150+अनमोल वचन: बाइबिल(नया नियम से)तीसरी किस्त

(101) मुझे भले ही वरदान मिल जाए कि पहाड़ को हटा सकता ‌हूँ,  इतना ग्यान प्राप्त हो जाए कि मैं पूर्ण हो  जाऊँ,  फिर भी यदि प्रेम का अभाव है 
तो मैं कुछ भी नहीं।कुरिन्थिंयों को नाम 
(13-2).(102) प्रेम सहनशील और दयालु है।कुरिन्थिंयों के नाम ((13-4).  (103) प्रेम न तो ईर्ष्या करता है और  न डींग मारता है। कुरिन्थिंयों के नाम  
(13-4).(104) प्रेम न घमण्ड करता है,
और न अशोभनीय व्यवहार करता है।
कुरिन्थिंयों को नाम(13-5),(105) प्रेम
अपना स्वार्थ नहीं खोजता। कुरिन्थिंयों
के नाम(13-5) (106)प्रेम न झुँझलाता है और न दूसरों की बुराई का लेखा जोखा  रखता है। कुरिन्थिंयों को नाम
(13-5) (107) मैने जिन चीजों का विनाश किया है, यदि मैं उसका पुनः निर्माण करूँगा, तो अपने को अवश्य  
अपराधी प्रमाणित करूँगा। गलतियों के
नाम(2-18).(108) आत्मा और शरीर
एक दूसरे के विरोधी हैं,आत्मा की प्रेरणा के अनुसार जब हम चलते हैं तब शरीर
की वासनाएँ तृप्त नहीं होतीं, इसीलिए
हम जो चाहते ‌हैं वह नहीं कर पाते हैं।
गलतियों(5-17),(109) आदमी जो होता है वही काटता है। शरीर की भूमि बोओगे तो विनाश कि फसल काटोगे,
आत्मा की फसल बोओगे तो अनंत जीवन कि फसल काटोगे। गलतियों के
नाम(6-8),(110) स्त्रियाँ भेषभूषा मैं
मर्यादा और शालीनता का ध्यान रखें,
स्त्रियाँ बहकावे में शीघ्र आ जाती हैं जैसे
हव्वा। इसलिए वे पति के अधीन में रहें।
तिमिथियों के नाम पहलापत्र(2-3&14)
(111) धर्मसेवक को अक्रोधी, अलोभी,
निर्मल अंतःकरण वाला, गम्भीर, संयमी 
और सहनशील होना चाहिए।तिमिथियों
के नाम पहला पत्र(3-8&9)(112).   शरीर के व्यायाम सेकुछ लाभतो होता है मगर भक्ति से जो लाभ मिलताहैवह   असीम है क्योंकि यह जीवन को आश्वा
सन देती है इहलोक में और परलोक में
भी। तिमिथियों के नाम पहला पत्र(4-8)
(113) बड़े बूढ़ों को कभी मत डाँटो बल्कि उनसे इस तरह अनुरोध करो जैसे
वह तुम्हारे पिता हों,भाई,बहनऔर माता
कहकर बुलाओ, उनके साथ शुद्ध मन से
व्यवहार करो। तिमिथियों के नाम पहला
पत्र(5-1&2)(114)जोअपनेसम्बन्धियों
की, विशेषकर अपने निजी परिवार की 
देखरेख नहीं करता वह अविश्वासीसेभी 
बुरा है। तिमिथियों के नाम पहला पत्र
(5-8).(115) धन का लालच सभी बुरा
इयों की जड़ है, इसी लालच में पड़कर कई लोग विश्वास के मार्ग से भटक गए।
तिमिथियों के नाम पहला पत्र(6-10).
(116) जो शुद्ध हैं उनके लिए सब शुद्ध है किन्तु जो अशुद्ध और अविश्वासी हैं,
उनके लिए कुछ भी शुद्ध नहीं है क्योंकि
उनकादामनऔरअंतःकरण दोनों अशुद्ध है। तीतुसियों के नाम (1-15).(117)
आप लोग धन का लालच न करें,जो आपके पास है उसमें संतुष्टरहें।इब्रानियों
के नाम(13-5)(118)प्रभुमेरी सहायता  करता‌  है,मनुष्य मेरा क्या कर सकता‌ है? इब्रानियों के नाम(13-6)(119).जो
भाई दरिद्र हैं, वे ईश्वर द्वारा प्रदत्त अपनी श्रेष्ठता पर गौरव करें। याकूब का पत्र
(1-9), (120) जो धनी हैं वे अपनी हीनता पर गौरव करें,क्योंकि धन घास
के फूल की तरह नष्ट हो जाएगा।याकूब
का पत्र(1-10)(121) धन्य है वह जो
विपत्ति में दृढ़ बना रहता है, क्योंकि परीच्छा में खरा उतरने पर उसे जीवन का वह मुकुट प्राप्त होगा जिसे प्रभु ने
अपने भक्तों को देने की प्रतिग्या की है।
याकूब का पत्र(1-12) (122) यदि कोई अपने को धार्मिक मानता है परन्तु
उसे अपने जीभ पर नियंत्रण नहीं है तो
वह अपने को धोखा देता है। याकूब का पत्र(1-26)(123) कोई मनुष्य अपनी
जीभ को वश नें नहीं कर सकता है,यह
एक ऐसी बुराई है जो कभी शान्त नहीं 
रहती और प्राण घातक विष से भरी हुयी है। याकूब का पत्र(3-8).(124)
हम उसी जीभ से प्रभु की स्तुति करते
हैंऔर उसी जीभ से गालियाँ, यह उचित
नहीं है। याकूब का पत्र(3-10).(125)
ऊपर सेआई हुयी ईश्वरीय प्रग्या मुख्यतः
पवित्र है और वह शान्तिप्रिय,सहनशील
विनम्र, करुणामय,परोपकारी,पच्छपात
रहित और निष्कपट भी है। याकूब का
पत्र(3-17),(126) संसार से मित्रता
रखने का अर्थ है ईश्वर से वैर करना।
याकूब का पत्र(4-4),(127) ईश्वर घमं-
डियों का विरोध करता है और विनीतों
पर अनुग्रह करता है। याकूब का पत्र 
(4-6),(128) प्रभु के सामने दीन हीन
बनें, वह आपको ऊँचा उठाएगा।याकूब
का पत्र(4-10),(129) दूसरों की निंदा
नहीं करना चाहिए। याकूब का पत्र(4- 
11),(130) आप नहीं जानते कि कल
आपका क्या हाल होने वाला है?आपका
जीवनएक कुहरा मात्र है-एक पल दिखा ई देता है, अगले पल लुप्त हो जाता है।
याकूब का पत्र(4-14),(131) ऐ धन वालो! आपको रोना और विलाप करना
चाहिए, क्योंकि आप पर विपत्ति पड़ने वाली है। याकूब का पत्र(5-1) (132)
विश्वास पूर्ण प्रार्थना रोगी को बचाएगी
और प्रभु उसे स्वास्थ्य प्रदान करेगा।
उसने पाप किया है तो उसे छमा मिलेगी
याकूब का पत्र(5-15)(133) आप लोग
हर प्रकार की बुराई, छल-कपट,पाखण्ड
ईर्ष्या और पर निन्दा के छोड़ दें। पतरस
कापहलापत्र(2-1)(134)आपशारीरिक
वासनाओं का दमन करें जो आत्मा के विरुद्ध संघर्ष करती है। पतरस का पह
ला पत्र(2-11)(135)अच्छी तरह काम
करने के बाद भी यदि आपको दुख भो
गना पड़ता है और उसे आप धैर्य से सह
ते हैं तो यह ईश्वर की दृष्टि में पुण्य कर्म है। पतरस का पहला पत्र(2-20)(136)
जो जीवन से प्यार करता है और सुख
शान्ति देखना चाहता है वह अपनी जीभ
से बुराई न बोलने दे और न अपने होंठों
से कपट पूर्ण बातें। पतरस का पहला 
पत्र(3-10) (137) प्रभु की कृपा दृष्टि
धर्मियों पर बनी रहती है और उसके का
न उसकी प्रार्थना सुनते हैं परन्तु प्रभु कु कर्मियों से मुँह फेर लेता है। पतरस का
पहला पत्र (3-12) (138) यदि आप 
भलाई करने में लगे रहेंगे तो कौन आप
के साथ बुराई करेगा। पतरस का पहला
पत्र(3-13)(139)यदि आपको धार्मिक
ता के कारण दुखसहनापड़ता है तोआप
धन्य हैं,आप न तो डरें और न घबड़ायें।
पतरस का पहला पत्र(3-14)(140)   
आप अपनी सारी चिन्ताएँ उस पर छोड़
दें क्योंकि वह आपकी सुधि लेता है। प
तरस का पहला पत्र(5-7) (141) आप संयम रखें और जागते रहें। आपका शत्रु
शैतान दहाड़ते हुए सिंह की तरह विचर ता हैऔर ढूँढता रहता है कि किसे फाड़ डालें।पतरस का पहलापत्र(5-8)(142)
आप विश्वास में दृढ़ होकर शैतान का सामना करें,आप जानते हैं ‌कि ‌संसारभर में आपके भाई भी इस प्रकार का दुख
भेद रहे हैं।पतरस का पहला पत्र(5-9)
(143) आपकी प्रार्थना विश्वास के साथ भाव पूर्ण और प्रभावशाली ढंग से होनी चाहिए। याकूब का पत्र(5-17) (144)
यदि हम कहते हैं कि हम निष्पाप हैं,तो
हम अपने आपको धोखा देते हैं और ह
ममें सत्य नहीं है। यूहन्ना का पहला पत्र
(1-8)(145)जो ईश्वर की संतान है वह
पाप नहीं करता क्योंकि ईश्वर काजीवन
तत्व उसमें क्रियाशील है। यूहन्ना का पह ला पत्र (3-9).(146)यदि संसार तुमसे  वैर करे तो इसमें आश्चर्य मत करो। यूह
न्ना का पहला पत्र(3-13)(147) किसी
के पास दुनिया की धन दौलत हो और
वह अपने भाई को तंगहाली में देखकर
उस पर दया न करे तो उसमें ईश्वर का
प्रेम कैसे बना रह सकता है। यूहन्ना का
पहला पत्र(3-17) (148) यदि हमारा 
अंतःकरण हम पर दोष नहीं लगाता है
तो हम ईश्वर पर पूरा भरोसा रख सकते
हैं। यूहन्ना का पहला पत्र(3-21) (149)
जो प्यार करता है वह ईश्वर की संतान है
 है और ईश्वर को जानता हैक्योंकि ईश्वर
प्रेम है।यूहन्ना कापहलापत्र(4-8)(150)
प्रेम में भय नहीं होता, पूर्ण प्रेम भय दूर कर देता है।यूहन्ना का पहला पत्र(4-8)
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