नैश पीठ--- चिन्ता मुक्त आनन्द प्राप्ति का एक सरल मार्ग

नैश पीठ--- अााध्यात्मिक ऊर्जा केन्द्र          *-------*--------*--------*--------*------*-  यह नैशपीठ दरबार है,यह रामरूप दरबारहै।अध्यात्मिक ऊर्जा केन्द्र प्रेम का, मार्ग ओम शिव द्वार है।मिलती है हर वक्त प्रसादी,यहाँ  ज़रूरत  मंदों  को ,कृपा प्रभो की मिलती अविरत,बेबस  और  ज़ईफों  को। यहाँ टहल जो करता उसका,हो जाता उद्धार है।यह नैश पीठ दरबार है,यह रामरूप दरबार है ।नैश पीठ से रेकी ऊर्जा निसरित होती रहतीहै,चहुँदिशि दूर क्षितिज तक जाकर, भला जगत का करती है। यहाँ ध्यानजोकरताउसका,खुलता दसवाँ द्वार है। यह नैश पीठ दरबार है,यह रामरूप दरबार है।शमन वेदि पर हरि चिन्तन से,सुख वैभव नर पाता है, एवं अमृत जल सेवन से,रोग मुक्त हो जाता है।यहाँ दान जो करता उसका होता बेड़़ा पार है। यह नैश पीठ दरबार है, यह रामरूप दरबार है। ------गणेश प्रसाद तिवारी ( पीठाधीश्वर )   --गाँव-नरायनपुर जयसिंह,पोस्ट-चरसड़ी,   ज़िला- गोण्डा(उ०प्र०)पिन-२७१५०२              --मोबाइल; ९८३९५५४२४१                *-------*-----------*--------*-------*--------- 
  नैश पीठ का उदय:-------मैं के०यल०इण्टर कालेज कर्नलगंज,गोण्डा(उ०प्र०) से अवकाश प्राप्त प्रवक्ता गणेश प्रसाद तिवारी "नैश" हूँ। कल तक राजनीति में रहा। आयु के ढलान में मुझे ईँश्वर को जानने की इच्छा हुई। वेद, उपनिषद ,पुराण ,दर्शन आदि आर्ष ग्रन्थों को अथवा इनसे सम्बंधित अन्य रिषियों, महर्षियों,साधकों ,साधुओं, विद्वानों एवं अन्य धार्मिक रचनाकारों के आदर्श ग्रन्थों का अध्ययन करने का प्रयत्न किया, परन्तु उलझ गया। एक सामान्य मानव में आध्यात्मिक विचारों को ग्रहण करने की क्षमता कम होती है और शायद इसी कमी के कारण मुझमें इन तमाम महान ग्रन्थों को समझने की सामर्थ्य नहीं थी,परन्तु इनग्रन्थों के अध्ययन से एक लाभ हुआ,  जिसके कारण ईश्वर को जानने के प्रति जिज्ञासा और बढ़ गई। किसी मनीषी की एक पंक्ति ने "अंधकार मिटाने के लिए अपने हिस्से का दीपक स्वयं जलाना पड़ता है," मुझे सहारा दिया। ईश्वर क्या है ?और हम उस तक कैसे पहुँच सकते हैं ? इस आशय के सन्दर्भ में उन तमाम धार्मिक ग्रन्थों के मंथन से जो नवनीत निकला था,उसका आधा अधूरा, छुट-पुट भाव जितना भी हृदय में उतरा, उसका सहारा लेकर एक छोटी पुस्तक पद्य में सन् २०११ में लिखी,उसका नाम ब्रह्म ज्ञान है। इस पुस्तक का सार यह है कि यदि कोई साधक ईश्वर तक पहुँचना चाहता है तो उसे अपने चक्रों को और कुणडलिनी को जागृत करना होगा। इसके लिए चक्रों पर ओइम् शब्द से ठोकर देनी होगी। यह पुस्तक साधक को ईँश्वर तक पहुँचने के लिए एक सरल मार्ग दिखाती है।यही वह पल था जब नैश पीठ का उदय हुआ और यह पुस्तक नैश पीठ का संविधान बनी। समय धीरे धीरे बढ़ता गया। मुझे यह जानने की जिज्ञासा बढ़ी कि जो ईश दूत इस पृथ्वी पर आए, उनके अथवा स्वयं ईश्वर, जो इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ उसके बारे में अध्ययन किया जाए। आखिर इनसे बेहतर कौन जानेगा कि ईश्वर क्या है ? और उस तक पहुँचने का मार्ग क्या है ? मैने सनातन धर्म पर भगवान राम(नैशरामायण),भगवान कृष्ण(लीलाधरभगवानश्रीकृष्ण)महाभारत  (महाभारत की गाथा),अन्य अवतारों पर
मत्स्य अवतार,कूर्म अवतार ,वराह अवतार, 
नृसिंह अवतार,वामन अवतार ,परशुराम अवतार तथा सिक्ख धर्म के समस्त गुरुअों पर(सिक्ख गुरु गाथा) इस्लाम धर्म पर ह०   मुहम्मद स०(आमना के लाल),ह० हुसैन      (फातिमा के लाल),  इसाई   धर्म  पर         (पैगम्बर हज़रात; क़ुरान और बाइबिल के हवाले से) आदि पुस्तकें लिखीं। मेरी समझदानी छोटी थी। कुछ अधिक जानकारी हासिल नहीं हुई। आखिर इस छोटे से पात्र में बहुत समझ कैसे समा सकती थी।बस मेरी समझ में सिर्फ इतना    आया कि एक मुहाने तक सभी धर्म, साधक  को पहुँचा कर छोड़ देते हैं ,आगे की यात्रा स्वयं साधक को तय करनी होती है। तब वह ईश्वर तक पहुँच सकता है।
    २६ मार्च सन् २०२१ को नैश पीठ अध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र,नरायनपुर जयसिंह,  पोस्ट- चरसड़ी, ज़िला-गोण्डा(उ०प्र०)का उद्घाटन मा० स्वांत रंजन जी अखिल भारतीय समिति आर० एस० एस० के बौद्धिक प्रमुख के कर कमलों से अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष  मा० सुशील चन्द्र त्रिवेदी तथा गुरुदेव डा०  सूर्य पाल सिंह, गोण्डा की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ। नैश पीठ के दो प्रमुख उद्देश्यों  की जानकारी उस समय अतिथियों तक पहुँचायी गयी। पहला उद्देश्य--आम जनमानस में नकारात्मक भाव हटाकर       सकारात्मक भाव पैदा करना और दूसरा उद्देश्य--ज़रूरतमंदों की यथासम्भव मदद करना। नैश पीठ का अपना  विधान और  निशान है।                                           *---------*--------*--------)*---------*------- सामाजिक सद्भाव की बातें------                 नैशपीठ एक रजिस्टर्ड संस्था है। इसका पूरानाम(आध्यात्मिक,सामाजिक,साहित्यिक,सांस्कृतिक)ट्रस्ट है। इसके चार पक्ष हैं।   (१) आध्यात्मिक पक्ष--नैश पीठ का मानना है कि आज का मानव शान्ति, संतुष्टि, सुख     अथवा आनन्द इस संसार में ढूँढ रहा है,      जब कि यह संसार दुख का सागर है।मानव अशांत और अवसाद से भरा हुआ है। इसलिए नैशपीठ मानव जाति को ईश्वर की तरफ बुलाता है। ईश्वर की तरफ मुड़ते ही मानव को सुख, शान्ति और आनन्द की अनुभूति होने लगती है।अवसाद,तनाव और नकारात्मक सोच से बाहर आकर मानव में सकारात्मक भाव आने लगता है। वह सुख और शान्ति का अनुभव करता है।             (२) सामाजिक पक्ष--                             सामाजिक सद्भाव के लिए नैश पीठ विभिन्न वर्गों, समुदायों, धर्मों के लोगों को एक साथ बिठाकर आपसी मतभेद को दूर करने का   प्रयास करता है तथा ज़रूरतमंदों की यथा   संभव मदद करता है।                             (३)साहित्यिक पक्ष---                             साहित्यिक सोच को बढ़ावा देने के लिए नैश पीठ आश्रम पर एक पुस्तकालय है,     जिसमें विभिन्न घर्मों की पुस्तकों का विशाल  भण्डार है। भरपूर मात्रा में साहित्यिक       संवर्धन के लिए साहित्य उपलब्ध है। नैश पीठ  समय-समय पर कवि सम्मेलन और मुशायरा का आयोजन करके साहित्यिक     रचनाओं के माध्यम से सामाजिक सद्भाव   एवं साहित्य के उन्नयन हेतु प्रयत्नशील है।  (४) सांस्कृतिक पक्ष--                             नैश पीठ का एेसा मानना है कि अपनी राष्ट्रीय संस्कृति को बनाए रखने की प्रवृत्ति हम सबकी होनी चाहिए पुरानी रीति,रिवाज़  पाश्चात्य चकाचौंध में धूमिल हो रहे हैं।      सांस्कृतिक धरोवर को पीढ़ी दर पीढ़ी में     स्थानांतरित करने का दायित्व नैशपीठ जैसे संगठनों की ही है। नैश पीठ  अपने   इस दायित्व को निभाने के लिए कृत संकल्प है।   सामाजिक सद्भाव के लिए उपरोक्त चारो पक्षों के समावेशी कार्यक्रमों पर आधारित   एक वार्षिक नैशपीठ स्मारिका को लोगों तक पहुँचाने का प्राविधान नैशपीठ के विधान में शामिल किया गया है।                *---------*--------*---------*---------*------*  ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग:-------               ब्रह्माण्ड में तीन तत्व सनातन हैं----         (१) ईश तत्व (२) जीव तत्व ( ३) माया तत्व                                                     माया दो प्रकार की होती है---               (१) अविद्या माया(अज्ञान) (२) विद्या माया (ज्ञान)। अविद्या माया (अज्ञान) को , विद्या माया (ज्ञान) से हटाते हैं। परन्तु विद्या माया (ज्ञान) को हटाने के लिए साधना आवश्यक है। साधना पर कदम बढ़ाने के पहले प्रमुख विकारों  को समझना आवश्यक है।                     विकारों का रहस्य :----- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, अहंकार ,ईर्ष्या, भय, तनाव और अवसाद को अच्छी तरह से समझिए तथा मन को इनमें फँसाकर गंदा मत कीजिए, इसे अपने वश में रखिए और सदा सर्वदा सकारात्मक कार्य में लगाइए, नकारात्मक कार्य की ओर जाने से यत्नपूर्वक रोकिए,इसको प्रसन्न बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास कीजिए,इसके नौकर मत बनिए, इसे अपना आज्ञाकारी बनाइए। इससे कहिए कि मैं तेरा गुलाम नहीं,मैं तेरा मालिक हूँ। ईश्वर ने तुझे मेरे पास इसलिए भेजा है कि तू मुझे अच्छी राह पर चलाए और बुरे काम की ओर जाने से रोके।                 
*------*--------*--- ---*------*--------*-----*-माया,जीव और ईश्वर का रहस्य:---     अविद्या माया अर्थात अज्ञान , ज्ञान से हट जाता है। माया तत्व जड़ तत्व है जबकि जीव तत्व और ईश तत्व दोनों चेतन तत्व हैं। ईश तत्व सर्व व्यापक है परन्तु  जीव तत्व  केवल शरीर में व्याप्त है। माया तत्व   और जीव तत्व, ईश तत्व की शक्तियाँ हैं।     जीव, ईश्वर की शक्ति होने के कारण ईश्वर   का अंश कहलाता है जैसे आग और आग की चिंगारी अथवा सूर्य और सूर्य की रौशनी चिंगारी का अस्तित्व आग से है,अतःचिंगारी आग  का अंश है और रौशनी सूर्य का अंश है,तथापि आग, चिंगारी का अंशी हुआ एवं सूर्य रौशनी का अंशी हुआ,इसी  तरह ईश्वर जीव का अंशी है क्योंकि जीव का अस्तित्व केवल ईश्वर से है। जीव माया के अधीन है और माया ईश्वर केअधीन है,इसीलिए ईश्वर मायाधीश कहलाता है। जीव माया के प्रलोभन में अनादिकाल से फँसा हुआ है।आँख,कान,नाक,जिह्वा,त्वचा,के फँसाव के लिए माया क्षेत्र में तमाम वस्तुएँ उपलब्ध हैं। इन्हीं वस्तुओं के उपभोग में जीव सदा से संलग्न है। वस्तुओं  के उपभोग में मन की अहम् भूमिका होती है। वस्तुओं के उपभोग से जीव में संतुष्टि अथवा असंतुष्टि का भाव उत्पन्न करने वाला मन है। मन बहुत चंचल है। यह ईश दूत है।  यह मन वस्तुओं के उपभोग से जीव को संतुष्ट नहीं होने देता है। क्षणिक संतुष्टि के बाद पुनः उस वस्तु की माँग जीव करने लगता है। जब जीव को चाहत की वस्तु नहीं मिलती है, तब क्रोध उत्पन्न होता है।   जब जीव को चाहत की वस्तु मिल जाती है, तब उस वस्तु के प्रति चाहत और बढ़ जाती  है अर्थात् लोभ बढ़ता है ,यह लोभ निरंतर बढ़ता ही जाता है। उपभोग के लिए वस्तुओं की चाहत ही काम कहलाता है।यही कामना है।मनुष्य की कामनाएँ अनन्त  होती हैं। कामनाओं की पूर्ति के लिए (उपभोग के लिए)वस्तुओं को उपलब्ध कराने वाले के प्रति मोह उत्पन्न हो जाता है और जो उपभोग के लिए वस्तुओं को उपलब्ध कराने में बाधक होता है, उसके प्रति घृणा उत्पन्न होती है।जब चाहत की वस्तु दूसरे के पास पहुँच जाती है,तब उसके प्रति ईर्ष्या उत्पन्न होती है।जब दूसरों के उपभोग की वस्तु अपने पास आ जाती है, तब मद उत्पन्न हो जाता है। यही मद जब स्थाइत्व ग्रहण कर लेता है, तब अहंकार     उत्पन्न हो जाता है। साधना से अन्य विकार तो हट(गल) जाते हैं, पर अहंकार व्यक्ति के  जीवन से इस प्रकार चिपक जाता है कि यह साधना से भी नहीं हट पाता है,   यह साधना में भी बहुत बाधा पहुँचाता है।यह व्यक्ति का मरणांतक विकार कहलाता है।   यहाँ तक कि यह व्यक्ति के जीवन को भी छीन लेता है। जब व्यक्ति के मन के अनुकूल कार्य संपन्न नहीं होता है तब व्यक्ति में तनाव उत्प्पन्न होता है, निरंतर प्रतिकूलता की स्थिति में व्यक्ति में अवसाद उत्पन्न हो जाता है।यहभी मरणांतक विकार  कहलाता है। यदि समय रहते व्यक्ति के अवसाद को हटाने का यत्न नहीं किया जाता है तो यह अवसाद भी व्यक्ति  का जीवन छीन लेता है।  तनाव से  ही    भय उत्पन्न होता है। व्यक्ति को लगता है अथवा व्यक्ति के कल्पना में आता है किइस स्थिति  का कारण कोई वस्तु अथवा कोई व्यक्ति    है। जिससे उस वस्तु अथवा उस व्यक्ति से  भय का भाव उत्पन्न होता है। निरंतर साधना से भय और तनाव गल जाते हैं।      उपभोग की वस्तुएँ ही माया कहलाती है।   जैसा कि हम जानते हैं कि जीव माया के अधीन है और ईश्वर मायाधीश है। जब जीव को इस वास्तविकता का ज्ञान हो जाता है,   तब वह माया की ओर से मुख मोड़ कर      ईश्वर की तरफ अपना मुख कर लेता है।     ज्यों ही जीव ईश्वर की तरफ मुड़ता है, जीव  जो अशांत था,वह अब शांति का अनुभव करता है, जीव जो पहले असंतुष्ट था,अब उसमें संतुष्टि का भाव सृजित हो जाता है     और तब व्यक्ति आनन्द की प्राप्ति के लिए   अथवा विद्या माया को हटाने के लिए साधना में लग जाता है।                               साधना के लिए सर्व प्रथम हम चक्रों और कुण्डलिनी को जागृत करते हैं।                  *--------*--------*--------*-------*-------*     चक्रों के जागृत करने की विधियाँ अथवा     कुणडलिनी जागरण:-----------                  हृदय स्थल में जीव और ईश्वर दोनों विद्यमान हैं। मन ईश दूत है, जो जीव को भ्रमित करता रहता है। साधना से मन को    एकाग्र करते हैं।चक्रों को जागृत करने की हर क्रिया में मन का लगाव होना आवश्यक है। लगातार अभ्यास से मन क्रिया में लगने लगता  है।                                              (१) रेकी विधि से :--                             हथेली को आपस में रगड़कर अथवा प्राणायाम के द्वारा हथेली में ईश्वरीय ऊर्जा को लेकर सभी सात चक्रों को स्पर्श करके जागृत करते हैं। इस ईश्वरीय ऊर्जा से चक्रों में स्वतः संतुलन तथा ईश तत्व और पार्थिव  तत्व में सामंजस्य स्थापित होता है।(रेकी  प्रथम एवं द्वितीय चैनल की पुस्तक का सहारा लेकरअभ्यास कीजिए)
 (२)ओम् शब्द की ठोकर से:--                   ओम् शब्द को आज्ञाचक्र के अंदर प्रवेश करके सभी चक्रों पर ओम् शब्द की ठोकर से चक्रों को जागृत करते हैं।(ब्रह्म ज्ञान की पुस्तक का सहारा लेकर अभ्यास कीजिए) (३)सांस पर ध्यान लगाकर:------               ऊपर सांस ले जाते समय ओम् तथा नीचे सांस छोड़ते समय शिव कहते हैं। ऊपर ले जाते समय तथा नीचे निकालतेे समय सांस को चक्र से ही गुज़ारना होता है। सांस को मूलाधार क्षेत्र से क्रमशःस्वाधिष्ठान,मणिपुर,  हृदय, विशुद्ध ,आज्ञा से होकर सहस्रार क्षेत्र तक लाते हैं फिर सहस्रार क्षेत्र से क्रमशः     आज्ञा, विशुद्ध, हृदय, मणिपुर स्वाधिष्ठान से लाकर मूलाधार पर छोड़ देते हैं। प्रारम्भ में सांस को मणिपुर से क्रमशः हृदय, विशुद्ध,   आज्ञा से होकर सहस्रार तक लाते हैं फिर   सहस्रार से क्रमशः आज्ञा, विशुद्ध, हृदय से   लाकर मणिपुर पर छोड़ देते हैं। यही क्रिया  बार-बार दोहराते हैं।(साक्षी ध्यान की पुस्तक का सहारा ले सकते हैं)।
        इन तीन विधियों से एक साथ अथवा  केवल एक विधि से अभ्यास करने पर        समस्त विकार शनैः शनैः गल जाते हैं। चक्रों के जागृत होने पर कुणडलिनी स्वतः जागृत  हो जाती है, जिसकी अपार ऊर्जा से दसवां  द्वार जो अंदर से बाहर की ओर खुलता है,  खुल जाता है। दसवाँ द्वार को छठी इंद्रिय, तृतीय नेत्र  अथवा आज्ञाचक्र भी कहते हैं ।  केवल हृदय चक्र या आज्ञाचक्र पर ध्यान लगाकर अथवा इन  पर ओम की ठोकर देकर भी समस्त चक्रों को जागृत कर सकते हैं। दसवाँ द्वार खुलते ही साधक अंदर से बाहर ईश्वरीय क्षेत्र(शिव लोक) में आ जाता है। यहाँ पर शिव गणों का पहरा रहता है।    इन गणों की परीक्षा में उत्तीर्ण होना होता है। इनकी परीक्षा में असफल रहने पर ये गण साधक को अंदर ढकेलकर द्वार को पुनः बंंद कर लेते हैं। साधक को फिर से साधना करके दसवें द्वार को खोलना होता है। शिव लोक से ईश्वरीय धाम(गो लोक धाम)अथवा परम धाम (सत लोक)तक पहुँचने का केवल एक मार्ग होता है,  जिसे  साधक को स्वयं तय करना होता है।.  इस   यात्रा में ईश्वर के प्रति साधक कासमर्पण भाव जितना अधिक गहरा होता है ,यात्रा उतनी ही सरल होती है।
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