150+अनमोल वचन:बाइबिल(नया नियम) से (पहली किस्त)
(1) मनुष्य रोटी से नहींं जीता है, वह ईश्वर के मुख से निकलने वाले हर एक शब्द से जीता हैै।- मत्ती(4:4). (2) अपने प्रभु ईश्वर की परीक्षा मत लो। -मत्ती((4:7),(3) अपने प्रभु ईश्वर की आराधना करो और केवल उसी की सेवा करो।-मत्ती(4:10)(4)अपने शत्रुओं से प्रेम करो।-मत्ती(5:44) ,(5) जो तुम पर अत्याचार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।-मत्ती(5:44) (6) वे जो धार्मिकता के कारण अत्याचार सहते हैं, स्वर्ग राज्य उन्हीं का है। --मत्ती(5:10).(7)अपने माता पिताका आदर करो। मत्ती(15:4) (8) जो लोग मुख से मेरा आदर करते हैं , परन्तु उनका हृदय मुझसे दूर है, वे व्यर्थ ही मेरा आदर करते हैंlमत्ती(15:7-8) .(9) हत्या मत करो, व्यभिचार मत करो, चोरी मत करो, झूठी गवाही मत दो और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो। -- मत्ती(19:18-19).(10) धन्य हैं, वे जो अपने को दीन-हीन समझते हैं, स्वर्ग राज्य उन्हीं का है। मत्ती(5:3)(11) धन्य हैं,वेजोनम्रहैंउन्हें प्रतिज्ञात देश प्राप्त होगा .मत्ती(5:4) (12) धन्य हैं, वे जो शोक करते हैं,उन्हें सान्त्वना मिलेगी।--मत्ती(5:5).(13) धन्य हैं, वे जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं, वे तृप्त किएजाएँगे!मत्ती(5:6).(14) धन्य हैं, वे जो दयालु हैं,उन पर कृपा कीजाएगी।--मत्ती(5:7).(15) धन्य हैं, वे जिनका हृदय निर्मल है,वे ईश्वर के दर्शन करेंगेे।मत्ती(5:8) (16) धन्य हैं, वे जो मेल कराते हैं, वे ईश्वर के पुत्र कहलाएँगे।-मत्ती(5:9).(17) धन्य हैं, वे जो धार्मिकता के कारण अत्याचार सहते हैं, स्वर्ग राज्य उन्हीं का है।-मत्ती(5-10).(18) जो बुरी इच्छा से किसी स्त्री पर दृष्टि डालता है, वह अपने मन में उसके साथ व्यभिचार कर चुका।----मत्ती(5:28). (19) व्यभिचार को छोड़कर जो अपने पत्नी का त्याग करता है, वह उससे व्यभिचार कराता है और जो परित्यकतता नारी से विवाह करता हैै, वह व्यभिचार करता है।-मत्ती(5:32), (20) शपथ नहीं खानी चाहिए।.-मत्ती(5:37). (21) तुम्हारी बात इतनी हो- हाँ की हाँ, नहीं की नहीं। - मत्ती(5:37) (22) दुष्ट का सामना मत करो। मत्ती(5:39),(23) यदि कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा भी उसकेसामने कर दो।-मत्ती(5:39),(24) जो मुकदमा लड़कर तुम्हारा कुर्ता लेना चाहता है, तो उसे अपनी चादर भी दे दो।-मत्ती(5:40).(25) यदि कोई तुम्हें आधा कोस बेगार में ले जाना चाहता है, तो उसके साथ कोस भर चले जाओ। ---मत्ती(5:41). (26) जो तुमसे कोई उधार माँगे , तो मुख न मोड़ो।--मत्ती(5:42) (27) जब तुम दान देते हो,तब तुम्हारा बायाँ हाथ यह न जानने पाये कि दाहिना हाथ क्या कर रहा है?-मत्ती(6:3).(28) प्रभु ईश्वर की प्रार्थना एकांत में करो। मत्ती(6:6).(29) तुम्हारे माँगने से पहले ही तुम्हारा पिता जानता है कि तुम्हें किन किन चीज़ों की ज़रूरत हैमत्ती(6:8वा6:32), (30) यदि तुम दूसरों के अपराध क्षमा करोगे तो तुम्हारा स्वर्गिक पिता तुम्हें क्षमा करेगा।-मत्ती(6:14).(31) स्वर्ग में अपने लिए पूँजी जमा करो क्योंकि जहाँ तुम्हारी पूँजी होगीवहींतुम्हारामनहोगा।-मत्ती(6:20वा21) ,(32) ईश्वर और धन दोनों की सेवा एक साथ नहीं सकती।-मत्ती(6:24), (33) कल की चिन्ता मत करो,कल अपनी चिन्ता स्वयं कर लेगा।-मत्ती(6:34),(34) जिस प्रकार तुम दोष दूसरों पर लगाते हो, दूसरे भी तुम पर दोषलगाएगेमत्ती(7:2) (35) अपनी मोती सुअरों के सामने मत फेको, हो सकता है वे पलट कर आपको फाड़ डालें।-मत्ती(7:6). (36) दूसरों से जैसा व्यवहार चाहते हो, तुम भी उनसे वैसा ही व्यवहार करो। मत्ती (7:12). (37) अच्छा पेड़ अच्छा फल देता है और बुरा पेड़ बुरा फल।--मत्ती(7:17). (38) जो स्वर्गिक पिता की इच्छा पूरी करता है, वही स्वर्ग में प्रवेश करेगा।-मत्ती (7:21)(39) अपने घर और अपने नगर में नबी का आदरनहींहोतामत्ती(13:57)
(40) जहाँ दो या तीन मेरे नाम पर इकट्ठा होते हैं, वहाँ उनके बीच मैं उपस्थित रहता हूँ। -मत्ती(18:20).(41) तुम ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो, तुम्हारी आवश्यकता की चीज़ें तुम्हें यूँ ही मिल जाएँगी।--मत्ती(6:33).(42) पहाड़ पर बसा नगर, दीवट पर रखा दीपकसबको दिखता है। मत्ती(6:14व15),(43) तुम्हारा दाहिना हाथ यदि पाप का कारण बनता है, तो उसे काटकर फेक दो,बाकी शरीर नरक में जाने से बच जाएगा।- मत्ती(5:30)(44) तुम पूर्ण बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गिकपिता पूर्ण है। -मत्ती(5:48) (45) सुई की नाकों से होकर ऊँट का निकलना सहज है परन्तु धनी का ईश्वरके राज्य में प्रवेश करना कठिन है।-लूकस(18:24),(46) पवित्र आत्मा की निन्दा करने वाले को कभी क्षमा नहीं मिलेगी।-मरकुस(3-28).(47) जो मेरा अनुसरण करता है,वह अंधकार में भटकता नहीं रहेगा। -यूहन्ना(8:12) (48) तुम सत्य को पहचान जाओगे,और सत्य तुम्हें स्वतंत्र बना देगा।-यूहन्ना(8-32) (49) मैं जो शिक्षा देता हूँ, वह मेरी अपनी शिक्षा नहीं है। -----यूहन्ना(14:1)(50) मुझमे निवास करने वाला पिता मेरे द्वारा अपने महान् कार्य सम्पन्न करता है-यूहन्नाा (14: 10)
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