और वहीं से भगवान का
कीर्तन करने लगे। मंदिर का प्रवेश द्वार
घूमकर उस तरफ हो गया जिस ओर
नामदेव बैठकर कीर्तन कर रहे थे। इन घटनाओं का विश्लेषण करने पर ऐसा
लगता है कि जहाँ-जहाँ नामदेव वहाँ- वहाँ उनके विट्ठल । इनके अभंग (विट्ठल
की स्तुति में कहे पद) आज भी महाराष्ट्र
में लोग गाते हैं। आपके इकसठ पद श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में अंकित हैै। आपका पद पन्ना (1163वा1164) पर जो अंकित है, उसके कुछ भाग की चर्चा हम यहाँ करेंगे। ऩामदेव पाँच साल के थे आपके पिता ने कहा,बेटा मैं बाहर जा रहा हूँ, विठोबा ( विट्ठल) को नहलाकर दूध पिला देना। नामदेव ने विट्ठल को नहलाया और पीने के लिए दूध का कटोरा सामने  रख दिया। भला पत्थर की मूर्ति दूध कैसे पीती ? आपने दीवाल में अपना सिर पटकना शुरू कर दिया और कहा, " विट्ठल यदि तुमने दूध नहीं पिया तो हम सिर पटक -पटक कर अपना प्राण दे देंगे।
"सोइन कटोरी अमृत भरी, लै नामे हरि आगे धरी। एकु भगतु मेरे हृदय बसै।
नामे देखि नरायनु हसै।दूध पिआइभगतु
घरि गइया। नामे हरि का दर्शन भइया।" इसका भाव ‌यह ‌है कि सोने की कटोरी
में दूध भरा हुआ है, प्रभु का नाम लेकर
उनके आगे पीने के लिए रख दिया गया है। विट्ठल कहते हैं कि वह भक्त मेरे हृदय में बसा हुआ है। दूध पिलाने की   उसकी ज़िद देखकर मुझे हँसी आती है। मैंने मूर्ति से बाहर आकर उसका दूध
पिया, वह भक्त इस तरह मुझे दूध पिला
कर अपने घर चला गया।
(7 संत परमानंद-----
सन्त परमानन्द का जन्म सन् 1483 में एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था। ये पुष्टि मार्ग के अनुयायी,जगदगुरु वल्लभाचार्य के शिष्य थे और कन्नौज
उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे। चार शिष्य
जगदगुरु वल्लभाचार्य के और चार शिष्य उनके बेटे विट्ठल नाथ के,ये आठ 
संत अष्टछाप कहलाते हैं, इन अष्ट छापी
संतों के नाम हैं--(1) संत कुम्भन दास
(2) संत सूरदास (3) संत कृष्ण दास
(4) संत परमानंद (5) संत गोविंद स्वामी (6) संत छीत दास (7) संत नंद
दास (8) संतचतुर्भुज दास। संत परमा-
नंद एक उच्च कोटि के साहित्यकार एवं
भगवान कृष्ण के भक्त थे। आपकी 
साहित्यिक रचनाओं में ध्रुव-चरित्र, दान लीला, परमानंद सागर और परम-दास  पद प्रमुख हैं। श्री गुरु ग्रन्थसाहिब में आप का एक पद पन्ना (1253) पर अंकित है।
" तै नर किआ पुरानु सुनि कीना। 
अनपावनी भगति नहिं उपजी,भूखै दानु न दीना। कामु न विसरियो, क्रोध न विसरियो लोभ न छुटियो  देवा। पर निन्दा‌ ‌मुख ते न छूटी निफल भई सब सेवा।  बाट पारि घरु मूसि बिरानो पेटु भरै अपराधी। जिहि परलोक जाइ अपकीरति सोइ अविद्या साधी।" इसका भाव यह है----
परमानंद जी कहते हैं कि हे मनुष्य ! 
तूने पुराणों को सुनकर ही आज तक किया है। तेरे अंदर अनपावनी भक्ति भी
नहीं आ पाई है, भूखे को दान भी कभी नहीं दिया, काम, क्रोध, लोभ और परनिंदा भी नहीं छूटी इसलिए तेरी सेवा निष्फल गयी। लूट- पाट करके अपराधी बनकर तू अपना पेट भरता है, जो गलत कार्य तूने अपना रखा है वह अपकीर्ति     परलोक में भी तेरे साथ जाएगी।
(8) संत त्रिलोचन------
संत त्रलोचन का‌ जन्म सन् 1269 में गाँव बरसी, ज़िला सोलापुर, महाराष्ट्र में एक वैश्य परिवार में   हुआ था।
एक बार जब त्रिलोचन अपनी भक्ति में लीन हो गए और सांसारिक कामों को नज़रअंदाज़ कर दिया, जिसके कारण उनके घर की परिस्थितियाँ खराब हो गईं। इस पर उनकी पत्नी असंतुष्ट हो गईं और भगवान को बुरा-भला कहने लगीं। त्रिलोचन ने इस पर जो कहा, वह इस प्रकार है। उन्होंने अपनी पत्नी को यह कहकर सांत्वना देने की कोशिश की कि उनकी परेशानी उनके पापों का नतीजा है। उन्होंने अपनी पत्नी से‌ कहा---  तुम यहोवा की निन्दा क्यों करती हो? तुम अज्ञानी और भ्रमित हो। दुःख और सुख आपके अपने कर्मों का परिणाम हैं। चन्द्रमा शिव के माथे पर निवास करता है; वह गंगा में स्नान करके पवित्र होता है। चन्द्रमा के कुल के पुरुषों में कृष्ण का जन्म हुआ; फिर भी, उसके पिछले कर्मों के दाग उसके चेहरे पर बना है।
   ‌   संत त्रिलोचन और संत नामदेव‌ गुरु भाई थे। एक बार संत त्रिलोचन ने संत नामदेव से कहा, "मित्र ! भगवान से आपकी
मुलाकात तो होती रहती है, भगवान से
पूछो, उनका दास त्रिलोचन भी दर्शन का भूखा है, उनको दर्शन कब मिलेगा ? और एक दिन जब नामदेव की भगवान‌ से मुलाकात हुयी, तब नामदेव ने पूछा, प्रभो मेरे मित्र त्रिलोचन को आप दर्शन ‌कब देंगे ? भगवान ने कहा, मैं‌ शीघ्र ही उनसे मिलने वाला हूँ लेकिन पहचानने का काम उनका है। संत नामदेव ने आकर यह खबर अपने मित्र त्रिलोचन को दी और सतर्क भी किया  कि मित्र ! पहचानने में भूल मत करना। त्रिलोचन के पास धन की कमी न थी, आप नित्य ही साधु संतों ‌को भोजन कराते थे। एक दिन आपकी पत्नी ने कहा, " सुनो जी ! कोई अच्छा नौकर मिल जाए तो‌ रख लो। साधु संतों की आमद बढ़ी है, काम सरलता से नहीं निपट पाता है। संत जी ने कहा, संतो की सेवा भगवान की सेवा है, भोजन खिलाने में मेहनत तो पड़ती ही है, कोई अच्छा नौकर मिल जाए, उसे रख लेते हैं। एक दिन संत जी सब्जी खरीदने गए थे, एक लड़का दौड़ता हुआ आया, उसने कहा, बाबू जी ! मैं गरीब हूँ। मुझे नौकरी चाहिए। अगर नौकर की आवश्यकता हो तो मुझे रख लीजिए।" संत ने पूछा," महीने का कितना लोगे ?" मुझे तनख्वाह नहीं चाहिए, बस पेट भर भोजन चाहिए।" उसने कहा।  संत ने पूछा, " काम क्या-क्या करना जानते हो?" उसने उत्तर दिया,  "काम तो सब‌ कर लेंगे मगर मेरी शिकायत अगर कहीं की तो मैं काम  छोड़कर चला जाऊँगा।"संत जी ने कुछ सोचा और उस बालक को काम पर रख लिया, तथा पत्नी से बालक की शर्त भी बता दी। नौकर सब काम बड़ी ईमानदारी से और मालिक के आदेश के अनुसार ही करता था। संत जी नौकर से बहुत खुश थे। वह संतों की सेवा बड़ी श्रद्धा से करता था। जब नौकर खाता था, तो खाता ही जाता  था। संत की पत्नी रोटी बनाते- बनाते थक जाती थीं। वह इस बात को कहीं कह भी नहीं सकती थीं,उन्हें डर था नौकर भाग जाएगा। समय बीतता गया, और एक दिन संत की पत्नी पड़ोसन के पास बैठी थीं, पड़ोसन ने कहा, अरे !अब तो नौकर भी आ गया है़,  घर का तमाम काम वह अकेले कर देता है, फिर भी तुम प्रसन्न नहीं दिखती हो, क्या बात है ? संत की पत्नी को उस लड़के की शर्त याद थी, इसलिए वह चुप रही। मगर बार-बार. पड़ोसन के पूछने पर उन्होंने पहले इधर-उधर देखा फिर बोलीं,
बहन क्या बताऊँ ? नौकर सब प्रकार से
अच्छा तो है, मगर जब खाने बैठता है, तो खाता ही जाता है, मना करने का नाम ही नहीं लेता है। वह बहुत खाता है बहन। शिकायत मुख से निकल चुकी थी, वह डर गयी, कहीं नौकर भाग न जाए ? वह नौकर नहीं, वह तो अपना लड़का है। हम उसको बहुत प्यार करते हैं। वह भागती हुयी अपने घर पर आयी। अन्तर्यामी !अन्तर्यामी ! पुकारने लगी, उसने अपना नाम अन्तर्यामी बताया था। अन्तर्यामी अन्तर्धान हो गया था। बात संत तक पहुँची, संत जी बहुत दुखी हुए। तभी नामदेव जी आ गये। नौकर के चले जाने की जानकारी मिली। नामदेव ने कहा,  मित्र ! तुम पहचान न सके, वह तो अपने
भगवान थे। तुम्हारी चाकरी कर रहे थे। 
त्रिलोचन और उनकी पत्नी बेहोश होकर गिर पड़ीं। थोड़ा भी होश आता था तो मेरे भगवान ! मेरे भगवान !कहकर फिर  बेहोश हो जाते थे। नामदेव ने कहा, प्रभो दर्शन दीजिए, वर्ना ये दोनों अब जीवित बचने वाले नहीं हैं‌। प्रभो प्रकट हुए। शंख
चक्र, गदा और पद्म हाथ में लिए हुए थे।बुलाया --त्रिलोचन उठो मैं आ गया हूँ।पति- पत्नी उठे और चरणों में लोट गये।
यह थी त्रिलोचन की ईश्वरीयभक्ति। भक्ति की पूरी छाप आपकी कविताओं पर है। श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में आपके चार पद अंकित किये गये हैं-- पन्ना (525और526)पर। "अंतरु मलि निरमलु नहिं कीना, बाहर भेख उदासी। हिरदै कमलु घटि ब्रह्मु न चीन्हा, काहे भइया‌ सनिआसी।"
इसका भाव यह है कि अंदर काम,   क्रोध, लोभ ,मोह, अहंकार आदि विकार भरा हुआ है, उसकी सफाई नहीं की और उदासी का भेष बना लिया। भगवान हृदय में विद्यमान है, इसका अनुभव भी नहीं किया। फिर सन्यासी कैसे ? हैं।:मन माया में पूरी तरह से आसक्त है ; नश्वर व्यक्ति बुढ़ापे और मृत्यु के भय को भूल गया है।अपने परिवार को देखते हुए, वह कमल के फूल की तरह खिलता है; धोखेबाज व्यक्ति दूसरों के घरों को देखता है और लालच करता है। जब मृत्यु का शक्तिशाली दूत आता है, तो कोई भी उसकी भयानक शक्ति के सामने खड़ा नहीं हो सकता।
-9)  संत धन्ना जी-:-----
संत धन्ना का जन्म 22 अप्रैल सन् 1415 में टोंक ज़िला राजस्थान में एक‌ जाट परिवार में हुआ था।
संत धन्ना की उम्र जब पाँच साल की थी।
आपके यहाँ एक दिन एक पंडित जी
आकर ठहरे। प्रातः स्नान के बाद 
शालिग्राम को अपने झोले से निकाला, स्नान कराया, तुलसी पत्र चढा़या,भोग लगाया। सब कुछ धन्ना टकटकी लगाकर देख रहा था। धन्ना ने पंडित जी से कहा, "एक भगवान मुझे भी दे दो।" पंडित जी मना करते रहे और बालक धन्ना जिद करता रहा। नाराज़ होकर पंडित जी ने पास में पड़े हुए एक पत्थर को उठाया और धन्ना को देते हुए कहा, "लो यह तेरे भगवान हैं।इन्हें नहलाना धुलाना, धूप बत्ती करना भोग लगाना।" उसी दिन से धन्ना ने उसी पत्थर को भगवान मान लिया। प्रातः ही 
स्नान करके वह अपने भगवान को 
नहलाता, तुलसी पत्र चढ़ाता और फिर अपने खाने के लिए जो रोटियाँ उसे मिलतीं, उन्हें लाकर भोग लगाता। भला पत्थर के भगवान कहीं रोटियाँ खाते हैं ? भगवान ने‌ रोटियाँ नहीं खायीं तो धन्ना ने भी रोटी नहीं खायी और रोटियाँ लेकर जंगल में डाल आया। कई दिन इसी तरह से बीते। धन्ना बहुत कमजोर हो चुका था। आखिर भगवान उस पत्थर से निकले और रोटियाँ खाना शुरू कर दिया,जब एक रोटी बची तो धन्ना ने भगवान का हाथ पकड़ लिया
और कहा इतने दिन मैं भूखा रहा, क्या
एक भी रोटी मेरे लिए नहीं छोड़ेंगे ? भगवान हँसे और कहा, " लो मैं अपने हाथ से तुम्हें खिलाता हूँ, और भगवान ने अपने हाथ से धन्ना को रोटियाँ खिलायीं। यह थी धन्ना की अलौकिक भक्ति। अब संत धन्ना बड़े हो चुके थे, खेती का काम निपटाते, और समय मिलने पर भगवान का स्मरण
ध्यान करते। 
एक दिन हल-बैल और बीज लेकर अपना खेत बोने जा रहे थे, रास्ते में कुछ संत मिल गए, एक संत बोला, "भइया कई दिन हो गये, कुछ खाने को नहीं मिला, यदि आपकी कुछ कृपा हो जाती तो अच्छा होता।" संत धन्ना ने वह बीज इन संतों को दे‌ दिया, जो खेत में बोने के लिए था। संतगण आशीष देकर वहाँ से चले गए। धन्ना की पत्नी तेज थी। वह तूफान न ला दे, इसलिए धन्ना ने हल उसी तरह से चलाया जैसे उसमें बीज बोया गया हो। कुछ दिन बाद जब फसल उगी तो सबसे अच्छी फसल संत धन्ना की थी। धन्ना सोच रहे थे कि बिना बीज बोए ही यह फसल किस तरह उगी ? यह सब प्रभु की लीला है। संत धन्ना को अब हर तरफ भगवान की ही लीला दिख रही थी आपके साहित्य पर आपकी भक्ति का गहरा प्रभाव दिखाई पड़ता है।
संत धन्ना एक रहस्यवादी कवि एवं वैष्णव भक्त थे। आप संत रामानंद के शिष्य थे। गुरु रामानंद ने आपको अपने घर पर  ही रहकर ईश्वरीय भक्ति करने की, एवं संतों ‌की सेवा करने की सलाह दी थी, इसीलिए आप अपने घर राजस्थान में टोंक जिले के धुआँ गाँव में ही रहकर ईश्वर का भजन-कीर्तन करते थे। श्री गुरु ग्रन्थ साहिब के पन्ना नम्बर (695) पर आपके तीन शब्द अंकित है, जिसमें यहाँ आप द्वारा लिखी आरती प्रस्तुत है।
"गोपाल तेरा आरता। जो जन तुमरी भगति करते तिनके काज सँवारता।दालि सीधा माँगव घीव, हमरा खुशी करै
नित जीव।" इसका भाव यह है कि हे
प्रभु !जो तुम्हारी भक्ति करता है उसक़ी
आप हर इच्छाएँ पूरी करते हैं, वह जब
दाल, सीधा और घी माँगता है जो उसके
जीव को खुशी प्रदान‌ करता है, तब उसे 
आप वह सब दे‌ देते हैं,जो वह माँगता‌ है।
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